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Monthly Archives: December 2011

2011 को अच्छा मानें या बुरा?

आज 2011 वर्ष का समापन होने जा रहा है। पूरे वर्ष की गतिविधियों और उनके परिणाम पर दृष्टिपात करके इस वर्ष को अच्छा या बुरा नहीं कह सकते। इस वर्ष ब्लाग-लेखन द्वारा कई ब्लागर्स से जो संपर्क था वह व्यक्तिगत मुलाकातों के रूप मे भी सामने आया। कई गोष्ठियों मे श्रोता के रूप मे  भाग लिया और अनुभव प्राप्त किए। राजनीतिक रूप से जहां अपनी कम्युनिस्ट पार्टी के धरना  व प्रदर्शनों मे भाग लिया वहीं AISF  तथा प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रमों मे भी उपस्थित रहा। पार्टी की कई बैठकों मे भी भाग लेने का अवसर मिला। कई ब्लागर्स की व्यक्तिगत समस्याओं हेतु ज्योतिषीय समाधान देने के भी अवसर मिले। एकमात्र मनोज कुमार जी ही ऐसे ब्लागर रहे जिनहोने अपने कार्य-संपन्नता की औपचारिक सूचना ई-मेल द्वारा दी। एक और ब्लागर ने पूछने पर स्वीकार किया कि उन्हें पहले से अब लाभ है। परंतु अधिकांश ने लाभ होने अथवा न होने की कोई सूचना देना मुनासिब नहीं समझा। एक ब्लागर की इच्छा का आदर करते हुये ‘जन हित मे’ स्तुतियाँ देना प्रारम्भ की ,परंतु उन ब्लागर ने ही उन्हे देखने की जरूरत नहीं समझी।

इसी वर्ष मार्च माह मे एक परिचित बैंक अधिकारी के पुत्र की तबीयत होली खेलने के बाद ऐसी खराब हुई कि डाक्टरों ने बचने के बारे मे ही संदेह व्यक्त कर दिया और बचने पर ‘दिमाग’ विकृत होने की बात कह दी। उन्होने चिकत्सा विश्वविद्यालय के ICU मे भरती अपने पुत्र के पास बुला कर ज्योतिषीय समाधान मांगा। मेरे द्वारा बताए मंत्रों के प्रयोग से उनका पुत्र सकुशल स्वस्थ होकर आया और परीक्षा परिणाम भी उसका अनुकूल ही आया। इस जानकारी से मन काफी संतुष्ट हुआ।

एक ब्लागर साहब और एक परिचित के पुत्र को पूर्ण लाभ होना मेरे ज्योतिषीय सिद्धांतों की वैज्ञानिकता को ही पुष्ट करता है। जबकि फेसबुक तथा ब्लाग्स मे कई लोग मेरी पद्धति का मखौल उड़ाते हैं,उन्हे प्रचलित दक़ियानूसी  पोंगा-पंथ ही भाता है।

इसी वर्ष हमारी बहन डॉ शोभा और बहनोई श्री कमलेश बिहारी माथुर S/O स्व.सरदार बिहारी माथुर,रेलवे अधिकारी (अलीगढ़),द्वारा हमारे विरुद्ध संलिप्त रहने का पर्दाफाश भी हो गया। हम तो छोटी बहन-बहनोई समझ कर उन पर विश्वास करते रहे और वे हमारे विरुद्ध लोगों को उकसाते व भड़काते रहे। 5 वर्ष से उनकी गतिविधियां संदिग्ध लग रही  थीं परंतु पूनम और यशवन्त मिलकर मुझे चुप करा देते थे। इस बार अप्रैल मे जब वे अपने भाई दिनेश की बेटी की शादी मे लखनऊ आ रहे थे तो फोन पर कई ऐसी बातें बहन जी द्वारा कही गई कि मैंने पूनम से कह दिया था कि इस बार तो अपने माता-पिता की पुत्री-दामाद होने के नाते अपने घ्रर  आने पर उनका स्वागत कर लेंगे परंतु भविष्य मे उन लोगों का स्वागत करना मेरे लिए संभव नहीं है।

यशवन्त को कमलेश बाबू चौराहे तक ले जाने की बात कह कर अपने साथ ले गए फिर हजरतगंज होते हुये अमीनाबाद तक जाकर लौटे बिफर कर यह कहते हुये कि यह न तो आलू की टिक्की खाता है न कुल्फी हम इसे अपने साथ नहीं ले जाया करेंगे। अगले दिन उन्हे फ्लाईट पकडनी थी लिहाजा मै खामोश रहा वरना पूछता कि क्या मैंने उसे आपके साथ लगाया था?उसे साथ ले जाने से  उसका साइबर ही ठप्प रहा। रास्ते मे उससे पूछते हैं ‘मोपेड़’ कितने मे बेची? आगरा छोडते समय काफी सामान काफी घाटे मे बेचना पड़ा खराब हो गई मोपेड़ भी घाटे मे ही बेची थी। उसकी खरीद मे जो रूपये लगे थे उनमे से आठ हजार शालिनी के थे शायद इसी लिए कमलेश बाबू को उसकी बिक्री के पैसों की फिक्र थी,जबकि जिस दिन मोपेड़ खरीद कर लाये थे उस दिन डॉ शोभा उपस्थित थीं और भौंचक रह गई थीं। डॉ शोभा ने मोपेड़ लाने की खुशी मे अपनी माँ द्वारा दी मिठाई का एक टुकड़ा भी न चखा था और उनके पति को उसकी बिक्री के पैसों की व्यापक चिंता थी।

आगरा का मकान मैंने मेरठ मे अपनी नौकरी के बचे पैसों से सिक्योरिटी जमा करके तथा 15 वर्षों तक मासिक ‘किश्तें’ जमा करके खरीदा था जिसे बेच कर लखनऊ मे घाटे मे आए थे। 1976 मे कमलेश बाबू ने हमारे बाबूजी द्वारा तीन मकान खरीदने की बात हमारी माँ से कही थी। बाबूजी की हैसियत एक भी मकान खरीदने की न थी क्योंकि दो वर्ष बाद ही उनका रिटायरमेंट था।बाद मे बहन जी ने माँ को सूचित किया था कि कमलेश बाबू अपनी बी एच ई एल,हरिद्वार की नौकरी छोड़ कर दरियाबाद की खेती सम्हाल लेंगे -बस बाबूजी अपना हिस्सा ले लें। ऐसा न होने के कारण ही मेरे लखनऊ आने पर मथुरानगर,दरियाबाद के ऋषिराज,नरेश ,उमेश को डॉ शोभा और कमलेश बाबू ने मेरे खिलाफ कुछ गलत-सलत भड़का दिया। निवाजगंज,लखनऊ मे कमल दादा ने फरवरी मे बताया था कि शोभा बचपन से ही टेढ़ी है। उनके निधन के बाद हवन के समय शैल जीजी ने भी कहा था कि शोभा चिढ़ोकारी है। अगस्त मे उनका भी निधन हो गया। मै संदेह के बावजूद चुप इसलिए रहता था कि ये लोग तिकड़म से पहले ही अजय को भी भड़का कर अलग-थलग कर चुके थे और इसका शक माईंजी पर डाल दिया था। ब्लाग जगत मे उनकी छोटी  पुत्री-मुक्ता(जिसके पति साफ्टवेयर इंजीनियर तथा कुक्कू के रिश्तेदार के रिश्तेदार हैं) जो सोनू नाम की फेक आई डी से यशवन्त और मेरे विरुद्ध अनर्गल प्रचार करके शक एक बार फिर माईंजी पर डाल चुकी थी।

अतः 1978 मे मेरा मकान एलाट होते ही कमलेश बाबू मेरे विरुद्ध साज़िशों मे लग गए जिंनका पता अब  लखनऊ आने पर ही चल सका और पुष्टि उनके 2011 मे हमारे घर आने पर हो सकी कि ‘मधू’ पत्नी कुक्कू तो कमलेश बाबू की भतीजी थीं। कमलेश बाबू ने हमारे तब के ज्योतिषीय सलाहकार डॉ रामनाथ को कुक्कू द्वारा खरीद कर शालिनी से 14 गुणों को 28 बता कर विवाह तय करवाया था। होटल मुगल से बरखास्तगी और राजनीतिक उठा- पटक मे भी कमलेश बाबू-कुक्कू-शरद मोहन(तीनों के पिता रेलवे के साथी रहे) गठजोड़ का ही हाथ था। इसी लिए वे लोग हमारे लखनऊ आने का शुरू से विरोध कर रहे थे। यह पता लगने  पर कि यशवन्त की ख़्वाहिश पर हमने घाटे मे भी लखनऊ आने का निर्णय किया था तो वे लोग उसके भी विरुद्ध मशगूल हो गए। अंततः मुझे उससे ‘बिग बाजार’ का जाब छुड़वाकर घर पर साइबर खुलवाना पड़ा जबकि डॉ शोभा-कमलेश बाबू अपने परिचित ‘लुटेरिया’ बिल्डर के यहाँ उसे जाब पर रखवाना चाहते थे। उसी लुटेरिया के माध्यम से उन्होने हमे यहाँ परेशान रखने का उपक्रम किया हुआ है।

इतना ही नहीं बी एच ई एल ,हरद्वार मे ‘सीटू’ से सम्बद्ध यूनियन मे सेक्रेटरी रह चुके कमलेश बाबू ने अपने पुराने संपर्कों के आधार पर सी पी एम से संबन्धित लोगों को पहले मुझ पर सी पी आई छोड़ कर सी पी एम मे शामिल होने का सुझाव भिजवाया। 17 जून 2011 को मेरे घर सी पी एम,मेरठ के कामरेड जो ब्लागर भी हैं आए और इस प्रकार की राय व्यक्त किए,कम से कम जलेस मे लेखन का ही उनका वैकल्पिक सुझाव था। चूंकि मैंने इन सुझावों को स्वीकार नहीं किया तो उन्हीं ब्लागर सी पी एम के कामरेड ने भाकपा के प्रदेश नेता द्वारा संचालित ब्लाग को फालों करके मेरे विरुद्ध अभियान चला दिया। इस अभियान का परिणाम मेरे विरुद्ध देखने के इच्छुक लोग संतुष्ट हो पाते हैं अथवा नहीं इसका पता 2012 मे ही चलेगा।

कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के ‘एकला चलो रे’ का मै अनुगामी हूँ और सदैव प्रत्येक के भले के लिए प्रस्तुत रहता हूँ ,इसलिए मुझे नहीं लगता कि कितनी भी बड़ी ताकत बटोर कर मुझे परास्त करने मे किसी को भी सफलता आगे भी मिल सकेगी जैसे अभी तक नहीं मिल सकी है । सन 2012 मे सभी को सद्बुद्धि मिले और सभी समृद्धि कर सकें 2011 के समापन पर यही हमारी मंगल कामनाएं हैं।

 

आगरा/1992-93/विशेष राजनीतिक (भाग-7 )

गतांक से आगे…..
शाखा लँगड़े की चौकी के मंत्री कामरेड एस कुमार (जिसे कभी मिश्रा जी बड़ा प्यारा कामरेड कहते थे) को कटारा के बेटे ने पार्टी कार्यालय मे ही पीट दिया। अब तो आगरा के कामरेड्स मे मिश्रा जी और कटारा के विरुद्ध उबाल ही आ गया था। एस कुमार जी भी अनुसूचित वर्ग से संबन्धित थे अतः यह माना गया कि मिश्रा जी का गुट कामरेड नेमीचन्द को हतोत्साहित करने हेतु ऐसी ओछी हरकतें जान-बूझ कर कर रहा है। एक बार पुनः राज्य-केंद्र पर अधिकृत तौर पर मिश्रा जी और कटारा साहब के विरुद्ध कारवाई करने का निवेदन किया गया। कामरेड काली शंकर शुक्ला जी का वरद हस्त मिश्रा जी का रक्षा कवच था। कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह ने खुद आगरा आकर सब की सुन कर कोई ठोस निर्णय लेने का आश्वासन दिया। मिश्रा जी ने दिलली  की भाग-दौड़ करके कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह के स्थान पर राज्य सचिव कामरेड मित्रसेन यादव का आना सुनिश्चित करवाया।

दिन मे आगरा की भाकपा जिला काउंसिल की बैठक भी राज्य सचिव के समक्ष हुई । लिखित और मौखिक शिकायतें उनको सौंपी गई। मिश्रा जी बैठक से अलग ले जाकर मित्रसेन यादव जी से मिले और उन्हें कुछ घुट्टी पिला दी। मिश्रा जी और कटारा साहब को पार्टी से हटाने का जो प्रस्ताव था उसे मित्रसेन यादव जी के कहने पर पास नहीं किया गया। उन्होने इन दोनों के सुधर जाने का आश्वासन अपनी तरफ से दिया। उनकी बात न माने जाने का प्रश्न ही न था। रात को राजा-की-मंडी स्टेशन पर ‘गंगा-जमुना एक्स्प्रेस’ मे मित्रसेन जी को बैठाने जिला मंत्री नेमीचन्द जी ,मै और किशन बाबू श्रीवास्तव साहब तो गए ही कटारा साहब भी मिश्रा जी के सुझाव पर पहुँच गए थे। स्टेशन पर मित्रसेन जी ने कटारा साहब से कहा मिश्रा जी का ख्याल रखो।

 

आगरा /1992 -93 ( विशेष राजनीतिक भाग- 6 )

गतांक से आगे…..

भकपा जिला काउंसिल के कार्यालय ‘सुंदर होटल’,राजा-की-मंडी मे रमेश कटारा ने कामरेड किशन बाबू श्रीवास्तव पर हमला कर दिया । नेमीचन्द समेत हम सभी लोगों ने इसे गंभीर चुनौती के रूप मे लिया । जिस शख्स को मिश्रा जी ने केंद्रीय कंट्रोल कमीशन के चेयरमेन कामरेड काली शंकर शुक्ला के प्रभाव से यू पी राज्य कंट्रोल कमीशन का सदस्य बनवाया हो वह बगैर मिश्रा जी के समर्थन के डॉ धाकरे के गुट के माने जाने वाले का  श्रीवास्तव पर पार्टी कार्यालय मे हमला करने का साहस नहीं कर सकता था। श्रीमती श्रीवास्तव ने हम लोगों को बताया था कि आतंक का सहारा लेना मिश्रा जी के लिए नई बात नहीं है। पहले भी इसी कार्यालय मे मिश्रा जी और उनके सहयोगी का जगदीश प्रसाद ने डॉ राम विलास शर्मा पर साइकिल की चेन से हमला किया था। डॉ राम विलास जी ‘सेंट जौंस कालेज,आगरा’ से जाब छोड़ कर दिल्ली चले गए और वहीं बस गए। मिश्रा जी के व्यवहार के कारण एक विद्वान लेखक का नाता आगरा से टूट गया।

हमने अधिकृत रूप से राज्य सचिव कामरेड मित्रसेन यादव जी को सूचित किया। पार्टी कार्य से लखनऊ आने पर कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह से निजी मुलाक़ात करके पूरी घटना और उसमे मिश्रा जी की संलिप्तता का विवरण दिया। उन्होने खेत-मजदूर सभा के नेता और सांसद कामरेड राम संजीवन को आगरा जाकर तहक़ीक़ात करने को कहा। जब कामरेड राम संजीवन आगरा आए तो मिश्रा जी और उनके गुट का कोई सदस्य स्टेशन उनकी अगवानी करने नहीं गया। होटल मे भी मिश्रा जी उनसे नहीं मिले लेकिन कटारा ने अपनी सफाई दी। मैंने कामरेड श्रीवास्तव और उनकी पत्नी की उनसे विशेष रूप से मुलाक़ात करवा दी थी। सुबह की ताज से आकर शाम की ताज से राम संजीवन जी दिल्ली लौट गए। उन्होने अपनी रिपोर्ट लखनऊ भेज दी होगी। आगरा पार्टी के कामरेड्स ने कटारा और मिश्रा जी को पार्टी से निकालने की मांग रखी थी।….  

 

आगरा /1992 -93 ( विशेष राजनीतिक भाग- 5 )

गतांक से आगे—
लगातार नौ वर्षों तक आगरा भाकपा के जिला मंत्री रह चुकने के बाद मिश्रा जी ने अपने हटाये जाने को अपनी करारी हार माना और बदले की कारवाइयों पर अमल करने लगे। उन्हें लगा कि यह उनके विरोधियों की उनके विरुद्ध साजिश है। उन्हें अपना अतीत याद आ रहा था जैसा पुराने कामरेड्स ने बताया था और कभी-कभी मौज मे होने पर वह खुद भी बताते रहते थे। आगरा भाकपा के संस्थापक मंत्री कामरेड महादेव नारायण टंडन के विरुद्ध डॉ जवाहर सिंह धाकरे से मिल कर मिश्रा जी ने खूब गुट-बाजी की थी और उन्हें हटने पर मजबूर किया था । टंडन जी ने भी अपने समर्थक डॉ महेश चंद्र शर्मा के पक्ष मे ही पद छोड़ा था। शर्मा जी को बीच कार्यकाल मे पद छोडने पर डॉ धाकरे और मिश्रा जी ने मजबूर कर दिया था। डॉ धाकरे जिला मंत्री और मिश्रा जी सहायक जिला मंत्री बने थे। डॉ धाकरे के 06 माह हेतु सोवियत रूस पार्टी स्कूल मे जाने की वजह से मिश्रा जी कार्यवाहक जिला मंत्री बने तो जमे ही रहे वापस चार्ज डॉ धाकरे को नहीं दिया तब से ही दोनों मे मन-मुटाव चला आ रहा था। मिश्रा जी को लगा कि यह डॉ धाकरे का खेल है। परंतु डॉ धाकरे तो पिछड़ा वर्ग के ओमप्रकाश जी को भले ही कुबूल कर रहे थे अनुसूचित वर्ग के कारेड नेमी चंद उनकी पसंद के नहीं थे। डॉ धाकरे के भांजा दामाद कामरेड भानु प्रताप सिंह ने मुझ से साफ कहा था कि,माथुर साहब कहने -सुनने मे तो बातें अच्छी लगती हैं -नेमीचन्द से तो मिश्रा जी ही भले थे। हालांकि नेमीचन्द बनेंगे मुझे खुद सम्मेलन के दूसरे दिन ही पता चला था हमारी त्तरफ से तो ओमप्रकाश जी उम्मीदवार थे। परंतु चुने जाने के बाद जैसा दूसरे लोग चाहते थे मै नेमीचन्द जी को हटाये जाने के सख्त खिलाफ था। हालांकि नेमीचन्द जी लिखत-पढ़त कुछ भी नहीं करते थे और यह भार मुझ पर अतिरिक्त था लेकिन मै चट्टान की तरह उनके समर्थन मे डटा रहा। नेमीचन्द जी भी जानते थे कि उनका पद पर कायम रहना केवल मेरे कारण ही संभव हो रहा है। लोगों ने उनके दिमाग मे खलल डालने के लिए उन्हें नेमीचन्द माथुर कहना शुरू कर दिया। परंतु वह विचलित नहीं हुये।

मिश्रा जी के समक्ष स्पष्ट था कि जब तक मै नेमीचन्द जी के साथ हूँ तब तक उनकी दाल नहीं गल पाएगी। मुझे झुका-दबा या खरीद लेने की फितरत उनके पास नहीं थी। इसलिए उन्होने षड्यंत्र का सहारा लिया। एक बार अचानक कार्यकारिणी बैठक मे मिश्रा जी ने मुझे पार्टी से निकालने का प्रस्ताव रख दिया। शायद वह पहले से लामबंदी कर चुके थे। नेमीचन्द जी भी कुछ न बोले। उस समय बाहर बारिश हो रही थी मैंने अपना छाता उठाया और बैठक से उठ कर घर चल दिया। कामरेड जितेंद्र रघुवंशी ने कहा कि बारिश बंद होने के बाद चले जाना तेज बारिश मे छाता भी बेकार है। मैंने कहा जब आप लोगों ने पार्टी से अकारण मुझे निकाल ही दिया तो चिंता क्यों?यह अवैधानिक फैसला है और मै इसे चुनौती दूंगा।

मैंने जिला मंत्री कामरेड नेमीचन्द से  बाद मे मिल कर कहा कि उनके समर्थन न देने के बावजूद मै कार्यकारिणी के इस अवैध्य फैसले को संवैधानिक चुनौती दे रहा हूँ और इस आशय का लिखित पत्र उनको सौंप दिया। उन्होने मुझे आश्वासन दिया कि वह जिला काउंसिल मे इस विषय पर मेरे साथ रहेंगे। कार्यकारिणी चूंकि मिश्रा जी द्वारा तोड़ ली गई थी वह चुप रहे थे। राज्य-केंद्र पर भी मैंने इस फैसले को चुनौती की सूचना भेज दी थी। मलपुरा शाखा के कामरेड्स जिंनका बहुमत था मेरे साथ थे ,उन्होने तो यहाँ तक कह दिया था कि यदि मिश्रा जी पीछे नहीं हटे तो वे सब भी पार्टी छोड़ देंगे। जिस दिन जिला काउंसिल की बैठक हुई मिश्रा जी ने कामरेड राजवीर सिंह चौहान को बैठक का सभापति घोषित करा दिया जिन्हें वह पहले ही सेट कर चुके थे। उन्होने सभापति बनते ही मुझे बैठक से बाहर कर दिया। अंदर धुआंधार बहस होती रही और मै इतमीनान से छत पर मौजूद रहा। डॉ जवाहर सिंह धाकरे ने आते ही मुझसे सवाल किया कि बैठक से बाहर क्यों हो ?मैंने कहा सभापति चौहान साहब का यही निर्णय है।

डॉ धाकरे से मेरे द्वारा पहले ही पार्टी संविधान पर चर्चा हो चुकी थी। उन्होने बैठक मे पहुँचते ही सभापति जी से संविधान की धाराओं पर चर्चा की और उन्हें बताया कि उनका फैसला एक और असंवैधानिक कारवाई है। कार्यकारिणी समिति का गठन जिला काउंसिल ने किया था और जिला काउंसिल का गठन सम्मेलन ने अतः कार्यकारिणी समिति जिला काउंसिल के सदस्य को हटा ही नहीं सकती थी। सभापति अगर अपना फैसला नहीं बदलेंगे तो उनके विरुद्ध भी संविधान-विरोधी कारवाई करने का प्रस्ताव पारित किया जाएगा। चौहान साहब की ठाकुर ब्रादरी के धाकरे साहब ने जब उन्हें चुनौती दी तो उन्होने अपना फैसला पलटते हुये दो-तीन वरिष्ठ कामरेड्स भेज कर मुझे बैठक के भीतर बुलवाया। उन्होने यह भी सूचित किया कि जिला काउंसिल ने कार्यकारिणी का फैसला रद्द कर दिया है अतः मै न केवल पार्टी मे बल्कि अपने सभी पदों पर पूर्ववत कार्य करता रहूँ। संवैधानिक जीत तो हासिल हो गई ,किन्तु एक बारगी इज्जत पर  तो नाहक  हमला हुआ ही इसलिए मन ही मन मौका मिलते ही पार्टी से खुद ही अलग हो जाने का निश्चय कर लिया और किसी से इस संबंध मे कुछ न कहा तथा कार्य पहले की भांति ही करता रहा।

एक बार जिला कचहरी पर कोई धरना  प्रदर्शन था मै वहाँ भी (उस घटना के बाद मैंने मिश्रा जी से बोलना बंद कर दिया था) मिश्रा जी से न बोला। मिश्रा जी मेरे पास आए और बोले माथुर साहब यह सब तो चलता ही रहता है,हम लोग एक ही पार्टी मे हैं ,उद्देश्य एक ही हैं ,काम एक साथ कर रहे हैं तो बोल-चाल बंद करने का क्या लाभ। मजबूरन उनका अभिवादन करना ही पड़ा वह वरिष्ठ थे और खुद मेरे पास चल कर आए थे । हम लोग उनके हित मे थे वह हमें गलत समझ रहे थे। कटारा ने तांत्रिक प्रक्रिया से उनके सोचने की शक्ति कुंन्द कर दी थी।

मिश्रा जी ने शायद यह भी मान लिया था कि वह मुझे हरा न पाएंगे। इसलिए उन्होने और गंभीर चाल चली जो अपने समय पर ही लिखित स्थान प्राप्त करेगी।

 

आगरा /1992-93(राजनीतिक विशेष-भाग-4 )

गतांक से आगे…..
हम लोगों ने मलपुरा के ग्राम प्रधान कामरेड ओमप्रकाश को मिश्रा जी के विरुद्ध जिला मंत्री पद पर खड़े होने को राजी कर लिया था। किन्तु मिश्रा जी ने अपना चक्र चला कर उन्हे पीछे हटने को राजी कर लिया ,मुझे इन बातों की खबर न थी। लेकिन मिश्रा जी के पारिवारिक हितैषी कामरेड्स ज्यादा चतुर थे,उन्होने मिश्रा जी के ही घनिष्ठ साथी नेमिचन्द को तैयार कर लिया था,ओम प्रकाश जी ने भी उन्हें समर्थन देना स्वीकार कर लिया था । इस कहानी की खबर न मुझे थी न मिश्रा जी को। राज्य-पर्यवेक्षक के रूप मे कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह के स्थान पर राज्य सचिव का मित्रसेन यादव द्वारा पूर्व राज्य-सचिव का जगदीश त्रिपाठी(जिंनका 17 दिसंबर 2011को लखनऊ मे निधन हुआ है) ,पूर्व सह-सचिव का अशोक मिश्रा(जो बाद मे राज्य  सचिव भी रहे) और आगरा क्षेत्र के इंचार्ज का डॉ गिरीश(वर्तमान राज्य सचिव) को संयुक्त रूप से भेजा गया था। मिश्रा जी खुश थे कि इन लोगों की मौजूदगी मे वह अपनी कलाकारी दिखा लेंगे।

पहले दिन की सम्मेलन कारवाई के बाद बाह मे ही एक जनसभा भी रखी गई थी। दिन मे सचिव की रिपोर्ट के बाद प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे थे और कहीं से भी मिश्रा जी को यह आभास नहीं मिला था कि कोई भी उन्हें हटाने की कारवाई कर सकता है ,मुझे भी यही लगा था कि मिश्रा जी ही पुनः पदारूढ़ होने जा रहे हैं। डॉ रामनाथ शर्मा और एडवोकेट सुरेश बाबू शर्मा तो खिन्न होकर आगरा वापस लौट भी गए थे। वे मुझे भी लौट चलने का दबाव बना रहे थे परंतु मै साधारण प्रतिनिधि के साथ-साथ तब तक कोशाध्यक्ष के पद पर था और इस तरह सम्मेलन का बहिष्कार करना भी मुझे पसंद नहीं था लिहाजा मै उनके साथ न जाकर अगले दिन के लिए वहीं रुका रहा था । परंतु मै सभा-मंच पर न बैठ कर सामने मैदान मे दरी पर दूसरे प्रतिनिधियों ,स्थानीय कार्यकर्ताओं एवं आम जनता के साथ बैठा था। संचालन कर रहे का हर विलास दीक्षित से मिश्रा जी ने अनाउंस करवाया कि समस्त कार्यकारिणी सदस्य मंच पर आ जाएँ ,मुझे छोड़ कर सभी पहले से ही मंच पर मौजूद थे। मै दरी पर ही बैठा रहा किन्तु सभा प्रारम्भ करने से पूर्व मिश्रा जी के इशारे पर का दीक्षित ने नाम लेकर कहा कि,का  विजय राज बली माथुर से आग्रह है कि तुरंत मंच पर अपना स्थान ग्रहण कर लें। मुझे आखिरकार मंच पर जाना ही पड़ा ,मिश्रा जी ने कहा भई आज तक तो आप कार्यकारिणी मे हैं ही नीचे क्यों बैठ गए थे?मैंने मौन रहना ही मुनासिब समझा।

बोलने के लिए पुकारे जाने पर भी मैंने अति सूक्ष्म भाषण ही दिया। रात्रि  भोजन के बाद वहीं ठहरने का प्रबंध था। गर्मी का मौसम था अतः मै दो एक लोगों के साथ खुली छत  पर ही रहा कमरों मे पंखों की हवा से बाहर की खुली हवा अच्छी थी। देखा-देखी काफी कामरेड्स छत  पर ही आ गए। अगले दिन खुली छत पर ही नहाना हुआ ,कौन कितनी देर तक गुसलखाना खाली होने का इंतजार करे। अधिकांश लोगों ने इसी प्रक्रिया का अनुसरण किया और शायद महिला कामरेड्स ने ही बाथरूम का प्रयोग किया। नाश्ते के बाद सम्मेलन की कारवाई प्रारम्भ हो गई ,बचे हुये लोगों ने अपनी-अपनी बात रखी। मै खुद भी नहीं बोलना चाहता था और शायद मिश्रा जी भी यही चाहते थे कि मै न बोलूँ। मुझे सम्मेलन के मिनिट्स लिखने का दायित्व सौंप दिया गया था।
दिन के भोजन के बाद मिश्रा जी ने नई जिला काउंसिल का पेनल पेश किया जो सर्व-सम्मति से स्वीकार कर लिया गया। इससे मिश्रा जी बिलकुल निश्चिंत हो गए कि वह पुनः निर्विरोध जिला मंत्री बनने जा रहे हैं।

चाय पान के बाद नई जिला काउंसिल की बैठक हुई जिसमे मिश्रा जी ने बतौर ड्रामा कहा कि वह काफी थक गए हैं और पद छोडना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद थी कि पूर्व की भांति कामरेड्स उनसे विनती करेंगे कि उनका कोई विकल्प नहीं है(जैसा कामरेड सी राजेश्वर राव की उपस्थिती मे भी  हुआ था) अतः वही जिला मंत्री बने रहें। उनकी आशा के विपरीत किसी ने उनसे ही दूसरा नाम सुझाने का अनुरोध कर दिया। अब तो मिश्रा जी को काटो तो खून नहीं। मजबूरन उन्होने अपने विश्वस्त साथी और आड़ीटर कामरेड जगदीश प्रसाद का नाम ले दिया किन्तु उन्होने तत्काल कह दिया कि वह बलि का बकरा नहीं बनेंगे। मुझसे सम्मेलन मे मिश्रा जी द्वारा नया पेनल पेश करने के दौरान कान मे आकर उनके ज़मीनों के धंधे के साथी कामरेड पूरन खाँ ने कहा था कि पेनल का विरोध न करवाना का ओमप्रकाश पीछे हट गए हैं उनके स्थान पर नेमीचनाद का नाम आ रहा है ,आप समर्थन कर देना। मिश्रा जी के ही दूसरे विश्वस्त का दीवान सिंह ने का नेमीचन्द का नाम प्रस्तावित कर दिया जिसका तालियों की गड़गड़ाहट ने समर्थन कर दिया । अब तो मिश्रा जी की जमीन छिन चुकी थी। उन्होने तत्काल सहायक जिलामंत्री पद हेतु का दीवान सिंह का नाम ले दिया यह कहते हुये कि आपने का नेमीचन्द को जिला मंत्री बनवाया है उन्हें कामयाब बनाना आप ही की ज़िम्मेदारी है अतः आप उनके सहायक जिला मंत्री होंगे। सबने समर्थन कर दिया। मिश्रा जी ने का नेमीचन्द को सुझाव दिया कि एक पदाधिकारी पुराना भी होना चाहिए अतः का माथुर को कोशाध्यक्ष बनाए रखें। ऐसा ही हुआ भी । राज्य-केंद्र के तीनों पर्यवेक्षकों के लिए हस्तक्षेप का प्रश्न ही नहीं था कहीं कोई विरोध हुआ ही नहीं और मिश्रा जी अपनी ही बिछाई बिसात पर मुंह की खा गए।मुझे  मक्खी की तरह मसल डालने और हरा देने के उनके  दावे धरे के धरे रह गए। कटारा का कुसंग उन्हें ले डूबा।सबसे बड़ी बात यह थी कि यह मिश्रा जी के विरोधियों की जीत नहीं थी बल्कि उन्हीं के पारिवारिक हितैषियों ने उनके ही परिवार को बिखरने से बचाने हेतु उन्हें पदच्युत किया था। किन्तु मिश्रा जी अभी भी जागे नहीं थे……… 

 

आगरा /1992-93(राजनीतिक विशेष-भाग-3)

गतांक से आगे…..
मिश्रा जी के समर्थकों ने उनके परिवार को कटारा के चंगुल से मुक्त कराने हेतु उन्हे पार्टी के जिला मंत्री पद से हटाने का फैसला कर लिया था और मुझ से कहा था कि मै इसकी भनक मिश्रा जी को न लगने दूँ। उधर राज्य-सम्मेलन के अकाउंट्स मे हेरा-फेरी न हो पाने की दशा मे मिश्रा जी और कटारा साहब मुझसे बुरी तरह खफा थे,वे जानते थे कि जैसे का तैसा विवरण पेश होने पर उन्हें जिला सम्मेलन मे फजीहत का सामना करना पड़ेगा। पहले कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह राज्य-पर्यवेक्षक के रूप मे आने वाले थे ,मिश्रा जी ने एडी-चोटी का ज़ोर लगा कर उन्हे रुकवाया। जिला सम्मेलन से ठीक एक दिन पहले  कामरेड किशन बाबू श्रीवास्तव के माध्यम से मुझे अपने घर पर बुलाया और अंतिम बार पूछा कि मै अकाउंट्स चेंज करूंगा या नहीं। मैंने उनसे कहा सारे दस्तावेज़ शीशे की तरह साफ हैं जो भी एडजस्टमेंट करेगा फँसेगा। वह बोले कामरेड जगदीश आडिट कर रहे हैं वह आपकी गलतिया सब के सामने रख  देंगे और कल सम्मेलन मे आपकी बुरी हार होगी। मैंने मिश्रा जी को जवाब दिया यदि मै हार गया तो मुझे खुशी होगी। मिश्रा जी चौंक पड़े और पूछ कि हारने पर क्यों खुशी होगी। मैंने स्पष्ट किया कि मेरे हारने पर आपकी जीत है और मै आपका एहसानमंद हूँ अतः मुझे अपनी हार और आपकी जीत की खुशी होगी। यदि मै जीता तो आप हारेंगे और आपकी एक प्रतिष्ठा है जिसे आघात पहुंचेगा अतः मै आपकी प्रतिष्ठा गिरने से चिंतित हूँ। मिश्रा जी बोले कि ऐसा है तब आप मेरा कहना मान कर अकाउंट्स क्यों नहीं दोबारा रात भर मे तैयार कर देते?(मुझे मिश्रा जी का यह वक्तव्य भी पता चला था कि उन्होने ऐलान किया था-‘हमारी बिल्ली ,हमी से म्याऊँ’-‘माथुर को मक्खी की तरह मसल कर फेंक देंगे’। मैंने संदेश वाहक से कहा था कि मक्खी क्यों मै तो उससे भी छोटा ‘चींटी’ हूँ और मिश्रा जी विशालकाय हाथी मै तो उनके पैरों तले पलक झपकते ही कुचल जाऊंगा। लेकिन मिश्रा जी को ध्यान रखना होगा कि चींटी उनकी सूंड मे न घुसने पाये)। अतः मैंने मिश्रा जी को सुझाव दिया कि वह कटारा को बचाने के लिए नकली अकाउंट्स बनवाने की जिद्द छोड़ कर इसे स्वीकार करते हुये कटारा के विरुद्ध खुद ही एक्शन ले लें उनकी प्रतिष्ठा मे चार चाँद लग जाएँगे। हँसते हुये मिश्रा जी ने कहा कल सम्मेलन मे आप मुंह की खा जाओगे और इतिहास की वस्तु बन जाओगे। …….  
 

आगरा /1992 -93 (राजनीतिक विशेष -भाग- 2 )

गतांक से आगे….
पूर्व-पश्चिम के कार्यकर्ताओं मे वैभिन्य था और कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह को पश्चिम के कामरेड्स का समर्थन न मिल सका अतः उन्होने कामरेड मित्रसेन यादव का समर्थन किया जिनहे सर्व-सम्मति से राज्य-सचिव चुन लिया गया। आगरा से जो 5 कामरेड्स राज्य-काउंसिल हेतु चुने गए उनमे मिश्रा जी अपने परम-प्रिय कटारा को स्थान न दिला सके। केंद्रीय कंट्रोल कमीशन के चेयरमेन कामरेड काली शंकर शुक्ला जी से व्यक्तिगत सम्बन्धों के आधार पर मिश्रा जी ने कटारा को उत्तर-प्रदेश कंट्रोल कमीशन का सदस्य नामित करवा लिया। कोई कुछ बोल तो न सका परंतु मिश्रा जी ने ऐसा करके अपने सभी हितैषियों को अपने विरुद्ध कर लिया।

राज्य-सम्मेलन समाप्ती के बाद आगरा के जिला सम्मेलन की तैयारी होना था। मिश्रा जी ने मुझ से कहा कि,अपने ज्योतिष से गणना करके जून के महीने मे दो तारीखें बताओ जिससे सम्मेलन शांतिपूर्ण हो जाये ,राज्य सम्मेलन मे तो काफी तनाव रहा। मैंने पत्रा देख कर उन्हे मध्य जून की दो तारीखें बता दी उन्हीं मे उन्होने जिला सम्मेलन करने की घोषणा की। राज्य-सम्मेलन के आय-व्यय का विवरण तैयार होने पर मिश्रा जी भड़क गए क्योंकि लगभग रु 6000/-अधिक (EXCESS ) निकल रहे थे। अकाउंट्स का थोड़ा भी जानकार समझ सकता है कि धन का बच जाना (एक्सेस) क्राईम है जबकि कम पड़ना (शारटेज) होना आम बात है।

मिश्रा जी का भारी दबाव था कि मै अपने अकाउंट्स ज्ञान का प्रयोग करके इस विवरण को इस प्रकार एडजस्ट कर दूँ कि EXCESS न रहे। ईमानदारी और पार्टी के प्रति वफादारी का तकाजा था कि विवरण को जैसे का तैसा रखा जाये और वही मैंने किया भी,चर्चा करने पर मिश्रा जी के सहयोगी और विरोधी सभी मुझसे सहमत थे। इस विवरण को मुद्दा बना कर मिश्रा जी ने मुझे परेशान करने की तिक्ड़मे की तो मैंने उनकी हिदायत की अवहेलना करते हुये राज्य-सम्मेलन के विवरण पर बची रकम को बैंक मे जमा करा दिया उसी अकाउंट मे जिसमे जिले का धन रहता था। अब तो मिश्रा जी एक प्रकार से मेरे शत्रु ही हो गए। कामरेड सरदार रणजीत सिंह काफी पुराने थे और सबके सब हाल जानते थे और उनकी उपेक्षा थी ,मुझसे बोले इस विषय पर पूरी तरह अड़े रहो इस बार मिश्रा एक ईमानदार आदमी से टकरा रहा है उसकी करारी हार हो जाएगी। वह मुझे सुबह 7 बजे मलपुरा ले चलने हेतु मेरे घर पर 6 बजे दयालबाग से आ गए। दोनों अपनी-अपनी साइकिलों से 16 km चले,उनके लिए 72-73 वर्ष की आयु मे इतनी दूर साइकिल से आना-जाना मुश्किल था किन्तु पार्टी-हित मे उन्होने यह कष्ट भी सहा। मलपुरा शाखा पार्टी की सबसे ज्यादा संख्या वाली शाखा थी और पार्टी मे उनका बहुमत भी था। उस शाखा के वरिष्ठ नेताओं से उन्होने संपर्क किया और वस्तु-स्थिति बताई ,सभी ने इस विषय मे मिश्रा जी का विरोध करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें जिला सम्मेलन मे हटा देने की बात कही। उन लोगों का कहना था वे सब मिश्रा जी के समर्थक माने जाते हैं इसलिए उनके प्रस्तावों का कामरेड जवाहर सिंह धाकरे विरोध करते हैं अतः उनका भी समर्थन हम लोग प्राप्त कर लें। कामरेड किशन बाबू श्रीवास्तव बाह के थे और वहीं के कटारा साहब भी थे बल्कि वही उन्हें पार्टी मे लाये थे किन्तु उन्होने श्रीवास्तव साहब को उनकी शाखा के मंत्री पद से हटवा दिया था क्योंकि उनकी छवी धाकरे साहब के पिछलग्गू की थी। लिहाजा हम लोगों ने उनसे संपर्क कर के धाकरे साहब से बात करने की जरूरत बताई। डॉ धाकरे तब R.B.S.कालेज के प्रिंसिपल थे उनके कार्यालय मे सरदारजी ,श्रीवास्तव साहब और मै मिले और उन्होने सहर्ष अपना समर्थन दे दिया। कभी भी अपने कालेज -निवास पर मिलने आने की बात भी उन्होने कही जहां ठीक से बात कर सकें।

मिश्रा जी के साथ ज़मीनों का धंधा करने वाले कामरेड पूरन खाँ जो उनके घर मे भी गहरे घुसे हुये थे और उनके सम्पूर्ण परिवार से सहानुभूति रखते थे,मुझसे लगातार कह रहे थे कि मिश्रा जी के परिवार को बचाओ कटारा उनके परिवार को तबाह करना चाहता है और वह कटारा प्रेम मे डूबे हुये हैं। कामरेड दीवान सिंह भी मिश्रा जी के एहसानमंद थे और वह भी उनके परिवार को कटारा से बचाना चाहते थे। मिश्रा जी के साथ जूते की फेकटरी खोलने वाले कामरेड नेमीचन्द भी उनके खैरख्वाह थे और भलीभाँति जानते थे कि उस फेकटरी को फेल करने मे कटारा और उनके बेटे का पूरा-पूरा हाथ था। इन लोगों का कहना था कि कटारा ने किसी तांत्रिक प्रक्रिया से मिश्रा जी को वशीभूत कर लिया है,पार्टी तो सम्हाल ली जाएगी और मिश्रा जी के बगैर भी चलती रहेगी किन्तु उनका परिवार बुरी तरह बिखर जाएगा। लिहाजा कटारा को काबू करने के लिए मिश्रा जी को हटाना जरूरी हो गया था। मलपुरा के कामरेड्स को भी मिश्रा जी से व्यक्तिगत सहानुभूति थी और वे भी कटारा से मुक्ति की मुहिम मे मिश्रा जी को पदच्युत करने के हामी थे। …… 

 
 
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