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Monthly Archives: April 2012

आगरा/1994 -95 /भाग-14

अजय के भी वापिस लौट जाने के बाद यशवन्त और मै दो ही लोग रह गए थे। वह सुबह साढ़े सात बजे के स्कूल के लिए घर छोडता था फिर साढ़े बारह बजे लौट कर खाना खा कर मेरे साथ ही हींग-की-मंडी दुकानों पर चलता था। कुछ किताबें साथ रख लेता था और दिन मे बाजार से ही होम वर्क कर आता था। सभी दूकानदारों ने उसे अपने साथ लाने की छूट मुझे दे दी थी। सिन्धी दुकानदार कर्मचारियों को चाय देते थे अतः कभी-कभी यशवन्त के लिए भी भिजवा देते थे। साधी आठ बजे तक घर वापिस आ पाते थे ,सुबह ही सब्जी अधिक बना लेते थे रात को रोटी सेंक लेते थे। खाते-खाते यशवन्त को गहराकर नींद आने लगती थी,उसे फिर सुबह सवासात बजे घर छोडना होता था। उसे सब 12 -साढ़े बारह घंटे का दबाव पड़ता था। मै तो मेक्सवेल पर 4 घंटे +रेकसन पर 1 घंटा +वाकमेक्स पर 1 घंटा काम कुल 6 घंटे का जाब करता था लेकिन यशवन्त को यह सारा समय मेरे साथ बिताना पड़ता था। उसे घर पर अकेला कैसे छोड़ा जा सकता था। मैंने डॉ शोभा को टटोलने हेतु पूछा था कि पिछले साल तुमने बउआ से यशवन्त को ले जाने की बात काही थी अब ले जाओ। लेकिन उन्होने अब उसे ले जाने से यह कह कर इंकार कर दिया था कि तुम अकेले रह जाओगे,इसलिए अब नहीं ले जाएँगे।

कभी-कभी न्यू आगरा स्थित शिव नारायण कुशवाहा की सब्जी की दुकान पर (जो उन्होने सपा पूर्वी विधान सभा क्षेत्र का अध्यक्ष होने के नाते पार्टी कार्यालय बना रखी  थी ) चला जाता था। शिव नारायण मुझसे पहले भाकपा छोड़ आए थे। एक बार एक मीटिंग के बाद उन्होने कमलानगर मे ही रहने वाले अशोक सिंह चंदेल साहब से मुलाक़ात करा दी जो उनके साथ महामंत्री थे। चंदेल साहब ने कहा कि लड़के को बाजार साथ क्यों ले जाते हो उनके घर छोड़ दें उनकी बेटियाँ बड़ी हैं उसे भी पढ़ा देंगी। लेकिन वह कहीं किसी दूसरी जगह मुझे छोड़ कर रुकता ही नहीं था। मेरे साथ ही उनके घर जाता और लौटता था। आस-पास के तथाकथित सवर्ण लोगों के मुक़ाबले बेकवर्ड चंदेल साहब और कुशवाहा साहब का व्यवहार बहुत अच्छा था। आस-पास के लोगों ने तो कुछ लोगों को उकसा कर तमाम दलाल और ग्राहक भेजे जो मेरा मकान खरीदना चाहते थे। दलील यह थी कि दो लोग इतने बड़े मकान का क्या करेंगे?इन कुराफातियों से भी निपटना होता था, घर का सारा काम भी करना होता था और बाजार मे तीन दूकानदारों की 5 बेलेन्स शीट भी बनानी  थी।अपने ही रिशतेदारों से शह प्राप्त आस-पास के लोगों ने उस अफवाह को खूब तेजी से उड़ाया और फैलाया ताकि मै भयभीत होकर मकान बेच जाऊ।  न कायर था न डरपोक, न किसी के आगे झुकता था। सब से अकेले दम पर ‘ईंट का जवाब पत्थर से’ की तर्ज पर मुक़ाबला किया और हर बार करारा जवाब दिया।

बिमला जीजी (जो रिश्ते मे बाबूजी की भांजी थीं एवं बउआ की सहेली भी क्योंकि लखनऊ-ठाकुर गंज मे नाना जी उनके पिता श्री के मकान मे किरायेदार रहे थे )ने मुझे सूचित किए बगैर अपने किसी देवर जो मथुरा मे थे को अपनी विधवा बेटी का पुनर्विवाह मुझसे करने का सुझाव दिया जो आए तो घर मे ताला देख कर बगल वाले शर्मा जी के घर पहुँच गए। शर्मा जी की मिसेज भी मथुरा की थीं उन लोगों को चाय नाश्ता कराया। शर्मा जी ने उन्हें झूठा बहकाया कि मकान दोनों भाइयों का है पता नहीं ऊपर नीचे बंटवारा होगा या एक-एक कमरा ऊपर व नीचे का बटेगा। उनसे मिलने के बाद उन्होने मुझे पत्र भेजा और यह सब बातें सूचित कीं।

इस दौरान पटना से सहाय साहब( जिन्हें मैंने बउआ के निधन की सूचना भी प्रेषित कर दी थी )ने मेरे माता-पिता के निधन पर खेद व्यक्त करते हुये अपना घर का फोन नंबर लिख भेजा था और फोन पर संपर्क बनाए रखने को कहा था। मेरे पास फोन था नहीं अतः वह दुकान पर मुझे करते थे। हींग-की -मंडी के ही एक दुकानदार (जिनके यहाँ मै जाब नहीं करता था एक मकान छोड़ कर किराये पर रहते थे और जिनहोने बउआ की बीमारी के दौरान अजय व शोभा से संपर्क करने हेतु अपने घर का नंबर प्रयोग कर लेने को कह दिया था )से मैंने सहाय साहब का फोन आने पर बात कराने की सुविधा प्रदान करने का अनुरोध किया और उन्होने सहर्ष स्वीकृति दे दी थी । एक बार जब घर पर उनके पास फोन आया मै हींग -की -मंडी मे ही था उनकी श्रीमतीजी ने अपनी दुकान का नंबर दे दिया। पटना से फोन आने पर उन्होने मुझे अपनी दुकान पर बुलवा कर बात करा दी। वह पटना मुझे बुलवाकर बात करना चाहते थे मैंने घर और शहर छोड़ कर जाने मे असमर्थता स्पष्ट कर दी जिस पर उन्होने कहा कि हम अपना आदमी भेजेंगे और पंजाबी जी को सूचना दे देंगे। 

 

आगरा/1994 -95 /भाग-13 (माईंजी के आने पर )

…. पिछले अंक से जारी ….

रात को माईंजी ने फिर कई बार PCO पर मुझे भेज कर विष्णू को फोन करने को कहा। जो नंबर उन्होने दिया उस पर कोई और उठाता था और विष्णू को जानने से इंकार करता था। दिन का तो भुगतान माईंजी ने सब कर दिया था,इस वक्त मेरे रुपए बर्बाद हो रहे थे। यशवन्त हर बार मेरे साथ जाता रहा। इस प्रकार अजय,उनकी श्रीमती जी और माईंजी को एकान्त गुफ्तगू का पर्याप्त समय मिलता रहा क्योंकि वह नंबर पहले तो मिलता ही बड़ी मुश्किल से था। अंततः माईंजी खुद PCO जाकर खुद विष्णू से बात करके आईं ,कहा तो यही कि उसी नंबर पर विष्णू ने उठाया परंतु मुझे शक है कि उन्होने मुझे गलत नंबर देकर ही हर बार भेजा था जो कोई दूसरा आदमी उठाता था।

माईंजी ने सोते समय मुझे बताया कि वह अगले दिन सुबह 05 बजे की बस पकड़ेंगी और मुझे बिजली घर बस स्टेंड पर मोपेड़ द्वारा उन्हें छोडने जाना था। सुबह चार बजे जाग कर अजय की श्रीमती जी ने भिंडी की सब्जी और पूरियाँ सेंक दी और यशवन्त के एक पुराने टिफिन बाक्स मे रख कर माईंजी को भोजन दे दिया। यशवन्त तो उतने तड़के सो ही रहा था,मै माईंजी को 05 बजे वाली बस पर बैठा आया और पहुँचने की सूचना देने का पत्र भेजने का अनुरोध किया। परंतु माईंजी ने फिर मुझसे कोई सम्पर्क नहीं रखा। 09 बजे अजय ने अपना फैसला सुनाया कि वह भी शाम को फरीदाबाद लौट रहे हैं। मैंने कहा परसों तो तुमने नरेंद्र मोहन जी (उनके साले )के कहने पर कार से जाने से भी इंकार कर दिया था अभी भी कमजोरी है,अचानक फैसला कैसे किया?वैसे वह फैसला अचानक नहीं था एक दिन पूर्व मुझे PCO पर अटका कर माईंजी द्वारा उनसे किए गए वार्तालाप का परिणाम था। अजय जिद्द पर अड़ गए कि वह आज ही जाएँगे। अपने साथ शाम का खाना भी न ले गए। उस दिन के बाद से आज तक कोई सम्पर्क भी नहीं रखा है। यही वजह है कि लखनऊ मे माईंजी के भी कहीं होने की सूचना पर मैंने 09 अक्तूबर 2009 को लखनऊ आने के बाद भी उनसे सम्पर्क करने का कोई प्रयास नहीं किया है। उनके  द्वारा मुझसे सम्पर्क करने का प्रश्न कहाँ है ?जबकि अजय का ही मुझसे सम्पर्क तुड़वा रखा है। उनके पुत्र विष्णू डॉ शोभा की छोटी और खोटी बेटी (जिसने फेक आई डी के जरिये कई ब्लागर्स को मेरे व यशवन्त के विरुद्ध गुमराह कर रखा है जिनमे वर्तमान  मे उसी के शहर पूना स्थित एक ब्लागर प्रमुख हैं)के विवाह मे कानपुर मे जूलाई 2006 मे मिले थे और एक ही बार बोले थे फिर दूर-दूर रहे।

अजय और उनकी श्रीमती जी ने पटना के सहाय साहब के पत्र का ज़िक्र माईंजी से किया होगा। माईंजी के इच्छा व्यक्त करने पर वह पत्र माईंजी को दिखा दिया था और मैंने क्या जवाब भेजा वह भी बता दिया था। उस पर माईंजी की प्रतिक्रिया थी कि इतनी पढ़ी-लिखी लड़की से शादी न करो। किसी गरीब और नीडी लड़की से शादी करो जो ज्यादा से ज्यादा हाई स्कूल पास हो। शायद अजय और कमलेश बाबू द्वारा उत्तर देने से मेरे द्वारा रोके जाने की यह प्रतिक्रिया थी।मैंने उनको स्पष्ट किया कि मै खुद पुनः विवाह के ही पक्ष मे न था। यशवन्त ने बाबूजी से एक पोस्ट कार्ड डलवा दिया था जिसके जवाब मे यह पत्र आया है और यदि यहाँ  बात नहीं बनती है तो मै विवाह नहीं करने जा रहा हूँ। चूंकि बात यहाँ बाबूजी चला गए हैं एवं बउआ -बाबूजी दोनों ने समर्थन किया था इसलिए उनके प्रति सम्मान भाव के कारण मैंने उत्तर भेज दिया था। माईंजी को समझ आ गया था कि उनकी दाल नहीं गलेगी । इसलिए खुद भी और अजय को  भी मुझसे  सम्पर्क न रखने का निर्णय किया होगा। 

 

आगरा/1994 -95 /भाग-12 (बउआ के निधन के बाद )

…. पिछले अंक से जारी……

बाबूजी के निधन के 12 दिन बाद ही बउआ का भी निधन हो गया था। 23 तारीख को अजय फरीदाबाद मेरे रुके रहने को कहने के बावजूद चले गए थे। वहाँ अटेची खोली भी नहीं थी ,अपने काम पर भी नही गए थे कि पुनः लौटना पड़ा। थकान या सदमा जो भी हो उनकी तबीयत गड़बड़ा गई,बुखार भी हो गया,बेहद कमजोरी हो गई। डॉ की दवा लेनी पड़ी। उठना बैठना भी मुश्किल हो गया था। अजय के छोटे वाले साले नरेंद्र मोहन (जो वैसे उनकी पत्नी से बड़े ही हैं और जिनकी पत्नी कमलेश बाबू की ममेरी बहन हैं )मिलने और शोक व्यक्त करने आए । उन्होने अपनी कार से फरीदाबाद अजय को छोड़ आने का प्रस्ताव रखा क्योंकि रेल का सफर करने की अजय की हिम्मत नहीं थी। किन्तु स्वाभिमान के चलते अजय ने उनकी पेशकश को नामंज़ूर कर दिया। डॉ शोभा और कमलेश बाबू की गैर हाजिरी मे तो अजय की श्रीमती जी का व्यवहार ठीक ही था,वही खाना -नाश्ता देखती थीं और स्कूल खुल जाने पर यशवन्त के समय से भी तैयार कर देती थी।

चूंकि मैंने  बाबूजी और बउआ के न रहने पर दोनों बार पोस्ट कार्ड पर सब को सूचना दी थी अतः लगातार दो मौतों के बाद कुछ लोगों ने पोस्ट कार्ड पर संवेदना भेजी थी जिनमे बाराबंकी से  सपा नेता कामरेड रामचन्द्र  बक्श सिंह का भी पोस्ट कार्ड था और आगरा से शरद मोहन माथुर का भी। ग्वालियर से अजय के साले साहब आए थे और उनके एक दो दिन बाद देहरादून से हमारी माईंजी भी शाम के वक्त 12 घंटे का बस का सफर करके पहुँचीं थीं। अगले दिन माईंजी ने कहा कि वह पीपल मंडी स्थित अपनी एक रिश्ते की बहन के यहाँ भी शोक व्यक्त करने जाएंगी जिनके पति बैकुंठ नाथ माथुर का कुछ समय पूर्व जबर्दस्त हार्ट अटेक से देहांत हो गया था। इन माथुर साहब से मेरा पूर्व परिचय था और मै उनके घर जा चुका था। माईंजी ने मुझसे साथ चलने को कहा तब यशवन्त स्कूल मे था।

चलते समय मैंने अपने साथ कुछ अतिरिक्त रुपए रख लिए लेकिन माईंजी ने कहा कि उनके साथ जाने पर मुझे रुपए खर्च करने नहीं हैं अतः न रखू।परंतु मै एहतियातन वे रुपए ले ही गया। बैकुंठ नाथ जी  के घर काफी देर माईंजी की अपनी बहन से बात हुई। चलते समय वह अपना पर्स उठाना भूल गईं। पीपल मंडी तिराहे पर आकर माईंजी ने कहा कि रानी जी के यहाँ भी मिल लेते हैं उनका घर भी माईंजी का देखा हुआ नहीं था और रास्ते से उन्हें अकेला छोडना उचित भी न था अतः मुझे मजबूरन जाना ही पड़ा। माईंजी ने अपनी फुफेरी नन्द के घर के लिए आम आदि फल ले लिए और जब रुपए देने के लिए पर्स चाहा तो था ही नहीं। तब बोलीं कि विजय हमारा पर्स तो वहीं छूट गया लगता है अब तुम्ही पैसे दे दो घर चल कर तुम्हारा सब हिसाब कर देंगे। मैंने कहा माईंजी वह तो कोई बात नहीं यदि मैंने सुबह आप की बात मानी होती तब इस समय मै भी खाली हाथ होता। उनको कहना पड़ा हाँ तुमने रुपए रख कर ठीक ही किया। फिर रिक्शा आदि सब जगह मै ही रुपए देता रहा।

चूंकि मै गोविंद बिहारी मौसा जी (अलीगढ़ रिश्ते के कमलेश बाबू के चाचा ) के घर जाना बंद कर चुका था अतः बगल के घर मे नवीन के बारामदे मे बैठ गया। जब रानी मौसी चाय लाई तब माईंजी से उन्होने मुझे भी बुलवा लिया। माईंजी के लिहाज पर मुझे रानी मौसी के घर चाय पीनी पड़ गई। माईंजी के काफी बुलाने पर भी गोविंद बिहारी मौसा जी बाहर माईंजी से नमस्ते तक करने न आए। माईंजी ने रानी मौसी से पूछा कि गोविंद बिहारी अगर पर्दा न करते हो तो वही उनसे अंदर नमस्ते कर आयें। झेंप कर रानी मौसी को फिर माईंजी को घर के अंदर ले ही जाना पड़ा। झेंप दूर करने के लिए ही तब मौसा जी ने माईंजी को खाना खा कर जाने को कहा। जब अंदर खाना टेबुल पर लग गया और उन लोगों ने मुझे बाहर के कमरे से नहीं बुलवाया तो माईंजी खुद उठ कर आईं और मुझसे चल कर खाने को कहा मेरे इंकार करने पर माईंजी ने आदेशात्मक स्वर मे मुझे एक ही रोटी खा लेने को कहा। अपनी शादी से पहले ही माईंजी मुझे जब मै कोई सवा या डेढ़ साल का था अपनी बहनो व भाइयो से अपने पास बुला कर सारा-सारा दिन रखती थीं उनकी बात गिरा कर तौहीन करना मेरे लिए मुमकिन न था अतः अपमान का कड़ुवा घूंट पीकर उनके साथ गया तो गोविंद बिहारी मौसा जी को भी नमस्ते किया जिसका उन्होने कोई रिस्पांस नहीं दिया और माईंजी ने खुद देख भी लिया। हालांकि रानी मौसी ने नमस्ते का उत्तर दे दिया था।

माईंजी ने एक नंबर देकर कई बार विष्णू को देहरादून फोन करवाया और वहाँ कोई और मिलता रहा पैसे बर्बाद जाते रहे। रानी मौसी के घर से चलने पर माईंजी ने पहले उनके एक भाई के घर हंटले हाउस रुकने को कहा। उन दो भाइयों मे से एक माईंजी की पीपल मंडी वाली बहन के घर गए हुये थे जो उनकी सगी बहन थीं । अतः माईंजी ने फोन पर बात करके उनसे अपना पर्स लेते आने को कहा। माईंजी को तब तक रुकना था। मैंने कहा यदि आप बुरा न माने तो मै चला जाऊ ,यशवन्त आ चुका होगा और वह परेशान होगा। माईंजी ने मुझे इजाजत दे दी और जब मै घर पहुंचा तो पाया कि अजय और उनकी श्रीमतीजी की खुशामदें करने के बावजूद यशवन्त ने खाना नहीं खाया था -भूखा था। उसने अपने चाचा-चाची से एक ही जिद लगा रखी थी कि जब तक पापा नही लौट आएंगे खाना नहीं खाऊँगा। उसने छोटी बहन से उनके द्वारा कहलवाए जाने पर भी खाना नहीं खाया था।

अजय की श्रीमती जी ने कहा कि अब शाम हो गई है यशवन्त को सुबह का खाना नहीं देंगे ,उन्होने जल्दी-जल्दी उसके लिए ताज़ी सब्जी बना कर पराँठे सेंक दिये तब उसने खाना खाया। सुनने पर माईंजी को खेद भी हुआ । उन्हें उनके भाई पी सी माथुर साहब घर के पास चौराहे पर छोड़ कर चले गए थे। रात को माईंजी ने दिन भर का सारा खर्च जोड़ कर रुपए 350/- मुझे लौटा दिये। ….. 

 

आगरा/1994 -95 /भाग-11 (बउआ का निधन )

(बउआ )

शोभा-कमलेश बाबू तथा अजय के परिवार के सब लोग आगरा से चले गए थे और बउआ की तबीयत निरंतर बिगड़ रही थी। कंपाउंडर दोनों वक्त आकर इंजेक्शन  -ग्लूकोज देख जाते थे ,उनको तो प्रत्येक ट्रिप पर रु 10/-मिल जाते थे। डॉ गर्ग को अब कुछ प्राप्ति न हो रही थी अतः कंपाउंडर से कहलवाया कि ग्लूकोज हटवा दो ऐसे कितने दिन चलेंगी। लेकिन मैंने ग्लूकोज चलने दिया और कंपाउंडर आते रहे। दरअसल अजय से डॉ गर्ग ने कहा था ग्लूकोज देने की बजाए पेट मे आपरेशन के जरिये नलिए फिट करा दो जिसके जरिये तरल भोजन भेजा जाये। लेकिन आपरेशन द्वारा मौत भी हो सकती है जिसकी ज़िम्मेदारी डॉ गर्ग की नहीं होगी। अजय इस आपरेशन के लिए तैयार थे परंतु मैंने सहमति नहीं दी थी।

रविवार 25 जून की सुबह से ही बउआ की तबीयत ज्यादा गड़बड़ हो गई ,सांस तेज चलने लगी, दोपहर को ही कंपाउंडर ने कह दिया था आज बड़ा मुश्किल है। खराब समय का यही आखिरी दिन था यदि निकल जाता तो अगले दिन से तबीयत सुधर सकती थी। काम मे मन लग नहीं रहा था परंतु निबटाना तो था ही। शाम को खाना जल्दी बना दिया था और यशवन्त से खाने को कहा परंतु उसने भूख नहीं है कह कर मना कर दिया अतः मैंने भी नहीं खाया जबकि मुझे भूख ज़ोर से लगी थी।

साँय 07-40  बजे कंपाउंडर आए ,उनके ग्लूकोज की बोतल  लगाते-लगाते07 -45 हो गया   और  तभी उन्हीं के सामने बउआ का सांस चलना भी रुक गया। वह सब नलियाँ ,ग्लूकोज आदि हटा गए और पैसे लेने से मना कर दिया उनमे डॉ गर्ग की अपेक्षा मानवीयता का माद्दा था।

बाबूजी के निधन के समय तो बउआ थीं तब मेरे साथ-साथ यशवन्त हर जगह गया था और वह घर पर अकेली रही थीं। किन्तु अब?बगल वाले घर के सतीश शर्मा साहब ने कहा कहीं मत जाओ वह अपने बेटे को भेज कर अजय व शोभा को टेलीग्राम करवा देंगे। हालांकि उनका बेटा व पत्नी मथुरा जाने के लिए अपने घर से निकले ही थे परंतु रुक गए। बर्फ भी वे पिता-पुत्र ही ले आए और तत्काल पैसे देने को भी मना कर दिया। उन्हीं के पुत्र ने मुझ से पता लेकर टेलीग्राम कर दिये,वही लड़का हींग-की-मंडी के शंकर लाल जी के घर भी बता आया।

बाबूजी के वक्त बउआ, मै और यशवन्त रात मे अकेले थे तब बउआ ने दरवाजा खुला रखवाया था। लेकिन अब शर्मा जी ने मुझसे कहा सिर्फ दो लोग हो दरवाजा रात को खुला न रखो,उन्होने बंद करवा दिया तब गए। पानी बरस गया था अतः गर्मी भी कम हो गई थी। बर्फ की सिल्ली अंदर रखवाते मे मेरे मध्यमा उंगली के कुचल जाने से काफी सूजन भी हो गई थी। इस बार बर्फ सस्ती मिली थी। बाबूजी के वक्त तेज गर्मी के कारण बर्फ काफी मंहगी मिली थी। तब भी शर्मा जी और उनके पुत्र ने ही बर्फ 13 तारीख की  आधी रात को ला दी थी।  तब सुबह होने मे तीन घंटे ही रह गए थे अब सारी की सारी रात बाकी थी। नींद तो न यशवन्त को आनी थी न मुझे।

वैसे शर्मा जी काफी पियक्कड़ थे और उन्हें अपना हाल मालूम होगा। इस समय से डेढ़ वर्ष बाद उनका भी निधन हो गया था। अंदरूनी एहसास के कारण वह दूसरी जगह (हमारे माता-पिता)अपने बेटे से अंतिम समय की परिस्थितियों से रू-ब -रू करा रहे होंगे। बाबूजी को भी चारपाई से उतार कर फर्श पर लाने मे उनके बेटे ने मेरा पूरा साथ दिया था और इस बार बउआ के समय भी उन्हें उतरवाने मे वही साथ-साथ लगा। इतनी मदद करवाने के बावजूद रात ही रात मे शर्मा जी को क्या हुआ या कि किसी रण-नीति के तहत उन्होने अगले दिन 26 जून को सुबह से हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि जल्दी घाट ले जाओ। वह अजय और शोभा के पहुँचने से पूर्व क्यों अंतिम संस्कार करने का दबाव डाल रहे थे समझ से परे था। बड़ी मुश्किल से यशवन्त को समझा कर बउआ के पार्थिव शरीर के पास अकेला छोड़ कर गधा पाड़ा स्थित कामरेड एस .कुमार को कह आया था कि वह कामरेड अनंत राम राठौर को लेकर घर 12 बजे के करीब आ जाएँ। मिनी ट्रक तो शर्मा जी का लड़का पहले तय कर आया था फिर वह अपनी माँ के साथ मथुरा चला गया था। उन लोगों के जाने के बाद शर्मा जी ने हल्ला बोला था। अतः एहतियातन मैंने दो कामरेड्स से संपर्क किया था हालांकि एक वर्ष पूर्व भाकपा छोड़ चुका था किन्तु सपा मे सक्रिय ज्यादा न हो पाया था। शर्मा जी ने धम्की दी थी कि कालोनी का कोई आदमी तुम्हारे साथ मदद नहीं कर सकता ।शर्मा जी एक ही डायलाग सड़क पर चिल्ला रहे थे कि जब उन बहन -भाई को माँ की चिंता न थी बीमारी गंभीर होने पर भी छोड़ कर भाग गए थे उनका यह बेवकूफ इंतज़ार क्यों कर रहा है?

शोभा-कमलेश बाबू के पहुँचने पर वही शर्मा जी बड़बड़ाने लगे -देखो बेटी को माँ की चिंता होती है वह तो आ गई ,बेटा भागा तो अभी तक आया ही नहीं। कमलेश बाबू को मोपेड़ पर साथ लेकर मै रावत पाड़ा सब सामान लेने गया। आने पर शर्मा जी बोले धूप बढ़ रही है भाई का इंतज़ार न करो ,शोभा बोलीं कि वह,कमलेश बाबू,मै और यशवन्त चार लोग हैं ले चलो ,अजय का इंतज़ार छोड़ो। मै इन लोगों की तिकड़म समझ रहा था अतः अजय के इंतज़ार मे रुका रहा।  जब ट्रेन पहुंची तब अजय भी पहुंचे और उनकी श्रीमती जी ने ही बउआ के अंतिम संस्कार हेतु रसमे भी निभाईं वही तो उस वक्त एकमात्र पुत्र-वधू थीं। जब घाट ले जाने लगे तो यशवन्त जो दो बार पहले भी जा चुका था (17 जून 1994 एवं 14 जून 1995 को ) चल ही रहा था उसके साथ ही चलने को पौने पाँच वर्षीय अजय की पुत्री भी अड़ गई।अजय ले चलने और उनकी श्रीमती जी भेजने को तैयार थीं अतः मै भी चुप ही रहा। मैंने शोभा से कहा तुमने घाट चलने की बात कही तो तुम्हारी भतीजी सच मे ही चल रही है।

ट्रक चलने से पूर्व ही कामरेड एस कुमार और कामरेड अनंत राम राठौर भी आ गए थे ,वे भी साथ चले। फिर शर्मा जी ने हमारे दूसरे साईड वाले सिन्धी महोदय को स्कूटर पर यह देखने के लिए भेज दिया कि कालोनी के लोगों को उनके द्वारा रोके जाने से इतने कम लोगों के साथ हम कैसे,क्या करते हैं?पता नहीं कुछ लोग खुद को खुदा क्यों समझने लगते हैं? हम लोग जब घाट पर टाल से लकड़ियाँ ढो रहे थे तब तक कुछ दूसरे लोग दाह संस्कार करके लौट रहे थे। उनके बुजुर्गवार एक सदस्य ने उन युवकों से कहा कि देखो इनके छोटी-छोटे बच्चे भी लगे हुये हैं तुम लोग इनकी मदद करो। फिर तो देखते-देखते आनन-फानन मे हम लोगों की कई क्वितल लकड़ियाँ मौके पर पहुँच गईं। हम उन लोगों को सिर्फ ‘धन्यवाद’ ही दे सकते थे। कालोनी के पढे-लिखे ,सभ्य ?सुसंस्कृत ?लोगों के व्यवहार और इन अनपढ़ तथा-कथित गवार ,अंनजाने लोगों के व्यवहार का यही तो अंतर था।शर्मा जी तथा दूसरे लोगों को उन सिन्धी महोदय से ज्ञात हो गया होगा कि उन लोगों द्वारा पीछे हटने के बावजूद अजनबी और गरीब लोगों द्वारा किस प्रकार अचानक हमारी सहायता की गई।

शाम को कहीं जाते समय वह शर्मा जी डॉ शोभा को अपने घर की चाभी दे गए और शोभा ने रख दी। मेरे यह पूछने पर उनके घर की चाभी क्यों ले ली तो शोभा का जवाब था तुम लड़ते रहना हम क्यों बुरा बनें?अपने बड़े भाई के अपमान से ज्यादा था बहन जी के लिए दूसरों के सामने  खुद को अच्छा साबित करना !शायद अगले ही दिन वे लोग झांसी चले गए।

क्रमशः …..

 

आगरा/1994 -95 /भाग-10 (बउआ की बीमारी )

…. पिछले अंक से जारी ….

15 जून को अजय ने कमला नगर के ही डॉ अशोक गर्ग को घर बुला कर बउआ को दिखाया। डॉ गर्ग भाजपा का था उसने घर आने का उस समय रु 500/- लिया था एक विजिट के हिसाब से। पास के एक नरसिग  होम मे उसने एडमिट करवा दिया जिसका चार्ज भी काफी था। उसमे भी मोटा कमीशन डॉ गर्ग को मिला होगा। अजय और कमलेश बाबू नरसिंग   होम मे बउआ के साथ रहे। लगातार ग्लूकोज चढ़ता रहा। अजय शायद रु 5000/- लेकर फरीदाबाद से आए थे वे आनन-फानन मे खत्म हो गए। उसके बाद उन्होने हाथ खड़े कर दिये हमारे पास पैसे नहीं हैं हम इलाज नहीं करा सकते हैं। मैंने उनसे कहा मै सेल्फ का चेक साईंन करके देता हूँ पास के बैंक जा कर रुपए निकाल लाओ। उनका जवाब था हम तुम्हारे नौकर नहीं हैं जो तुम्हारे लिए रुपए निकाल कर दें। तब तक शुद्धि हवन नहीं हुआ था और मुझे घर से निकलना भी नहीं था अतः मैंने कमलेश बाबू से निवेदन किया कि आप से कहने का कोई हक तो नहीं है परंतु इतनी मदद कर दे तो मेहरबानी है। कमलेश बाबू की मेहरबानी से रुपए मेरे अकाउंट से निकल सके और बउआ का इलाज जारी रह सका। 16 जून को शालिनी को दिवंगत हुये एक वर्ष पूर्ण हुआ तब तक बाबू जी भी दिवंगत हो चुके थे और बउआ मरणासन चल रही थीं।

18 जून को बाबू जी का शुद्धि हवन होना था। शोभा और कमलेश बाबू एक बैग मे थोड़ा सामान लेकर नरसिंग होम चले गए। परंपरानुसार बेटी-दामाद को इस हवन मे शामिल भी नहीं होना था और यह भी कि हवन के बाद उनका पुनः आगमन रहे इसलिए भी। अजय और उनकी श्रीमती जी ने हवन की तैयारी की। इस बार अजय को आर्यसमाज के मंत्री जी की श्रीमती जी ने बलकेशवर निवासी एक शिक्षक महोदय का पता दे दिया था उन्हे ही वह कह आए थे। यह पुरोहित जी, जो अजय ने दिलवाया वह सब ले गए। बउआ की तबीयत की जान कर उनसे यह भी कह गए जरूरत हो तो घर आ जाना।

हवन के बाद अजय और उनकी श्रीमती जी ने तय किया कि वे दोनो अब घर पर रहेंगे,हवन हो चुका लिहाजा मुझे नरसिंग होम मे रहना चाहिए। यशवन्त भी मेरे साथ ही जाने पर अड़ गया। शोभा ने कहा कि बिना माँ के बच्चे के साथ यह अन्याय है कि वह बाप के साथ-साथ रात को नरसिंग होम मे गुजारे। अतः शोभा और कमलेश बाबू दोनों मिल कर रात भर नरसिंग होम मे रहने लगे। अजय ने बाबू जी के सन्दूक को चेक किया था उनके जो डिपोजिट्स आदि थे उसमे वह बहन को हिस्सा नहीं देना चाहते थे और वो लोग लेना चाहते थे। मैंने कहा मेरा हिस्सा न लगाओ तुम दोनों आपस मे बाँट लो। अजय किसी भी कीमत पर शोभा को कुछ भी देने को राजी न थे। इसी के बाद उन लोगो ने नरसिंग होम मे रात को रुकना बंद कर दिया था। शोभा की दोनों बेटियाँ तब छोटी थी और झांसी मे दूसरों के आसरे थीं। अजय का निर्णय तो न्यायोचित नहीं ही था उनकी श्रीमती जी और शोभा मे खूब वाक-युद्ध हुआ जबकि उस समय अजय और कमलेश बाबू दोनों ही अस्पताल मे थे। मुझे हस्तक्षेप करना मजबूरी बन गया क्योंकि अजय की श्रीमती जी ने तर्जनी उंगली घुमाते हुये शोभा से कहा कि एक मिनट के अंदर घर से निकाल देंगे। मुझे अजय की श्रीमती जी को संबोधित करके कहना पड़ा कि अभी बउआ   बीमार हैं और बाबू जी नहीं हैं अगर होते और वह भी इस प्रकार शोभा को यहाँ से निकालना चाहते तो नहीं निकाल सकते थे क्योंकि घर और मकान मेरा है। मै इस प्रकार बे इज्जत करके किसी को भी बहन को निकालने नहीं दूंगा। खैर फिर अजय की श्रीमती जी चुप हो गईं उन्होने मुझे कोई जवाब नहीं दिया।

एक रोज फिर अजय और कमलेश बाबू अस्पताल मे थे तब पोस्टमेन एक लिफाफा दे गया जो पटना से बी पी सहाय सहाब का बाबूजी के नाम था और उसमे उन्होने अपने पत्र का उत्तर न मिलने का जिक्र किया था। मुझे शोभा और अजय की श्रीमती जी किसी ने भी  इस बाबत कुछ नहीं बताया और पत्र पढ़ कर दोनों आपस मे इस बात पर उलझ गईं कि उनका जवाब कमलेश बाबू देंगे/अजय देंगे। बाहर खुले मे झगड़ने की आवाज पर मुझे पूछना पड़ा कि मामला क्या है?तब मजबूरन मुझे पत्र दिखाया गया। मैंने दोनों से कहा कि अब बाबू जी हैं नहीं और बउआ भी होश मे नहीं हैं। कमलेश बाबू और अजय दोनों मुझसे छोटे हैं मेरे बारे मे फैसला कैसे कर सकते हैं ?उत्तर देना होगा तो खुद मै ही दूँगा मेरे अलावा और कोई नहीं देगा। यह कह कर मैंने पत्र अपने कब्जे मे ले लिया। पोस्ट कार्ड पर मैंने उन्हें सूचित कर दिया कि 13 जून को बाबूजी नहीं रहे हैं और माँ गंभीर बीमार हैं अभी मै कुछ भी नहीं कह सकता वह कहीं और आगे बात चला सकते हैं।

इसके बाद शोभा और कमलेश बाबू झांसी लौट गए। उन्हें बुरा लगा कि मैंने पत्र का जवाब उन्हें क्यों नहीं देने दिया। मै दो -तीन घंटे के लिए हींग-की-मंडी जाकर कुछ काम निबटा देता था । शुक्रवार 23 जून को अचानक अजय ने कहा कि शाम को वे लोग भी फरीदाबाद लौट रहे हैं। उन्हें भी पटना पत्र का उत्तर न देने का बुरा लगा था। मेरी गणना के मुताबिक रविवार तक का समय बउआ का कष्टप्रद था उसके बाद समय ठीक होना था। मैंने अजय से इतवार तक रुकने को कहा परंतु वह नहीं माने। अतः हींग-की-मंडी जाकर मुझे सभी दूकानदारों से अगले दिन से न आने की सूचना देनी पड़ी। घर पर बीमार माँ ,मै और यशवन्त रह गए।

क्रमशः … 

 

आगरा/1994 -95 /भाग-9(बाबू जी का निधन )

(बाबू जी )

एफ ब्लाक वाले आर पी माथुर साहब ने मुझसे उनके पास जाकर मिलते रहने को कहा था। अक्सर यशवन्त को लेकर मै उनके घर चला जाता था। उनकी श्रीमती जी का दृष्टिकोण था कि उन लोगो की अफवाहों का मुक़ाबला करने हेतु मुझे  फिर से विवाह कर लेना चाहिए। मेरा ख्याल था कि जब हमारे बाबूजी चार साल के थे तब हमारी दादी जी नहीं रहीं थीं और बाबाजी ने फिर शादी न की थी तो यशवन्त तो 11 वर्ष का होने जा रहा था लिहाजा मुझे भी शादी फिर न करना चाहिए। उन लोगो ने तीन लड़कियो का ब्यौरा भी बताया जिनमे दो की शर्त यशवन्त और मेरे माता-पिता को न रखने की थी। कोई प्रश्न ही नहीं था कि ऐसी बातें सुनी भी जाएँ। एक की ऐसी शर्त न थी लेकिन उसकी उम्र बेहद कम थी। आर सी माथुर साहब तो घर पर भी आए और उस लड़की की बात उठाई जिसकी कभी छोटे भाई से उठाई थी। वह शालिनी के भाई को भी भड़का रहे थे उनकी बात तो गौर करने लायक थी ही नहीं।

ऊपर से तो माता-पिता ने मेरे ही विचारों का समर्थन किया किन्तु दिन भर यशवन्त से उनकी क्या चर्चा होती रही मै बेखबर था। पहली अप्रैल 1995 का ‘सरिता’ का अंक ‘पर्यटन विशेषांक’था जो यशवन्त ने लिया था उसमे कोई विज्ञापन देख कर उसके और मेरे माता-पिता के बीच कुछ सहमति बनी होगी। मुझसे बउआ – बाबूजी ने कहा कि हम लोग जब तक हैं तब तक तो दिक्कत नहीं है आगे के लिए यशवन्त की बात सोच कर शादी कर लो। मेरे मना करने लेकिन यशवन्त के ज़ोर देने पर बाबूजी ने उसकी संतुष्टि हेतु एक पोस्ट कार्ड बाक्स नंबर के पते पर भेज दिया कि कौन पोस्ट कार्ड पर गौर करेगा?और यशवन्त को खुश कर दिया। लेकिन लगभग डेढ़ माह बाद पटना से बी पी सहाय साहब ने बायोडाटा और फोटो के साथ उस पोस्ट कार्ड का जवाब भेजा था। दिन मे बाबा-दादी के साथ यशवन्त की बात हो चुकी थी शाम को मेरे घर आने पर उन लोगो ने कहा बच्चा इन्हें माँ मानने को तैयार है उसकी खुशी के लिए तुम हाँ कह दो तो जवाब भेज दें । मैंने टालना चाहा था किन्तु माँ- पिताजी का कहना था कि शादी तो तुम्हें करनी ही पड़ेगी अतः हम लोगो के रहते ही कर लो। मैंने फिर निर्णय उन लोगो पर छोड़ दिया था।

जून के प्रथम सप्ताह मे बउआ को बुखार आकर तबीयत ज्यादा बिगड़ गई उधर हैंड पंप भी खराब हो गया । रिबोरिंग कराना पड़ा। दुकानों मे अकाउंट्स का काम भी ज्यादा होने के कारण छुट्टी न ले सका। बाबूजी को नल का काम देखना पड़ा। शायद उन्हें लू लग गई। उन्हें भी बुखार हो गया। डॉ को बता कर दवा ला रहा था फायदा न था अतः मैंने बाबूजी से डॉ के पास चलने को कहा कि मोपेड़ धीरे-धीरे चला कर ले चलूँगा। उन्होने अगले दिन चलने का वायदा किया। किन्तु मंगलवार 13 जून की रात लगभग डेढ़ बजे उनका प्राणान्त हो गया।
14 तारीख की सुबह अर्जुन नगर बउआ की दूसरी फुफेरी बहन के पुत्रों को खबर करने गए लेकिन पिछले वर्ष की ही भांति यशवन्त फिर मेरे साथ गया मै उसे छोड़ जाना चाहता था बउआ अकेली थीं। लेकिन बउआ ने कहा ले जाओ वह रह  लेंगी।वहाँ से लौट कर हींग-की-मंडी के शंकर लाल जी को सूचित किया। फिर बेलनगंज जाकर अजय और शोभा को फरीदाबाद व झांसी टेलीग्राम किए। बउआ अकेले ही बाबूजी के पार्थिव शरीर के पास रहीं।

शाम को पाँच बजे तक अशोक और नवीन (सीता मौसी के पुत्र )आए उनके साथ असित ( रानी मौसी का पुत्र )भी आ गया था। रानी मौसी को गोविंद बिहारी मौसा जी ने यह कह कर न आने दिया था कि वहाँ जाओगी तो तुम्हारी टांगें तोड़ देंगे। उन लोगों के आने के बाद बउआ ने मुझसे सिर मुड़ाने जाने को कहा। यशवन्त फिर मेरे साथ चला गया और अशोक,नवीन भी बाद मे कहीं टहलने निकल गए। बाद मे शोभा-कमलेश बाबू झांसी से पहुँच गए,किन्तु अजय का इंतज़ार था। अजय फरीदाबाद मे शोभा के आने के इन्तजार मे रुके रह गए थे क्योंकि वे लोग वहाँ घूमने उसी दिन पहुँचने वाले थे। काफी इन्त्ज़ार देखने के बाद भी जब शोभा न पहुँचीं तब वह आगरा के लिए चले ,शायद साढ़े सात बजे तक पहुंचे होंगे तब तक बाबूजी को घाट ले जाने हेतु छोटा ट्रक और सामान आदि नवीन की मार्फत मँगवा  लिया था। घाट पर ही रात के नौ बज गए थे।

नहाने-धोने के बाद अजय बउआ को कुछ खिलाना चाह रहे थे और वह लेने को तैयार न थीं। हालांकि मै और यशवन्त भी कुछ खाये बगैर ही भरी गर्मी मे रहे थे। किन्तु झेल गए बउआ या तो झेल न पायीं या पडौस की महिलाओ के कहने पर चलते समय बाबूजी के चरण-स्पर्श कराने के फेर मे उन्हें जबर्दस्त मानसिक आघात लगा। बाद मे डॉ ने ऐसा ही बताया था कि उनके ब्रेन का रिसीविंग पार्ट डेमेज हो गया था। किन्तु उस समय अजय बउआ पर झल्ला पड़े,शोभा से भी बात नहीं कर रही थीं इसलिए वह भी चिड़चिड़ा रही थीं । ये लोग मुझे उनके पास लेकर गए (जबकि परंपरानुसार मुझे बाहर अलग-थलग रहना होता था )मेरे आवाज देने पर बउआ के मुंह से इतना ही निकला -“क्या कहें?किस्से कहें?”इसके बाद उनके होठ तो चलते दिखे लेकिन कोई आवाज मुंह से सुनाई न दी। क्रमशः ….. 

 

आगरा 1994-95/भाग-8

इस हादसे के बाद मेरी तबीयत भी खराब हो गई ,किसी भी प्रकार की डाक्टरी दवा बेअसर जा रही थी। तेज बुखार के साथ -साथ बेहद कमजोरी हो गई थी। चम्मच तक पकड़ना मुश्किल हो गया था। बाबूजी चम्मच से तरल पदार्थ -दाल,सूजी का पेय आदि पिला देते थे। किन्तु यह अच्छा नहीं लगता था। न पानी अच्छा लग रहा था न पिया जा रहा था। अतः मैंने बाबू जी से कहा कि डाक्टर की दी दवाएं बंद करके केवल सूखा ग्लूकोज पावडर मुझे दें । उन्होने यही किया जिससे प्यास भी लगने  लगी और पेशाब भी सही होने लगा। दो तीन दिन मे कमजोरी दूर हो गई। बुखार भी इसी से ठीक हो गया और थोड़ा-थोड़ा भोजन भी अच्छा लगने लगा। कुछ दिनो बाद ड्यूटी जा सका। सभी दूकानदारों ने पूरा सहयोग दिया। मेक्सवेल के शंकर लाल जी,रेकसन के मुरलीधर जी और ईस्टर्न ट्रेडर्स के मोहन लाल जी के ज्येष्ठ पुत्र अपने टाईपिस्ट के साथ तथा वाकमेक्स के सुंदर लाल जी के साले और ज्येष्ठ पुत्र तो घर पर शोक प्रकट करने भी आए थे।

जूलाई मे स्कूल खुलने पर यशवन्त को भी भेजा। बउआ ,बाबूजी की मदद से खाना बना रही थीं किन्तु वह खुद अस्वस्थ थीं । कई बार रोटी सेंकते-सेंकते पीछे फर्श पर गिर गईं और  गैस चूल्हा जलता रह गया। मैंने फिर बाबू जी से सख्ती के साथ उन्हें व बउआ को खाना बनाने को मना किया। मै खुद खाना बनाने लगा और ईस्टर्न के मोहन लाल जी से मिन्नत करके उनका पार्ट टाईम छोड़ दिया। वह मुझे छोडना नहीं चाह रहे थे समय घटाने को तैयार थे वही वेतन देते हुये भी। सुबह और शाम खाना बनाने के साथ मुश्किल होती अतः उनका जाब छोड़ ही दिया। फिर भी यशवन्त को भूख लगने का बहाना करके शाम को मेरे आने से पहले ही बउआ और बाबूजी खाना बना लेते थे। तब मैंने दोनों वक्त की सब्जी सुबह ही बना कर रखना शुरू कर दिया ताकि बउआ-बाबूजी पर ज्यादा भार न पड़े।

एक तरफ बुढ़ापे मे माँ-पिताजी को भी मानसिक आघात,शारीरिक कष्ट और यशवन्त की भी चिन्ता थी तो दूसरी तरफ ‘चिता मे भी रोटी सेंकने ‘ वालों की भी कमी न थी। पर्दे के पीछे षड्यंत्र रचा गया और रिश्ते दारों तथा कालोनी के लोगों के बीच यह अफवाह फैलाई गई कि शालिनी को जहर दिया गया है। ‘कोना शूज’ वाले निरंजन आहूजा( जो श्रीमती आरती साहनी ,इन्कम टैक्स अपीलेट कमिश्नर द्वारा बुक्स आफ अकाउंट्स जब्त किए जाने से परेशान थे और जिंनका केस वकील की सलाह पर मेरे परिश्रम के बल पर सुलझा था) जिनकी बात अपमानजनक लगने पर मैंने उनका जाब छोड़ दिया था। इस मौके पर हींग-की-मंडी मे इस अफवाह के सृजक थे। उन्होने( जिनको मैंने वकील साहब द्वारा कानून पढ़वाकर जेल जाने से बचाया था) रेकसन वाले नारायण दास जी के समक्ष शंकर लाल जी से कहा था नया अकाउंटेंट ढूंढ लो तुम्हारा अकाउंटेंट जेल जाने वाला है। शंकर लाल जी हमारी ही कालोनी मे रहते थे और सब परिवार को   अच्छी तरह जानते थे और शू चेम्बर के प्रेसीडेंट थे अतः उन्होने निरंजन आहूजा को डांट कर चुप रहने को कहा कि झूठी अफवाहें न उड़ाएं । किन्तु लोगों को कानाफूसी करने और नाहक बदनाम करने का मसाला तो मिल ही गया था।

कमलनगर के ही एफ ब्लाक मे रहने वाले आर पी माथुर साहब से हमने जिक्र किया जो LLB भी थे। उन्होने कहा अफवाहों से चिंतित न हो जरूरी समझो तो जवाब देना वरना चुप रहना। उनकी श्रीमती जी ने बताया कि शालिनी की माँ भी अफवाहें फैलाने वालों मे हैं। भरतपुर पोस्टिंग के दौरान दैनिक यात्री रहे आर सी माथुर साहब शरद मोहन के मित्र बन गए थे वह भी आग मे घी डालने वालों मे थे ,अब उनकी पुत्री कमलेश बाबू के मौसेरे भाई की पत्नी भी हो गई है।*

इन सब परिस्थितियों मे राजनीति से विश्राम रहा। ……….

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*कमलेश बाबू की एक बहन के पति कुक्कू के रिश्तेदार हैं और उनकी शादी मे कुक्कू बाराती बन कर अलीगढ़ पहुंचे थे। आर सी माथुर की पुत्री कमलेश बाबू के मौसेरे भाई की पत्नी होने के साथ-साथ उनकी बड़ी बेटी की सुसराल मे भी रिश्तेदार है। उनकी छोटी बेटी के पति कुक्कू की भुआ के सुसराल के रिश्तेदार हैं। कमलेश बाबू ने अपनी  एक बहन और दोनों बेटियों की शादिया कुक्कू की रिश्तेदारी मे की हैं उनकी छोटी बेटी की देवरानी तो कुक्कू की बेटी की नन्द है। अतः कमलेश बाबू और डॉ शोभा उन लोगो से मिल कर हमारे साथ भीतरघात करते रहे जिसका खुलासा लखनऊ आते ही हो गया। इसीलिए डॉ शोभा ने मुझसे फोन पर  28 जनवरी 2010 को कहा था कि वे लोग मेरे लखनऊ आने के पक्ष मे नही थे। लखनऊ मे बिल्डर लुटेरिया के माध्यम से हम लोगो को हर तरह से परेशान करना उनका खास शगल बन गया है। यशवन्त को बिग बाजार की नौकरी छुड़वाकर लुटेरिया की नौकरी करवाने का उनका  प्रस्ताव मैंने आगरा  मे रहते ही ठुकरा दिया था।

कुछ ब्लागर्स को भी इन लोगो ने भड़का कर मुझे व यशवन्त को परेशान करने का उपक्रम कर रखा है जिनमे कुछ उनकी छोटी बेटी के शहर पूना मे हैं। एक प्रवासी ब्लागर ने 06 अक्तूबर 2010 को यशवन्त पर एक पोस्ट लिख कर उसका भविष्य चौपट करने का प्रयास इनही लोगो के इशारे पर किया था। के बी साहब की छोटी बेटी ने मुझसे फोन पर कहा था “मै…. को जानती हूँ,मैंने उनका प्रोफाईल देखा है। “सीधा अर्थ है कि वे लोग यशवन्त और मेरे ब्लाग्स पर प्राप्त टिप्पणियों के माध्यम से पहुँच बना कर ब्लागर्स को गुमराह करते रहते हैं। ताज्जुब तो पढे लिखे लोगों का इन लोगो के कुचक्र मे फँसने का है। कुक्कू उसकी पत्नी मधू ( के बी साहब की भतीजी ) बहने,बहनोई,भांजे-भांजी,भाई-भाई की पत्नी और भतीजिया तथा कुक्कू के पुत्र-पुत्री और उसके मित्र के बी साहब की पुत्रियाँ हमे सपरिवार नष्ट करने के अभियान मे संलग्न हैं। परंतु किसी के आगे झुक कर हकीकत लिखने से पीछे नहीं हट सकता। 

 

आगरा/1994 -95 / (भाग-7)

गतांक से आगे ……

अजय को फरीदाबाद लौटना था वह भी प्राईवेट जाब तब छोड़ कर किसी के साझे मे अपना काम कर रहे थे,कितना नुकसान उठाते अतः आर्यसमाँजी पद्धति से हवन कराने का निर्णय बाबूजी ने लिया। कमला नगर आर्यसमाज मे उस समय कोई पुरोहित न था अतः वहाँ से पता करके उनके सेक्रेटरी के घर अजय गए जहां सेक्रेटरी साहब तो नहीं मिले किन्तु उनकी पत्नी ने सामग्री लिखवा दी और दिये समय पर पुरोहित भिजवाने का आश्वासन दे दिया। निर्धारित दिन और समय पर हवन कुंड और समिधा लेकर हींग -की -मंडी आर्यसमाज के पुरोहित अशोक शास्त्री जी पहुँच गए। विधानपूर्वक उन्होने शांति हवन करा दिया। जो दक्षिणा  बाबूजी  ने उन्हें दी बिना किसी हुज्जत के उन्होने स्वीकार कर ली। बल्कि जो साड़ी और बर्तन बाबूजी ने अजय से उन्हें देने के लिए मँगवाए थे वे भी लेने से उन्होने यह कह कर मना कर दिया कि न उसका कोई औचित्य है न ही आर्यसमाज मे चलता है। उनका कहना था आपको देना है तो किसी और पंडित को दे दें। बड़ी मुश्किल से बाबूजी और अजय ने उन्हें वे चीजें ले जाने को यह कह कर राजी किया कि आप ही जिसे चाहे दे दें।

अजय की बेटी अनुमिता तब पौने पाँच वर्ष की थी हवन के बाद बोली ताऊजी क्या आप हमे मोपेड़ पर नहीं घुमा सकते हैं?लिहाजा उसे बैठा कर थोड़ा आगे ही बढ़े थे कि उसने कह दिया बस घूमना हो गया अब वापिस चलिए। मुझे जानकारी नहीं थी किन्तु यशवन्त ने बताया कि मम्मी की इच्छा अनुमिता को एक फ़्राक देने की थी अब वह नहीं हैं इसलिए आप दिला दीजिये। तुरंत कुछ खरीदने-देने की मेरी इच्छा तो नहीं थी परंतु यशवन्त की इच्छा को देखते हुये उसी की पसंद की एक फ़्राक जिसे उस बच्ची ने भी पसंद किया ले दी जिसे यशवन्त ने ही अपनी चाची को सौंपा। फ़्राक को तो यशवन्त ने बताया था कि मम्मी देना चाहती थीं उनकी इच्छा को पूरा करने के लिए दी है उसे तो उन लोगों ने स्वीकार कर लिया। किन्तु यशवन्त अपनी तरफ से रु 4/- का हारलिक्स बिस्कुट का एक पैकेट और डेढ़ रुपया अपनी बहन को दे रहा था जिसे उस बच्ची ने ले भी लिया था। अजय ने पैसे उससे छीन कर उछाल दिये और बिस्कुट का पैकेट लौटा देने को कहा ,मन मसोस कर बच्ची ने रख दिया। यशवन्त को बहुत बुरा लगा और वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसे रोता छोड़ कर वे लोग रवाना हो गए। मुझे बेहद ताज्जुब हुआ और धक्का भी लगा परंतु कर क्या सकता था?यशवन्त को ही बेमन से डांट दिया। बउआ -बाबूजी अजय से कुछ नहीं बोले यह बात भी समझ से परे थी।

डॉ रामनाथ, विजय शर्मा (सप्तदीवा साप्ताहिक के सम्पादक) और आस-पास के लोग 13 वी न करके आर्यसमाज से हवन कराने पर बिदक गए। गोविंद बिहारी मौसा जी (रानी मौसी के पति एवं अलीगढ़ के रिश्ते से  कमलेश बाबू के चाचा ) ने अपने घर पर मुझसे कहा कि -“तेरवी न करके जीजाजी ने अपना मुंह काला करवाया है,वह कबसे आर्यसमाजी हो गए?”

मुझे तो उनकी बात तीखी चुभी ही थी और मैंने इस दिन के बाद  उनके घर जाना छोड़ दिया और मन मे सोचा कि आपके जीजाजी (साढू) भले ही आर्यसमजी न हुये पर मै होके दिखाऊँगा। बउआ को भी छोटे फुफेरे बहनोई द्वारा अपने पति की तौहीन बेहद बुरी लगी। उन्होने बताया कि उनके फूफा जी ने उनकी भुआ (अर्थात गोविंद बिहारी जी के श्वसुर साहब ने उनकी सास )  के न रहने पर 5 दिन भी नहीं केवल 3 दिन बाद ही आर्यसमाज से हवन कराया था।मैंने एक पत्र भेज कर उनसे पूछा कि हमारे बाबूजी के बारे मे तो आपने तपाक से कह दिया कि अपना मुंह काला करवाया जो तेरवी न की तो आप अपने श्वसुर साहब के लिए क्या कहना चाहेंगे? रानी मौसी भी इस विषय पर अपने पिता को गलत नहीं ठहरा सकती थीं जबकि उनके सामने ही उनके पति ने मेरे पिता को गलत ठहरा दिया था।

इससे पूर्व गोविंद बिहारी मौसा जी के ही कहने पर मै कई बार यशवन्त को लेकर राजा-की-मंडी क्वार्टर पर गया था। किन्तु वे लोग उपेक्षित व्यवहार उसके साथ भी कर रहे थे। गोविंद बिहारी मौसा जी ने कहा था कि उनके कहने से एक बार और ले जाऊँ उस दिन शरद मोहन का आफ था वह घर पर थे किन्तु तुरंत ड्रेस पहन कर स्टेशन रवाना हो गए उनकी माता जी सोने चली गई और उनकी पत्नी ने अपनी पुत्रियों को रंग – ड्राइंग कापियाँ दे कर अलग कमरे मे बैठा दिया। लिहाजा मै यशवन्त को लेकर फ़ौरन सीधे अर्जुन नगर रानी मौसी के घर यह तथ्य बताने गया। तभी उन्होने तेरवी न करके आर्यसमाजी हवन कराने पर आपत्ति जताई थी। उसी दिन के बाद से गोविंद बिहारी मौसा जी के साथ-साथ शरद मोहन के घर भी जाना बंद कर दिया। 

 

आगरा/1994 -95 /(भाग-6 )

गतांक से आगे ……

मै नहीं समझ सका कि क्यों डॉ शोभा यशवन्त को हस्तगत करना चाहती थीं और क्यों अजय की श्रीमती जी ने बउआ को वैसा न करने का सुझाव दिया(वह तो कमलेश बाबू की ममेरी बहन की नन्द हैं और के बी साहब ने ही उनकी शादी करवाई थी ) कि क्या वह यशवन्त को अपने पास रखना चाहती थीं?मुझसे किसी ने भी तब कोई जिक्र क्यों नहीं किया ?क्या यशवन्त किसी के पास रह लेता ?जब बउआ ने ग्यारह माह बाद बताया तब क्या उन्हें अपने लोगों के जीवन न रहने का एहसास हो गया था?उस समय इन सब बातों पर विचार करने का समय न था और बाद मे ध्यान से निकल गया था। कल जब 25 मार्च को भाग-5 लिख रहे थे तब दिमाग मे 25 मार्च 1981 की वह घटना भी कौंध रही थी कि तब शालिनी से एंगेज्मेंट हो चुकने के तुरंत बाद उन लोगों ने शालिनी का हाथ देख कर बताने को कहा था मेरे माता-पिता ने भी उन लोगों का समर्थन कर दिया था।

(बाएँ से दायें-बउआ,सरोजनी देवी-शालिनी की माँ,मधू-कुक्कू की पत्नी और कमलेश बाबू की भतीजी,शालिनी,खुद,बाबूजी और उनकी गोद मे डॉ शोभा की ज्येष्ठ पुत्री,पीछे की पंक्ति मे -अजय,कुक्कू,डॉ शोभा,सीमा,जय शंकर लाल-शालिनी के पिता )

(सीमा,मधू,शालिनी )

शालिनी की दोनों हथेलियों का अवलोकन करने से स्पष्ट था कि उनकी उम्र कुल 35 वर्ष ही है। अर्थात वह शादी अधिक से अधिक 13 वर्ष ही चलनी थी। यदि उसी समय हकीकत बता देता तो तत्काल रिजेक्ट कर दिया जाता और वह विवाह न होता। हाथ एंगेज्मेंट के पहले देखने को कहा जाता तो हकीकत ही बताना था। असमंजस मे तब चुप रहना मेरे लिए काफी घातक रहा। फिर वह बात दिमाग से इस प्रकार निकल गई जिस प्रकार गधे के सिर से सींग। जब नवंबर 1993 मे लव लीन ने शालिनी को बताया कि भुआ आपकी उम्र 36 वर्ष ही है तब भी पुरानी बात याद न आई और मैंने शालिनी को समझा दिया कि भतीजी की बात को अन्यथा न लें। किन्तु उसी दिन से वह बीमार पड़ गई थीं और अंततः 36 वे वर्ष मे दुनिया छोड़ ही गई।

जैसा कि पहले ही उल्लेख कर चुका हूँ कि शालिनी से विवाह कमलेश बाबू के पिताजी ने तय कराया था। पहले जितने भी लोगों ने संपर्क किया था सब का जिक्र बउआ डॉ शोभा से करती थीं और कमलेश बाबू की माताजी किसी न किसी आधार पर सभी लड़कियों को रिजेक्ट करा देती थीं। मुझसे मेरे माता-पिता ने कोई राय लेना कभी मुनासिब नहीं समझा । नीचे उन पत्रों की स्कैन कापियाँ दे रहा हूँ जिनकी पुत्रियों के प्रपोज़ल डॉ शोभा ने अपनी सास के हवाले से रिजेक्ट करवाए थे-

यह पत्र बार्डर सिक्योरिटी फोर्स के रिटायर्ड सब इंस्पेक्टर अमर सिंह जी का है जिनकी राय मैंने मांगी थी किन्तु उनके ठीक बताने के बावजूद डॉ शोभा ने बउआ को सूचित किया था कि उनकी सास कहती हैं मात्र 10 माह का अंतर कम है और इसी ग्राउंड पर बाबूजी ने वहाँ मना कर दिया था।

इन सभी पत्रों और उनके साथ आई फ़ोटोज़ को पहले बाबूजी अलीगढ़ डॉ शोभा के पास डाक से भेजते थे और डॉ शोभा अपनी सास साहिबा के कमेन्ट के साथ लौटाती थीं। जयपुर से आए एक फोटो पर डॉ शोभा की सास अर्थात के बी माथुर साहब की माताजी का रिमार्क मुझे बेहद बेहूदा लगा था कि -‘लड़की के कूल्हे भारी हैं’। मेरे बोलने की कहीं कोई गुंजाईश न थी अपने बारे मे ही मेरी कोई भूमिका नहीं थी।

आखिरी पत्र अजय के एक्सीडेंट के समय सहयोग देने वाले परिवार की बेटी की नन्द की बाबत है। पटना के मशहूर दवा व्यवसायी थे (के जी मेडिकल हाल वाले कृष्ण  गोपाल माथुर साहब ) जिनके यहाँ कई बार डकैती भी पड़ी और अंततः वे लोग पूना शिफ्ट हो गए। डॉ शोभा की सास ने यह कह कर रिजेक्ट कराया कि पटना का पानी खराब है वहाँ की लडकिया बीमार रहती हैं। नामनेर ,आगरा के वह माथुर साहब भी अब पूना शिफ्ट हो गए हैं किन्तु उस लड़की की शादी आगरा मे ही सेंट्रल बैंक के एक क्लर्क से उन्होने करा दी थी जो अब अधिकारी हैं। ये दोनों पति-पत्नी अपनी पुत्रियों की जन्मपत्रियाँ बनवाने  कमला नगर मेरे घर पर कई बार आए हैं।बड़ी बेटी के  विवाह हेतु मुझसे ही कुंडलियाँ भी मिलवाई हैं। रांची स्थित कोल इंडिया के रिटायर्ड डिप्टी चीफ सेक्यूरिटी आफ़ीसर आर पी माथुर साहब,विनीश जी के चाचा थे और मुझ से मित्रवत व्यवहार रखते थे। शालिनी व मुझे विनीश जी की पत्नी -ज्योति से उन्होने ही अपने घर पर परिचय करवाया था।

25 मार्च 1981 को शालिनी से एंगेज्मेंट के बाद कुक्कू की पत्नी मधू  के गाना गाने पर कमलेश बाबू ने स्टूल को तबला बना कर अपनी भतीजी के साथ संगत की थी। तमाम कारणों से तमाम को रिजेक्ट करने के बावजूद अंजाम क्या रहा ?डॉ रामनाथ ने भी शालिनी से 28 गुण मिलते बताए थे जब कि हकीकत मे 14 थे अर्थात नहीं मिलते थे (1981 तक मै खुद नहीं मिलाता था)। अब एहसास होता है कि कमलेश बाबू ने कुक्कू के जरिये डॉ रामनाथ को खरीदवा दिया था। डॉ रामनाथ ने पैसों के लालच मे प्रोफेशन और मेरे साथ विश्वासघात किया था।डॉ शोभा दूसरे कारणों से रिजेक्ट कराती रहीं तो भी बाबू जी डॉ राम नाथ के पास ज्योतिषीय जानकारी लेने हेतु जन्मपत्रियाँ भेजते थे। शालिनी की जन्मपत्री को छोड़ कर सभी मे उन्होने गुण नहीं मिलते बताया था। चूंकि बउआ -बाबूजी अपनी पुत्री-दामाद पर विश्वास करते रहे इसीलिए उन्हें विश्वासघात करना आसान रहा।(सब बातों का खुलासा गत वर्ष उनके लखनऊ आने पर हुआ और इसी डर से वे हमारे लखनऊ शिफ्ट करने का विरोध करते रहे थे)।

क्रमशः …….. 

 
 
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