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Monthly Archives: September 2011

आगरा/1986-87(भाग-6)

मेरे सामने नाभा मे जिक्र था कि वे लोग आर्य समाज से हवन जल्दी कराएंगे क्योंकि दोनों लोग को ड्यूटियाँ ज्वाइन करनी है। उस अनुसार हमारे बाबूजी उनके टूंडला निवास पर शोक प्रकट करने हेतु गए परंतु वहाँ कोई नहीं लौटा था ,पता चला कि 13 वी करके लौटेंगे। पोंगा-पंडितवाद लोगों के दिमाग मे बुरी तरह घुसा हुआ है और समाज को खोखला कर रहा है। पढे-लिखे लोग भी समझने को तैयार नहीं होते यही देश और समाज के पतन का कारण है।

जब वे लोग टूंडला लौटे तो उन्हीं के साथ  शालिनी भी यशवन्त को लेकर वहाँ पहुँच गईं। कुछ दिन माँ के साथ और रहने की इच्छा व्यक्त की थी अतः वहाँ रहने दिया। दिसंबर के आखिर तक मथुरा मे नरेंद्र चाचा (बाबूजी के चचेरे भाई जो वहाँ डेंटल सर्जन हैं) के यहाँ रह कर और वृन्दावन घूमते हुये भुआ -फूफा जी हमारे घर आए। उन लोगों की इच्छा शालिनी और यशवन्त से मिलने की थी। बउआ वैसे तो इन लोगों को मकर संक्रांति पर बुलाने का इरादा रखती थीं। परंतु भुआ का लिहाज करते हुये मै टूंडला जाकर बुला लाया। भुआ ने आते ही शालिनी को वृन्दावन का प्रशाद दे दिया और उनके पिता के निधन की बाबत कोई शोक नहीं व्यक्त किया जो शालिनी को तीखा चुभा। उन्होने प्रशाद छिपा कर रख दिया और खाया नहीं। भुआ से तो नहीं परंतु मुझ से कहा क्या भुआ जी ने उनके मरने के लिए प्रशाद बोला था? मैंने यह बात बउआ-बाबूजी तक पहुंचा दी किन्तु भुआ से किसी ने कुछ नहीं कहा।

भुआ की हद तो तब हुयी जब उन्होने हमारे सामने ही हमारे माता-पिता को भड़काते हुये कहा कि यह मकान विजय का कैसे हुआ?जब उन्हें उन लोगों ने बताया कि उसने (मैंने) अपने बचत के पैसों से सिक्यूरिटी जमा करके लिया और अब भी अपने ही पैसों से किश्तें जमा कर रहा है तो भुआ की गणित सामने आई कि तुमने (मेरे बाबूजी ने)पढ़ाई मे पैसा खर्च किया था अतः यह मकान तुम्हारा हुआ और इसमे तीनों बच्चो का हिस्सा लगाना चाहिए था;विजय को अपने नाम करने दे कर गलती की। बाबूजी ने बड़ी बहन की बातें चुप-चाप सुन ली और उन पर कान नहीं धरा। बाबूजी ने बहन से तो नहीं कहा परंतु हकीकत तो थी ही कि मैंने तो बी ए तक पढ़ कर छोड़ दिया,अजय ने 3 वर्षीय डिप्लोमा कोर्स को 6 साल मे पूर्ण किया उस पर भी तो खर्च हुआ था और 12 वी तक शोभा पर भी तब केवल विजय पर पढ़ाई का खर्च करने से उसके पैसे पर दूसरे बहन भाई का अधिकार कैसे हो सकता है?भुआ की भूमिका फूट डलावा, आग-लगावा की थी। भुआ ने अपने से बड़े  एक दूसरे भाई के खिलाफ दरियाबाद मे पैतृक संपत्ति का मुकदमा लंबे समय तक लड़ा और फूफा जी की तमाम तंख्वाह तबाह करा दी। पोस्टमैन को खरीद कर उनके सम्मन गायब करा कर एक्स पार्टी केस जीत लिया और लाखेश भाई साहब के डी आई जी दोस्त के मार्फत खेतों  पर कब्जा कर लिया।

हमारे घर से भुआ -फूफा जी कानपुर तूफान एक्स्प्रेस से लौटे पहुँचते-पहुँचते वहाँ अंधेरा हो गया था। गाड़ी मे भीड़ अधिक थी ,कुली आ नहीं पाया और वे दोनों उतर गए एवं उनका सामान आगे गाड़ी मे चला गया। दिल्ली तक लिखा-पढ़ी कर लिए कुछ भी वापिस न मिला। शालिनी को बेहद प्रसन्ता हुयी क्योंकि पिता के निधन के बाद आने पर उन्हे भुआ ने परशाद भेंट किया था और मकान को विवादित बनाने की कुचेष्टा की थी। भुआ को अपनी काली करतूतों की सजा परमात्मा से मिल गई थी किन्तु आदत नहीं बदली। पहले कभी बाबा जी के साथ रामेश्वरम गईं थीं ,फूफा जी नहीं गए थे। लौटते मे रात्री मे मैदान मे मूत्र विसर्जन हेतु गईं और खुले पड़े डी सी बिजली के तारों से छू गईं -करेंट ने उन्हें दूर फेंक दिया था और उनके दायें हाथ की हड्डी कोहनी से कलाई तक टूट गई थी। बकरे की हड्डी डलवाने के बावजूद वह हाथ निष्क्रिय रहा। फूफाजी और उनके बच्चे खाना बनाने तक का काम करते थे। खुद भुआ नहाने-धोने तक मोहताज थीं किन्तु हेंकड़ी आसमान पर थी।

हमारी छोटी बहन जी अपनी भुआ से हेंकड़ी मे टक्कर लेती हैं और लाखेश भाई साहब से उनके मधुर संबंध हैं नेल्लोर मे बैठ कर भी जबकि सवा कि मी दूर हमसे रह कर भी संबंध लाखेश भाई साहब ने  नहीं रखना पसंद किया। जैसे भुआ ठोकर खाकर भी नहीं सुधरती थीं वैसे ही डा शोभा भी सुधर नहीं सकतीं आखिर वह हिन्दी और संस्कृत मे एम ए ,संस्कृत मे पी एच डी ,बी एड जो सुसराल जाकर हो गई हैं। भुआ के तो नौ सगे भतीजे थे इसलिए जिन के खिलाफ थी उनमे मेरा नाम प्रमुख था क्योंकि मैंने छब्बीस वर्ष की उम्र मे अपना मकान हासिल कर लिया और फूफाजी रिटायरमेंट तक न बना सके। डा शोभा का तो संभवतः  एक ही भतीजा यशवन्त और शायद एक ही भतीजी अनुमिता (अजय की पुत्री) है परंतु वह उनके खिलाफ हैं। फूफा जी (नृत्य बिहारी लाल) की भांति ही बहनोयी साहब (कमलेश बिहारी) भी सुसराल की संपत्ति पर निगाह रखते हैं। 1975 मे शादी के बाद 1976 मे उन्होने (जैसा तब शोभा ने बउआ को बताया और उन्होने मुझे) शोभा से कहा था कि बाबूजी दरियाबाद मे अपना हिस्सा मांग लें ,शोभा के यह पूछने पर कि वे दोनों (मै और अजय) तो देखने जाएँगे नहीं तो कौन देखेगा?उन्होने बी एच ई एल  ,हरद्वार की अपनी मेषीनिस्ट की पोस्ट छोड़ कर हमारे बाबूजी के बिहाफ पर देखने की बात कही थी। परंतु बाबू जी ने उनकी बात पर गौर नहीं किया। मैं भी उनकी इस बात से सहमत नहीं था। अतः उन्होने मेरे विरुद्ध मन मे गांठ बांध ली और जब मौका पड़ा मुझे नीचा दिखाने और नुकसान पहुंचाने का कृत करते रहे जिसे मै तब तक न समझ सका जब तक उन्हीं की छोटी बिटिया ने यह खुलासा नहीं कर दिया कि,शालिनी के बड़े भाई कुक्कू की पत्नी मधु उनकी भतीजी हैं और कुक्कू उनके बहौत अच्छे दोस्त रहे हैं। जब इस बात का जिक्र अभी उनके अपनी भतीजी की शादी मे आने के अवसर   पर मेरे घर आने पर किया तो खीसे निपोरते रह गए । अब प्रतीत होता है कि कुक्कू को हमारे ज्योतिषीय सलाहकार का पता बता कर उन्हें खरीद कर हम लोगों को गुमराह करने का सुझाव कमलेश बाबू का ही रहा होगा। उन पंडित जी ने 14 गुण को 28 बता कर जन्म पत्री मिला दी थी और जब भेद खुलने पर मैंने उनसे सवाल उठाया तो उन्होने मेरे बाबूजी की इच्छा बता दिया जबकि बाबूजी कोई भी जन्म पत्री मिलवाने कभी नहीं गए मुझे ही भेजते थे। मुझसे फरेब मेरे अपने रिशतेदारों के सुझाव पर उन्होने किया था।

यह ब्लाग मेरे जीवन के संघर्षों की कहानी सार्वजनिक करने हेतु मैंने शुरू किया है परंतु एक  काबिल ब्लागर् का  मत है कि निजी बातों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। जबकि वही ब्लागर महोदय अपने परिवार तथा मित्रों से संबन्धित जांनकारी सचित्र अपने ब्लाग पर देते रहते हैं। ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ हमारे देश की पुरानी रीति है पैसे वालों  के लिए सब छूट किन्तु कोई निर्धन उनकी बराबरी मे कैसे आ सकता है? मैंने ब्लाग लेखन को ‘स्वांतः सुखाय,सर्वजन हिताय ‘घोषित किया है उसका भी उन्होने अपने ब्लाग पर उपहास किया है। प्रत्येक का लेखन उसके अपने हिसाब से होता है और उससे औरों का सहमत होना आवश्यक नहीं होता है। परंतु किसी एक को दूसरे को हिदायत देने का अधिकार भी नहीं बंनता है। किन्तु मेरे ब्लाग्स पर कुछ धनवान ब्लागर्स हिदायत यदा-कदा देते रहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी ही छोटी भांजी  ने फेक आई डी से जो कुचक्र रचा है यह भी उसी का एक हिस्सा होगा।

 

आगरा/1986-87(भाग-5)-चंडीगढ़ जाना

यों तो मुझे घूमने का कोई शौक नहीं है परंतु दुख-तकलीफ मे मदद करने के स्वभाव तथा सीधी रिश्तेदारी के कारण चंडीगढ़ जाना पड़ा तो गए। शालिनी के बड़े भाई के एम माथुर उर्फ ‘कुक्कू’ सेंट्रल वेयर हाउजिंग कार्पोरेशन ,चंडीगढ़ मे पोस्टेड थे। उनके पिताजी रिटायरमेंट के बाद भी टूंडला ही मे निजी मकान मे रहते थे और छोटे (परंतु शालिनी से बड़े)भाई राजा -की-मंडी ,आगरा मे रेलवे इन्क्वायरी मे क्लर्क थे,लेकिन टूंडला से ही रोज आना-जाना करते थे। जैसा कि शालिनी की माता ने तब बताया था कि एक दिन अचानक उनके पिता घर मे पहने कपड़ों मे ही और दो-चार कपड़े झोले मे लेकर चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए ,उनके कहे मुताबिक पोती का हवाला देकर रोकना चाहा तब भी न रुके। चंडीगढ़ जाकर उन्हें पैरालिसिस का अटैक हो गया। टूंडला से सब चंडीगढ़ पहुँच गए। शरद की पत्नी संगीता का अपनी जेठानी मधू (जो कुक्कू की पत्नी और कमलेश बाबू की भतीजी हैं) पर आरोप है कि उन्होने गरम-गरम दूध अपने श्वसुर साहब के गले मे डाल दिया जिससे उनके गले मे घाव हो गए। उन्हें पी जी आई मे दाखिल करा दिया गया। इस घटना से 06 माह पूर्व उन्होने अपना हाथ दिखा कर टूंडला मे मुझसे पूछा था कि और कितने वर्ष जीवित रहूँगा। हाथ के मुताबिक साढ़े बासठ वर्ष मैंने उन्हें बताया तो तपाक  से बोले कि अब सिर्फ 06 माह और। मुझे उनकी वास्तविक उम्र का अंदाज न था वरना टाल जाता और कुछ न बताता। गणना के अनुसार वह समय आ गया था। अतः जब शरद मोहन का टेलीग्राम आया-“फादर सीरिअस” और बाबूजी ने कहीं से मुझे दुकान पर फोन करके उस बाबत बताया तो तत्काल मैंने सेठ जी से अनिश्चित काल के लिए चंडीगढ़ जाने की बात काही। मेरा कार्य उनकी निगाह मे था और उन्होने स्वीकृति दे दी।

शालिनी तत्काल उसी रात चलने को राजी न थीं। मैंने प्रश्न-कुंडली से भी वास्तविकता ज्ञात कर ली थी और अपनी माता को बता दी थी कि अब आना तुरंत नहीं होगा। शालिनी को वास्तविकता न बता कर तुरंत चलने का फैसला दे दिया। यशवन्त अभी चार वर्ष का भी न था ,रात के सफर मे दिक्कत थी और परिस्थितियाँ जल्दी करने की थीं। पहली उपलब्ध गाड़ी से दिल्ली फिर पुरानी दिल्ली पहुंचे और रात प्लेटफार्म पर गुजार के सुबह ‘हिमाल्या एक्स्प्रेस’ से चंडीगढ़ के लिए रवाना हुये। दोपहर  तक चंडीगढ़ पहुंचे और स्टेशन से पी जी आई भी पहुँच गए किन्तु टेलीग्राम मे वार्ड आदि का उल्लेख न होने से और तब मोबाइल न होने से दिक्कत थी कि अब कैसे पता करें ?एक तीन शेड मे सामान और शालिनी तथा यशवन्त को रुकने को कह कर पता निकालने हेतु दफ्तर-दफ्तर चक्कर काटने लगे इत्तिफ़ाक से शालिनी के बड़े ताऊ जी के बड़े बेटे दीख गए उनके साथ पहुंचे उस बिस्तर पर जहां उन्हें आक्सीजन दी जा रही थी। पूछने पर उन्होने इशारे से जवाब दिया कि अब ठीक नहीं होंगे। शायद उन्हें साढ़े बासठ वर्ष तक कुल आयु होने की बात ध्यान होगी। तब से अब मैंने किसी को भी हाथ अथवा जन्म पत्री देख कर कुल आयु /उम्र बताना बंद कर दिया है।

उस वक्त अस्पताल मे कुक्कू उनके ताऊ जी,चचेरे भाई ,उनकी पत्नी मधु मौजूद थे। शरद शायद अपने दफ्तर के लिए मेसेज देने गए थे। उस सराय मे जहां वे लोग ठहरे थे हम लोगों को पहुंचवा दिया गया । वहाँ कुक्कू और शरद के बच्चे ,शरद की पत्नी संगीता और शालिनी की माता जी,ताई जी,चचेरी भाभी,छोटी बहन सीमा और उनके बच्चे   थे । बाद मे शरद की वह मौसेरी बहन मिक्की अपने टी एक्स आर पति के साथ आ गईं जिन्हें शरद 1982 मे टूंडला मे गोद मे उठा कर नाचते थे और वह मौसी-मौसी करती तथा उनकी मौसी हँसती रहती थीं। वे लोग राक गार्डेन घूमने जा रहे थे शालिनी की माता जी ने हम लोगों से भी घूमने को कहा परंतु मैं तो घूमने नहीं गया था अतः घूमने नहीं गया। बल्कि मुझे तो हैरानी हुयी कि कैसे लोग बीमार को देखने की आड़ मे घूमने का प्लान बना लेते हैं।

खाना-नाश्ता सब केंटीन मे होता था। वे लोग मेरे आर्थिक स्थिति के मद्दे नजर खर्च नहीं करने देते थे। मेरे लिए बार-बार आना- जाना संभव नहीं था अतः रुका रहा।एक दिन सुबह के खाने के कूपन पहले ही मैंने खरीद कर रख लिए थे और लच के समय भुगतान कर दिया था।  जबकि उनकी बड़ी बेटी रागिनी अपने पति अनिल के साथ और छोटी बेटी सीमा के  पति योगेन्द्र  देख कर क्रमशः गाजियाबाद और झांसी लौट चुके थे। हमें सूचना तब दी गई थी जब डाक्टरों ने जवाब दे दिया था। 12 नवंबर 1987 की साँय शालिनी के पिताजी का निधन हो गया उस वक्त वहाँ पर शालिनी के ताऊ जी ,उनके बेटे,दोनों भाभिये और मै ही मौजूद थे। नरेंद्र मोहन जी ने मुझ से कुक्कू और शरद की पत्नियों को सराय पर छोड़ आने ,सबसे अपना-अपना सामान बांधने का संदेश देकर लौट आने को कहा तब तक अस्पताल मे ही खोज कर कुक्कू और शरद को उन्होने बुलवा लिया।

चूंकि कुक्कू तब नाभा मे पोस्टेड थे अतः रात्रि मे ही मारुति वैगन और टैक्सी कार के जरिये सब लोग नाभा को चले। तब खालिस्तानी आतंकवाद चरम पर था अतः जगह-जगह रोका गया और साथ मे पार्थिव शरीर देख कर जाने दिया गया क्योंकि पी जी आई अस्पताल का डेथ सर्टिफिकेट उन्हें दिखाया जाता रहा था। रास्ते मे किसी सनकी को चाय पीने की तलब लगी और उन लोगों ने एक क्रासिंग पर चाय पी किन्तु मैंने चाय पीने से इंकार कर दिया। मुझे ऐसी हरकतें देख कर विस्मय था कि कैसे मौज-मस्ती करते हुये पार्थिव शरीर को ले जाते हैं।

गहरी रात मे कर्तार पूरा,जत्था के गुरुद्वारा के निकट, नाभा(जिला -पटियाला) पहुंचे जहां कुक्कू की सूचना पर उनके मकान मालिक ने उनका बाहर का कमरा सामान हटा कर खाली कर दिया था और उसी मे शालिनी के पिताजी का पार्थिव शरीर रखा गया और हम लोग भी उसी मे रुके जबकि महिलाएं बगल वाले कमरे मे। रात मे शालिनी के ताऊ जी भजन गाते रहे ,छोटे भाई के निधन पर गम मिटाने का उनका यही तरीका था।

दिन मे नौ-दस बजे तक रागिनी और अनिल गाजियाबाद से पहुँच गए और शायद योगेन्द्र झांसी से देर शाम तक पहुँच पाये थे। अनिल ने अर्थी को कंधा भी दिया जिस पर किसी ने देख कर उन्हें हटाया कि दामाद कंधा नहीं देते हैं। मैंने ख़्वामख़्वाह का स्टंट किया ही नहीं। किसी पार्क मे अंतिम संस्कार किया गया।

शाम को शरद की पत्नी बेहोश हो गईं ,उनकी छोटी बेटी होने वाली थी। लोगों को ताज्जुब हुआ कि पुत्र-वधू को श्वसुर का इतना धक्का लगा परंतु शालिनी की माता का कहना था उन्हें काफी दिनों से कब्ज था गैस दिमाग पर चढ़  गई होगी और जिस नर्सिंग होम मे उन्हें एडमिट किया गया वहाँ के चिकित्सकों का भी यही विचार था।

अगले दिन सुबह नाभा से पहली गाड़ी पकड़ कर मै आगरा के लिए चला ,यशवन्त और शालिनी नाभा मे ही रुक गए थे। मेरा टिकट आगरा कैंट तक का था वह गाड़ी टूंडला निकल जाती उसे दिल्ली मे छोड़ कर दूसरी गाड़ी से मुझे राजा-की-मंडी पर उतरना था। अंबाला कैंट गुजर जाने के बाद एक टी टी साहब आए और मुझे पेनल्टी चार्ज लगाने की बात करने लगे,मैंने पूंछा किस खुशी मे?वह बोले आप की जर्नी खत्म हो गई और आप आगे निकाल आए हैं मैंने कहा जनाब मेरा टिकट आगरा कैंट तक है और मुझे इस ट्रेन को दिल्ली मे छोडना है ,पेनल्टी किस बात की?अपनी गलती पर मुस्करा कर शरद मोहन के वह विभागीय साथी आगे बढ़ गए।

दिल्ली मे ट्रेन बदल कर मै आगरा 14 नवंबर को पहुँच गया उस दिन विश्राम करके अगले दिन से अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर ली। इस प्रकार चंडीगढ़ की यात्रा का समापन नाभा होते हुये हुआ।

 

आगरा/1986-87 (भाग-4)/लखनऊ-कानपुर यात्रा

शायद 27 सितंबर 1987 को मामाजी के सबसे छोटे बेटे शेष की शादी थी। अपने स्वास्थ्य के कारण बउआ का और उनके कारण बाबूजी का जाना संभव न था,भुआ ने हम लोगों को कानपुर आने को कहा था और मै अपनी तरफ से सबसे मेल-जोल व रिश्ता रखना चाहता था/हूँ। अतः 26 ता की रात को अवध एक्स्प्रेस से चल कर 27 को लखनऊ पहुंचा। अब माईंजी न्यू हैदराबाद मे यूनिवर्सिटी बंगले से लौट कर रहने नहीं गईं थी,नई कालोनी रवीन्द्र पल्ली मे थीं। चारबाग से हजरतगंज आकर दूसरे टेम्पो से  रवीन्द्र पल्ली पहुंचे और उनके घर पहुँचने के लिए रिक्शा किया जैसा कि नई कालोनियों मे होता है कोई उनके घर के न . B-2,सविता सदन,गोखले विहार मार्ग की लोकेशन बताने की स्थिति मे न था। माई जी के छोटे भाई हरीश माथुर साहब कहीं से लौट रहे थे मैंने उन्हें पहचान कर आवाज दी -हरीश मामाजी ,देख कर वह पहचान गए और उनके साथ घर पहुँच गए। तब तक सब लोग नाश्ता कर चुके थे और शादी के लिए लिए गए कम्यूनिटी हाल(संस्कार,B-1/15,’E’पार्क ,मंदिर मार्ग,महानगर एक्सटेंशन) चलने की तैयारी मे थे। माई जी ने हम लोगों को नाश्ता देकर कहा तुम्हारा साथ कोई नहीं देगा सब कर चुके हैं। यों अकेले-अकेले गड़पने की आदत हमारी नहीं है,शुगन भर का चख लिया और उल्टे पैरों फिर चलने के लिए तैयार हो गए। वहाँ लोगों को पहुंचा दिया गया था और खाने-पीने का सब सामान घर से सबसे आखीर मे आया ,लिहाजा खाना बेहद देर से बना हलवाई खाली बैठा-बैठा शोर मचाता रहा वह बिना समान के करता क्या?माईजी बोलीं हमने कहा था तुमने वहाँ नाश्ता नहीं किया अब हम यहाँ क्या करें भूखे तो होगे?हम यशवन्त हेतु जो रस्क आदि आगरा से लाये थे वह उसे तथा दूसरे छोटे बच्चों को दे दिये गए और लाया गया सारा स्टाक तत्काल खत्म हो गया। खाना 3-4 बजे तक हुआ।

वहाँ राजन मामाजी , रंजना मौसी ,मंजु मौसी, (तीनों बउआ के छोटे चाचा के बच्चे) कमल मौसी(बउआ  के विश्वनाथ चाचा की बेटी) आदि भी मिले थे। गोपाल मामा जी  (बउआ के फुफेरे भाई) से भी काफी लंबे समय बाद मुलाक़ात हुयी।  शायद यह शेष की लव मैरेज थी ।

वहाँ माईं जी की एक बहन मनोरमा मौसी भी आयीं थी जो तब विधवा हो चुकी थीं और  उनकी आर्थिक स्थिति भी बदल चुकी थी उनके प्रति माईं जी का व्यवहार अब उपेक्षा भरा था। जबकि न्यू हैदराबाद मे 196 0 के लगभग जब वह आयीं थीं तो उनका तथा मौसा जी का मामा जी एवं माईं जी ने गरम जोशी से स्वागत किया था। तब वह मुरादाबाद मे बर्तनों के सफल व्यापारी थे। आर्थिक ,सामाजिक स्थिति बदलते ही पारिवारिक रिश्तों मे यह परिवर्तन लगा तो अटपटा ही परंतु अब सभी जगह ऐसा ही दिख रहा है। जहां माईं जी अपने अमीर रिशतेदारों को अपने प्रबंध से चारबाग से बुला और विदा के समय भेज रहीं थीं वहीं इन मनोरमा मौसी को  आना और जाना अपने माध्यम से रिक्शा द्वारा तय करना पड़ा।

माईं जी के बाद वाली उनकी बहन सरोज मौसी और राजेन्द्र बहादुर मौसा जी की आव-भगत ज्यादा थी। डा आर बी श्रीवास्तव साहब तब सोमैया आर्गेनिक ,बाराबंकी मे उच्च अधिकारी थे। उन्हीं ने बताया था कि,पद्मा शंकर पांडे को विनोद दीक्षित के स्थानांतरित होते ही हटा दिया गया था।

बउआ ने शेष के लिए थ्री पीस सूट भिजवाया था उसका जिक्र माईं जी ने किसी से नहीं किया जबकि उनके पीहर वाले जो लाये थे उनका खूब बखान सब से कर रही थीं। वैसे उनके यहाँ सुबह 09 बजे नाश्ता और दोपहर  एक बजे खाना ,04 बजे चाय,रात 09 बजे खाना समय से चला। सुबह नाश्ते के समय मामा जी के चित्र पर हलवा ,जलेबी आदि माईं जी रखवाती थीं ,अक्सर यशवन्त उनमे से कुछ न कुछ उठा लेता था और खा लेता था। वहाँ भी इस पर किसी को ऐतराज नहीं था और बउआ ने भी इसे उसकी अच्छी आदत ही माना ।

तीसरे दिन दोपहर  मे हम कानपुर भुआ के यहाँ जाने के लिए उनके यहाँ से चल दिये। सुबह का नाश्ता करके चले थे और चारबाग मे पेसेंजर गाड़ी काफी देर से मिली थी। गाड़ी मे भीड़ भी थी। वैसे हमने यशवन्त को प्लेटफार्म पर केले खिला दिये थे और किसी दूसरे से न लेने की उसकी आदत भी घर की परंपरा के अनुसार डाली हुयी थी। एक वृद्ध सज्जन जिनकी पत्नी बुर्का पहने थीं भी कानपुर जा रहे थे। उन्होने हमसे थोड़ी जगह उनके लिए एडजस्ट करने को कहा ,हमने यशवन्त को गोदी मे बैठा लिया और उन दोनों को जगह उपलब्ध करा दी। यशवन्त के यह पूछने पर कि ये कौन हैं,उनकी आयु को देखते हुये उसे बताया कि ये बाबाजी-अम्मा जी हैं। इस बात पर वे लोग खुश हुये। आगे एक जगह उन लोगों ने केले खरीदे तो यशवन्त को भी देने लगे और 04 वर्षीय बच्चे द्वारा लेने से इंकार करने पर उन्हें अटपटा लगा। वह बोले हम तो बाबा जी हैं हमसे क्यों नहीं ले रहे हो तब हम लोगों ने भी उससे लेने को कह दिया तभी उसने उनसे लेकर केला खाया। उन्हें हमने स्पष्ट किया कि यह उनके लिए नहीं कुल मिला कर इस लिए उसकी आदत हमारे माता-पिता ने डाली है कि आज के युग मे सब का भरोसा नहीं किया जा सकता। इस बात से उन्होने भी सहमति जतलायी।

शाम तक भुआ के घर कानपुर पहुंचे। खाना तो रात को ही हुआ। बउआ ने कहा था अगर माईं जी शादी का पकवान भेजें तो भुआ से कहना कि वह थोड़ा उसमे से ले लें ,मुझे अपने हाथ से देने को मना किया था । भुआ ने खुद न निकाल कर मंजु भाभी जी से निकालने को कह दिया जिनहोने सारा का सारा लेकर रख लिया। चलते समय थोड़ा सा भी घर ले जाने को नहीं दिया। बउआ को अपनी नीति के चलते अपने भतीजे की शादी का पकवान न खुद मिला न हम लोगों को चखनेको मिला।

1979 मे एक बार यूनियन के काम से कानपुर गए थे और एक दिन वहाँ रुके थे तब भुआ-फूफा जी भी नहीं थे,लाखेश भाई साहब भी दिल्ली गए हुये थे। अगले दिन मंजू भाभी जी छोटी बेटी स्वाती को डा के पास दिखाने ले गईं ,मुझे भी ले गईं थीं। दवा के रु 10/-देने थे बोलीं अपना पर्स भूल आए है क्या आपके पास रु 10/- हैं?जो सफर मे बाहर निकला हो वह बिलकुल खाली हाथ कैसे निकाल सकता है?मैंने तत्काल एक दस रु का नोट दे दिया। वह बोलीं घर पर मांग लीजिएगा, भला भतीजी की दवा के दस रु भी मांगने वाली बात थी?हमे ऐसे संस्कार हमारे माता-पिता से नहीं मिले थे। हम अपना बैग उठा कर यूनियन दफ्तर होते हुये कानपुर सेंट्रल पहुंचे और केले खाकर लच कर लिया। उस समय हम तो रात की अवध एक्स्प्रेस से जाने के इंतजार मे वेटिंग रूम मे बैठे थे। एक टी टी साहब  आए और उन्होने सुझाव दिया कि यदि वह पहले जाने की गाड़ी का बंदोबस्त कर दें तो क्या हम शाम तक घर नहीं पहुँच जाएंगे। भला स्टेशन के वेटिंग रूम मे बैठने का कोई तुक तो था नहीं। कोई सज्जन इलाहाबाद से कानपुर जाना चाहते थे और उन्हें मजबूरी मे टूंडला तक का टिकट लेना पड़ा था ऐसे ही टिकट को दूसरे अपने साथी से मँगवा कर उन्होने मुझे दे दिया और कुल रु 50/- लिए । टूंडला से बस पकड़ कर 05 बजे तक मै आगरा घर पहुँच गया था।

भुआ और लाखेश भाई साहब का चाय-दूध का बंदोबस्त अलग-अलग था ,खाना एक साथ था। वह नव-रात्र के दिन थे भुआ तो उपवास भी रखती थीं। लाखेश भाई साहब दफ्तर से लौटते मे कुछ अधिक टाफिया लाये और यशवन्त को सौंप कर कहा एक एक कर खाते रहना परंतु उससे मंजू भाभी जी ने वह पेकेट ले लिया एवं एक टाफी पकड़ा दी। उसके बाद उस पेकेट का क्या हुआ?चलने तक खबर न थी। यह भी सुनने मे आया था कि बाद मे जब लाखेश भाई साहब ने कार ले ली थी तो भाभी जी शराब के नशे मे चलते हुये टकरा बैठी थी और रीढ़ मे चोट खा ली थी। शायद सभी अमीर हमेशा ही नशे मे रहते हैं। अच्छा ही है उन लोगों ने रिश्ता नहीं माना वरना एक कि मी दूरी पर रह कर वे हमारा कितना नुसान करने की स्थिति मे होते?

भुआ के यहाँ दो रोज रुके थे। तीसरे दिन चल दिये थे । दूसरे दिन फूफा जी ने अपने दोस्त और शालिनी के फूफाजी के यहाँ मिलने जाने को कहा जो टेलर मास्टर थे। भुआ के यहाँ से नाश्ता करके ही चलना पड़ा और शालिनी के फूफा जी  की आर्थिक स्थिति टफ थी उनकी एक पुत्री रु 600/- की टीचरी करके गुजारा कर रही थीं। अतः उनके घर हम लोगों ने खाना खाना उचित नहीं समझा और भुआ के यहाँ हम लोगों के खाने का बंदोबस्त इसलिए नही हुआ कि शालिनी की भुआ खिलाएँगी। रात को ही खाना हुआ।

उस समय तक जेनरल कम्पार्टमेंट से जाना-आना मुश्किल न था यह जाफ़र शरीफ साहब की मेहरबानी से बहौत बाद मे मुश्किल हुआ है। लिहाजा हम लोग अवध एक्स्प्रेस से जाने के लिए रात का खाना खा कर सेंट्रल प्लेटफार्म पर आ गए। यशवन्त गोदी मे था और एक बेंच पर दो मोटे-मोटे लोग पसार कर आराम से बैठे थे। मैंने शालिनी से कहा उस बेंच पर बच्चे को लेकर बैठ जाओ परंतु उनकी हिम्मत उन लोगों से कहने की नहीं हुयी तो मुझे ही कहना पड़ा। बाद मे यह पता चलने पर कि हम लोग भी कमला नगर ,आगरा मे ही रहते हैं और उनका एवं हमारा घर आगे-पीछे की रो मे ही है तब उन लोगों ने मुझे भी बैठा लिया। वस्तुतः वहाँ उनके पुत्र रहते थे और यह साहब कहीं जज साहब के पी ए थे। बाद मे कल्याण सिंह की बिरादरी का होने के कारण तथा पूर्व मे ही वकालत पास होने के कारण यह खुद भी जज बन गए और जब रिटायरमेंट के बाद कालोनी मे रहने आए तो सब इन्हें जज साहब के रूप मे ही जानने लगे,किसी को पता ही नहीं है कि उनके प्रोमोशन का राज ?उन्हें तो संगम एक्स्प्रेस से टूंडला तक जाना था उनकी गाड़ी पहले आ गई और वह पहले चले गए। हमारी गाड़ी आने पर हम लोग भी चल दिये। हम तो आगरा फोर्ट पर उतरे उन्हें टूंडला से जीप से आना पड़ा होगा।

कुल मिला कर यह यात्रा खर्च करने के बाद भी खुश न करने वाली रही। ……..

 

आगरा /1986-87(भाग-3)-एपसो,कानपुर

आगरा से जो लोग चले थे उनमे एक बालेश्वर जी कांग्रेस के थे,एक शुक्ला जी भी हमारी पार्टी के नहीं थे। हम कम्यूनिस्ट पार्टी के लोगों मे डा महेश चंद्र शर्मा,डा जितेंद्र रघुवंशी (के एम मुंशी विद्यापीठ,आगरा के विदेशी भाषा विभाग के अध्यक्ष और रूसी भाषा के शिक्षक),का नेमीचन्द,का एम पी दीक्षित (यह कानपुर के ही थे),मै और शायद एक दो लोग और। दो-दो लोग एक-एक रिक्शा मे बैठ कर ठहराव स्थल पहुंचे। मेरे साथ का नेमिचन्द बैठे थे वह पेशे से जूता डिजाइनर थे ,मुझसे वह समृद्ध थे परंतु मैंने रिक्शा के पैसे दिये थे। पूरे प्रदेश के लोग वहाँ थे काफी भीड़ थी और नहाना संभव न था। जूलाई या अगस्त का महीना था और बिना नहाये ही कान्फरेंस मे शामिल होना पड़ा। नाश्ता वहाँ से कर् के चैंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के हाल पहुंचे।

अब उस कान्फरेंस की हू- ब -हू बातें याद नहीं हैं। का रमेश सिन्हा जो तब दूसरी कम्यूनिस्ट पार्टी मे थे इस संगठन के प्रधान के पद से मुक्त होना चाहते थे। का आर एन मिश्रा शायद महासचिव थे। लखनऊ से आने वालों मे उस समय के जिला मंत्री (जो बाद मे प्रदेश सचिव भी रहे और अब राष्ट्रीय परिषद के सदस्य हैं)का अशोक मिश्रा ,एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष का अतुल ‘अंजान'(जो बाद मे प्रादेशिक नेता रहे और अब राष्ट्रीय सचिव मण्डल के सदस्य हैं) का मुझे ध्यान है। एक वकील साहब मैनपुरी के थे जिनकी पत्नी का उर्मिला राजपूत शायद 6 0-70 महिलाओं का जत्था ले कर आयीं थीं शायद वह अब भाजपा मे हैं,कल्याण सिंह के जमाने मे जातिवाद के कारण चली गईं होंगी।

समारोह मे डा हेमलता स्वरूप (आचार्य नरेंद्र देव महाविद्यालय की तत्कालीन प्राचार्या और पूर्व कुलपति कानपुर विश्वविद्यालय) की भी शायद महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनके पुत्र का अरविंद राज स्वरूप भी काफी सक्रिय थे और का हरबंश सिंह को भी दौड़-धूप करते देखा गया था।

दिन-रात का भोजन ठहराव -स्थल पर ही था। अगले दिन चुनाव भी हुआ। का अशोक मिश्रा जी को किसी महत्वपूर्ण पद पर का सिन्हा ने प्रस्तावित किया था जिसे उन्होने स्वीकार कर लिया था परंतु का अतुल ‘अंजान’ ने पहले पद लेने से इंकार किया था। परंतु बड़े नेताओं के आग्रह पर बाद मे मान गए थे। इस दिन कान्फरेंस कुछ जल्दी समाप्त हो गई थी और लौटने की गाड़ी रात की थी। हालांकि चलते समय मै भुआ के घर का पता बाबूजी से लेना भूल गया था परंतु पहले घर का उनका पता मालूम था। डा शर्मा जी से अनुमति लेकर मै भुआ के घर के लिए चला उनके पहले वाले मकान मालिक शरीफ थे और उन्होने नया पता दे दिया -111/4,हर्ष नगर,इंजीनियर्स पेट्रोल पंप के सामने । भुआ-फूफाजी तो थे ही लाखेश भाई साहब -भाभी जी उनकी बेटियाँ-वर्षा,स्वाती सभी मिले। (यह वही लाखेश भाई साहब हैं जो अब हमारे घर से सवा किलो मीटर की दूरी पर हैं परंतु संपर्क नहीं रखना चाहते)। उस समय लाखेश भाई साहब ने खाना जबर्दस्ती खिलवाया और अपने स्कूटर से मुझे ठहराव-स्थल पर पहुंचा दिया। वहाँ साथी का ने मेरे खाने का भी प्रबंध रख छोड़ा था जब की उस दिन रात का खाना जल्दी दे दिया गया था। मै दोबारा तो खा नहीं सकता था परंतु साथियों की बात रखने के लिए मीठा ले लिया था।

भुआ-फूफा जी ने शालिनी और यशवन्त को भी लेकर आने को कहा था। और इत्तिफ़ाक से सितंबर मे मामा जी के छोटे बेटे शेष की शादी मे लखनऊ आना हुआ तब लौटते मे कानपुर भुआ के घर उन लोगों को लेकर गए थे। ब्यौरा अगली बार…..

 

आगरा/1986-87(भाग-2)

अब एक तरफ तो मे मजदूर आंदोलन मे भाकपा के माध्यम से सक्रिय था दूसरी तरफ भाजपा के रुझान वाले व्यापारियों की नौकरी कर रहा था। शुरू-शुरू मे पार्टी का कार्य गोपनीय ढंग से किया,लेकिन  एक बार एक प्रदर्शन मे भाग लेते हुये सेठ जी के चचेरे भाई (जिनकी हरिद्वार मे गंगा मे डूब कर मृत्यु हुयी जब मैंने उन्हें पानी से खतरा बताया था तो वह खूब हँसे थे) ने देख कर सेठ जी को सूचित किया और वितरित पेंफ्लेट उनको दे दिया तो सेठ जी ने पूछा कि माथुर साहब यह क्या? उन्हें समझा दिया यह हम कर्मचारियों के हित की लड़ाई है मैंने मुगल के विरुद्ध केस इन्हीं के माध्यम से किया है तो वह संतुष्ट हो गए। जब व्यापारियों और उनके वकील साहब को यह संतुष्टि रही कि मेरे कम्युनिस्ट पार्टी मे भागीदारी से उनका कार्य प्राभावित नहीं होता है तो खुल्लम-खुल्ला प्रदर्शन आदि मे भाग लेने हेतु कुछ घंटों अथवा पूरे दिन का भी समय वे दे देते थे जिसका पूरा वेतन मुझे मिलता था।

कभी-कभी तो मौज मे होने पर सेठ जी मजदूरों की समस्या पर भी चर्चा करने लगे थे। उन्होने अपने सामने की दूसरी दुकान पर भी मुझे पार्ट-टाईम दिला दिया था क्योंकि उनके साढू को भी फुल-टाईम अकाउंटेंट की जरूरत थी अतः वहाँ छोडना पड़ा था। एक बार सेठ जी ने स्वीकार किया कि,हिंदुस्तान मे ‘डिस्पेरिटी तो है-एक तरफ बोरे मे भी धन रखने की जगह नहीं है दूसरी तरफ मजदूर भूख से बिलबिला रहे हैं। ‘उनके अनुसार यह व्यवस्था की समस्या है वे लोग व्यक्तिगत रूप से कुछ नहीं कर सकते,सिवाए इसके कि मेरे समान संघर्षरत ईमानदार लोगों को सहयोग जो हो सकता है -प्रदान कर दे।

हमारे जिला मंत्री मिश्रा जी का कहना था आप भाग्यशाली हो जो आप को ‘कम्यूनिस्ट’ पहचान के बावजूद भाजपा के व्यापारी जाब मे रखे हुये हैं,अन्यथा संघ/भाजपा के व्यापारी ट्रेड यूनियन तक के लोगों को बर्दाश्त नहीं करते । कोशाध्यक्ष चौहान साहब का दृष्टिकोण था कि चूंकि मैंने उनके अकाउंट्स पर होल्ड कर लिया है इसलिए मुझे रखना उनकी मजबूरी है जिसे वह अपनी उदारता के रूप मे पेश कर रहे हैं। लेकिन वे संतुष्ट थे की मेरे रोजगार पर पार्टी मे भागीदारी से खतरा नहीं है।

हमारे पास समयाभाव भी था और धनाभाव भी था अतः हम लोग मेल-जोल पुनः होने के बावजूद टूंडला कम ही जा पाते थे।रेलवे बाबू शरद मोहन की पत्नी ही कभी अपनी जेठानी,कभी दूसरी नन्द को लेकर आती रहती थीं और दिन मे दुकानों ,फिर पार्टी आफिस मे होने के कारण मेरी गैर मौजूदगी मे ही उन लोगों का आना-जाना होता था। शरद मोहन को रोज शहर आने-जाने के बावजूद अपनी बहन या भांजे से मिलने की कोई जरूरत नहीं थी। पार्टी आफिस राजा-की-मंडी मे होने के कारण यदि शालिनी के बहौत आग्रह पर मे उनके आफिस मे गया तो वह सकपका जाते थे और ढंग से कोई बात-चीत न करते थे। उनके घर टूंडला जाने पर भी वह घर पर नहीं होते थे और यदि कभी घर पर हुये भी तो सोने का स्वांग करते थे,उनकी माता का कहना होता रोज आफिस मे थक जाता है आज रेस्ट मे रेस्ट कर रहा है। एम ए पास इन्क्वायरी के बाबू को मुझ से बात करने मे घबराहट होती थी। क्योंकि वह अश्लील मज़ाक पसंद व्यक्ति थे और मुझे तो मज़ाक ही पसंद नहीं था/न ही है।

डा राम गोपाल सिंह चौहान ने रिटायरमेंट के बाद कालेज का बंगला -6,हंटले हाउस  अपनी पुत्री (जो आगरा कालेज मे हिन्दी विभाग मे पढ़ाती थीं)के नाम करवा लिया था और उन्हीं के लान मे पार्टी की बड़ी मीटिंग्स होती थीं। वह A I P S O मे भी सक्रिय थे और उसमे भी मुझे बुलाते थे। इस ‘विश्व शांति और एकजुटता संगठन’ मे कम्यूनिस्टों के अतिरिक्त कांग्रेस,जनता पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के भी सदस्य थे। आगरा मे इसका नेतृत्व का महादेव नारायण टंडन (संस्थापक जिला मंत्री,आगरा-भाकपा)करते थे जो कम्यूनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध के समय A I C C मे सक्रिय थे और गोपनीय ढंग से पार्टी चला चुके थे। 1987 मे कानपुर एपसो का एक सम्मेलन था जिसमे भाग लेने को टंडन जी ने मुझ से कहा परंतु मैंने आर्थिक आधार पर असमर्थता व्यक्त कर दी। उन्होने कहा हम तुम्हें भेजेंगे तुम टिकट की चिंता न करो। एक वृद्ध सज्जन जो एन वक्त पर नहीं गए उनके टिकट पर मुझे भिजवा दिया और लौटने के टिकट का धन पार्टी फंड से मिश्रा जी ने दे दिया।

राजा-की-मंडी रेलवे स्टेशन से आगरा से जाने वाले लोगों का जत्था ‘गंगा-जमुना एक्स्प्रेस’ से रात्रि मे चला और अगले दिन प्रातः कानपुर पहुंचा । विवरण अगली बार……. 

 

आगरा/1986-87(भाग-1)मुगल के विरुद्ध संराधन केस

सेठ जी ने अपने पार्ट टाईम अकाउंटेंट जो उनके सहपाठी भी रहे थे उनके स्वास्थ्य की आड़ लेकर उन्हें अपने यहाँ से हटा दिया और सम्पूर्ण कार्य मेरे ही पास आ गया परंतु वेतन बढ़ोतरी नहीं हुयी ,प्रतिवर्ष मात्र रु 100/-ही बढ़ाने की बात कही। किन्तु दो माह बाद ही मेरी  बात मान कर उन्होने अतिरिक्त रु 200/- बढ़ा दिये। फिर भी समस्या तो थी ही क्योंकि रु 290/- की किश्त तो हाउसिंग बोर्ड की ही जमा करनी होती थी। जिन लोगों का हाथ मुगल से नौकरी खत्म कराने का था उनकी सोच थी कि ,जाबलेस होकर यह मकान बेचने पर मजबूर हो जाएगा। परंतु कम ही सही कुछ तो अरनिंग हो ही रही थी झेल लिया और इसलिए भी कि पिताजी मेरे ही पास थे वह अंत तक आटा अपने खर्च पर मुहैया कराते रहे। मना करने पर उनका जवाब होता हम तुम्हें किराया नहीं दे रहे हैं -खाना खुद खाएँगे और तुम लोग भी उसी मे खा सकते हो।

हरीश छाबड़ा के चिकित्सक मित्र के एक दूसरे मित्र ने मुझे मुगल के विरुद्ध केस हेतु का अब्दुल हफीज से संपर्क करने को कहा। आगरा मे उस समय भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की पहचान हफीज साहब की पार्टी या चचे की पार्टी के रूप मे थी। का हफीज ईमानदार ट्रेड यूनियन नेता थे और काफी वृद्ध हो  चुके थे वह सज्जन उनके पूर्व परिचित थे ,वही मुझे लेकर गए थे अतः उन्होने यह कह कर कि अब खुद नए केस नहीं ले रहे है का हरीश चंद्र आहूजा के घर भेज दिया। पहले तो वकील आहूजा साहब मुगल का नाम सुन कर भड़क गए क्योंकि झा साहब के परसोनल मेनेजर रहते उनके विरुद्ध इजेक्शन  नोटिस पारित कराया गया था। लेकिन बाद मे इस शर्त पर केस लड़ने पर राजी हो गए कि किसी भी सूरत मे कभी भी मुगल मेनेजमेंट से कोई सम्झौता नहीं करोगे।

आहूजा साहब ने संराधान अधिकारी,आगरा के समक्ष केस दायर कर दिया। इसके जवाब मे मुगल मेनेजमेंट ने एक माह की नोटिस पे का ड्राफ्ट बना कर भेज दिया और कहा सरप्लस होने के कारण छटनी की है। सरकारी श्रम विभाग मे जिस कछुआ गति से केस चलते हैं उसी प्रकार मेरा भी केस शुरू हो गया। आहूजा साहब ने प्रत्येक गुरुवार को श्रमिक प्रशिक्षण कार्यक्रम मे भाग लेने हेतु राम बाग स्थित ‘मजदूर भवन’ पर मुझे बुलाना शुरू किया जिसमे भाग लेने हेतु हींग की मंडी से सीधे पहले रामबाग जाता था फिर वहाँ से लौट कर घर पहुंचता था। इस स्कूल मे ट्रेनिंग देने हेतु प्रो डा जवाहर सिंह धाकरे,प्रो डा महेश चंद्र शर्मा,और का रमेश मिश्रा,जिला मंत्री भाकपा टर्न -बाई -टर्न आते रहते थे। जैसा मेरा मिजाज है मे मूक श्रोता न था। मैंने शंका होने पर सवाल उठाए जिंनका उत्तर प्रशिक्षक लोग बड़ी सौम्यता से समझा कर देते थे।

कुछ माह बाद आहूजा साहब ने कहा केस अपनी रफ्तार से चलता रहेगा लेकिन हम चाहते हैं कि जिस आंदोलन से हम जुड़े हैं आप भी जुड़ें। उन्होने ‘माँ’ उपन्यास पढ़ने को दिया। अक्तूबर 1986 मे उन्होने मुझे भाकपा का सदस्य बना लिया। का रमेश चंद्र मिश्रा जी ने मुझे अपने घर बुला कर कुछ और किताबें पढ़ने को दी। हमारी लँगड़े  की चौकी शाखा की पार्टी मीटिंगें मिश्रा जी के निवास पर ही होती थीं। 8-10 माह बाद आहूजा साहब ने मुझे ‘मजदूर भवन’ बुलाना बंद कर दिया और कहा कि आप राजा की मंडी आफिस मे चौहान साहब और शर्मा जी के साथ काम करो वे आप को वहाँ चाहते हैं। इनमे से चौहान साहब से मे मिला तक नहीं था अतः आश्चर्य भी हुआ । डा राम गोपाल सिंह चौहान ,आगरा कालेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष से सेवा निवृत थे और भाकपा के जिला कोषाध्यक्ष थे । डा शर्मा जी आर बी एस कालेज ,आगरा मे बी एड के विभागाध्यक्ष थे और सहायक जिला मंत्री थे । वैसे दोनों ही पूर्व मे जिला मंत्री भी रह चुके थे। ये दोनों मुझे पार्टी आफिस मे अपनी सहायता के लिए चाहते थे क्योंकि जिला मंत्री मिश्रा जी भाग-दौड़ ,मजदूर व किसान  समस्याओं आदि मे व्यस्त रहते थे।

शुरू-शुरू मे चौहान साहब मुझे इमला बोल कर पत्रोत्तर लिखाते थे। बाद मे उन्हें कुछ लगा कि मे तो खुद लिख सकता हूँ तो कहने लगे रफ लिख कर रखना मुझे दिखाना। मे उनके आने से पहले प्रदेश और केंद्र से आए पत्रों के उत्तर लिख कर रखने लगा तो कुछ दिन बाद बोले बेकार दो बार लिखते हो सीधे पार्टी लेटर हेड पर लिख लो। अब उन्हें केवल हस्ताक्षर ही करने रहते थे। मुझे पार्टी की जिला काउंसिल मे भी सदस्यता प्रदान कर दी गई।………. 

 

आगरा/1984-85(भाग-6 )

हालांकि 21 फरवरी 1985 को टर्मिनेशन लेटर मिलने और 01 अप्रैल 1985 को हींग की मंडी की जूते की दुकान मे नौकरी करने के मध्य खाली रहा। कभी किसी और कभी किसी काम से इधर-उधर जाना बढ़ गया क्योंकि समय पर्याप्त था। जब कभी टूंडला जाना हुआ तो शालिनी का आग्रह रहता था कि उनके घर भी मिल कर आऊँ और अक्सर वहाँ भी  हो आता था । घर पर उनकी माँ और छोटी भाभी ही अक्सर मिल  पाती थीं। उनके भाई तो राजा-की -मंडी स्टेशन पर रेलवे इंक्वायरी मे  रोज ड्यूटी देने आते थे परंतु अपनी छोटी बहन से मिलने आना उनकी कर्टसी मे नहीं था। इसलिए मै उनके घर टूंडला जाने का इच्छुक नहीं होता था लेकिन जब यशवंत के जन्म के बाद दोबारा आना-जाना शुरू हो गया था तो चला ही जाता था।

पहले 1982 मे जब यशवंत से बड़ा वाला लड़का वहाँ टूंडला मे हुआ और 12 घंटे बाद नहीं रहा तो वहाँ से आवा-गमन बंद कर दिया था।किन्तु जब शालिनी वहाँ थीं तो महीना-पंद्रह दिन पीछे जाता रहा था। उस समय भी शरद मोहन का व्यवहार अटपटा लगता था। कभी वह अपने भिलाई वाले ताऊ जी से मज़ाक मे कहते थे आप बैंक क्यों जा रहे हैं मम्मी के स्टेट बैंक (आशय ब्लाउज मे रखे पर्स से था) से रु ले लिया करें। कभी वह अपनी मौसेरी बहन चंचला (मिक्की) जो दो बच्चों की माँ थी को गोद मे उठा कर सीने से चिपटा कर डांस करने लगते थे और मिक्की सिर्फ मौसी-मौसी कहती रहती थीं और उनकी मौसी अर्थात शरद मोहन की माँ केवल हँसती रहती थीं।

अब 1985 मे उनकी श्रीमती जी -संगीता का व्यवहार भी अटपटा ही दीखा। वह अक्सर लेटी ही रहती थीं किन्तु उनकी भाव-भंगिमा ठीक नहीं लगती थी। शालिनी ने बताया था कि शुरू-शुरू मे जब वह आयीं थीं तो श्वसुर साहब के टूर से लौटने पर उनके सीने से चिपट जाती थीं जो उनकी सास को भी ठीक नहीं लगा,उन्होने खुद ही अपनी सास को बताया था कि जब वह अपने कालेज यूनियन की अलवर मे प्रेसीडेंट थीं तो सहपाठी लोग उनसे चिपटते रहे थे उसी आदत के कारण वह अपने श्वसुर से भी चिपट जाती थीं, अलवर की अपनी कालोनी मे वह ‘काली पप्पी’ के नाम से मशहूर थीं । हालांकि अब शालिनी जीवित नहीं हैं तो वे लोग अपनी बात से पलट भी सकते हैं। व्यक्ति हो या न हो बात उसकी याद मे  रह जाती है।

मई के आखिर मे उनकी पुत्री का जन्म हुआ तो कुछ समय के लिए शालिनी को बुलवा लिया था ,इस प्रकार यशवंत तब ही पहली बार वहाँ पहुंचा था।उस समय उसका वहाँ मन नहीं लगा था।

बिजली दुकान का पार्ट टाईम जाब ज्यादा नहीं चल सका। वकील साहब ने हमारी कालोनी मे ही स्थित एक जूता फेकटरी मे दूसरा पार्ट टाईम जाब दिला दिया। ये लोग मुस्लिम होने के बावजूद सौम्य व्यवहार के थे। लेकिन कुछ समय बाद इनहोने वहाँ से काम समेट लिया और कलकत्ता चले गए। फिर  सेठ जी ने अपने साढ़ू साहब की जूता फेकटरी मे पार्ट टाईम जाब दिला दिया। वह भी पास की कालोनी मे ही था। ……..

 
 
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