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Monthly Archives: June 2011

आगरा/१९७८-७९(भाग ४)

बउआ की फुफेरी बहन सीता मौसी और कृष्ण  कुमार मौसा जी का व्यवहार बहुत अच्छा था.हालांकि यह उनके फूफा जी की बड़ी बेटी थीं जबकि उनकी अपनी भुआ की बेटी रानी मौसी और गोविन्द बिहारी मौसा जी का व्यवहार स्वार्थी था.जब मैं मेरठ से खाली होकर आया था के.के.मौसा जी ने जाब दिलाने का प्रयास भी किया था.अतः गोविन्द मौसा जी के यह कहने पर कि,जीजाजी को दो हार्ट अटैक हो चुके हैं ,अशोक बी.काम.कर रहा है मौका लगे तो जाब दिलवा दो,झा साहब के कहने पर अशोक को अपने साथ अपरेंटिस रखवा दिया;वहां सीखा काम मौसा जी के निधन के बाद एल.आई.सी.  की नौकरी में अशोक के बहुत काम आया.
झा साहब चाहते थे होटल मुग़ल में एक ‘क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट सोसाईटी’की स्थापना हो जाए उसके लिए मुझ पर ही दबाव बनाया लिहाजा मुझे ही उसका प्रेसीडेंट बनना पड़ा.क्योंकि दौड़-भाग और अधिकारियों से काम मैं करा लूँगा ऐसा उन्हें पूर्ण विश्वास था जो गलत भी नहीं गया.वैसे आगे होटल के जेनरल मेनेजर को एक्स-आफिशियो अध्यक्ष बनाना तय हुआ था कारण यह था कि इनीशियली कं.रु.२००००/-इन्वेस्ट कर रही थी.यह रकम नान रिफंडेबिल  लोन के नाम पर दी गयी थी.को-आपरेटिव विभाग में भी रिश्वत का बोल-बाला था.लेकिन होटल स्टाफ की सोसाईटी होने के कारण नकद की डिमांड नहीं हुई.विभाग के अधिकारी होटल में आ-आ कर भोजन कर लेते थे.असिस्टेंट रजिस्ट्रार यूं.एस.सिसौदिया साहब ने एडीशनल ए.आर. अशोक माथुर साहब (पी.सी.एस.अधिकारी)को मुझसे मित्रता स्थापित करने हेतु निर्देशित किया था.को-आपरेटिव बैंक के डायरेक्टर शुक्ला जी जब सपरिवार आगरा आये तो सिसौदिया साहब ने उनके सत्कार में लगभग १२ लोगों का डिनर होटल में कराने की व्यवस्था चाही.मैनें झा साहब से जिक्र किया ,वह तो ऐसे मौकों की   फिराक में ही रहते थे कि ,कब,कैसे सरकारी अधिकारियों को ओब्लायीज किया जा सके.सिसौदिया साहब ने हेड क्लर्क को जीप मेरे घर भेज कर बुलवा लिया और अपनी पूरी टीम लेकर होटल चले.शुक्ल जी की आफिशियल  कार में सिसौदिया साहब ने अशोक माथुर साहब तथा मुझे भी बैठा लिया. शुक्ल जी के यह पूछने पर कि यह कौन साहब हैं ?सिसौदिया साहब ने कह दिया यह माथुर साहब के मित्र हैं और माथुर ही हैं इन्हीं की तरफ से डिनर है.’ए एंड जी'(एडमिनिस्ट्रेटिव एंड जेनरल एक्सपेंसेज)अकाउंट के मद में वह डिनर झा साहब के दस्तखतों से डाला गया.सरकारी अधिकारियों को इसी मद से ओब्लायीज किया जाता था.
सोसायटी रजिस्ट्रेशन के वक्त भी इन्स्पेक्टर कुलश्रेष्ठ साहब इसी मद के तहत भोजन कर गए थे.आगामी वर्ष जब चुनाव हुए तो तय प्रोग्राम के मुताबिक़ जेनेरल मेनेजर पेंटल साहब को प्रेसीडेंट हेतु नामित किया गया और उनके व्यक्तिगत अनुरोध पर मुझे उनके साथ वाईस प्रेसीडेंट बनना पड़ा,क्योंकि पेंटल साहब का काम तो मुझे ही करना था,वह औपचारिक हस्ताक्षर करते थे.डिपार्टमेंट की तरफ से जो इंजीनियर चुनाव पर्यवेक्षक बन कर आये थे वह मेरे साथ १९६२-६४ में शाहजहांपुर में कक्षा ६ एवं ७ में पढ़ चुके थे.
दोहरी सदस्यता के नाम पर मोरार जी सरकार टूट गयी थी और चौ.चरण सिंह इंदिराजी के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए थे तो होटल मौर्या ,दिल्ली में युनियन प्रेसीडेंट उनके किसी भांजे को झा साहब ने बनवा दिया जो वहां ट्रांसफर होकर जा चुके थे.मुग़ल होटल में हेमंत कुमार साहब पर्सोनल मेनेजर बन कर आये थे उनका लक्ष्य यहाँ दो युनियन बनवाना था. वह मुझ से सहयोग चाहते थे.मैंने सेक्रेटरी पद छोड़ दिया था और दुबारा वह भी अपने सहयोग से गठित युनियन को तोड़ कर कुछ नहीं कर सकता था.अतः हेमंत कुमार साहब मुझसे खिंचे-खिंचे रहते थे.उन्होंने झा साहब की मदद से मौर्या की युनियन के प्रेसीडेंट को आगरा बुलवाया और रविवार छुट्टी का दिन होने के बावजूद मुझे भी घर से युनियन पदाधिकारियों के माध्यम से बुलवा लिया. मैंने चौ.साहब के उन भांजे साहब को समझाया कि वह दो युनियन के चक्कर में न पड़ें और अपने यहाँ दिल्ली में भी ऐसा न होने दें -बात उनकी समझ में आ गयी और हेमंत कुमार जी मुंह की खा गए.

सेक्रेटरी पद क्यों छोड़ा?
झा साहब ने अपनी रण-नीति में विफल रहने पर मुझे डबल प्रमोशन दिला दिया था और मेरे अधीन एक अपरेंटिस मेरे द्वारा लाया ही रखवा दिया था ,इसके पीछे भी उनकी गहरी चाल थी.ऐसा करके उन्होंने मेरे विरुद्ध मेनेजमेंट से मिल जाने का दुष्प्रचार करवाया तथा अध्यक्ष को कैप्चर कर लिया.कार्यकारिणी में अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास -प्रस्ताव पास करा कर मैंने उन्हें पदच्युत करवा दिया और उपाध्यक्ष को कार्यवाहक अध्यक्ष बनवा दिया.इत्तिफाक से उपाध्यक्ष भी अध्यक्ष वाली जाति के ही थे.उन्हें भी झा साहब ने तोड़ लिया तब दूसरा कोई उपाय न देख कर मैंने कार्यकारिणी से मध्यावधी चुनाव घोषित करा दिए.उधर मोरार जी साहब का प्रधानमंत्री पद भी चला गया था.
नए चुनावों में मैंने चुनाव न लड़ने का एलान कर दिया.प्रेसिडेंट पद के लिए दो नाम थे और सेक्रेटरी पद के लिए एक भी नाम नहीं आया और स्टाफ तथा मेनेजमेंट दोनों का दबाव मुझ पर ही पुनः सेक्रेटरी बन जाने का रहा .था.मैं थूक कर चाटने वालों में नहीं हूँ.अतः मैंने अध्यक्ष पद के एक प्रत्याशी जो बंगाली थे को सेक्रेटरी पद पर जिताने का पूर्ण आश्वासन देकर अध्यक्ष पद के बिहारी प्रत्याशी के पक्ष में हट जाने को राजी किया.अध्यक्ष पद निर्विरोध हो गया.समय के भीतर सेक्रेटरी पद के लिए जब बंगाली साहब का आवेदन जमा हो गया तब आनन्-फानन में हमारे अकौन्ट्स विभाग के एक भटनागर बंधू को उनके विरुद्ध झा साहब की योजना के अंतर्गत खड़ा कर दिया गया.वायदे के अनुसार मुझे बंगाली महोदय का समर्थन करना और जिताना था,लेकिन विभागीय साथी भटनागर का पक्ष लेने को दबाव बना रहे थे.मेरे लिए दिए गए वचन का महत्त्व भी था और प्रश्न यह भी था जब मैंने भटनागर को अपना उत्तराधिकारी बन जाने को कहा था तो उन्होंने इनकार कर दिया था अब झा साहब के इशारे पर मैदान में कूद गए थे.यह अनैतिक  कदम  थाजिसका समर्थन करने का कोई सवाल ही नहीं था.भटनागर और सम्पूर्ण आफिस स्टाफ ने एडी-चोटी का दम लगा लिया और जब बुरी तरह हारने का अनुमान लग गया तो भटनागर साहब मेरे पास आकर बोले कि,हारना तो तय है लेकिन बुरी तरह फजीहत न हो कायस्थ होने के नाते मुझे इसलिए ५० वोट दिलवा दीजिये.मैंने उन्हें सिर्फ ५० वोट दिलवाने का वायदा कर दिया और ५०  लोगों को कह दिया.हालांकि इस खबर से बंगाली महोदय घबडा कर मेरे पास आये और अपनी आशंका व्यक्त की कि आप कहीं भटनागर को तो नहीं जिता रहे हैं.मैंने स्पष्ट कर दिया तुम बंगाली कायस्थ हो और वह यूं.पी.के कायस्थ पर हैं दोनों एक ही बरादरी के  मैं अपने वायदे पर कायम हूँ और तुम ही सेक्रेटरी बनोगे.हुआ भी यही केवल भटनागर की शर्मनाक हार नहीं हुई.
मेनेजमेंट कभी सरलता से हार नहीं माना करता है.हेमंत कुमार जी ने क्या चाल चली अगली बार …………
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बउआ -पुण्य तिथि पर एक स्मरण

बाबूजी के निधन का बउआ को गहरा दिमागी सदमा लगा और जब हम लोग १४ जून १९९५ को अजय के फरीदाबाद से आने पर घाट ले गए थे तभी से वह अचेतन हो गईं और तमाम इलाज करने-नर्सिंग होम में भर्ती कराने के बावजूद २५ जून १९९५ को उनका भी निधन हो गया.२६ जून की दोपहर अजय के आने के बाद उन्हें घाट ले जाया गया.यशवन्त तो बाबूजी के समय भी घाट गया था परन्तु पांच वर्षीय  अजय की पुत्री-अनुमिता भी अड़ गई और वह भी घाट गई.हम २५ ता.को हवन में विशेष सात आहुतियाँ ही देते हैं और ढोंग-रहित सरल तरीके से स्मरण कर लेते हैं.
नानाजी की जीवित तीन संतानों में हमारी बउआ बीच की थीं.उनसे बड़ी मौसी थीं और छोटे थे मामाजी.मामाजी की पढाई की वजह से नानाजी बरेली से लखनऊ ट्रांसफर करवाकर आये थे और ठाकुर गंज में अपने एक बहनोई के मकान में किराए पर रहते थे.लखनऊ आने के बाद नानी जी का निधन हो गया था और कुछ दिन बउआ शाहजहांपुर में अपने बाबाजी और चाचा-चाचियों के साथ रहीं.सम्भवतः रामेश्वर ताऊ जी और उनकी माता (हमारी भुआ दादी) ने ही नाना जी को बाबा जी से संपर्क कराया था और इस प्रकार उनका विवाह बाबू जी से हुआ था. 
‘नाम बड़े और दर्शन थोड़े’ या ‘ ऊंची दूकान-फींका पकवान’ लगा था बउआ को मथुरा नगर (दरियाबाद) का माहौल.बड़ी ताईजी जो उस समय हाई स्कूल पास और टेनिस खेलने वाली बड़ी माडर्न मानी जाती थीं,बेहद दकियानूसी ढंग से घर-संचालन करती थी जो भण्डार घर में ताला डाल कर बउआ को दोनों वक्त नपा-तुला राशन ही देती थीं ,जिस कारण बउआ को अक्सर भूके पेट या कम खाए ही गुजारा करना पड़ता था.इन सब बातों का असर उनके मस्तिष्क और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ा जिस कारण हम लोगों को उनके साथ बाद में अंगीठी जलाने,आटा माड़ने,कपडे धोने आदि में मदद करनी पड़ती थी. 
बउआ की आदत चुप रहने और बेहद कम बोलने की थी इसलिए सब सहती रहती थीं.बेहद काम करने की आदत थी और जब नहीं कर पाती थीं तो उन्हें पीड़ा होती थी.अंगरेजी दवाएं उन्हें रिएक्ट कर जाती थीं .वह या तो नाना जी की होम्योपैथी दवा लेती थीं या फिर आयुर्वेदिक.डाबर,ऊंझा,वैद्यनाथ आदि के पंचांग से दवाएं ढूंढ कर १९७० से मैं बाबूजी को बताने लगा था जिन्हें वह ले आते थे और बउआ को फायदा हो जाता था.उन्हीं के कारण मैंने १९८०-८१ में आयुर्वेदरत्न का कोर्स किया.१९८२ में वैद्द्य के रूप में रजिस्टर्ड कराने के बावजूद धन-लाभ अर्जित नहीं किया.
बाबूजी की ही तरह बउआ को भी झूठ बोलना -सुनना पसंद नहीं था.उन दोनों को छली-छद्मी लोग अच्छे नहीं लगते थे.अतः उनका परिचय का दायरा कम था.लखनऊ में तो मामाजी और भुआ के यहाँ बाबू जी के साथ अक्सर जाती थीं,कभी-कभी निवाज गंज बाबू जी की भुआ के यहाँ भी जाती थीं.ताई जी (स्व.कुसुमलता माथुर,पत्नी स्व.रामेश्वर दयाल माथुर) का व्यवहार बउआ को पसंद था.मेरे जन्म के बाद बीमारी में मुझे अस्पताल दिखाने ताई जी ले जाती थीं और बउआ की परेशानी बच जाती थी.आज भी निवाज गंज वाले ताऊ जी के सभी बच्चों का व्यवहार अपने माता-पिता की भाँती ही काफी अच्छा है और हमारा भी उनके यहाँ ही जाना-आना होता है.
बाबूजी के ममेरे भाई स्व.दुलारे लाल माथुर ,पी.सी.एस.(बाद में आई.ए.एस.हुए) के दुसरे विवाह के एक कार्यक्रम में बउआ नहीं गईं थीं तो ताई जी (दुलारे ताऊ जी की पहली पत्नी )ने अगले दिन बउआ को  भी आने की बाबत मुझ से कहलाया था और बउआ ,उनकी इच्छानुसार गईं भीं.वह बड़ों का पूरा सम्मान करती थीं और यही शिक्षा भी हम सब को दी थी.मेरी पूरी कोशिश उस पर अमल करने की रहती है.हालांकि इस बात पर मेरी खिल्ली भी खूब उडती है.१९७३ में एक इन्टरवियू देने मैं लखनऊ आया था हालांकि सरू स्मेल्टिंग ,मेरठ में सर्विस भी कर रहा था.मामाजी के घर ठहरा था,माईं जी ने मुझ से कहा था-विजय अब तुम नौकरी कर रहे हो जीजी को आदत बदलने का दबाव डालो न मानें तो उनसे अलग हो जाओ.मैंने माईं जी का पूर्ण सम्मान करते हुए विनम्रता पूर्वक जवाब दिया-मैं बउआ पर कोई दबाव नहीं डालूँगा और न ही उनसे अलग होउंगा.माईं जी को अच्छा नहीं लगा पर फिर चुप हो गईं.हमारे छोटे भाई-बहन जरूर माईं जी से प्रभावित हैं और इसी कारण मेरे आलोचक हैं तथा बहन-बहनोई तो बाबूजी के एक भतीजी और  भतीजों के समर्थक हैं;मेरी बदनामी माँ और नाना का अनुयायी के रूप में भी है.
हमारे नाना जी,बाबूजी और बउआ सभी ने तमाम परेशानियां उठा कर भी मेहनत और ईमानदारी को कभी नहीं छोड़ा और मैं भी वैसा ही करके संतुष्ट हूँ.बेईमानी का धन कमाने वाले सभी रिश्तेदारों का नजारा भी सामने है.दुनिया से कदमताल करके चलने के नाम पर मैं सत्य और ईमान को नहीं छोड़ सकता.हालांकि हमारे बाबा जी भी खुद तो ईमानदारी  पर ही चले जिस कारण उन पर फायर भी किये गए.वह सेनेटरी इन्स्पेक्टर थे और सदा-गला मांस,मिठाइयाँ ,फल आदि बे झिझक फिंकवा देते थे,रिश्वत लेते नही थे अतः उन पर गोलिया चलाई जाती थीं.परन्तु बाद में बड़े तथा छोटे ताऊजियों ने उनको अपने चंगुल में कर लिया था. उनकी इस कमजोरी को  ग्रहण नहीं किया जा सकता. 
बाबूजी का प्राणांत मेरे हाथ के सहारे पर हुआ था. तब तो बउआ सामने ही थीं.२५ जून १९९५ की रात्रि ०८ बजे जब बउआ का प्राणांत हुआ मैं और यशवन्त ही सामने उपस्थित थे.खाना बना रखा था परन्तु खाया किसी ने नहीं था.अगले दिन तीसरे पहर घाट से लौट कर ही यशवन्त ने भी भोजन लिया.यद्यपि १२ दिनों के अन्तराल में ही बाबूजी  और बउआ दोनों यह दुनिया छोड़ गए परन्तु उनकी दी हुयी शिक्षा,त्याग और श्रम करने की प्रेरणा सदैव मेरा संबल रहेंगे.
 

पुण्य तिथि पर बाबूजी का एक स्मरण

(स्वर्गीय ताज राज बली माथुर )

हमारे बाबूजी का निधन १३.०६.१९९५ की रात्रि को हुआ था.हम अंगरेजी कैलेण्डर के हिसाब से इस दिन हवन करके उसमें वे विशेष सात आहुतियाँ देते हैं जिन्हें प्रति दीपावली पर स्वामी दयानंद सरस्वती हेतु देने का प्राविधान बताया गया है.इसके अतिरिक्त हम कनागत आदि का कोई ढोंग कभी नहीं करते हैं.न ही किसी प्राणी को उनके निमित्त कुछ खिलाते हैं.जैसाकि गीता में योगीराज श्रीकृष्ण ने भी स्वीकार किया है और वेदोक्त सत्य भी है -आत्मा सदैव अजर,अमर होती है.हमारे अपने बाबूजी से सम्बन्ध के समय जो आत्मा उनके शरीर में थी ,वह आज जहां भी हो उसकी शांति के निमित्त ही हम ये सात आहुतियाँ देते हैं.वायु द्वारा जो सर्वत्र व्याप्त है इन आहुतियों द्वारा दिए पदार्थ परमाणुओं में परिवर्तित होकर पहुँच जाते होंगे.दुसरे लोगों के तरीके से किसी को खिलाने-पिलाने से कुछ भी उनकी आत्मा तक कतई नहीं पहुँच सकता था.  

बाबूजी ,बाबाजी की चार संतानों में सबसे छोटे थे.जब बाबूजी चार वर्ष के थे दादी जी (उनकी माता)का निधन हो गया था.बाबाजी ने फिर विवाह नहीं किया था.कुछ समय बाद सबसे बड़े ताउजी का विवाह कर दिया था.जब बाबाजी ने रायपुर (दरियाबाद-बाराबंकी)में कोठी बनवाई तो बाबूजी को साईकिल के कैरियर पर बैठा कर ले जाते थे.बाबूजी की पढाई लखनऊ के काली चरण हाईस्कूल में हुयी. कुछ समय निवाज् गंज में वह अपनी भुआ के पास भी रहे और कुछ समय स्कूल के बोर्डिंग में भी जहां उनके सहपाठी का. भीका लाल जी भी उनके कमरे के साथी भी थे.जैसा बाबूजी बताया करते थे-टेनिस के खेल में स्व.अमृत लाल नागर जी ओल्ड ब्वायज असोसियेशन की तरफ से खेलते थे और बाबूजी उस समय की स्कूल टीम की तरफ से.स्व.ठाकुर राम पाल सिंह जी भी बाबूजी के खेल के साथी थे.बाद में जहाँ बाकी लोग अपने-अपने क्षेत्र के नामी लोगों में शुमार हुए ,हमारे बाबूजी १९३९ -४५ के द्वितीय  विश्व-युद्ध में भारतीय फ़ौज की तरफ से शामिल हुए.

अमृत लाल नागर जी हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हुए तो ठा.रामपाल सिंह जी नवभारत टाइम्स ,भोपाल के सम्पादक.भीका लाल जी पहले पी.सी एस. की मार्फ़त तहसीलदार हुए ,लेकिन स्तीफा देके भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए और प्रदेश सचिव भी रहे.बाबूजी को लगता था  जब ये सब बड़े लोग बन गए हैं तो उन्हें पहचानेंगे या नहीं ,इसलिए फिर उन सब से संपर्क नहीं किया.एक आन्दोलन में आगरा से मैं लखनऊ आया था तो का.भीका लाल जी से मिला था,उन्होंने बाबूजी का नाम सुनते ही कहा अब उनके बारे में हम बताएँगे तुम सुनो-उन्होंने वर्ष का उल्लेख करते हुए बताया कब तक दोनों साथ-साथ पढ़े और एक ही कमरे में भी रहे.उन्होंने कहा कि,वर्ल्ड वार में जाने तक की खबर उन्हें है उसके बाद बुलाने पर भी वह नहीं आये,खैर तुम्हें भेज दिया इसकी बड़ी खुशी है.बाद में बाबूजी ने बताया था कि जब का.भीका लाल जी विधायक थे तब भी उन्होंने बाबूजी को बुलवाया था परन्तु वह संकोच में नहीं मिले थे.

बाबूजी के फुफेरे भाई साहब स्व.रामेश्वर दयाल माथुर जी के पुत्र कंचन ने (१० अप्रैल २०११ को मेरे घर आने पर) बताया कि ताउजीऔर बाबूजी  दोस्त भी थे तथा उनके निवाज गंज के और साथी थे-स्व.हरनाम सक्सेना जो दरोगा बने,स्व.देवकी प्रसाद सक्सेना,स्व.देवी शरण सक्सेना,स्व.देवी शंकर सक्सेना.इनमें से दरोगा जी को १९६४ में रायपुर में बाबाजी से मिलने आने पर व्यक्तिगत रूप से देखा था बाकी की जानकारी पहली बार प्राप्त हुई.

युद्ध -समाप्ति पर बाबूजी खेती देखना चाहते थे.परन्तु बाबाजी बड़े ताऊ जी -ताई जी के कहने में चलने के कारण उनकी मदद नहीं कर सके ,हालांकि युद्ध के दौरान पूरे सात वर्षों का बाबूजी का वेतन बाबा जी ने ताऊ जी और उनके बच्चों पर ही खर्च किया .बड़े ताऊ जी अपने बड़े बेटे की शिकायत पर अपनी नौकरी गवां चुके थे.जब ताऊ जी एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में इन्स्पेक्टर थे घर पर उनके अधिकारी के आने पर उनके बेटे ने मेज के नीचे छिप कर कह दिया उनके पापा रिश्वत लेते हैं.इसी बात पर उनकी नौकरी चली गयी और उनको अपने बड़े बेटे से घोर नफरत हो गयी.यही कारण था उनके निधन पर  मेरे  आगरा  से  आकर  लौटने  तक   वह नहीं पहुंचे थे. ताऊ जी की मृत्यु घर के कुँए में गिर जाने से ब्रेन हैमरेज द्वारा हुयी थी और उनके छह माह बाद ताई जी की मृत्यु कैंसर से हुयी थी.उनके बाकी बेटे मथुरा नगर की जमीन-जायदाद देखते हैं.उनके बेटों में सबसे छोटे वकालत किये हैं और लखनऊ में अपने मामा के मकान के वारिस बन कर रह रहे हैं और मेरे बाबूजी को बाबाजी की जायदाद का बंटवारा न होने के लिए दोषी ठहराते हैंजबकि उनकी सभी बहनों की शादी खेत बेच-बेच कर हुईं हैं.उनसे बड़े मेरे लखनऊ वापिस आने पर अनमने हो गए थे.

छोटे ताऊ जी -ताई जी भी बेहद तिकडमी थे.आठवी कक्षा पास होते हुए भी वह समकक्ष  परीक्षाएं पास करके रेडियो इंजीनियर के पद से रिटायर हुए.बाबाजी को अपनी  गिरफ्त में लेकर रायपुर की जमीन-जायदाद उन्होंने अपने बेटों के नाम गिफ्ट करा ली.अपनी भुआ की जमीन भी उन्होंने हड़प ली.छोटी ताई जीमृत्यु पर्यंत लगातार  २७ वर्ष पागल रहीं.वह खुद रामेश्वरम से लौटते में ट्रेन में नहीं रहे और उनके दुसरे न. के बेटे ने चंदे के रुपयों से उनका डाह -संस्कार रास्ते में ही किया.उनके सबसे बड़े बेटे और सबसे छोटे अब नहीं हैं.दुसरे न. वाले के चार बेटे हैं.सूना है आज कल वह भी बीमार चल रहे हैं.हमारे लखनऊ आने के बाद से संपर्क में नहीं हैं,अपने बड़े बेटे की शादी तक में नहीं बुलाया था.रामेश्वर ताऊ जी के बड़े बेटे कमल दादा के अंतिम संस्कार के समय घाट जाते वक्त उनके बड़े बेटे ने मुझसे कहा था -“आज कल किसी को दुसरे के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है”,तो यह कारण था उसके विवाह में न बुलाने का.

बाबू जी ने खेती कर पाने में विफल रहने पर पुनः नौकरी तलाशना शुरू कर दिया.उसी सिलसिले में इलाहाबाद जाकर लौट रहे थे.उनकी कं.के पुराने यूनिट कमांडर जो तब लेफ्टिनेंट कर्नल बन चुके थे और लखनऊ में सी.डब्ल्यू.ई.की पोस्ट पर एम्.ई.एस.में थे उन्हें इलाहाबाद स्टेशन पर मिल गए.यह मालूम होकर बाबूजी नौकरी की तलाश में थे उन्हें अपने दफ्तर में बुलाया.बाद में बाबूजी जब उनसे मिले तो उन्होंने स्लिप देकर एम्प्लोयमेंट  एक्सचेंज भेजा जहाँ तत्काल बाबूजी का नाम रजिस्टर्ड करके फारवर्ड कर दिया गया और सी.डब्ल्यू ई. साहब ने अपने दफ्तर में उन्हें ज्वाइन करा दिया. घरके लोगों ने ठुकराया तो बाहर के साहब ने रोजगार दिलाया.सात साल लखनऊ,डेढ़ साल बरेली,पांच साल सिलीगुड़ी,सात साल मेरठ,चार साल आगरा में कुल  चौबीस साल छः माह  दुबारा नौकरी करके ३० सितम्बर १९७८ को बाबू जी रिटायर हुए.तब से मृत्यु पर्यंत (१३ जून १९९५)तक मेरे पास बी-५६० ,कमला नगर ,आगरा में रहे.बीच-बीच में अजय की बेटी होने के समय तथा एक बार और बउआ  के साथ फरीदाबाद कुछ माह रहे.

बाबूजी के दोनों धनाढ्य भाईयों की घरेलू स्थिति से बाबूजी की खुद की आर्थिक विपिन्नता के बाद मेरी भी विकट आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उनकी घरेलू स्थिति अच्छी रही है.कारण सिर्फ यह है -वह सदा ईमानदारी पर चले इसलिए सफल रहे.तमाम परेशानियों के बावजूद और भारी दबाव झेलने पर भी आज अभी तक मैं भी ईमानदारी छोड़ नहीं सका हूँ और इसी लिए मैं भी हारते-हारते अंततः जीत ही जाता हूँ.आज जो भी मान-सम्मान और प्रशंसा समाज तथा ब्लॉग जगत में  मैं प्राप्त कर सका हूँ उसका कारण बाबूजी और बउआ का आतंरिक आशीर्वाद मेरे साथ होना है.जब तक वे जीवित रहे अपनी दक्षता एवं क्षमता के अनुसार मैंने उन्हें प्रसन्न रखने का अपनी और से प्रयास किया.आज जब वे भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं मैं आडम्बर या दिखावा उनके नाम पर कुछ नहीं करता हूँ,सिवाए  हवन  उनके निमित्त करने के,जो वैज्ञानिक आधार पर उनकी आत्माओं तक मेरा निवेदन पहुंचा सकता है.

 

आगरा /१९७८-७९ (भाग-३)

मुझे मकान तो कमला नगर में एलाट हो गया था परन्तु उसकी कंडीशन ऐसी न थी कि,पजेशन लेकर उसमें रहने चले जाते.आवास-विकास परिषद् एक सरकारी उपक्रम था और वहां काम रिश्वत के जोर से होता था जिसकी रिश्वत लेने की आदत नहीं वह दे कैसे सकता था?लिहाजा काफी दौड़ -धुप करनी पड़ती थी.आफिस से छुट्टी लेकर साईकल से जाता-आता था ,काफी समय लग जाता था अतः यूं.ऍफ़.सी.शेखर साहब ने कहा जब कैशियर बैंक जाए उसके साथ कार से जाओ और कार से लौट आओ रस्ते का समय और थकान बचे तभी ठीक से काम होगा.इसका फायदा भी हुआ कि,जब सब कुछ ओ.के.हो गया तो संपत्ति प्रबंध अधिकारी ने कहा दो गवाह ले आओ हम पजेशन लेटर दे देंगें.एक कैशियर और दुसरे कार ड्राईवर गवाह हो गए और एक और राउंड लगाए बगैर कागजात मिल गए.परन्तु सितम्बर १९७८ में आगरा में भी यमुना में बाढ़ आ गई थी,इसलिए भी टेक ओवर करने के बाद भी किराए के ही मकान में रहते रहे,और ३० सितम्बर को बाबूजी को रिटायर भी होना था उनका खेरिया एयर-पोर्ट का ए.जी.ई.आफिस वहां से बहुत दूर हो जाता इसलिए भी देर कर दी.
उधर हमारे चार्टर आफ डिमांड में लोअर स्टाफ का अधिक ख्याल रखने का मुद्दा हमारे आफिस स्टाफ के हितों के प्रतिकूल पड़ता था.झा साहब आफिस वालों को मेरे विरुद्ध उकसा रहे थे और मैं बहुमत साथ रखने की खातिर आफिस वालों का विरोध सहने के लिए पूरे तौर पर तैयार था.मैंने अपना ‘सुपरसेशन’ वाला केस भी विद्ड्रा कर लिया जिससे किसी को यह भी कहने का मौका न मिले कि खुद तो प्रमोशन ले लिया और बाकी साथियों का ख्याल नहीं रखा.
युनियन प्रेसीडेंट और बाकी कार्य कारिणी सदस्य झा साहब के इन्फ्लुएंस में चल रहे थे.दीपक भाटिया पूरे तौर पर मेरे साथ थे उनकी ड्यूटी ही ऐसी थी कि अनेकों बार जी.एम्.से सामना होता था उनके माध्यम से मुझे पता था कि पेंटल साहब झा साहब से कितना दुखी हैं और वह हर हाल में मेरे ऊपर झा साहब को नहीं हावी होने देंगे यदि मैं अड़ा रहा तो.इसलिए गिनती के हिसाब से अल्पमत में होते हुए भी और इसलिए भी कि मेरे हटने पर कोई भी सेक्रेटरी जेनरल बनने को तैयार न होता मैं अपने निर्णय को लागू करने में पूर्ण कामयाब रहा.झा साहब की कूटनीति उनके और उनके समर्थक कार्यकारिणी सदस्यों के खिलाफ पड़ गई.सारे स्टाफ के मध्य सन्देश साफ़ था केवल विजय माथुर की अड़ के कारण लोअर स्टाफ का बेनिफिट हुआ है.लिहाजा झा साहब को अपना स्टैंड बदलना पडा.झा साहब के सिखाये आफिस के लोग भी अब पूरी तौर पर मेरे फैसले के पक्ष में हो गए .यही कारन था कि सभी एकजुट होकर रत्ना को देखने और मिलने पहुंचे थे-दिसंबर १९७८ में मेरी छुट्टियों के दौरान.
बाबूजी के रिटायरमेंट के बाद चूंकि रत्ना को लाना था लिहाजा फैसला हुआ कि अपने ही मकान में लाया जाए.बिजली बगैर तो काम चल सकता था पर पानी कनेक्शन जरूरी था.कारपोरेशन का विभाग कुंडली मारे बैठा था. बात वही रिश्वत कौन और कहाँ  से दे?हमारे एक सहकर्मी के पडौसी टैक्जेशन आफीसर थे उनकी मदद ली और काम चुटकियों में हो गया.छोटी दिवाली के दिन पानी का कनेक्शन चालू हो गया .मैं और अजय देर रात में पानी चालू कराकर प्रताप नगर लौटे जहाँ दोनों भाई ही त्यौहार के मौके पर थे.बाबूजी और बउआ शाहजहांपुर नानाजी का आँख का आपरेशन कराने गए थे.
१२ नवंबर को हम लोग अपने मकान में आ गए .रत्ना के आने के बाद कुछ रिश्तेदारों को बुला कर कथा करवाई गई (माता-पिता उसी पद्धत्ति पर चलते थे,उनके बाद मैंने आर्य समाज ज्वाइन किया था).
मार्च १९७९ में झा साहब ने मुझ से कहा तुमने अपना दावा वापिस ले लिया था इसलिए तुम्हारा प्रमोशन नहीं हो सका था और तुम्हारा केस वाजिब है अतः हम मेनेजमेंट की तरफ से तुम्हें डबल प्रमोशन देकर सुपरवाइजर बना रहे हैं.तुम अपने नीचे एक अपरेंटिस भी अपनी पसंद  का ले आओ रख लेंगें.हमारे रिश्ते के एक मौसा जी को हार्ट अटैक के दो राउंड पड़ चुके थे उनके बड़े बेटे को जिसने बी.काम कर लिया था हमने रखवा दिया. 
क्रमशः….
 

आगरा/१९७८-७९ (भाग-२)

नवम्बर १९७८ में जब भांजी को लेकर बाबूजी आये थे तो उसका स्वास्थ्य ज्यादा बेहतर नहीं था क्योंकि वह वहां सूखा रोग के कारण जन्मतः ऐसी थी.हमारे घर रह कर जब अलीगढ़ लौटी तो वहीं के स्टूडियो में खींचे फोटो के अनुसार इतना सुधार  हुआ था.
(बीमारी के दौरान अलीगढ में  रत्ना )
(आगरा में स्वास्थ्य लाभ के दौरान रत्ना )
(आगरा से लौटने के बाद अलीगढ के स्टूडियो में खींचा गया रत्ना का फोटो )

  मेरे छुट्टियों के दौरान लगभग पूरा लेखा विभाग (बैक आफिस के सभी लोग)भांजी को देखने और मिलने आये थे.आखिर उन लोगों ने भी तो जडी -बूटियाँ लाकर दी थीं.सभी ने उसे गोद में लिया था. जाड़ों में एक बार खुले बारामदे में गर्म पानी से बहन जी भांजी को नहलाने लगीं ,बउआ ने गुसलखाने में बंद दरवाजे में नहलाने को कहा ताकि सर्दी-गर्मी से नुक्सान न हो तो बहन जी माँ पर बिफर गईं और उनसे बोल-चाल बंद कर दी.जाड़ों भर फिर बउआ ने ही उसे  नहलाया.एक बार बहन जी दिन में गहरी नींद सो गईं और बच्ची के भूखे होने पर भी उसके जगाने से नहीं जागीं तो मैंने छोटी कटोरी में उसे कुछ परमल के दाने दे कर कसार (घी में आटा भून कर चीनी मिला )उसे दिया ,हालांकि इस हेतु बउआ से डांट भी सुनी कि जब उसकी माँ को चिंता नहीं है तो तुम क्यों खैरख्वाह बने.अभी कुछ दिन पहले यह भांजी ,उसकी बेटी और भांजा दामाद कुछ घंटों के लिए हमारे घर भी लखनऊ आने पर आये थे.

पहली जनवरी १९७९ को छुट्टियों  से लौट कर मैंने अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर ली थी.इसी त़ा. से प्रभावित ‘सुपरवाइजर अकाउंट्स’ के रूप में प्रमोशन भी बाद में मुझे मिला,परन्तु यों ही नहीं -उसके लिए पहले मुझे काफी त्याग करना पड़ा.उसके जिक्र से पहले युनियन के रजिस्ट्रेशन के बाद के घटनाक्रम को बताना जरूरी है.
हमारी युनियन के अध्यक्ष सी.पी.भल्ला साहब ने रजिस्ट्रेशन होते ही मेनेजमेंट के समक्ष मान्यता प्रदान करने की मांग रख दी.पर्सोनल मेनेजर झा साहब ने जेनेरल मेनेजर पेंटल साहब से पक्ष में सिफारिश कर दी.हमारी युनियन-‘होटल मुग़ल कर्मचारी संघ’को मेनेजमेंट ने मान्यता शीघ्र ही दे दी ,जिस दिन यह घोषणा हुई उस दिन फ़ूड एंड बेवरेज मेनेजर कार्यवाहक जी.एम्.थे .उन्होंने मेनेजमेंट की तरफ से सम्पूर्ण स्टाफ को ‘गाला लंच’ देने का भी एलान कर दिया.मैं वैसे वहां लंच नहीं लेता था,परन्तु अध्यक्ष,कार्यकारिणी सदस्यों तथा झा साहब का आग्रह टाल न सका और उस दिन वह लंच करना ही पडा.
यूनियन रजिस्टर्ड होने तथा मान्यता भी मिल जाने से स्टाफ का भारी दबाव था कि वेतन बढ़वाया जाए ,हालांकि उस वक्त होटल मुग़ल आगरा का हायेस्ट पे मास्टर था. हम लोगों ने एक चार्टर आफ डिमांड बना कर पर्सोनल मेनेजर को सौंप दिया. हमारे साथियों ने जितना चाहते थे उसका दुगुना वेतन बढाने की मांग रख दी जिसे देखते ही झा साहब व्यंग्य से मुस्करा दिए और बोले इसे तो हेड क्वार्टर भी मंजूर नहीं करने वाला.कई बैठकों के बाद भी जब कार्यकारिणी ने बार-बार इसी की पुष्टि कर दी तो झा साहब नया तर्क ले कर आये कि यह चार्टर आफ डिमांड उन पदाधिकारियों द्वारा बनाया गया है जिन्हें स्टाफ ने नहीं चुना था,लिहाजा फ्रेश मेंनडेट लेकर आओ .भल्ला साहब जो कभी ओबेराय होटल में भी पेंटल साहब के साथ काम कर चुके थे स्टाफ का भरोसा नहीं जीत सकते थे लिहाजा मैंने खुद एक दुसरे व्यक्ति को अध्यक्ष पद के लिए यह कह कर तैयार किया कि प्रत्यक्ष तौर पर तो मुझे भल्ला साहब का ही समर्थन करना होगा लेकिन जिताएंगे तुम्हे ही .वह शख्स अनजान थे और मुफ्त में युनियन की अध्यक्षता मिलती नजर आ रही थी. खुशी -खुशी राजी हो गए.
अध्यक्ष पद के दो उम्मेदवार हो गए किन्तु मेरे सेक्रेटरी जेनरल तथा कोषाध्यक्ष पद के लिए कोई दावेदार नहीं था.एक सज्जन को पकड़ कर कोषाध्यक्ष पद हेतु नामांकन कराया क्योंकि उस समय के कोषाध्यक्ष को संभावित प्रमोशन के कारण पद छोड़ना था.दो पद निर्विरोध निर्वाचित घोषित हुए.केवल अध्यक्ष पद का ही चुनाव हुआ.कार्यकारिणी सदस्य भी विभागों से निर्विरोध निर्वाचित हो गए थे.अध्यक्ष भल्ला साहब हर जगह मुझे साथ-साथ अपने प्रचार में ले जाते थे. मैं यही कहता था -आप लोगों ने भल्ला साहब का कार्य देखा है ,संतुष्ट हैं तो इन्हें ही पुनः मौक़ा दें.
लोगों को पता था मैं किसे चाहता हूँ और उन्हें वोट किसे देना है.झा साहब ने कूटनीति फेंकते हुए लोगों द्वारा मेरी पसन्द के उम्मेदवार को ही जिताने का अपनी और से प्रयास किया ताकि भल्ला साहब को बाद में समझाया जा सके और मेरे विरोधी के तौर  पर खड़ा किया जा सके.जैसा कि स्वभाविक था ठाकुर पुष्पेन्द्र बहादुर सिंह लगभग एकतरफा वोट पाकर जीत गए.भल्ला साहब चाहते थे मैं उनकी हार के बाद पद त्याग कर दूँ.परन्तु पेंटल साहब खूब होशियार थे उन्होंने यह समझते और बूझते हुए कि भल्ला साहब हारे ही इसलिए कि उन्हें मेरा समर्थन था ही नहीं,एक अन्य कार्यकारिणी सदस्य  श्री दीपक भाटिया के माध्यम से उन्होंने मुझे सन्देश भिजवाया कि यदि  मैं श्री भाटिया को पदाधिकारी बना लूं तो पेंटल साहब हर विवाद में मेरा ब्लाइंड समर्थन करेंगें.चूंकि झा साहब खुद को रिंग मास्टर समझते थे और युनियन को पाकेट युनियन बनाना चाहते थे इसलिए मुझे भी अपनी बातें मनवाने के लिए पेंटल साहब का समर्थन मिलने का आश्वासन घाटे  का सौदा नहीं लगा. 
श्री दीपक भाटिया पहले फिल्म ऐक्ट्रेस जया भादुरी के पी.ए.थे और उनकी शादी अमिताभ बच्चन से हो जाने पर कुछ दिन जया  के कहने पर भाटिया को अपना अतिरिक्त पी.ए.बनाये रखा परन्तु वह सरप्लस ही थे.आगरा के होने के कारण भाटिया को श्री बच्चन ने पेंटल साहब से कह कर ही मुग़ल में जाब दिलवाया था और वह पेंटल साहब के प्रति एहसानमंद भी थे.अतः श्री पेंटल ने भल्ला के बदले भाटिया को तरजीह दे दी. हमने श्री भाटिया को सेकिंड ज्वाइंट सेक्रेटरी पद दे दिया.
 पुनः चुनावों में जीत कर आई नई कार्यकारिणी ने भी पुराने चार्टर  आफ डिमांड को ही पास कर दिया अतः झा साहब के पास निगोशिएशन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.कई दौर की धुंआ धार मीटिंगों के बाद एक निश्चित वेतन मान को लेकर मेनेजमेंट के साथ सहमति बनाने के फार्मूले को ढूँढा गया.इसमें न्यूनतम वेतन-वृद्धि रु.४५/-और अधिकतम रु.९०/-किया जाना था सबसे निचले ग्रेड को अधिकतम और ऊपर उठते ग्रेड्स में कम वृद्धि होनी थी.आफिस के लोगों विशेषकर  लेखा विभाग वालों की कम वृद्धि का प्रस्ताव था.बस यहीं झा साहब को खेल करने का मौका भी था.उन्होंने अध्यक्ष को और पुराने अध्यक्ष को लेखा विभाग के मेरे साथियों के मध्य मेरी छवि ख़राब करने की मुहीम पर लगा कर कार्यकारिणी में एक अलग स्वर उठवा दिया जिसे मेनेजमेंट-युनियन मीटिंग में उन्होंने खुला समर्थन भी दिया ,उद्देश्य था लोअर स्टाफ जिसकी तादाद ज्यादा थी के मध्य मेरी इमेज बिगड़ जाए.श्री दीपक भाटिया के माध्यम से पेंटल साहब का सन्देश मुझे मिल गया वही होगा जो मैं चाहता हूँ.११ सितम्बर १९७८ की मीटिंग में पेंटल साहब ने निर्णायक तौर पर कह दिया आज के बाद और कोई मीटिंग नहीं होगी और सेक्रेटरी जेनेरल द्वारा समर्थित वेतन वृद्धि को वह मंजूर करते हैं अब कोई बदलाव उन्हें मंजूर नहीं है.
प्रोमोशन के लिए जो लिस्ट मैंने दी थी उसमें से अपना नाम मुझे हटाना पड़ा,इसी विवाद  के कारण अतः मेरे अतिरिक्त सभी लोगों को अपग्रेड भी करने की बात मान ली गई.पेंटल साहब ने उठते-उठते कहा आप लोगों की डिमांड नहीं थी फिर भी साल में एक बार फ्री जूता यूनिफार्म के साथ देंगें.उनके इतना कहते ही मैंने तपाक से कह दिया और आप अपनी तरफ से दे ही क्या सकते हैं.मेरे जवाब पर सभी लोग ठट्टे लगाते हुए उठ गए और इस प्रकार ‘एग्रीमेंट सेटलमेंट’सम्पन्न हो गया.
एग्रीमेंट के दौरान के झंझटों तथा मकान की प्रक्रिया के व्यवधानों का समाधान कैसे हुआ इसका जिक्र अगली बार………….
 
 
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