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Monthly Archives: May 2012

आगरा/1994 -95 /भाग-19

….. जारी…..

07 नवंबर को टूंडला उतर कर वहाँ से टैक्सियाँ करके कमला नगर घर पर पहुंचे। सभी लोग अंदर प्रवेश कर गए और पूनम दरवाजे पर खड़ी रह गई ,मुझे सारा घर -ताले वगैरह खोलना था,यशवन्त उस समय साढ़े ग्यारह वर्ष का था उसकी उतनी बुद्धि काम न की और पूनम के साथ मात्र डॉ साहिबा की दोनों पुत्रियाँ ही खड़ी रहीं। पूरे घर के ताले खोलने के बाद मै ही पूनम को अंदर लेकर आया। क्या गुरुशरण या कमलेश बाबू /डॉ शोभा जो पटना के होटल मे बाबूजी की भूमिका अदा करना चाहते थे घर पर पूनम को अंदर आने को नहीं कह सकते थे?वहाँ तो गुरुशरण कह रहे थे छोटी बहन माँ के समान होती है (यह तो सुना था कि,बड़ी भाभी को माँ का दर्जा दे देते हैं परंतु छोटी बहन का माँ के समान होना नई चालाकी की बात थी),पूछने पर डॉ साहिबा का जवाब था घर तो उनका है हम तो अतिथि हैं वह वहाँ क्यों खड़ी रहीं?

पूनम ने झाड़ू मुझे न लगाने दी और खुद सारे घर की झाड़ू लगाई। मैंने कुछ समय के लिए पड़ौस के लोगों के यहाँ काम कर रही महिलाओं को काम पर रखने की कोशिश की थी किन्तु उन लोगों ने किसी को आने नहीं दिया था। जाने से पहले डॉ साहिबा ने अपनी पुत्रियों से झाड़ू लगवा दी थी परंतु अब जिसका घर था वह आ गई तो अब वही लगाए। बड़ी विषम परिस्थिति थी घर आने पर स्वागत-सत्कार के स्थान पर पूनम को खुद झाड-बुहार करनी पड़ी। सामने वाले जैन साहब के घर मै बर्तन दे गया था और उनकी पत्नी ने दूध लेकर गरम करके रखा हुआ था हमारे आते ही सौंप दिया था। गुरुशरण,अशोक वगैरह के दिखावे के लिए डॉ साहिबा ने अपनी पुत्रियों से चाय बनवा दी थी। उन लोगों के जाने के बाद मैने चावल बीन कर तहारी सबके लिए बना दी थी। शाम से पूनम ने मुझसे सब चीज़ें  पूछ-पूछ  कर खाना बनाया। उनका घर जो था ,ज़िम्मेदारी उनकी जो थी सो उन्होने बखूबी निबाही।

12 नवंबर को परिचित लोगों को चाय पार्टी पर बुलाने का कार्यक्रम पहले से तय था किन्तु दयाल लाज मे बालाघाटी इंजीनियर साहब की प्रेरणा पर  बाबू जी साहब द्वारा ट्रेन बदलवाने से प्रकुपित डॉ शोभा को चार दिन मे लौटना था अतः आस-पास की महिलाओं को 08 तारीख को उनके सामने चाय पार्टी पर  बुलवा दिया सबको कहने यशवन्त गया ।

09 नवंबर की सुबह जब डॉ शोभा का परिवार झांसी लौटने लगा तो पूनम ने उनकी बेटियों को मुझसे रु 250/-  – 250/- दिलवा दिये। इसी बात पर बिफर कर डॉ शोभा और कमलेश बाबू झगड  पड़े और बेटियों के रुपए समेत पटना मे खुशी-खुशी माँ जी के हाथों ग्रहण वस्त्र  व चांदी का सिक्का आदि पटक कर चले गए।

डॉ शोभा की बड़ी बेटी (जो अब जयपुर मे है)को वस्त्र भेंट करती माँ जी 

डॉ शोभा की छोटी बेटी (जो अब पूना मे है और ब्लागर्स के प्रोफाईल चेक कर करके मेरे विरुद्ध भड़काती रहती है ) को वस्त्र भेंट करती माँ जी 

डॉ शोभा और अशोक की पत्नी को माँ जी ने वस्त्र भेंट किए तुरंत बाद का फोटो 

बाए से दायें-अकड़ू खाँ गुरुदेवशरण माथुर, हँसते हुये कामरेड किशन बाबू श्रीवास्तव,अशोक  और उनका पुत्र अंकित  माँ जी से वस्त्र प्राप्त करने बाद  उनके साथ बैठे हैं हेल्थ विभाग वाले चाचा जी साहब 

सभी फोटो कमलेश बाबू के खींचे हुये हैं ,मैंने केमरा उनको सौंपा हुआ था अतः उनका अपना फोटो वस्त्र भेंट लेते  समय का खिच नहीं सका। एक लंबे समय तक डॉ शोभा ने पत्राचार भी बंद रखा। बाद मे ज्ञात हुआ की अकड़ कर स्टेशन पहुँचते ही डॉ साहिबा के पैर की एडी मे मोच आ गई थी। सफर मे  हंसी खुशी आना-जाना चाहिए। इसके विपरीत डॉ साहिबा और असिस्टेंट फोरमेन साहब ने बेवजह का तांडव खड़ा किया ,बदशुगनी की और खुद भी सजा भुगती।

क्रमशः….. 

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आगरा/1994 -95 /भाग-18

…. जारी …..

हालांकि मै सी पी आई मे न होकर सपा मे था किन्तु सी पी आई नेता कामरेड किशन बाबू श्रीवास्तव से घरेलू आधार पर आना-जाना था। डॉ शोभा /कमलेश बाबू के उपद्रवकारी रुख-रुझान को देखते हुये मैंने पूनम के पिताजी से निवेदन किया था कि यदि पटना मे कोई दूसरा आपसे प्रोग्राम मे कोई तबदीली कराना चाहे तो आप का .किशन बाबू के अलावा किसी की बात न स्वीकार करें। सेंट्रल बैंक से रिटायर्ड बाबूजी के एक भांजे गुरुदेव शरण माथुर भी अक्सर घर आते रहते थे ले जाने की टीम मे वह भी शामिल थे। एन वक्त पर वह अपनी श्रीमतीजी को भी शामिल करना चाहते थे जिनकी मौसेरी बहन( के जी मेडिकल हाल वाले की बेटी ) ज्योति हैं। मैंने उनको भी शामिल नहीं किया और यह भी ठीक ही किया क्योंकि बाद मे पता चला कि गुरुशरण के बहनोई राकेश तो शरद मोहन के मौसेरे भाई थे। यह साहब भी शरद मोहन के भेदिया के तौर पर ही आते थे।

04 नवंबर को टूंडला से मगध एक्स्प्रेस पकड़ने हेतु प्रस्थान करना था ,08 बजे रात्रि तक घर छोड़ देना था उसी के अनुरूप डॉ शोभा और अशोक (बउआ के फूफा जी की बेटी सीता मौसी का बड़ा बेटा )को सूचित किया था ;कामरेड किशन बाबू समेत सभी यथोचित समय से पहुँच गए थे। रात का खाना और ट्रेन हेतु नाश्ता मैंने हलवाई से बनवा लिया था और डॉ शोभा के सुपुर्द कर दिया था । खाना तो डॉ साहिबा ने सब को खिला दिया था किन्तु नाश्ता जैसा का तैसा रखा रहा गाड़ी पटना काफी लेट पहुँचने के बावजूद किसी को नहीं दिया।

05 नवंबर को पटना जंक्शन  पर पूनम के भाई,चचेरे भाई और चाचा गण उपस्थित थे। सबसे परिचय ई ओ साहब (पूनम के ज्येष्ठ भ्राता) ने कराया। हेल्थ विभाग वाले उनके चाचा के पुत्र कारें ड्राईव कर रहे थे उनसे परिचय तब कराया जब ठहराने के होटल पहुँच गए। वहाँ स्नान करने के बाद चाय बिस्कुट हुआ। बालाघाट वाले सीनियर मेनेजर साहब ने नाश्ते हेतु आलू के पराठों का आर्डर दिया था लेकिन विलंब के कारण फिर केनसिल कर दिया। कुछ लोग गोल घर घूमने गए किन्तु कमलेश बाबू ने यशवन्त को वहाँ नहीं चढ़ने दिया। मै घूमना-फिरना पसंद न होने के कारण गया नहीं था।


आर्यसमाज पटना मे ही दिन का खाना भी खिलवाया गया जो वहाँ के घर वालों के लिए बना था और अच्छा था। मुहूर्त का वक्त हेल्थ विभाग वाले चाचा के इंतज़ार मे गुजार दिया गया और इल्जाम गाड़ी लेट होने पर लगाया गया। गाड़ी भी उन्हीं के कहने पर बदली गई थी फिर भी इल्जाम हम पर थोप दिया यह भी नहीं सोचा कि  सिर्फ मेरा नहीं खुद उनकी बेटी के भविष्य का भी प्रश्न है। पुरोहित ने जब हमारी ओर के किसी बड़े से हवन मे आहुती दिलवाने को कहा तब कमलेश बाबू ने गुरुशरण माथुर साहब को आगे कर दिया जबकि मै कामरेड किशन बाबू को आगे रखना चाहता था।

दिन की शादी के बावजूद लाईटिंग मे धन तबाह किया गया था रात को अपनी तरफ के लोगों को भोजन पर आमंत्रित किया था उनके दिखावे हेतु। सुना है भोजन रात का भी अच्छा था। दिन का खाना देर से खाने के कारण मुझे भूख नहीं थी उस पर पूनम की देहरादून वाली चाची ने (जिन्होने डॉ अस्थाना को जासूस बना कर भिजवाया था)एक-एक  डिनर प्लेट मे सब कुछ अगड़म-बगड़म कचरे की भांति भर कर मुझे व पूनम को थमा दिया था। जब खुद पूनम ने ही न खा कर प्लेट नीचे रख दी तब बिन भूख के मै कहाँ ठूँसता?इस प्रकार अन्न की बरबादी होते देख मन खिन्न हो गया। दिन मे फेरों के बाद भी पूनम की माता जी अपने लोगों के पैर छूने का आदेश दे रही थीं जबकि हम लोगों के रिवाज मे ऐसा नहीं है तब डॉ शोभा की चुप्पी पर भी मन खिन्न हो गया था। रीति-रिवाज पर चर्चा करने की बजाए वे लोग आगरा आने पर आलतू-फालतू बातें ही करते रहे थे। ऐन मौके पर फजीहत खड़ी कर रहे थे। मेरे ज्योतिषीय परामर्श को ठुकरा कर वे लोग 25 सितंबर प्रतिपदा के दिन पटना से चले थे नतीजतन लौट कर जब 29 सितंबर को पटना पहुंचे तो उन लोगों का स्कूटर रिक्शा आर ब्लाक के पास पलट गया था जिसमे सभी को चोटें आई थीं और इस घटना को अब बताया था पत्र मे सूचित नहीं किया था। इस घटना को आधार बना कर भी बालाघाट वाले मेनेजर साहब ने अपने चाचा-चाची के सहयोग से केनसिल कराने का भरसक प्रयास किया था किन्तु पूनम की दादी जी केनसिल नहीं करवाना चाहती थीं अतः किसी की न चल सकी।

रात को होटल चले गए । अगले दिन, दिन का खाना  घर पर  था । घर काफी बड़ा है वहीं एक दिन पूर्व का कार्यक्रम भी रखते तो काफी धन बर्बाद होने से बचा सकते थे। रात को गुरुदेवशरण ,कमलेश बाबू और डॉ शोभा के बीच क्या खिचरी पकी कि,गुरुदेवशरण ने पूनम के पिताजी से पूनम को होटल भेज कर कोई रस्म करवाने को कहा। अजीब बात थी जब आर्यसमाज विधि -वेदिक पद्धती अपनाई थी तो दक़ियानूसी रस्म का सवाल कहाँ था?और फिर 1981 मे मेरे वक्त और 1988 मे अजय की शादी के वक्त खुद बाबूजी ने वह रसमे नहीं की थीं तो अब उनके न रहने पर उनके स्थान पर गुरुशरण या कमलेश बाबू कैसे उन रस्मों को कर सकते थे?परंतु पूनम के पिताजी पर तो कमलेश बाबू का ऐसा जादू चढ़ा था कि वह बोले कि वह ठीक कह रहे हैं। बड़ी मुश्किल से मैंने कामरेड किशन बाबू की मदद से उन्हें बेमतलब की कुराफ़ात न करने पर राज़ी किया। मै पहले रेजिस्टर्ड पत्र मे लिखित मे कह चुका था कि कोई भी परिवर्तन मेरे या कामरेड किशन बाबू की जानकारी बगैर नहीं होगा परंतु उनकी बुद्धि शायद कमलेश बाबू ने उन्हें टोटके की सिगरेट पिला कर जाम कर दी थी। बात न चल पाने से रुष्ट होकर गुरुदेवशरण अपने मौसिया श्वसुर साहब के घर पटना सिटी खाने चले गए और इनके खाने का बहिष्कार कर दिया। घर पर खाना चलताऊ था जो पूनम के चाचाओं की पसंद का था और सुधा डेरी का खट्टा-मीठा दही भी एक चाचा का करिश्मा था जो उनके अपने घर वालों को नसीब भी न हुआ।

पहले उन लोगों ने तय किया था कि सब को होटल भेज देंगे और वहाँ से लौटने की ट्रेन पर बैठा देंगे। फिर प्रोग्राम चेंज करके होटल से सबका सामान घर मँगवा लिया और घर से विदा करने का निर्णय हुआ। गुरुशरण अड़े थे कि वह होटल से ही जाएँगे जबकि ये लोग होटल खाली करना चाहते थे। एक बार फिर कामरेड किशन बाबू को संकटमोचक बना कर उनके पास भेजा जो उन्हें सामान समेत घर पर लाये। पूनम के पिताजी गुरुशरण की खुशामद दर खुशामद करें कि खाना खा लें या कम से कम एक रसगुल्ला खा लें और वह आड़े -तिरछे मटकते नो-नो करते रहे।  अंततः मुझे  ई ओ साहब से कहना पड़ा कि अपने पिताजी को समझाएँ  कि अड़ियल टट्टू की खुशामद न करे। तब जा कर वह ड्रामा बंद हुआ।

इन लोगों ने रात के खाने के पेकेट हर व्यक्ति के लिए बना कर डॉ शोभा को सौंप दिये थे और मिठाई एकमुश्त दे  दी थी। ट्रेन मे डॉ शोभा ने सबको खाने के पेकेट पकड़ा दिये और मिठाई किसी को न दी। हर पेकेट मे आठ- आठ पूरियाँ और दो-दो साबुत बेंगन भी थे। अधिकांश ने खाना फेंका। खाना पूनम की सबसे छोटी चाची ने पेक किया था । छोटा-खोटा का सूत्र यहाँ भी लागू हुआ। कामरेड किशन बाबू मुगल सराय पर उतर गए उन्हें वाराणासी कुछ काम था। बाद मे उनकी बीमार पत्नी कामरेड मंजू श्रीवास्तव ने बताया था कि स्टेशन पर खाना किसी गरीब को देकर किशन बाबू ने स्टेशन के बाहर मिठाई खरीद कर खाई तब जाकर उनकी तबीयत ठीक हुई। जो मिठाई रास्ते के लिए दी गई थी यदि डॉ शोभा सबको दे देती तो यह शिकायत न  सुननी पड़ती।

स्टेशन रवाना होने से पूर्व पूनम की माँ जी ने मुझसे कहा कि आइये आपको अपनी सासू माँ से भी मिलवा दें। वह पूनम व मुझे लेकर दादी जी जो बीमार थीं और बिस्तर पर थी के पास ले गई। सम्पूर्ण परिवार मे वयोवृद्ध दादी जी के व्यवहार को ही अच्छा कहा जा सकता है। वही आत्मीयता से बोलीं। पूनम को भी अच्छी सीख दी।वस्तुतः बचपन मे पूनम अपनी दादी  जी के पास माँ-पिता को छोड़ अकेले रही भी हैं  इसलिए भी वह विशेष मानती रही होंगी।

क्रमशः ….. 

 

आगरा/1994 -95 /भाग-17

…. जारी….

इन लोगों के आने से लगभग एक सप्ताह पहले पड़ौस वाले शर्माजी( जिन्होने मेरी माता जी के निधन के बाद ऊधम किया था और जिन्होने ही मथुरा वाले माथुर साहब को मेरे मकान की बाबत भ्रामक सूचना दी थी) के एक रिश्तेदार जो अपने श्वसुर साहब के रेजिस्ट्रेशन पर मेडिकल प्रेक्टिस करते थे मेरे घर आए और सवाल उठाया कि मैंने उनके चचिया श्वसुर डॉ रामनाथ से क्यों संपर्क तोड़ा? उनका दबाव था कि मुझे पुनः उनसे मेल करना चाहिए। अंत मे उन्होने धमकी  दी -“माथुर साहब पैसे मे बहुत ताकत होती है हम पैसे के दम पर आपको झुका ही लेंगे। “मैंने उन्हें उत्तर दिया-” मिस्टर उपाध्याय पैसे के दम पर आप गर्दन तो  कटवा सकते हैं पर झुकवा नहीं सकते और मै तो पैसे वालों को जूते की ठोकर पर रखता हूँ। “यह सुन कर वह दुम दबा कर भाग गए। हालांकि 2007 मे उनका बड़ा बेटा मेरे घर किसी कार्य से आया तो मैंने बच्चा समझ कर उसका कार्य कर दिया।

इसके दो दिन बाद हींग की मंडी काम पर जाते समय कमला नगर पुलिस चौकी के दरोगा ने रेडियो मार्केट के निकट अपनी मोटर साइकिल से मेरी मोपेड़ मे टक्कर दी थी जिस कारण सीधे पैर के घुटने मे मोटर साईकिल का लेग गार्ड रगड़ने से हल्का दर्द भी हो गया था। परंतु मैंने न तो यशवन्त को इसका एहसास होने दिया जो मौके पर साथ ही था , न ही डॉ शोभा आदि से कहा और पूनम के घर वालों से तो कहने का कोई प्रश्न ही न था।

ऐसे माहौल के बीच डॉ शोभा और उनके पति कमलेश बाबू एक अलग वितंडा खड़ा कर गए थे। अतः उनके रोष को कम करने हेतु डॉ शोभा को पूनम के वास्ते कुछ (चेनऔर अंगूठी),साड़ी वगैरह खरीदने को कह दिया जिसका पैसा शायद उन्होने बाद मे लिया,एम ओ से भेजने को मना कर दिया था। बाकी पाँच साड़ी -सेट और शाल मैंने खुद ही किनारी बाज़ार से खरीद लिया था। पूनम के पिताजी की ख़्वाहिश के मुताबिक अपने लिए भी एक गरम सूट का कपड़ा खरीद लिया था। डॉ शोभा झांसी मे बाज़ार अपने साथ (कमलेश बाबू के  BHEL के साथी की पत्नी) किन्ही मंजू श्रीवास्तव को ले गई होंगी उन्होने डॉ शोभा को भड़काया कि यदि उन्हें पटना मे ले चला जाये तो वह भोजपुरी मे उन लोगों से फरमाईश करेंगी। उनके अनुसार पूनम के भाई साहब के कोई डिमांड?पूछने पर मना करके मैंने गलती की थी। ऐसा ही हमारे दूर के रिश्ते की एक भुआ ने भी कहा था उनसे तो मैंने नहीं परंतु डॉ शोभा से कहा था कि मै अपने साथ किसी भिकारिन को नहीं ले जा सकता। इससे डॉ शोभा और कमलेश बाबू और अधिक चिढ़ गए। एक बार तो उन्होने खुद भी न चलने की धमकी का पत्र भेज दिया था। हालांकि कई वर्षों के  बाद मे उन मंजू श्रीवास्तव से डॉ शोभा का झगड़ा हो गया और बोल-चाल भी बंद हो  गई। वस्तुतः डॉ शोभा के बड़े दामाद इंजीनियर नहीं हैं और मंजू श्रीवास्तव को इंजीनियर दामाद मिल गया था। मन-मुटाव के लिए यही मुद्दा काफी था।

उधर आर्यसमाज के वह पुरोहित जी जो बाबूजी और बउआ के निधन के बाद शुद्धि हवन कराने आए थे और उसके बाद से यदा-कदा यों ही आते रहते थे भी पटना चलने के इच्छुक थे। मैंने उन्हें भी स्पष्ट मना कर दिया था और ठीक ही किया क्योंकि बाद मे पता चला था कि वह शरद मोहन के रेलवे के साथी रमेश चंद्र आर्य के इशारे पर एक भेदिया के रूप मे आते थे।

कमलेश बाबू के सामने पूनम के पिताजी ने काफी ज़ोर देकर कहा था कि जब और कुछ नहीं ले रहे हैं तो वह पटना से ग्यारह हजार का ड्राफ्ट भेजेंगे उसे स्वीकार कर लूँ। उन्होने हमलोगों के आने-जाने के टिकट का व्यय भी खुद करने की बात कही थी। चूंकि लौटने के टिकट तब आगरा से नहीं मिले अतः वहाँ उन्हें लेने पड़े और इस प्रकार उस व्यय रु 2200/- को काट कर नौ हजार का ड्राफ्ट उन्होने भेज दिया था। पूनम के आने के बाद वह पैसा मैंने पूनम के सुपुर्द कर दिया था।

क्रमशः………. 

 

आगरा/1994 -95 /भाग-16

….. जारी……

लेकिन सहाय साहब को उनके एक और भाई जो वहाँ हेल्थ विभाग मे अधिकारी थे ने उनसे कह दिया कि,माथुर तो भंगी होते हैं जबकि उन्हीं की पत्नी ने अपने जेठ साहब को समझाया कि वह गोरखपुर की होने के नाते जानती हैं कि यू पी मे माथुर कायस्थों का दर्जा तो उनके श्रीवास्तव लोगों से ऊपर होता है अतः वहम न करें।अपने भाइयों के विरोध के बीच सहाय साहब ने कनागत के बाद की पड़वा 25 सितंबर को पटना से प्रस्थान किया और 26 को आगरा पहुँच कर ‘दयाल लाज’ मे विश्राम किया। शाम को कमला नगर मे डॉ अस्थाना से मिलने आए किन्तु पास ही हमारा घर  होते हुये भी आने की ज़रूरत नहीं समझी।

जब अपनी माता जी के कारण उन्होने पत्राचार स्थगित रखा था तब डॉ अस्थाना कई -कई बार मेरे घर आए और उन्होने कायस्थ होने के आधार पर परस्पर मेल करने की इच्छा व्यक्त की,अतः हम भी उनके घर गए। चूंकि सहाय साहब की ढील की कोई सूचना उस वक्त मेरे पास भी न थी तो डॉ अस्थाना ने उन पर आरोप लगाया कि,”सहाय साहब डबल माईंडेड हैं”और अपनी ओर से तीन अलग-अलग अधिक उम्र की माथुर लड़कियों का रेफरेंस दिया। इनमे अपने प्रिंसिपल की बेटी से वह मुझे रिश्ता करने हेतु ज़ोर डालते रहे। उनसे भी मैंने यही कहा कि मै खुद तो पुनर्विवाह का इच्छुक नहीं था किन्तु बाबूजी ने सहाय साहब से बात चलाई थी अतः जारी रखे हूँ और उनके प्रस्तावों पर विचार करने मे असमर्थ हूँ।

सहाय साहब और उनके ज्येष्ठ पुत्र का डॉ अस्थाना ने स्वागत नहीं किया और चाय भी काफी देर मे पिलाई। बल्कि उलाहना और दे दिया कि उनसे एंक्वायरी कराने के बावजूद उनको गतिविधियों की कोई सूचना तक न दी। सहाय साहब ने उन्हें यह भी न बताया कि अगले दिन वह अपनी बेटी की एंगेजमेंट करने जा रहे हैं। मैंने बहन शोभा और उनके परिवार को झांसी से बुलवा लिया था वे लोग 26 तारीख को आ चुके थे। (तब उस वक्त तक उन लोगों के हमारे विरुद्ध साजिश मे शामिल होने की हमे भनक तक न थी ,अतः उनकी किसी गतिविधि पर किसी प्रकार का शक नहीं किया था)।

27 तारीख को लगभग 10 बजे सहाय साहब और उनके ज्येष्ठ पुत्र घर पर आए और एक बजे दयाल लाज मे आने का निमंत्रण दे गए और वहीं रस्म करने की बात कही। उन्होने हाथ को मुंह की ओर ले जाकर कहा था कि जब आएंगे तो कुछ होगा । इसका मतलब कमलेश बाबू ने निकाला कि जब एक बजे बुला रहे हैं तो खाना भी खिलाएँगे। चूंकि उन्होने खाना खिलाने की बात नहीं कही थी अतः मै चाहता था कि घर से खाना खाकर चलें। किन्तु कमलेश बाबू ने मेरी बात नहीं चलने दी जिसका नतीजा यह हुआ कि उनकी छोटी लड़कियों समेत यशवन्त और हम तीन बड़े लोग भी दिन भर बेवजह भूखे रह गए। वहाँ लाज मे मिठाई,बिस्कुट,दालमोंठ और फल का ही नाश्ता था। हम लोग जो फल और मिठाई ले गए थे वे शोभा की मार्फत पूनम को भेंट किए गए। पूनम की माता जी ने मुझे रु 250/- और कमलेश बाबू को भी रु 250/- भेंट किए। शोभा उनकी दोनों लड़कियों और यशवन्त को भी रुपए दिये। लाज मे खाने का बंदोबस्त उनकी ओर से नहीं था ,खुद वे लोग ढाबे से लाकर लाज मे खाते थे।

मैंने रात के खाने पर उन्हें घर पर आमंत्रित किया जिसे थोड़ा नखरे दिखा कर उन्होने स्वीकार कर लिया। मेरा दृष्टिकोण था कि बावजूद इसके कि एंगेजमेंट की रस्म हो गई है ,पूनम घर पर आकर मकान आदि की दशा अपनी आँखों से देख लें और यदि कोई हिचक हो तो अभी ही इंकार कर दें बजाए इसके कि बाद मे परेशानी अनुभव हो। सुबह जब सहाय साहब घर आए थे तो उन्होने शालिनी के घर से ताल्लुकात की बाबत पूछा था और मैंने साफ-साफ कह दिया था कि हमारे उन लोगों से कोई ताल्लुक नहीं हैं। शाम को घर पर पूनम की माता जी ने भी वही बात दोहराई थी तो उनको भी यही बता दिया था कि उन लोगों से हमारा कोई संबंध नहीं है।

उस समय पता नहीं चला किन्तु बाद मे ज्ञात हुआ कि कमलेश बाबू ने पूनम से उनके छोटे भाई जो बालाघाट मे इंजीनियर हैं की उपस्थिती मे कहा था कि वे लोग तो चले जाएँगे वह कुल तीन लोग रहेंगे ,खूब सोच लें,समझ लें। यह तो पहले ही स्पष्ट था कि अतिथि तो चले ही जाते है ;मेरे और यशवन्त के अतिरिक्त पूनम को ही रहना था। किन्तु उनके निहितार्थ को समझते हुये पूनम के छोटे भाई ने अपने बड़े भाई के पटना लौट जाने के बाद अपने पिता पर एंगेजमेंट तोड़ देने का ज़बरदस्त दबाव बनाया था। और इसी चक्कर मे वे लोग खाने पर बहुत देर से पहुंचे थे। दरअसल एंगेजमेंट के बाद पूनम के बड़े भाई मेरे साथ हींग-की मंडी मेरी मोपेड़ से अपने लिए जूते की जोड़ी खरीदने गए थे,मैंने कमलेश बाबू को रु 100/-अतिरिक्त ज़रूरी चीजें खरीदने हेतु दे दिये थे (सारा सामान घर मे था ही )। जूते लेकर लौटने पर न्यू आगरा चौराहे से वह लाज की ओर पैदल चले गए और मै घर लौट आया था।

खाना कमलेश बाबू के सुपरवीजन मे शोभा और उनकी बेटियों ने सहयोग देकर बनाया था। मटर पनीर की सब्जी जो मुझे पसंद नहीं है कमलेश बाबू ने चखने को दी जिसमे भयंकर नमक झुंखा  हुआ था। तेज नमक वैसे भी मुझे नहीं अच्छा लगता है मैंने वह सब्जी खाने मे न परोसने का सुझाव दिया। कमलेश बाबू ने खुद चखा और बोले लगता है चारों जनों ने अलग-अलग नमक डाल दिया है। वह बाज़ार मे हलवाई से दही लेकर आए और सब्जी मे डाल कर पका दिया BHEL,झांसी के असिस्टेंट फोरमेन साहब का यह फार्मूला कारगर हो गया। खाना पसंद किया गया और कमलेश बाबू ने काफी तारीफ़ें बटोरीं। उनका जादू पूनम के पिताजी के सिर चढ़ कर बोल रहा था और उसी रौ मे उन्होने मुझसे कहा कि मै छोटे बहनोई को अपना गार्जियन मानूँ।

चूंकि मै शादी आर्यसमाज की साधारण वेदिक विधि से करने बाबत बता चुका था और पटना आर्यसमाज ने एक शपथ -पत्र मांगा था अतः पूनम के पिताजी ने मुझसे कहा कि 28 तारीख की शाम को मै उन्हें लाज मे बनवाकर दे जाऊ क्योंकि वे लोग 28 की रात की गाड़ी टूंडला से पकड़ेंगे। 28 को दिन मे दीवानी कचहरी से शपथ-पत्र बनवा लिया वहाँ से लाज पास मे थी लेकिन उन्होने शाम को बुलाया था अतः मै शाम को ही लेकर गया और उन्हें सौंप दिया। पूनम के बालाघाटी  इंजीनियर भाई ने प्रोग्राम मे तबदीली करने को अपने पिता श्री को राजी कर लिया था। हम आगरा से 04 नवंबर की दोपहर ‘तूफान एक्स्प्रेस’ से चल कर 05 की सुबह  06 बजे पहुंचना चाहते थे क्योंकि मुहूर्त दिन मे दो बजे का था। इंजीनियर बेटे के बहकावे मे पूनम के पिताजी ने मुझे टूंडला से रात 11 बजे ‘मगध एक्स्प्रेस’ से चलने को कहा जो वहाँ 05 को दिन के 11 बजे पहुंचाती ।

मुझसे गलती यह हुई कि जब सारा प्रोग्राम कमलेश बाबू की उपस्थिती मे तय हुआ और वह उन्हें गार्जियन बता रहे थे तो उनकी गैरहाजिरी मे प्रोग्राम बदलना स्वीकार क्यों किया?घर आने पर शोभा और कमलेश बाबू बिफर पड़े और ताना देने लगे अब गरज निकल गई तो वे लोग सगे हो गए हम शादी के वक्त अब एक सप्ताह नहीं सिर्फ चार दिन को आएंगे।

क्रमशः…. 

 

आगरा/1994 -95 /भाग-15

उन्हीं दिनो फीरोजाबाद मे ट्रेन एक्सीडेंट हो चुका था जिसके बाद पुलिस,पी ए सी और अराजक तत्वों ने मृत तथा घायल लोगों को लूटा था और सेना के गोली चलाने की धमकी पर ही यह लूट थमी थी। सोनिया गांधी के आशीर्वाद से गठित तिवारी कांग्रेस के अध्यक्ष पंडित नारायण दत्त तिवारी दुर्घटना स्थल का मुयाना कर गए थे । अतः प्रधानमंत्री नरसिंघा राओ साहब को भी23 जूलाई 1995 को  आना पड़ा। सड़कों पर आवागमन कुछ समय के लिए प्रतिबंधित था। अतः हींग-की-मंडी न जाकर, मथुरा गया और  रंग बिहारी माथुर साहब से शर्मा जी द्वारा बताई दास्तान की जानकारी लेने हेतु  संपर्क किया। वह तो बुला रहे ही थे। उनकी उस बेटी की बेटी से यशवन्त को मिल कर खुशी हुई कि बहन है परंतु माँ तो पटना वाली ही को मानना था अपने बाबा जी से वहाँ पत्र जो भिजवाया था। शर्मा जी की बातें बेदम और झूठ हैं उन्हें समझा दिया और आग्रह किया कि वह इस बाबत बिमला जीजी से ही सही जानकारी हासिल कर लें। उनकी पुत्री की बाबत कह दिया कि पटना मे सहाय साहब से चल रही बात तोड़ कर तो कोई विचार नहीं हो सकता क्योंकि वह वार्ता पिताजी शुरू करके गए हैं। लेकिन अगर सहाय साहब खुद ही पीछे हट जाते हैं तब उनके प्रस्ताव पर विचार कर सकते हैं।

मथुरा से लौटते-लौटते अंधेरा हो चुका था और सहाय साहब के ज्येष्ठ पुत्र कमला नगर/हींग-की-मंडी /कमलानगर के चक्कर काटते -काटते थक कर  परेशान होकर घर के बाहर के हिस्से मे नींबू के पेड़ के नीचे खड़े हुये थे। उन्होने कोई सूचना हमे नहीं दी थी। हम बेखबर थे तो परेशानी भी उन्हीं को हुई। उन्होने मुझसे पूछा कि शादी कब करना है तारीख दे दूँ। मैंने उन्हें पहले जन्मपत्री दिखाने को कहा उसके बाद गुण मिलने पर ही मुहूर्त का सवाल उठने की बात कही।वह अपनी बहन की जन्मपत्री लाये तो थे किन्तु दिखा नहीं रहे थे । उनके जन्मपत्री दिखाने के बाद भी मैंने कहा कि आप खुद  अकेले नहीं बल्कि अपनी बहन और माता-पिता की उपस्थिती  मे मुहूर्त की बात रखें। चाय यशवन्त ने बना दी थी और उसने मीठा बहुत तेज डाला था। बिस्कुट उन्होने मीठा होने के कारण नहीं लिया था अतः मैंने फीकी चाय अलग से बना दी। सुबह के आलू के पराँठे बचे रखे थे और कुछ ताजे सेंक कर मैंने उनसे भोजन करने को कहा। उनके पास यशवन्त को छोड़ कर पीछे बाजार से दही ले आया था। उन्होने वही  हम लोगों के साथ खा लिया था। उनकी थकान को देखते हुये मैंने उनसे रात को घर पर रुक जाने को कहा तो बोले कि सामान दयाल लाज मे है वहाँ से लेकर टूंडला से ट्रेन पकड़ कर निकलेंगे। लेकिन बाद मे पता चला कि वह तबियत गड़बड़ाने के कारण रात को लाज मे ही रुक कर अगले दिन सुबह की ट्रेन से गए।

वस्तुतः जिन दिनों हमारे बाबूजी नहीं रहे थे उधर उसी समय सहाय साहब की वयोवृद्ध माताजी को गिरने से कूल्हे मे फ्रेक्चर हो गया था। उनके कुछ ठीक होने तक उन्हें पत्राचार के लिए रुकना था और हम भी फिर बउआ के न रहने तथा उसके बाद लोगों द्वारा उठाए ऊताचाल से त्रस्त थे। उनके घर मे फोन था लेकिन हमे दूसरों के घर से अटेण्ड और खुद  PCO से करना होता था अतः जल्दी-जल्दी संपर्क न हो पाता था। इसी वजह से उस दिन ‘पूनम’के भाई साहब को हमारे न मिलने से परेशानी उठानी पड़ी। उनके पटना पहुँच कर सब बातें बताने के बाद सहाय साहब ने रेजिस्टर्ड पत्र भेज कर उन लोगों के आगरा हमसे मिलने आने का समय पूछा। उनकी हिदायत थी कि उन्हें पत्र मै भी रेजिस्टर्ड डाक से ही भेजूँ। मैंने उन्हें नवरात्र की दोज 26 सितंबर को पटना से चल कर 27 सितंबर को मुझसे संपर्क करने को लिख भेजा था। उन्होने पत्र द्वारा मुझे स्वीकृति भी भेज दी थी।

उनके देहरादून निवासी एक  छोटे भाई ने बीच मे हस्तक्षेप करके इस स्टेज पर हमारे बाबत अपने एक जासूस से एंक्वायरी कराने की बात उठा दी। उन्होने अपने पुत्र के आकर मिल जाने और खुद अपने आने की सूचना देने के बाद अपने छोटे भाई को एंक्वायरी की इजाजत दे दी। कमलनगर मे ही हमारे बी- ब्लाक के बगल वाले ई -ब्लाक निवासी डॉ एस सी अस्थाना साहब एक दिन देहरादून से अङ्ग्रेज़ी मे उनके नाम  भेजा गया गया एक पत्र लेकर आए और मुझे दिखा कर पूंछा कि इसका क्या जवाब दे दें?मैंने उन्हें उत्तर दिया कि वह मेरे बारे मे जो कुछ जानते हों सब सूचित कर दें। डॉ अस्थाना बोले वह मुझे बिलकुल नहीं जानते इसलिए मै जो बता दूँगा वही वह लिख देंगे। तब मैंने कहा कि जब वह मुझे नहीं जानते तो यही लिख कर भेज दें कि वह मेरे बारे मे कुछ नहीं जानते। बाद मे ज्ञात हुआ कि उन्होने यही लिख भेजा था कि वह विजय माथुर के बारे मे कुछ नहीं जानते। उनका संदेश देहरादून की मार्फत पटना सहाय साहब को मिल गया।

 
 
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