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लखनऊ वापसी क्यों

१९७८ में आगरा में मकान ले कर बस चुकने के बाद क्या केवल पुत्र के आग्रह पर ही वापिस आया अथवा लखनऊ से लगाव पहले से ही था यह बताना भी बेहद जरूरी है.आगरा में १९८६ में राजनैतिक गतिविधियों में सक्रीय भाग लेना शुरू किया और शहर छोड़ने तक २३ वर्षों में सिर्फ एक बार ही दिल्ली प्रदर्शन में गया जबकि लखनऊ प्रदर्शन के हर अवसर का उपयोग लखनऊ आने में किया.एक तो लखनऊ खुद का जन्म स्थान था दुसरे बाबूजी का बचपन और शिक्षा-दीक्षा लखनऊ में होने के कारन लखनऊ का ज़िक्र होता ही र्रेहता था.डाली गंज में बाबु जी ने फूफा जी के प्लाट के बगल में मकान बनवाने के लिए ज़मीन भी खरीदी थी लेकिन दोनों ही मकान न बना सकेऔर ज़मीन बेचनी पड़ी.बाबु जी कालीचरण highschool में पढ़ते थे,खेल कूद में सक्रीय थे.टेनिस में senior boyz association के पंडित अमृत लाल नागर के साथ भी बाबु जी खेले हैं और पत्रकार राम पाल सिंह भी बाबु जी के खेल के साथी थे.का.भीका लाल तो बाबु जी के रूम त्य्पिस्त और और व् ही अ.लत में में हस्ती बने तो बाबु जी का उनसे संपर्क टूट गया.एक प्रदर्शन के दौरान का.भीका लाल से मैने भेंट की तो उन्होंने शिकायत भी की कि वह उनसे क्यों नहीं मिलते लेकिन उन्होंने संतोष भी जताया था कि वह खुद न मिले लेकिन अपने बेटे को तो भेज दिया.पुराने लोगों में बेहद आत्मीयता थी.१९३९ में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बाबु जी तो फ़ौज में चले गए थे; भीका लाल जी तहसीलदार बन गए थे फिर नौकरी छोड़ कर राजनीती में आगये थे और उत्तर प्रदेश भारतीय कम्मुनिस्ट पार्टी के सचिव भी बने.युद्ध समाप्त होने के बाद बाबु जी खेती देखने के विचार से दरियाबाद आगये थे.लेकिन वहां भाइयों का अनमना व्यवहार देख कर खिन्न हो गए.सात साल लड़ाई के दौरान पूरा वेतन बाबु जी ने बाबा जी को भेजा उसका भी कोई return नहीं मिला.लड़ाई के दौरान बाबु जी की unit के कंपनी कमांडर ने लखनऊ में Lt. col. हो कर C .W. E. बनने पर बाबु जी से फिर से नौकरी करने को कहा जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया.इस प्रकार हम लोगों को लखनऊ में जन्म से ही रहने का अवसर मिला.जिन लोगों का ,जिन लोगों कि संतानों का बाउआ – बाबु जी के प्रति बर्ताव ठीक नहीं रहा उनका कोई जिक्र अपने संस्मरणों में नहीं कर रहा हूँ. जो लोग मेरे माता-पिता के साथ ठीक-ठाक रहे सिर्फ मुझे ही ठुकराया है उनका उल्लेख जरूर किया जा रहा है५ या ६ वर्ष का रहा होऊंगा तब बड़े मंगल पर अलीगंज मंदिर में में भीड़ में छूट गया था.बाउआ महिला विंग से गयीं.नाना जी ने अजय को गोदी ले लिया और बाबु जी शोभा को गोदी में लिए थे मैने बाबु जी का कुरता पकड़ रखा था.पीचे से भीड़ का धक्का लगने पर मेरे हाथ से बाबु जी का कुरता छूट गया और मैं कुचल कर ख़तम ही हो जाता अगर एक घनी दाढ़ी वाले साधू मुझे गोद में न उठा लेते तो.वे ही मुझे लेकर बाहर आये और सब को खोजने के बाद एक एकांत कोने में मुझे रेलिंग पर बैठा कर खड़े रहे उधर नाना जी और बाबु जी भी अजय और शोभा को बाउआ के सुपुर्द कर मुझे ढूंढते हुए पहुंचे और खोते-खोते मैं बच गया.इसी प्रकार जब मामा जी लखनऊ university की और से रिसर्च के लिए आस्ट्रेलिया जाने हेतु बम्बई की गाडी से जा रहे थे तो अजय को चारबाग platefarm से कोई बच्चा चोर ले भागा.तुरंत mike से anauncement कराया गया तो घबरा कर उस आदमी ने अजय को ओवर ब्रिज पर छोड़ दिया जिसे मामा जी के छोटे साले ने देखा और गोद में ले आये तभी मामा जी बम्बई के लिए रवाना हुए वर्ना यात्रा रद्द कर रहे थे.मामा जी की बेटी की शादी में शोभा की बड़ी बेटी भी बादशाह बाग़ की कोठियों में खो गयी थी.सब लोग उसे खोज रहे थे और एक धोबी पुत्र रत्ना को साइकिल पर लिए घर-घर पूछ रहा था.मुझे देखते ही रत्ना रोते हुए मेरे पास आगई.लखनऊ में मैं ,भाई और भांजी खोते-खोते बचे.लखनऊ खोने की नहीं पाने और मिलने की धरती रही है.बाबु जी नहीं बना सके लखनऊ में मकान तो आगरा से हट कर मैं बस गया जो बाबू जी का सपना था मैंने पूरा कर दिया।

Typist-Yashwant

 

लखनऊ में बीता बचपन

न्यू हैदराबाद के एक स्कूल में भी कुछ समय गया और हुसैन गंज कि राष्ट्रीय पाठशाला में भी पढ़ा तथा बहुत कम समय दुगांवा में रहने का कुछ भी याद नहीं है.हुसैन गंज में नाले के पास बनी फखरुद्दीन मंजिल के एक हिस्से में जब आकर रहे तभी पहले बाबु जी का विचार बंगाली बोयस स्कूल में भेजने का था लेकिन फिर डी पी निगम girls जू हा.स्कूल में दाखिला करा दिया जहाँ दूसरी से चौथी क्लास तक पढ़ा.शिक्षा का माहौल अच्छा था,सिलाई और संगीत की भी शिक्षा दी गयी.संगीत की क्लास में लड़कों को गेंद और लड़कियों को रस्सी कूदने का खेल भी कराया जाता था.चौथी क्लास में कुछ सामने तक व्रद्ध बंगाली पुरुष Mathes पढाने आये जो गलत करने वाले लड़के और लड़कियों दोनों को बुरी तरह स्केल से पीटते थे उन्हें बहुत जल्दी हटा दिया गया.प्रभात कमल श्रीवास्तव नामक एक साथी से बहुत प्रगाढ़ता हो गयी थी उसके पिता जी शायद डॉक्टर थे इसलिए वह कभी कभी विजय मेडिकल हाल और बगल के खद्दर भण्डार में हमें भी साथ ले जाता था.सिर्फ उसीके साथ ही बऊआ मुझे और छोटे भाई अजय को भेज ती थीं.वह अक्सर सरकारी दफ्तर में लगी जंगल जलेबी तोड़ेने के लिए खड़ी जीपों पर भी चढ़ जाता था।

आज सड़कें चौड़ी हो गयी हैं लेकिन बड़े divider भी लग गए हैं तब हम लोग स्कूल जाते आराम से सड़क पार कर लेते थे तब ये divider नहीं थे शायद उनकी जरूरत भी नहीं थी लोग नियमों का पालन करते होंगे.barlington होटल में ही पोस्ट ऑफिस था दोनों भाई जाकर postcard वगैरह बड़े आराम से ले आते थे और सड़क के उस पार हलवाई से किसी मेहमान के आने पर समोसा वगैरह भी ले आते थे.तब समोसे का रेट एक आना था.आज जितनी रु.में एक समोसा मिलता है तब ४८ मिल जाते.सदर में राम लीला देखने या अमीनाबाद पैदल ही जाते थे कहीं सड़कों पर परेशानी नहीं होती थी.सबसे छोटे होने के कारन बहन शोभा को तो बऊया बाबु जी गोदी में लेलेते थे,हम दोनों भाईयों को पैदल सड़क पर चलने या पार करने में कोई परेशानी नहीं हुई।
१९६० में जब जी.पी.ओ.तक बढ़ का पानी आ गया था तब हमारी भुआ,फूफाजी सपरिवार अपने सप्रू मार्ग के मकानमें ताला लगा कर आ गए और बढ़ उतरने के बाद ही वापिस गए थे.उन दिनों हर इतवार को बाबु जी मेरे लिए ५ पैसा कीमत का ”स्वतंत्र भारत” ले देते थे.हमारे फुफेरे भाईयों को यह अच्छा नहीं लगता था.उनमें से छोटे वाले हमारी ही कोलोनी में सिर्फ १ कि.मी.कि दूरी पर रहते हैं लेकिन जो फासला एक अमीर एक गरीब के साथ रखता है वही वह भी रख रहे हैं-अब भूल चुके हैं कि कभी हमारे घर पर बाढ़ पीड़ित बन कर भी रहे थे।

न्यू हैदराबाद में हमारे मामाजी डाक्टर कृपा शंकर माथुर भी रहते थे उनके घर,भुआ के घर और बाबु जी के मामाजी के घर ठाकुरगंज भी हम लोग जाते थे.बाबु जी के ममेरे भाइयों में एक श्री गंगा प्रसाद जलेसरी नामी वकील और एक श्री दुलारे लाला माथुर I.A.S.का व्यवहार बाबु जी के साथ मधुर रहा.हमारे ममेरे भाई भी यहीं शहर में हैं लेकिन रिश्ते निबाहने में वही दिक्कत है जो दौलतमंद महसूस करते हैं.निवाज गंज में बाबु जी के फुफेरे भाई स्व.रामेश्वर दयाल माथुर रहते थे उनका भी मधुर व्यवहार बाबु जी के साथ था.ताई जी (बाबु जी की फुफेरी भाभी) ने तो मेरे छुटपन में मेरे बीमार पड़ने पर अस्पताल की काफी दौड़-धुप की और बऊआ को ज़रा भी तकलीफ नहीं होने दी.१९६१ में बाबु जी का तबादला बरेली हो गया तो शहर छूट गया.
 

लखनऊ तब और अब

जनम से १९६१ तक लखनऊ में रहने के बाद गत वर्ष अक्टूबर में पुनः लखनऊ वापसी हुई.तब से अब तक के लखनऊ में न केवल छेत्रफल कि दृष्टि से बल्कि लोगों के तौर तरीकों और आपसी व्यव्हार में भी बेहद तब्दीली हो चुकी है.१९८१ में जब कारगिल में नौकरी के सिलसिले में था तो टी बी अस्पताल के सीऍमओ साः ने बोली के आधार पर कहा था कि क्या आप लखनऊ के हैं.९ वर्ष कि उम्र में शहर छोड़ेने के बीस सालों बाद भी बोली के आधार पर मुझे लखनऊ से जोड़ा गया था.लेकिन ४९ साल बाद वापिस लखनऊ लौटने पर यहाँ के लोगों ने मुझे बाहरी माना है.तब हुसैन गंज में रहता था,मुरली नगर के डी पी निगम गिर्ल्स जू.highschool में पढता था और अब कचहरी से लगभग १० कि मी दूर नई कोलोनी में रहता हूँ.लखनऊ की नई कोलोनियों में लगभग ८०% लोग बाहर  से आकर बसे हैं और लखनवी तहजीब से कोसों दूर हैं वे ही मुझे बाहरी मानते हैं.अपने नजदीकी रिश्तेदार भी मेरे लक्नाऊ वापिस आ जाने से असहज महसूस कर रहे हैं.हकीकत यह है कि अपना ३१ वर्ष पुराना जमा-जमाया माकन बेच कर उसके आधे से भी छोटा मकान लेकर नयी कोलोनी में रहना उनको भारी अखर गया है जब कि अपना पहला मकान भूखे रहकर या,चना-परमल पर भी गुज़ारा करके १५ सालों कि किश्तें चुका  कर बना पाया था और उसी को बेच कर बहुत छोटा सा महंगा मकान मिल पाया है. कहीं से भी किसी से भी एक चुटकी धूळ या एक भी गिट्टी खैरात में लेकर या उधार में ले कर गुजारा  नहीं किया,यही उन दौलत वालों को खटकता है.लोगों को ईमानदारी और मेहनत से गुज़र-बसर करना सुहाता नहीं है और वे पेशे पर हमला करते हैं.जो ज्योतिषी बेईमानी,ढोंग और पाखण्ड पर चलते हैं उन्हें भी मेरा इमानदारी और वैज्ञानिक आधार पर  चलना नहीं सुहाता है.यह सब लखनवी कल्चर के खिलाफ है लेकिन लखनऊ उन्हीं का है
photo by mr.kartik mathur
लखनऊ से बरेली वहां से शाहजहाँ पुर जहाँ से सिलिगुरी फिर शाहजहाँ पुर और मेरठ रहकर आगरा पहुंचे और अपना मकान बना कर बस गए.मेरठ कॉलेज में पढाई के दौरान छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष से फ़िराक गोरखपुरी का यह कथन सुनकर आगरा बसने का फैसला किया था की,यु.पी.में जितने आन्दोलन मेरठ -कानपूर डायगोनल  से शुरू हुए विफल रहे जबकि बलिया-आगरा डायगोनल  से शुरू आन्दोलन पूरे यू.पी. में छा कर देश में भी सफल रहे.आगरा के अब के लोगों में वह राजनीतिक  समझ नहीं देखी  उनकी बेरुखी और पुत्र के आग्रह के कारन पुनः लखनऊ आने का फैसला किया ,अभी तो पूरी तरह सेटल भी नहीं हो सके हैं –देखते हैं की क्या यहाँ रह कर देश के लिए कोई राजनैतिक योग दान दे सकता हूँ या नहीं.”जननी जन्मभूमिश च स्वर्गादपि गरीयसी” कहा तो जाता है लेकिन मेरी जनम भूमि लखनऊ और यहाँ के लोग मुझे देश-समाज के हित में कुछ करने देने में कितना सहयोग करते हैं –यही देखना –समझना बाकी है.उम्मीद छोड़ी नहीं है.

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 १३ अप्रैल २०११ को ‘हिन्दुस्तान’ लखनऊ में छपा आदरणीय के. पी. सक्सेना साहब और १७ अप्रैल २०११ को सैय्यद हैदर अब्बास रजा साहब  के कथन से भी लखनऊ वासियों के चरित्र में बदलाव की पुष्टि होती है –

 
 
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