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आगरा/१९७८-७९

आगरा आये थे राजनीतिक लक्ष्य के तहत,युनियन से दूर रहना चाहते थे और थुप गई गंभीर जिम्मेदारी.काम ओढ़ लिया तो करना था पूरी क्षमता से.अतः जब यूनियन के रजिस्ट्रेशन के लिए एक इन्स्पेक्टर जैन साहब उप-श्रमायुक्त कार्यालय,आगरा में पधारे तो मैंने उनके समक्ष महेश नानाजी का जिक्र कर दिया जो मेरठ से डिप्टी चीफ   इन्स्पेक्टर आफ फैक्टरीज होकर कानपुर गए थे. हालांकि उस वक्त वह रिटायर हो चुके थे.परन्तु जैन साहब ने कहा वह हमारे बॉस रहे हैं और तुम उनके रिश्तेदार हो और युनियन के सेक्रेटरी हो तो समझो इंस्पेक्शन हो गया और यूनियन रजिस्टर्ड हो गई इस आशय का लेटर डाक से भेज देंगे.सच में जैन साहब ने अपना वायदा पूरा किया और ०३.०४ .१९७८ की ता.में यूनियन रजिस्टर्ड होने का लेटर हमें जल्दी ही मिल गया. 
उधर लखनऊ से भी ०३ .०४ .१९७८ को ही मुझे कमला नगर ,आगरा में बी -५६० न. का मकान एलाट होने का लेटर तत्काल मिल गया.प्रथम किश्त जमा करने की आख़िरी ता. से पहले १० अप्रैल को रु.२९०/-सेन्ट्रल बैंक कमला नगर आगरा में जमा कर दिए.
इत्तिफाक से ०३ अप्रैल को ही अलीगढ़ में बहन को भी पुत्री रत्न की प्राप्ति हुयी.यह भान्जी शुरू से ही कमजोर और बीमार रही जिसकी फ़िक्र हमारे बउआ -बाबूजी को परेशान किये रही. यूनियन की कारवाई,मकान की प्रक्रिया और भांजी के शीघ्र स्वास्थ्य के लिए उपाए तलाशना  सभी काम महत्वपूर्ण थे.हमारे स्टाफ के साथियों ने पूरी मदद की. बहन के जेठ के मित्र बाल रोग विशेग्य थे और बिरादरी के ही थे उन्होंने तथा वहां के पंडित ने भान्जी के जीवन के लिए ख़तरा बताया था.मैं तब तक ज्योतिष में पारंगत नहीं था.लेकिन पंडित वाद का प्रबल विरोधी था.मैंने काफी पहले जब मकान एलाट होने की कोई सूचना भी नहीं थी और प्रताप नगर के मकान में किराए पर थे तभी एक स्वप्न देखा था कि हम अपने मकान में हैं और बाहर के खुले कच्चे हिस्से में यह भान्जी ईंटों के कंकडों के  ढेर पर खड़े होकर सड़क पर फेंकती जा रही है.अर्थात मैं पूर्ण आश्वस्त था कि भान्जी सकुशल रहेगी.जब बहुत बाद में ऐसा ही हुआ तो मैंने बउआ को प्रत्यक्ष दिखा कर उस स्वप्न का जिक्र याद दिलाया था.
बाबूजी अलीगढ़ जाकर बहन और भान्जी से मिल आये थे और भान्जी की फिजिकल पोजीशन देख कर निराश थे.मैंने उस समय के अपने ज्ञान के आधार पर खराब ग्रहों के समाधान हेतु कुछ जडी-बूटियाँ एकत्र कीं और उनके विशिष्ट रेशमी कपड़ों में ताबीज बना कर अलीगढ़ ले गया.बहन जी की सास साहिबा ने कहा कि वे लोग इस पर विशवास नहीं करते हैं फिर भी मामा के नाते लाये हो तो अपने हाथ से ही पहना जाओ और मैंने उनके निर्देश का पालन किया.खिन्नी की जड़ एक सहकर्मी ने अपने घर के पेड़ से खोद कर ला दी तो दुसरे ने केले की जड़ ला दी ,अनंत मूल की जड़ हमने रावत-पाड़ा से खरीद ली.सफ़ेद चन्दन का ताबीज उन लोगों ने मेरे परामर्श पर वहीं तैयार कर लिया और बाद में पहना दिया. 
चूंकि अलीगढ़ी पंडित ने आठ माह भारी बताये थे अतः बहन के श्वसुर साहब ने वातावरण बदलने के नाम पर बाबूजी से बहन और भान्जी को आगरा ले आने को कहा.इस दौरान १२ नवम्बर १९७८ को हम लोग अपने मकान में कमला नगर आ चुके थे अतः उस मकान में ही भान्जी आयी.(मकान लेने की औपचारिकताएं,अड़ंगे एवं समाधान अगली बार)
होली के बाद बहन के श्वसुर साहब और सास साहिबा अपनी पोती को देखने हमारे घर आये जब उन्हें पूर्ण तस्सल्ली हो गई कि वह पूर्ण स्वस्थ है और उनके पंडित ने झूठा बहका दिया था (या वह समाधान नहीं जानते होंगे या ठगना चाहते होंगे) तब लौट कर बहन और भान्जी को बुलवा लिया.
जब मेरा ज्योतिषीय प्रयोग भान्जी पर सफ़ल रहा तो मैंने तन्मयता से  इस ज्ञान को बढ़ाया किन्तु पोंगा-पंथ से हट कर शुद्ध वैज्ञानिक आधार पर.
 

पैसा ,पोस्ट,रिश्ता,रीति-रस्म /आगरा-१९७६-७७(भाग ५)

बचपन में जब लखनऊ से शाहजहांपुर नानाजी के पास जाते थे या जब दिल्ली मौसी के पास गए थे या यहीं लखनऊ में ही मामाजी या भुआ के घर जाते थे तो खुशी ही होती थी और ऐसा भी एहसास कभी नहीं हुआ कि जहाँ कहीं गए उन लोगों को अच्छा नहीं लगा ;परन्तु ये बातें लगभग ५० वर्ष या और अधिक  पूर्व की हैं.अब यहाँ लखनऊ पुनः आने पर हमारे लखनऊ आने के प्रबल विरोधी रिश्तेदार जब यहाँ हमारे घर होकर गए तो लगा कि यदि वे अब तक न आये थे तो ही ठीक था. अब रिश्तों का कोई  महत्त्व नहीं है ,अब तो बस केवल पैसा और पोस्ट का महत्त्व है.जो पैसे या पोस्ट में बड़ा है वह खुद को रिश्ते में बड़े से भी अधिक बड़ा मानता है.पुराने संस्कार ,रीति-रिवाज जाने कैसे उड़न-छू हो गए हैं.
हमारे एक रिश्तेदार जो पोस्ट में सेमी-इंजीनियर कहे जा सकते हैं और स्वभाविक रूप से पैसे में बलशाली हैं अपने से बड़े रिश्ते को न मान कर खुद अपनी तान उस पर चलाना चाहते हैं.३०  -३५ वर्ष से उनकी यही तान चल रही थी तब तक तो ठीक था.अब जब रिश्ते में छोटे उन सेई सा :की सारी की सारी पोल-पट्टी खुल कर उजागर हो गयी तो वह जैसा अक्सर कहते रहे उसी अनुसार  रिश्ता ख़त्म मानने की कारवाई पर उतर आये.दरअसल आये तो वह अपनी भतीजी की शादी में थे,परन्तु शिष्टाचारवश उनसे अपने झोंपड़े पर आने को कह दिया था सो वह शादी से निवृत होकर पधारे थे.उनकी बड़ी बेटी ,दामाद और धेवती भी कुछ घंटों हेतु आये थे जब तक वे लोग रहे सेई सा :और उनकी श्रीमतीजी ठीक रहे उनके विदा होते ही अपनी फ़ार्म में आ गए.
नीचे यशवंत के साईबर में बैठ कर उसके तथा मेरे पोस्ट पढते रहे उतना तो ठीक था.,परन्तु उसकी मेन टेबिल के नीचे सिगरेट के जले टुकड़े डाल देना बिलकुल  अनुचित था जो उन्होंने किया.या तो वह आग लगा देना चाहते रहे या कुछ टोटका वगैरह किये होंगे ,अन्यथा ऐसा नहीं करना चाहिए था.उनकी श्रीमती जी को भी आर.एस.एस.के ब्लागर्स द्वारा की टिप्पणियाँ पसंद आयीं.यह भी रहस्य उजागर हुआ कि संभवतः उनकी छोटी बेटी ने खुद या किसी द्वारा फेक आई.डी.के जरिये कुछ ब्लागर्स संभवतः आर.एस.एस.से सम्बंधित को मेरे विरुद्ध बरगलाया अतः ऐसे ब्लागर्स ने समय-समय पर अनर्गल टिप्पणियाँ कीं उनमें कुछ एहसान फरामोश भी निकले क्योंकि उनके कल्याणार्थ मैं उन्हें कुछ स्तुतियाँ ई.मेल कर चुका था.ब्लागर्स तो बाहरी लोग थे लेकिन हमारे रिश्तेदार दम्पति को ऐसे लोग अच्छे लगे यह बात रहस्यपूर्ण लगी.इतना ही नहीं चलते समय औपचारिकता एवं परम्परानुसार जो टीका करके गोला-बताशे सेई सा :को दिए वे सब उन्होंने यहीं छोड़ दिए -बहाना फ्लाईट से जाने का किया.किन्तु जो शुगन हेतु रु.उन्हें दिए थे उन्हें ले जाने में कोई दिक्कत न होती फिर भी उसके दुगने करके दोनों लोग यशवंत को दे गए.मतलब यह हुआ की वे छोटे होकर भी हम से लेंगे नहीं क्योंकि छोटे तो रिश्तों में है;वस्तुतः पोस्ट और पैसा में वे हमसे वरिष्ठ हैं और इसी लिए दुगुना करके लौटा गए इतना ही नहीं एक और परंपरा है कि कहीं से आने के बाद तुरंत नहाते नहीं हैं.वैसे इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि गति के नियम के अनुसार आने-जाने से शरीर में गर्मी या ऊर्जा आ जाती है और पानी से नहाने पर ठंडा -गर्म होकर शरीर को क्षति पहुंचाता है इस तथ्य को पूर्वजों ने शगुन -बद -शगुन के साथ जोड़ दिया.जब ये लोग अपनी भतीजी की शादी के बाद दिन के दो बजे टेम्पो से हमारे घर आये तो नहीं नहाए  क्योंकि भतीजी का शगुन खराब नहीं करना था.जब हमारे घर से अपने घर पहुंचे तो रात के दस बजे दोनों-जन नहाए तब शगुन की बात नहीं थी.सेई सा :के जन्म-दिन पर मैंने उनके लिए ई.कार्ड ग्रीटिंग हेतु भिजवाया था,यशवंत ने उसे गलती से अपनी ई.मेल आईडी से भेज दिया था.अतः यहाँ आने पर उन्होंने यशवंत को फटकारा कि फालतू ई.मेल मत किया करो.ग्रीटिंग भेजना फालतू बात है !तो मुझे कहते मेरी तरफ से और मेरे नाम से था.ठीक है भविष्य में अब उन्हें कोई ग्रीटिंग उनकी इच्छानुसार नहीं भेजेंगें इससे पूर्व उनके छोटे दामाद भी यशवंत को ई.मेल भेजने पर फटकार चुके थे.और उनकी छोटी बेटी ने उसके बाद फेस बुक से यशवंत का नाम अपनी लिस्ट से हटा दिया था…
एक पी.सी.एस.आफीसर किसी प्रकार मेरे मित्र बन गए थे (किसी डिपार्टमेंटल मजबूरी में) उनका एक कथन मुझे बेहद प्रिय है-“पैसे वालों को जूते की ठोकर पर रखते हैं”उनके इस कथन को मैंने भी आत्मसात कर लिया है और ज्यादातर पूरा-पूरा अमल भी किया है.अब इन रिश्ते में छोटे लोगों को ठोकर तो नहीं मार सकते परन्तु जब वे रिश्ता नहीं मानते तो हम भी रिश्ता मानने के लिए बाध्य  नहीं है और उनके आगे झुकें क्यों?
१९७ ६ -७७  (भाग-५) 
हमारे इस किराए के मकान में एक एयर-फ़ोर्स के सा :अपने क्वार्टर में चले गए तो बाबू जी ने उनका कमरा भी किराए पर ले लिया क्योंकि कमलेश-बाबू पहली बार अपनी शादी के बाद आ रहे थे.उनसे बउआ ने जिक्र किया कि यह (मेरी तरफ इशारा करके) मेरी बात मान कर अब मकान लेने की प्रक्रिया चला रहा है.उन्होंने त्वरित उत्तर दिया कि हाँ अब तो यही ले सकते है ,अब बाबू जी कैसे ले सकते हैं?वह लेंगे तो उन्हें तीन लेने पड़ेंगें.वह तो एक-दो दिन में चले गए एक माह बाद बाबूजी ने पोपली सा :से कहा यह अतिरिक्त कमरा अब नहीं रखेंगें.वह राजी तो हो गए पर उन्हें अच्छा नहीं लगा ,पहले वाली सौम्यता नहीं रही.अब हमारे सामने फिर नया मकान खोजने की समस्या थी. मैंने बाबूजी से कहा इस बार मुझे अपने तरीके से देखने दीजिये क्योंकि अपना मकान एलाट होने पर फिर छोड़ना ही होगा. मैंने अपने होटल के एक ठेकेदार सुराना सा :से जिक्र किया जो बहुत मदद करने का प्रस्ताव करते थे. उन्होंने अपने घर के सामने प्रताप नगर में एक मकान दिला दिया जिसका एक कमरा मकान मालिक ने अपने लिए बन्द कर रखा था.
उल्टी गंगा 
दत्त सा :के कार्यकाल की इस घटना का उल्लेख न किया तो अकाउन्ट्स के जानकारों को जायकेदार मेथड से वन्चिंत रखना होगा.एक वर्ष लेजर आदि सब अधूरे थे और हेड क्वार्टर से समय निर्धारित हो गया जब तक अपनी यूनिट की बेलेंस शीट भेजनी थी. दत्त सा :ने अपने कागजों पर प्राफिट तय करके बेलेंस शीट बना कर भेज दी और हमें ट्रायल बेलेंस देकर कहा इस हिसाब से लेजर तैयार कर दो.अब हमें हर अकाऊंट का बेलेंस उस हिसाब से बैठाने  हेतु एंट्रीज अपने हिसाब से बनानी थीं जबकि होता यह है कि जो नेट बेलेंस होता है उसे ट्रायल बेलेंस में ले जाते हैं.यहाँ सब उलटा चल रहा था. इस प्रक्रिया में बँगला उपन्यासकार ताराशंकर बंदोपाध्याय के’पात्र-पात्री’में उल्लिखित गुड की भेली पर कहानी की याद आ गयी.पता नहीं दत्त सा :ने वह पढ़ा था या नहीं पर अमल कर दिया.

एक बार जब होटल के स्टाफ केफेटेरिया में पानी की सप्लाई बंद थी हमारे विभाग के लोगों को गर्मी में प्यास बर्दाश्त नहीं हो रही थी.उनकी व्याकुलता को देख कर मैंने उन सब को इकट्ठा किया और लेकर कारपोरेशन के पम्पिंग स्टेशन पर पानी पिलवा लाया .उन लोगों ने मुझ से भी पानी पीने को कहा परन्तु मैंने इस कारण नहीं पीया क्योंकि बिना किसी की इजाजत के सब को बाहर ले गए थे.बाद में यह बात चीफ अकाऊंटेंट और पर्सोनल मेनेजर तक गई और उन लोगों को ताज्जुब हुआ कि सब की प्यास बुझवा कर भी मैं सिर्फ सिद्धांतों के कारण प्यासा रहा.मेरे लिए सिद्धांत और सम्मान प्यारे हैं न कि धन-दौलत.यदि मैंने धन कमाने पर ध्यान दिया होता तो प्रोजेक्ट में महत्वपूर्ण पद पर काम करके तब ही लखपति हो जाता और आज ऊंचे पद से अवकाशप्राप्त होता.
ज्यादातर लोगों की निगाह में मैं इसीलिये मूर्ख हूँ और मुझे अपनी इस मूर्खता पर गर्व है.

यूनियन का रजिस्ट्रेशन,मान्यता और अपने मकान की बातें अगली बार ……..

  
 
 
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