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सुख और दुःख ज्योतिष क़े आईने में (पुनर्प्र काशन)—विजय राज बली माथुर

सोमवार, 17 जनवरी 2011

सुख और दुःख ज्योतिष क़े आईने में

सुख और दुःख परस्पर विरोधी अवस्थाओं का भान कराने वाले शब्द हैं.वैसे यदि दुःख न हो तो सुख की अनुभूति या उसे प्राप्त करने की इच्छा भी नहीं हो सकती.मर्यादा पुरुषोत्तम राम व जानकी माता तथा योगीराज श्री कृष्ण को भी दुखों का सामना करना ही पड़ा था.यहाँ एक ऐसे शख्स का उल्लेख कर रहे हैं,जिन्हें एक ही ग्रह मंगल ने सुख और दुःख दोनों अलग-अलग प्रकार से प्रदान किये.ऐसा न केवल उनके जन्म-कालीन ग्रहों क़े आधार पर हुआ बल्कि,गोचर-कालीन मंगल की कुद्रष्टि ने भी उन्हें पीड़ित किया.

उनके जन्मांग में चतुर्थ भावस्थ मंगल उनको भूमि व वाहन लाभ दिलाने में पूर्ण समर्थ रहा है,उनके कई अपने निजी मकान हैं और कई उत्तम वाहनों क़े भी वह स्वामी हैं;जहाँ इतनी सुख-सुविधाएं उन्हें मंगल ग्रह क़े कारण मिल रही हैं-वहीं यही मंगल उन्हें पीड़ा देने में भी अग्रणी है.पत्नी भाव का स्वामी होकर सुख भाव में प्रबल शत्रु-ग्रह शुक्र क़े साथ मंगल की उपस्थिति ही उनकी पत्नी क़े स्वास्थ्य को क्षीण करने का कारण बनी है.विवाह क़े बाद लगातार उनकी पत्नी कुछ न कुछ रुग्ण रही हैं और लगभग ७ वर्ष पूर्व उन्हें बड़ा आपरेशन कराना पड़ा है.ऐसा मंगल क़े गोचर-कालीन प्रभाव और जातक क़े जन्मांग में स्थिति दोनों क़े फलस्वरूप घटित हुआ है.जातक को स्वंय २० जूलाई २००३ को दुर्घटना का शिकार होना पड़ा-पटना में रात्री पौने आठ क़े उपरान्त उनको बदमाशों ने किसी दूसरे क़े धोखे में गोली मार दी जो उनके पेट में घुस कर पीछे कमर से निकल गई.जातक को आपरेशन कराना पड़ा और लम्बे समय तक चिकित्सा-अवकाश पर रहना पड़ा.जातक क़े जन्मांग तथा गोचर काल में जब गोली उनको लगी दोनों स्थितियों में शनि उनके शत्रुओं क़े लिये संहारक स्थिति में था.शनि मंगल का प्रबल शत्रु भी है,अतः स्पष्ट है कि,शनि ने मंगल क़े आघात से जातक की प्राण-रक्षा की है,परन्तु ऊँची दुकान फींका पकवान वाले पं.जी ने जातक को शनि ग्रह घातक बताया था और गोली लगने का हेतु भी शनि को बताया था.जबकि अध्ययन काल में भी जातक वाहन दुर्घटना का शिकार मंगल क़े प्रकोप से हो चुके थे और तब भी उन्हें शनि ग्रह ने ही बचाया था.अन्ततः जातक ने मुझसे संपर्क किया और तब मैंने उन्हें समझाया कि उन्हें मंगल ग्रह की शांति करानी चाहिए तथा जो रत्न उन पं.जी ने पहनाया है उन्हें उतार देना चाहिए .जातक ने मेरे बताये अनुसार वैसा ही किया और राहत प्राप्त की.उनके घर का माहौल भी पहले की अपेक्षा ठीक हो गया.जातक क़े जन्मांग में सिर्फ मंगल का ही कोप नहीं था,वरन जहाँ वह तब निवास कर रहे थे उस सरकारी मकान में ईशान में रसोई-घर बना हुआ था.जातक और उनकी पत्नी दोनों ही ब्लड प्रेशर से ग्रसित थे और इस वस्तु-दोष ने भी उन्हें दुर्घटना का शिकार बनाया .उन्हें वास्तु-दोष क़े निराकरण हेतु भी सुझाव व उपाय दिये जिन्हें उन्होंने स्वीकार व अंगीकार किया तथा उसका लाभ भी उन्हें मिला और जो भय व कष्ट उन्हें सता रहे थे उनसे राहत मिल गई.यह जातक रसायन शास्त्र(केमिस्ट्री)में पी. एच.डी.हैं.अतः इन्हें हवन की वैज्ञानिक पद्धति से उपचार की बात तर्क सांगत लगी और उन्होंने उसका सहारा लेकर लाभ भी प्राप्त किया.परन्तु ऐसे इंजीनियर परिवारों से भी साबका पड़ा जिन्हें विज्ञान-सम्मत तर्क समझ में नहीं आते और वे उन उपायों को करने की बजाये पोंगा-पंडितों क़े बताये उल-जलूल उपायों को ही अपनाते हैं.एक इं.सा :अपने घर क़े वास्तु-दोष क़े कारण अपनी बाईपास सर्जरी करा चुके थे. उनके पहले किरायेदार की मौत इसी दोष क़े कारण हो गई,तीसरे किरायेदार क़े बड़े पुत्र का दुर्घटना में दुखांत हो गया,उनके दूसरे और चौथे किरायेदार दिवालिया हो गये.पांचवां किरायेदार एक फ्राड था जो कुछ दिन रह कर भाग गया.लेकिन इंजीनियरी क़े नशे में उन साहब को अपने मकान क़े वास्तु-दोषों का निराकरण करने की आवश्यकता नहीं है.एक और परिवार में तीन सदस्य इंजीनियर हैं यह भी एक आधुनिक परिवार है इनके ईशान में शौचालय और उत्तर में रसोई बनी हुई है.तमाम वास्तु दोष इन्हें परेशान तो कर रहे हैं परन्तु ये लोग इस तथ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं.वैज्ञानिक विधि क़े उपायों का भी उनकी निगाह में कोई महत्त्व नहीं है.इं दोषों का ही परिणाम था कि परिवार क़े मुखिया को हार्ट प्राब्लम का भी सामना करना पड़ा था और इसी परिवार में रहने वाले बालक को दो बार एक ही कक्षा में रुकना पड़ा और तीसरी बार प्रयास करना पड़ा.इस बालक को मेरे द्वारा जो उपाए बताये गये थे उन्हें इन लोगों ने नहीं माना और न ही अमल किया गया .इस बालक को भी मंगल ग्रह की शांति करने को कहा गया था,परन्तु साईंसदा परिवार ने वैज्ञानिक उपायों को ठुकरा दिया और इस प्रकार अपना ही अहित कर डाला.इस बुद्धि विपर्याय का कारण भी इस परिवार का वास्तु-दोष को ठुकरा कर उनका परिष्कार न करना ही है.जब ईशान में शौचालय होते हैं तो सबसे पहले बुद्धि ही भ्रष्ट होती है,उसके बाद धीरे-धीरे अन्य विकार जन्म लेते जाते है. वैसे ग्रहों ने धन-सम्पदा भी प्रदान की है जिसका वे दुरूपयोग ही करते हैं.एक अन्य परिवार जो धन-संपत्ति की दृष्टि से सम्पन्न है ऐसे निवास में रह रहा है जिसके नैरित्य(South West) में रसोई है और आग्नेय (South East) में शौचालय .इस परिवार क़े बच्चे व गृहणी रुग्ण चलते रहते हैं.परिवार क़े मुखिया उच्च शिक्षित ,उच्चाधिकारी और ठाकुर परिवार से सम्बंधित हैं.उन्होंने हमसे संपर्क किया ,उन्हें भी वैज्ञानिक विधि क़े उपाए बताये.उन्होंने सहर्ष समझा और स्वीकार ही नहीं किया वरन उन पर अमल भी शुरू कर दिया.वास्तु-दोष का निवारण तथा हवन-विधि से ग्रहों को शान्त कराया.स्वभाविक रूप से वैज्ञानिक उपायों क़े महत्त्व को समझा और सबसे पहले वास्तु-दोष का निरावरण कराया और लाभ उठाया.उनके विपरीत इंजीनियर सदस्यों वाले ठाकुर परिवार में वैज्ञानिक उपायों को दकियानूसी व बेकार का समझा गया,जिस कारण वे उनका लाभ उठाने से वंचित रहे.परिणाम स्वरूप बुद्धि-विभ्रम भी नहीं समझ सके-यही है ग्रहों का वैज्ञानिक खेल जो सुख और दुःख दोनों प्रदान कर रहा है.

सुख और दुःख -स्वास्थ्य क़े पैमाने से
सुख की इच्छा करने से ,सुख न पावे कोय.
तन की रक्षा करने से,दुःख भी सुखमय होय..

A Healthy Mind In a Healthy Body
विद्वानों क़े ये कथन निरर्थक नहीं हैं .हमारे यहाँ पहले एक प्रार्थना प्रचलित थी ‘जीवेम शरदः शतम’ जो अब विलुप्त प्राय हो गई है और यही कारण है कि अब हमारे यहाँ स्वस्थ मनुष्य नहीं हैं.किसी को कुछ तो किसी को कुछ समस्या परेशान किये हुये है.तेज जिन्दगी में खांन -पान की ओर किसी का ध्यान नहीं है और अधिकाँश रोग उदर संबंधी हैं जिनसे फिर और नयी-नयी बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं.एक प्रमुख समस्या है गैस बनने की जो घुटनों ,कमर,रीढ़ और यहाँ तक कि सिर दर्द का कारण भी बनती है. भोजन क़े उपरान्त ढाई- तीन मिनट की यदि कसरत कर ली जाये तो नियमित करने पर गैस रोग से मुक्ति मिल जाती है और गठिया रोग भी दूर भाग जाता है.इसमें भोजन क़े बाद और भोजन क़े मध्य जल न पीयें.भोजनोपरान्त घुटनों क़े बल इस प्रकार बैठें कि पंजों पर कूल्हे टिक जाएँ,कमर सीधी रखें दोनों हथेलियों को दोनों घुटनों पर उन्हें ढकते हुये टिकाएं .पानी भोजन क़े आधे घंटे बाद ही पियें.ऐसा करने पर जेलोसिल,गैसेक्स और गैस पिल्स सेवन करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.

अक्सर काम की अधिकता या अधिक बैठे रहने क़े कारण कमर में दर्द हो जाता है .कमर दर्द की कभी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए.इसके लिये छोटी सी कसरत दिन में कभी भी जब भोजन न किये हों अथवा भोजन किये हुये तीन -चार घंटे व्यतीत हो चुके हों तब ही करनी चाहिए .कमर सीधी करके दोनों पैर विपरीत दिशाओं में फैला लें.अब दायाँ हाथ फैला कर बायीं ओर तथा इसी प्रकार बायाँ हाथ फैला कर दायीं ओर ले जाएँ.
पांच -सात मिनट तक इस प्रक्रिया को दोहरायें.नियमित यह कसरत करने से कमर का दर्द स्वतः ठीक हो जाता है.शरीर में चुस्ती रहती है और आलस्य दूर होता है.परन्तु आवश्यकता है अपने शरीर पर ध्यान देने की,यह शरीर परमात्मा की अनुपम भेंट है और इसकी रक्षा करना भी परमात्मा की सेवा करने का ही अंग है.अतः तन की रक्षा करके दुःख को भी सुखमय बनाने का प्रयास करना चाहिए.

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श्रद्धांजली उसे जो 12 घंटे ही जीवित रहा

आज तीस वर्षों मे पहली बार उसे श्रद्धांजली देने हेतु 07 विशेष आहुतियों से हवन किया। मेरी श्रीमती जी (पूनम) का कहना था कि जब हम परिवार के निकटतम दिवंगत सदस्यों यथा-बाबूजी,बउआ,शालिनी हेतु हवन करते हैं तो हमे उस अनाम संतान हेतु भी हवन करना ही चाहिए। क्योंकि चाहे वह 12 घंटे ही जीवित रहा हो, था तो परिवार-खानदान का ही सदस्य। बात ठीक थी तो हमने 24 नवंबर 1982 की प्रातः 04 बजे जन्मे और उसी साँय 04 बजे दिवंगत बड़े पुत्र को पहली बार इस प्रकार स्मरण किया।

वह आत्मा जिसका संबंध हमसे रहा है अब चाहे जहां हो जिस अवस्था मे हो उसकी शांति व सद्गति हेतु हवन द्वारा दी आहूतियाँ तत्काल उस तक हमारी श्रद्धा को वायु के माध्यम से पहुंचा देती हैं।

उसके जन्म से पूर्व हमारी बउआ ने शालिनी की इच्छा के अनुरूप उनको उनकी माँ के पास टूंडला भेज दिया था। 24 नवंबर 1982 को प्रातः सात बजे उसके नानाजी आगरा आए और उसके जन्म तथा अस्वस्थता की सूचना दी। तत्काल उनके साथ बउआ व मैं टूंडला गए वहाँ के प्रसिद्ध चाईल्ड स्पेशलिस्ट को दिखाया। उन्होने चिंता न होने की बात कही थी। तीन बजे तक हम लोग वहाँ थे फिर आगरा लौट आए थे। शाम सात बजे पार्सल बाबू शरद मोहन माथुर यह संदेश लेकर आए कि "बच्चे की डेथ हो गई है"। पहले उनकी माता श्री कहती थीं कि शरद खुशखबरी लेकर ही हमारे घर आएगा। राजा-की-मंडी पर रोजाना ड्यूटी करने आने के बावजूद वह कभी अपनी बहन शालिनी से मिलने हेतु भी इससे पहले कभी नहीं आए थे।

रात मे मैं उनके साथ चला गया था। बउआ व बाबूजी को धक्का लगा था और वे सफर की स्थिति मे न थे। अगले दिन 25 तारीख को एक पंखे पर उसके पार्थिव शरीर को रख कर टूंडला मे ही दफना दिया। चूंकि मैं ही उसे अपने हाथों ले कर गया था इस पर मेरे माता-पिता का दृष्टिकोण था कि उन लोगों को मेरे द्वारा नहीं भिजवाना चाहिए था। जब लौट कर आ गए थे तब किसी प्रकार हिम्मत करके बउआ व बाबूजी भी पहुंचे । बाबूजी ने उसे बिलकुल भी न देखा था जिसका उन्हे मलाल रहा । बउआ ने तो गोद मे लिया भी था।

कुछ कारणों से उस बच्चे की जन्मपत्री का विश्लेषण अभी नहीं दे रहे हैं ,फिर कभी मौका लगा तब देंगे। लेकिन एक स्वप्न का ज़िक्र करना अभी ही मुनासिब समझता हूँ। उसके जन्म से लगभग दो माह पूर्व मैंने स्वप्न मे उस बच्चे को सफ़ेद कफन मे लिपटे देखा था। बउआ को बताया तो उन्होने कह दिया कि स्वप्न मे मुर्दा देखना शुभ होता है-स्वप्न शास्त्र का ऐसा ही दृष्टिकोण है भी। किन्तु मैंने तो जन्म से पूर्व बच्चे की स्थिति देखी थी और अक्सर बहुत बातों का मुझे पूर्वाभास होता रहा है अतः मुझे कुछ-कुछ खटका भी था जो सही ही निकला भी।

पहले शालिनी को मानसिक वेदना के भय से उसका स्मरण नहीं किया फिर इसलिए कि,उसके छोटे भाई यशवन्त को जिसने उसे देखा भी नहीं है कोई वेदना न हो। परंतु अब यह सोच कर पूनम का सुझाव स्वीकार कर लिया कि आने वाले कुछ वर्षों बाद जब यशवन्त हमे श्रद्धांजली देना चाहे तब अपने बड़े भाई को भी स्मरण मे रख सके अतः अभी अपने समय से ही उस अनाम संतान को श्रद्धांजली देना प्रारम्भ कर दिया है।

 

जब मैं खुद ज्योतिष विरोधी था

 

बाबू जी ने भुआ के कहने पर उनके किसी जानकार को हम सब कि,जन्मपत्रियाँ दिखाई होंगी। उन सज्जन ने मेरी जन्मपत्री देख कर कहा था कि यह बालक अपने पिता को 11 वर्ष की अवस्था मे गद्दी पर बैठा देगा। जब मैं 11वे वर्ष मे चल रहा था चीनी आक्रमण के दौरान  नवंबर 1962 मे बाबूजी का तबादला नान फेमिली स्टेशन-सिलीगुड़ी हो गया था। परिवार दो स्थानों पर रहने को बाध्य था अतः उस समय से मेरे मन मे ज्योतिष और ज्योतिषियों के प्रति काफी ‘कटु’ नफरत थी। बड़ों के साथ-साथ मंदिर जाना मजबूरी थी परंतु मन मे मुझे वह ‘ढोंग’ नापसंद था। इसका एक कारण तो पाँच वर्ष की अवस्था मे लखनऊ के अलीगंज मंदिर मे भीड़-भड़क्का के बीच कुचलते-कुचलते बचने की घटना थी और दूसरे मूर्तियों के दलाल -पंडितों का दुर्व्यवहार।वृन्दावन के बाँके बिहारी मंदिर से दर्शन करके लौटते ही बाबूजी का तबादला सिलीगुड़ी होने की सूचना मिली थी। यह भी मंदिरों के ‘भगवानवाद’ पर अविश्वास का प्रबल कारण था। 
http://vidrohiswar.blogspot.in/2010/09/blog-post_10.html

जून 1975 मे एमर्जेंसी के दौरान मेरठ की नौकरी छूटने के बाद सितंबर 1975 मे  आगरा मे होटल मुगल मे दूसरी नौकरी मिल गई थी। 14 सितंबर को लिखित ‘टेस्ट’ हुआ था जिसमे 20 प्रतिभागी शामिल हुये थे और उनमे से हम चार लोगों का 20 सितंबर को साक्षात्कार हुआ था। साक्षात्कार मे मेरे अतिरिक्त सुदीप्तों मित्रा,विनोद श्रीवास्तव और कोई सक्सेना साहब शामिल थे। मेरे और मित्रा के नियुक्त हो जाने के बाद विनोद श्रीवास्तव यूं ही हम लोगों से मिलने आते रहते थे। अतः उन से हमदर्दी हो गई थी। मेन कंट्रेक्टर लूथरा साहब ने अपने आफिस के लिए विश्वस्त लेखा सहायक बताने को मुझसे कहा और मैंने विनोद श्रीवास्तव का नाम सुझा दिया और वह वहाँ नियुक्त हो गए। इस प्रकार प्रतिदिन अनेकों बार हम लोग परस्पर संपर्क मे रहते थे।

लूथरा साहब के एक विश्वस्त सुपरवाईजर थे-अमर सिंह जी जो बार्डर सिक्योरिटी फोर्स के रिटायर्ड़ सब इंस्पेक्टर थे। वह हस्तरेखा एवं ज्योतिष मे पारंगत थे। विनोद उनसे सलाह मशविरा करते रहते थे। चूंकि मैं तब ज्योतिष का घोर विरोधी था अतः मैं विनोद की इस बात के लिए कड़ी आलोचना करता था। एक दिन सुदीप्तों और विनोद ने ज़बरदस्ती मेरा हाथ अमर सिंह जी को देखने का आग्रह किया जो कुछ उन्होने बताया पिछला सही था । अगले के बारे मे उन्होने कहा कि अधिक से अधिक  कुल 15 वर्ष नौकरी करोगे बाकी ‘दिमाग से खाओगे’। 26 वर्ष की उम्र मे अपने मकान मे पहुँच जाओगे और 43 वर्ष की उम्र मे उसके मालिक बन जाओगे 48 वर्ष की उम्र मे ‘राजदूत स्तर’ का दर्जा मिलेगा।उस समय मुझे रु 275/-मासिक वेतन मिलता था बचत कुछ न थी ,रिश्वत/कमीशन लेता न था मकान कहाँ से बनेगा  मुझे यह सब  हास्यास्पद लगा था और मैंने अपना ऐतराज भी उनको जता दिया था,जिस पर हँसते हुये उन्होने कहा था कि आज तुम मुझ पर हंस रहे हो आने वाले समय मे तुम खुद ही सबको उनका भविष्य समझाओगे। प्रोजेक्ट पूर्ण होने पर कंट्रेक्टर के साथ अमर सिंह जी दिल्ली चले गए। लूथरा साहब ने ‘अमर सिंह पामिस्ट एंड एस्ट्रोलाजर’ नाम से उनका आफिस खुलवा दिया और अपना परामर्शदाता बना कर अपने निवास पर ही उनको रहने का स्थान प्रदान कर दिया। 
सुदीपतो मित्रा कहीं से कुछ ज्योतिष की किताबें लेकर आए और मुझे पढ़ने को दी ,चूंकि किताबें पढ़ने का तो मैं शौकीन था हीं सबको पढ़ा एवं कुछ खास-खास  बातों को नकल उतार कर अपने पास लिपिबद्ध कर लिया। बाद मे हरीश छाबरा ने भी कुछ हस्तरेखा व अंक शास्त्र की पुस्तकें पढ़ने को दीन उनसे भी कुछ-कुछ लिख कर रख लिया। प्रकट मे ज्योतिष का विरोध जारी रखते हुये अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष निकलता रहता था। 1970 मे मेरठ मे  साईकिल से मेरा एक्सीडेंट मेरी ही गलती से हुआ था किन्तु चोट ज़्यादा मोटर साईकिल सवार को लगी थी। नवभारत टाईम्स मे रत्न लाल शास्त्री’रतनामबर’ ने उस दिन के भविष्य फल मे बाबूजी को आर्थिक हानी बताई थी और मेरा ठीक था। गलती होते हुये भी मुझे कम चोट लगी थी। साईकिल टूटी थी और आटा सड़क पर आधा बिखर गया था। अर्थात बाबूजी को आर्थिक हानी तो हुई ही थी इससे इंकार नहीं किया जा सकता था। किन्तु ऊपर से मैंने ज्योतिष का विरोध जारी रखते हुये अब इसके निष्कर्षों पर निगाह रखनी शुरू कर दी थी। अतः 1977 मे चुनावों की घोषणा होते ही मैंने मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री बनने की घोषणा करके अपने निष्कर्ष को सार्वजनिक कर दिया था। मेरा खूब मखौल उड़ाया गया जो लोग यह मानते भी थे कि इन्दिरा जी सत्ता मे न आ सकेंगी उनका आंकलन बाबू जगजीवन राम के प्रधानमंत्री बनने का था। आगरा से सेठ अचल सिंह के हारने  पर राय बरेली से इन्दिरा जी के हारने की भी घोषणा मैंने कर रखी थी। सभी बातें हास्यास्पद थीं जो कि चुनावों के बाद मेरे आंकलन को सही सिद्ध कर गई। 
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1972 से 75 तक तीन वर्षों मे रु 3000/- मेरठ मे वेतन से बचा कर उसी फार्म मे एफ डी कर रखे थे। सेवा समाप्ती के बाद वे रिफ़ंड नहीं भेज रहे थे। बाबूजी के एक सहकर्मी आगरा मे ‘कंचन डेरी’ नाम से व्यवसाय करते थे उन्होने सलाह दी कि उनको लीगल नोटिस भेज दो । अपने मित्र वकील साहब से उनका लेटर हेड लाकर उन्होने दिया और उस पर मैंने सुदीप्तों मित्रा से अपनी भाषा लिखवाकर रेजिस्टर्ड डाक से भेज दिया। इधर उसी वर्ष   1976 मे हमारे एक साथी आवास-विकास का मकान के लिए फार्म भर रहे थे मुझ पर भी फार्म भरने का दबाव बनाया। मैंने फार्म तो भर दिया परंतु लीगल नोटिस के जवाब मे वहाँ से दो चेक दिल्ली बैंक पर बना कर वहाँ से भेजे गए थे जिंनका कैश मिलने पर ही ड्राफ्ट बनवा सकता था। इत्तिफ़ाक से 25 मार्च 1977 को जब मोरारजी देसाई दिल्ली के रामलीला मैदान नई सरकार की सभा कर रहे थे मैं आगरा कैंट सेंट्रल बैंक से तीन हज़ार का ड्राफ्ट हाउसिंग बोर्ड के नाम बनवा रहा था।

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11 माह बाद लखनऊ से मुझे सूचना मिली कि पहली किश्त जमा कर दूँ तो ठीक वरना एलाटमेंट केनसिल हो जाएगा। तब तक वेतन बढ़ कर रु 500/- हो चुका था अतः रु 290/- की मासिक किश्त भरने की दिक्कत न हुई। 1978 मे जब मुझे मकान का पज़ेशन मिला उम्र 26 वर्ष हो गई थी। तब एस्ट्रोलाजर अमर सिंह जी की बात सच साबित होने का  यह प्रमाण था। ठेकेदार के किसी काम से जब वह होटल मुगल आए थे तब उनसे मिल कर मैंने उनकी बात प्रमाणित होने की सूचना दे दी थी। 15 वर्षों की किश्तें पूरी होने के बाद रिश्वत न देने के कारण रेजिस्ट्रेशन मे व्यवधान रहा और अंततः राज्यपाल मोतीलाल बोरा जी से शिकायत करने के बाद ही 1994 मे 42 वर्ष उम्र पूरी करने के बाद ही मेरे नाम रेजिस्ट्रेशन हो सका जिससे अमर सिंह जी के आंकलन पूरी तरह सही सिद्ध हुये। 

इसके बाद मैंने ज्योतिष अध्ययन पूरी तल्लीनता से किया लेकिन अब  छिट्ट-पुट्ट बातें विश्वस्त लोगों को बताने भी लगा था। सफलता से इस क्षेत्र मे आगे बढ्ने का उत्साह भी बंता चला गया। नौकरी के साथ-साथ लोगों को निशुल्क परामर्श देना भी शुरू कर दिया और सन2000 ई .मे नौकरी बिलकुल छोड़ कर ‘ज्योतिष’ को ही आजीविका बना लिया। ईमानदारी पर चलने और ढोंग-पाखंड का प्रबल विरोध करने के कारण आर्थिक लाभ तो न हुआ। किन्तु मान-सम्मान ज़रूर बढ़ा। इसी कारण पूना प्रवासी कुछ चिढ़ोकरे-एहसान फरामोश ब्लागर्स ने मेरे ज्योतिष ज्ञान को लक्ष्य करके ‘ज्योतिष एक मीठा जहर’ सरीखे आलेख भी IBN7 के नुमाईन्दे से लिखवाये।

दूसरे ब्लाग पर मैंने ज्योतिष संबंधी कई आलेख दिये हैं और दुष्प्रचार का माकूल जवाब भी दिया है। ज्योतिष के नाम पर आडंबर का मैंने सख्त प्रतिवाद किया है। 

http://krantiswar.blogspot.com

 

 
 
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