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Monthly Archives: May 2013

विद्रोही स्व-स्वर में तीन वर्षों में क् या खोया,क्या पाया—विजय राजबली माथुर

चूंकि हम लखनऊ यशवन्त की इच्छानुसार आए थे और उसका ट्रांसफर कानपुर से लखनऊ नहीं किया जा रहा था तब हमने उसको जाब छोड़ कर आने को कहा एवं विकल्प के रूप में उसे घर पर ही साईबर चलाने को कहा जिसका प्रारम्भ तीन वर्ष पूर्व आज ही के दिनांक को हुआ था। इन तीन वर्षों में यद्यपि आर्थिक रूप से कोई लाभ नहीं हुआ परंतु इसके माध्यम से लेखन के क्षेत्र में हमें मान-सम्मान तो मिला ही एक अलग पहचान भी प्राप्त हुई।

कुछ कारणों से व्यवसायिक रूप से तो साईबर का संचालन जारी नहीं रखा है परंतु लेखन के क्षेत्र में प्राप्त सुविधा का लाभ आज भी ले ही रहे हैं।इससे विद्वेष रखते हुये ही ब्लाग -लेखन क्षेत्र में कुछ निहित स्वार्थ वाले लोगों ने हमें विचलित करने व हम पर अनर्गल कीचड़ उछालने का कार्य भी किया।
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वीना6 अक्तूबर 2010 6:52 pm
"यादें-संस्मरण अक्सर खट्ट्-मीठे होते हैं पर ये रोचक रहे…"
उस समय इस टिप्पणी को साधारण समझा था जबकि यही टिप्पणी ‘स्लो प्वाइजन’ निकली। टिप्पणी दाता ने अपने ज़िले एवं श्वसराल के संपर्कों के आधार पर ब्लाग जगत में ‘धन-लोलुप’ब्लागर्स के सहयोग से हमारे विरुद्ध घृणित प्रचार अभियान तो चलाया ही इन संपर्कों के आधार पर ही हमारी पार्टी व निवास क्षेत्र में भी लोगों को हमारे विरुद्ध उकसाया। टिप्पणी दाता ने अपने एक निकटतम रिश्तेदार के माध्यम से हमारे सभी परिवारी जनों पर नाहक तोमहतें लगवाईं। वह महानुभाव हमारे संपर्क के लोगों को हमारे विरुद्ध करने का अभियान चलाने लगे। क्योंकि संपर्क हेतु उन्होने साईबर में अपने कागजात टाईप करवाने का बहाना खोजा था अतः उनके कार्य को सम्पन्न करने से इंनकार करवा दिया है। अब भी यदि वह अपनी दुष्प्रवृत्ति जारी रखेंगे तो मजबूरन उनका नाम भी उजागर करना पड़ेगा। ऐसा उनको उनके फोन काल के उत्तर में भी सूचित कर दिया है।

इस सबके बावजूद पिछले तीन वर्षों को निराशाजनक कतई नहीं कहा जा सकता। तीन वर्षों में परिवार के तीनों सदस्यों के ब्लाग -लेखन का कार्य चल रहा है। चार ब्लाग सार्वजनिक रूप से अपने व एक पूनम का और दो ब्लाग निजी तौर पर मैं खुद संचालित कर रहा हूँ। यशवन्त चार ब्लाग व्यक्तिगत रूप से और एक ब्लाग सामूहिक रूप से संचालित कर रहा है। फेसबुक एवं ब्लाग-लेखन के माध्यम से हम लोगों की एक पहचान राजनीतिक क्षेत्र मे बन गई है। आर्थिक सफलता न सही राजनीतिक सफलता ही हौसला अफजाई के लिए काफी है।

 

विद्रोही स्व-स्वर में मान न मान ऊंची दु कान फीका पकवान —विजय राजबली माथुर

‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ एवं ‘ऊंची दुकान -फीका पकवान’ दो अलग-अलग कहावतों को एक में मिला कर शीर्षक देने का आशय एक ऐसे चरित्र वाले व्यक्ति की खटकने वाली बातों पर प्रकाश डालना है।
एक उम्र दराज राजनेता साहब हमारे पार्टी कार्यालय में अक्सर पधारते और हमारे वरिष्ठ नेताओं से सम्मान प्राप्त करते रहते हैं। अतः मिलने पर मेरे द्वारा भी उनको सम्मान दिया जाना उसी क्रम की एक औपचारिकता है। गत वर्ष 31 मई के संयुक्त प्रदर्शन के बाद धरना-स्थल पर अपना भाषण देने के बाद वह मेरे पास आकर खड़े हो गए और अपनी वार्ता छेड़ दिये,हालांकि उनको खुद भी वक्ता को सुनना चाहिए था और मुझे भी सुनने देना चाहिए था विशेषकर तब जबकि वक्ता डॉ श्री प्रकाश कश्यप साहब आगरा से ही हमारे पूर्व परिचित रहे हैं। औपचारिकता और शिष्टाचार को दरकिनार करते हुये यह साहब अपनी ही गाथा कहते रहे। मुझको यह बताने का प्रयास करते रहे कि वह हमारे खानदान से व्यक्तिगत रूप से परिचित हैं और उनकी अपनी कोई रिश्तेदारी भी हमारे खानदान में है। वह आगरा के हमारे परिचितों को जानते हैं आदि-आदि बातें उनके द्वारा वर्णित करने के उपरांत इच्छा ज़ाहिर की गई कि वह हमारे घर आना चाहते हैं। कई-कई बार उन्होने आने का समय दिया परंतु नहीं आए। मुझे अपने घर बुलाते रहे मैं नहीं गया। दो अक्तूबर को हम लोग जब कहीं जाने के लिए सिटी बस में थे फोन करके कहते हैं कि वह हमारे घर आ रहे हैं। मजबूरन कहना पड़ा कि हम कहीं रास्ते में हैं घर पर नही।अंततः 18 अक्तूबर 2012 को वह हमारे घर पहली बार पहुंचे। पहले भी जब-जब उनके फोन काल्स आए या वह खुद घर आए हमें किसी न किसी प्रकार का नुकसान ज़रूर हुआ।
वह यशवन्त से भी अपने कागजात आदि कन्सेशनल रेट पर या मुफ्त टाईप करवाने लगे। इतना तक तो ठीक था झेला जा सकता था। किन्तु मेरे साथ-साथ मेरी पत्नी एवं पुत्र पर अनावश्यक तोहमत थोपना मुझे बराबर अखरता रहा है तब भी यह सोच कर कि हमारे वरिष्ठ नेताओं के बीच उनका उठना-बैठना है उनको प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं कहा है परंतु अप्रत्यक्ष रूप से उनको कई बार इंगित कर दिया है कि उनका व्यवहार न काबिले बर्दाश्त है। हमारी पार्टी के दो नेता गण भी उनको हमें क्षति पहुंचाने हेतु उकसाते रहते हैं उनका भी संकेत इसी ब्लाग में पूर्व में किया जा चुका है। 17 अप्रैल 2013 को उनके आने के बाद हमें जिस प्रकार वेदना हुई थी उस कारण उसके बाद दो बार उनके आने पर मैं उनसे मिला ही नहीं था । जब कल मैं पार्टी कार्यालय में था शाम 5 बजे उनका फोन आया कि वह मेरे घर आ रहे हैं मैंने सूचित कर दिया था कि मैं 7 बजे तक ही पहुँच सकूँगा किन्तु फिर भी वह 6-15 पर पहुँच गए और यशवन्त से अपने कागजात टाईप कराने के बाद मेरा इंतज़ार करते रहे जबकि मैं उनसे मिलने व बात करने का कतई इच्छुक नहीं था।
उनकी अनर्गल बातें तो मैंने चुप-चाप सुन लीं किन्तु अपनी ओर से कुछ नहीं कहा तब एक पूर्व विधायक के लहजे में उनकी बात को दोहराते हुये उनका कथन था कि चुप क्यों हो?बोलते क्यों नहीं?मजबूरन मुझे यह कहना ही पड़ा कि आपसे क्या बोलें जब आप राजनाथ सिंह व RSS की भाषा बोल रहे हैं। उनका प्रश्न था कि RSS क्या है?मैंने उनको स्पष्ट किया कि ‘रियूमर स्पीच्युटिंग सोसाईटी’=RSS होता है। एक वामपंथी दल का प्रदेशाध्यक्ष होते हुये भी उनका दृष्टिकोण घनघोर सांप्रदायिक है। पता नहीं कैसे हमारे वरिष्ठ नेता गण उनको झेलते है ?और कैसे उनके साथ संयुक्त कार्यक्रमों में भाग लेते हैं?वह अपने दल के प्रति निष्ठावान भी नहीं हैं ,पता नहीं क्यों उनके दल का राष्ट्रीय नेतृत्व उनको निष्कासित नहीं कर देता?
बड़े लोगों की बड़ी बातें वे ही जानें किन्तु न चाहते हुये भी मुझे उनको अपने घर आने से मना करना ही पड़ेगा यदि वह कल की ही तरह दोबारा मुझ पर हावी होने की कोशिश करेंगे। उनको आपत्ति थी कि मैं पार्टी कार्यालय क्यों गया?क्या कोई मीटिंग थी?या कोई विशेष काम था?क्या था या क्या नहीं किसी भी हैसियत से उनको कुछ भी मुझसे जानने का हक नहीं था। फेसबुक पर आज उनके जन्मदिन की सूचना के आधार पर उनकी वाल पर यह संदेश जो हर-एक को उसके जन्मदिन पर देता हूँ उनको भी दे दिया है-"जन्मदिन मुबारक हो। हम आपके सुंदर,स्वस्थ,सुखद,समृद्ध उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना करते हैं। " लेकिन सोचता हूँ कि क्या वह इसके हकदार हैं?

 

विद्रोही स्व-स्वर में बरेली के दौरान (भ ाग-3)—विजय राजबली माथुर

बरेली के दौरान (भाग-2 )http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/05/2.html

बरेली के दौरान

जब हम लोग धर्म प्रकाश जी के इस मकान में रहने आए थे तब कमरों व बारामदे की छत खपरैल की थीं और एक पड़ौसी की तरफ की दीवार कच्ची मिट्टी की बनी थी। कुछ दिनों बाद दुकान के हिस्से को उन्होने पक्का करवा कर दो मंजिल बनवा कर दुकान के ऊपर भी घर किराये पर उठा दिया था। कच्ची दीवार को पूरा ही उन्होने पक्का करवा डाला था। जब मिट्टी की दीवार तोड़ी गई तो सुना था कि उसमें उनको कुछ गड़ा हुआ खजाना मिला था। कानूनन वह सरकार का होता। पड़ौसी का घर बंद रहता था वह अविवाहित सज्जन अपने किसी भतीजे के पास बाहर रहते थे। धर्म प्रकाश जी की धर्म पत्नी साहिबा ने उनके सिर पर पोटली बांध कर गहने देकर उनको किसी रिश्तेदार के घर छिपवा दिया था। किसी की शिकायत पर जब पुलिस आई तो दुकान से उनके छोटे भाई को पकड़ कर थाने ले गई। धर्म प्रकाश जी की पत्नी को मजदूर गण ‘ललाईन’कहते थे। वही मकान निर्माण का कार्य देखती थीं। ऐसा सुनने में आया था कि वह थाने मे काफी गरम होती हुई पहुँचीं और अपने पति ‘धर्म प्रकाश’जी को गायब करने तथा देवर को प्रताड़ित करने का इल्ज़ाम पुलिस पर लगाते हुये दरोगा जी को खूब फटकारा और उनके विरुद्ध शिकायत करने की धमकी दी जिससे घबराकर उन्होने उनके देवर ‘नारायण दास’ जी को भी तत्काल थाने से बगैर लिखा-पढ़ी के ही छोड़ दिया था। उनको पकड़ना ही नहीं दिखाया होगा।

आज आए दिन पुलिस द्वारा महिलाओं के उत्पीड़न की कहानियों से रंगे अखबार पढ़ने को मिलते हैं तब आज की उच्च शिक्षित महिलाओं की बुद्धि पर हैरानी होती है। अबसे 52 वर्ष पूर्व की अशिक्षित ‘ललाईन’ के ज्ञान और पुलिस के प्रति उनके तेवर को क्या आज की शिक्षित महिलाएं अपना कर अपने शोषण-उत्पीड़न से टक्कर नहीं ले सकती हैं ? या अब पुलिस का चरित्र हींन होना ही पुलिस की पहचान बन गया है -इस उदारवादी विकास वाले भारत में -महिला और पुरुष का भेद मिटा कर सबका उत्पीड़न समान बना दिया गया है? बड़ा विस्मय होता है!

ललाईन सुबह मजदूरों के पहुँचते ही आ जाती थीं और किसी को भी खाली नहीं बैठने देती थीं। मजदूरों के खाना खाने के समय खुद घर जाकर खाना खातीं और अपने पति व देवर का खाना लाकर दुकान मे पहुंचाती थीं। मकान मालकिन होने के नाते हमारी बउआ दोपहर में उनको चाय पिला देती थीं। उन लोगों का अपना घर भी सादगी युक्त ही था। जैसा कि आज चार पैसे होते ही लोगों मे घमंड झलकता देखते हैं वैसा तब के उन धनाढ्यो में दूर-दूर तक नहीं दिखाई देता था। जब कभी बउआ के साथ उनके घर गए उन्होने अपने बच्चों के साथ ही हम लोगों को भी खेलने दिया व उनके साथ ही खाने की चीज़ भी दीं,बिना किसी भेद-भाव के।

बाबू जी के आफिस के एक गेरिजन इंजीनियर साहब जिस मकान में रहते थे वह कुतुब बाज़ार जाने के रास्ते में पड़ता था। वह अक्सर अपने बारामदे में बैठे होते थे और बाबूजी द्वारा ‘नमस्ते’ करने का जवाब बड़ी ही आत्मीयता से देते थे। उस समय तक अफसर होने का घमंड उनमे नहीं था।

 

विद्रोही स्व-स्वर में बरेली के दौरान (भ ाग-2 )—विजय राजबली माथुर

बरेली के दौरान
क्योंकि बरेली मे बहुत कम समय ही रहे थे अतः 10 सितंबर 2010 को लिखते समय बहुत सी बातें छूट गईं थीं किन्तु अभी भी स्मरण हैं अतः उनको भी सार्वजनिक किया जाना अब समीचीन लगा है।

जब तक बाबूजी ने बरेली में किराये पर घर लिया तब तक के लिए हम लोग शाहजहाँपुर -नानाजी के पास चले गए थे। उस समय तक नानाजी का दक्षिण मुखी घर सामने ऊंचा था तथा पीछे उत्तर की ओर रेलवे लाईन की तरफ नीचा था। नीचे आँगन में तख्त पर ऊपर के चबूतरे से हम लोग छलांग लगा कर खेल रहे थे। बहन सबसे छोटी होने के कारण संभल न सकी और गिर गई उसके सिर में तख्त से चोट लग गई। जब तक वहाँ थे नाना जी अपनी होम्योपेथिक दवाएं देते रहे। गोला बाज़ार में लाला धर्म प्रकाश जी की दुकान के पिछवाड़े हिस्से में उनके घर को किराये पर लेकर बाबूजी लखनऊ से सब सामान और हम लोगों को भी ले गए। बाबू जी का दफ्तर-CWE आफिस सुबह 07-30 से प्रारम्भ होता था। अतः हम दोनों भाई छोटी बहन को केंट जनरल अस्पताल ले जाकर मरहम-पट्टी करवा लाते थे।

शुरू में दोनों भाई रूक्स प्राईमारी स्कूल में थे और बहन का स्कूल हम लोगों से आगे और थोड़ी दूर पर था। उसके स्कूल की प्राचार्या क्रिश्चियन थीं जिनके दो पुत्र हमारे स्कूल में एक मेरे साथ और दूसरा भाई के साथ पढ़ते थे। बहन की एक अध्यापिका हमारे घर चौका-बर्तन करने वाली ‘मेहरी’साहिबा की पुत्री थीं। उनकी शादी में हम दोनों भाई भी बाबूजी के साथ बारात में शामिल होकर गए थे। बउआ ने यह बात जब मेहरी साहिबा को बताई थी तो वह बहुत खुश हुईं थीं।

लखनऊ से जब बाबू जी अकेले आए थे तो अपने दफ्तर के कुछ साथियों के साथ बी आई बाज़ार में उन लोगों के साथ कमरे पर रहे थे। उनमे एक थे ‘बाला प्रसाद’जी जिनसे बाबूजी की घनिष्ठता हो गई थी। उनके परामर्श पर ही बाबूजी उनके कमरे के सामने वाले दुकानदार ‘धर्म दास’ जी से सामान खरीदने बी आई बाज़ार जाते थे हम दोनों भाईयों को भी ले जाते थे। मकान मालिक ‘धर्म प्रकाश’ जी की दुकान से छिट -पुट चीज़ें ही कभी-कभी लेते थे। इन बाला प्रसाद जी के एक माने हुये पुत्र से ही जो इंजीनियर हो गए थे मेहरी साहिबा की शिक्षिका पुत्री का विवाह हुआ था। क्योंकि बाबूजी के दफ्तर के साथियों को यह आश्चर्य हुआ था कि खुद ‘तेली’समुदाय से होते हुये अपने दत्तक पुत्र का विवाह वह ‘कहार’ समुदाय की पुत्री से क्यों कर रहे हैं?अतः बाला प्रसाद जी को इस छिपे रहे रहस्य को उजागर करना पड़ा था कि उनके घर के वफादार सेवक ने जिनकी पत्नी की मृत्यु पहले हो चुकी थी अपना अन्त समय जान कर अपने 10 वर्षीय पुत्र का हाथ उनको पकड़ा कर उनसे वचन लिया था कि उसे अपने पुत्र के समान ही मानते हुये उसका लालन-पालन करेंगे। उन्होने अपनी जमा-पूंजी की पोटली भी बाला प्रसाद जी को सौंप दी थी जिसे बाला प्रसाद जी ने इस शादी के वक्त उस पुत्र को सौंप दिया था। जैसा कि बाला प्रसाद जी ने अपने साथियों को बताया था इस पुत्र की शादी का खर्च उन्होने खुद किया था। हालांकि उस वक्त वह बरेली से ट्रांसफर हो चुके थे किन्तु जब बारात लेकर बरेली आना था तब अपने आफिस और कमरे के पास के मोहल्ले के साथियों को पूर्व में कार्ड भेज कर निमंत्रित किया था। बारात गोला बाज़ार के पास से चली थी और उसमें बैंड-बाजे का भी बंदोबस्त था। लड़की वालों के घर के पास एक खाली मैदान में बाकायदा बेंच-मेज़ पर खाने का प्रबंध ‘पत्तल-शकोरे’ में था। खाना अच्छा था। लड़की वालों की आर्थिक स्थिति को देखते हुये बाला प्रसाद जी ने खाने का खर्च खुद उठाया था। आजकल जब अखबारों मे पढ़ते हैं कि किस प्रकार लोग लड़की वालों का शोषण उनको दबा कर करते हैं तब ‘बाला प्रसाद’ जी का आचरण स्मरण हो जाता है। वह भी तब जबकि वह उनका पाला-माना पुत्र था।

यह भी याद है कि हमारे क्लास का एक छात्र रामलीला में पटाबाजी का खेल करता चलता था। गंगा-पार उतारने का दृश्य धोंपेश्वर महादेव मंदिर के तालाब में ‘नाव’ पर सम्पन्न किया जाता था। एक वर्ष लक्ष्मण की भूमिका वाले पात्र की लंबाई राम के पात्र से अधिक थी। वहाँ राम बारात और नाव उतरने के कार्यक्रम ही हम लोगों ने देखे थे,राम लीला तो काफी रात में नौटंकी के रूप मे होती थी। सावन के सोमवारों पर वहाँ उस मंदिर पर मेला लगता था।

बबूए मामाजी (बउआ के चचेरे भाई)उस वक्त हास्टल में रह कर सिविल इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे। कुछ त्यौहारों पर जब वह शाहजहाँपुर नहीं जाते थे बउआ ने उनको घर बुलाकर खाना खिलाया था। वैसे मिलने आने पर वह खाना नहीं खाते थे कि मेस में तो खर्चा कटेगा ही। नाना जी के फुफेरे भाई -महेश नाना जी,इंस्पेक्टर आफ फेकटरीज़ सिविल लाईन्स मे रहते थे उनके घर भी मिलने जाना होता रहता था। पहली बार पहुंचाने महेश नानाजी हम सबको अपनी कार से आए थे। बाबूजी की साईकिल को नानी जी की दही मथने की रस्सी से कार की छत पर बांध दिया था। खाना उन्होने खिला कर भेजा था हमारे घर हैंड पंप का पानी ही उन्होने व मौसियों ने पिया क्योंकि रात को तब नाश्ते का समय नहीं था।

छ्ठे क्लास मे मैं ‘रूक्स हायर सेकेन्डरी स्कूल’ (जो अब रवीन्द्र नाथ टैगोर इण्टर कालेज हो गया है)में था जब डॉ राधा कृष्णन जी का राष्ट्रपति के रूप में प्रथम जन्मदिवस पड़ा जिसे पंडित नेहरू ने शिक्षक दिवस घोषित कर दिया था। स्कूल में छुट्टी तो घोषित कर दी गई किन्तु हमारे कक्षाध्यापक दीना नाथ जी हमारी कक्षा से मुझे व पड़ौस के ही एक दूसरे सहपाठी को तथा अन्य कक्षाओं से दूसरे छात्रों को लेकर बाज़ारों में ‘शिक्षक दिवस’ का चन्दा लेने ले गए। एक छोटा फ्लेग वह लोगों को देकर सील्ड डिब्बे में धन एकत्र कर रहे थे। बाबूजी भी घर आ चुके थे छुट्टी के बाद तब तक मेरे न लौटने से चिंतित होकर गोला बाज़ार में खड़े थे और दूसरे छात्र के पिताजी भी वहीं उसका इंतज़ार कर रहे थे। दीना नाथ जी ने सब छात्रों को उनके घर पहुंचाने के बाद हम लोगों को पहुंचाया था और दोनों के पिताओं को आश्वस्त किया था कि वह अपने साथ ले गए थे।

 

इसे शीर्षक क्या दिया जाये ?—विजय राजबली मा थुर

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गत वर्ष 27 अगस्त 2012 को यहाँ लखनऊ में एक ब्लागर सम्मेलन हुआ था जिसमें शामिल होने का हमारा इरादा नहीं था। किन्तु 22 अगस्त की रात्रि लगभग 08-30 बजे फोन पर एक पत्रिका के प्रबंध संपादक महोदय ने सूचित किया कि पूना से उनके संपादक (जिसने अपने IBN7 के कारिंदा ब्लागर से ‘ज्योतिष एक मीठा जहर’लिखवा कर मेरे ज्योतिषीय विवेचन का मखौल उड़ाया था) का आगमन नहीं हो रहा है और मुझ पर अपने ही शहर मे हो रहे उनके कार्यक्रम मे भाग लेने का दबाव बनाया। 26 अगस्त को फोन पर अब डायचे वेले के योद्धा साहब ने भी ज़रूर शामिल होने का दबाव बनाया जिनके कार्यक्रम मे 27 अगस्त 2011 को भाग ले चुके थे अतः शामिल भी हुये थे और कार्यक्रम पर एक पोस्ट भी दिया था। ( लेकिन बाद में पूना प्रवासी ब्लागर के उकसावे पर उन्होने भी ज्योतिष विरोधी लेख लिख कर मुझ पर अभद्र टिप्पणियाँ कर डालीं।) कार्यक्रम के बाद उक्त पत्रिका के प्रधान संपादक पर हो रहे हमलों के दौरान हमलावर ब्लागर और उसके पूना प्रवासी आका के विरोध मे भी एक पोस्ट दिया था जिसे वापिस लेने का दबाव प्रबंध संपादक द्वारा डाला गया था।

कानपुर,बाराबंकी और लखनऊ के वकील और बैंक कर्मी फेसबुक वालों एवं ब्लागर्स ने अपने मित्र द्वारा मुझे निम्नाकित मेसेज भिजवाया था—

  • September 14, 2012

  • 10:30pm
    Advocat Ganiou Adechi

    From Ganiou ADECHI
    03 BP 1375
    Cotonou,
    Benin Republic
    Tel: +229 99 47 94 50,
    Attention:Vijai RajBali Mathur
    Let me start by introducing myself to you, I am Ganiou ADECHI ,a Solicitor and the Personal Attorney to Late Mr. Michael Mathur, a national of your country, who used to work as the Director of Societe Nationale pour la Promotion Agricole(SONAPRA), the major national cotton production company in Benin Republic.I saw your contact during my private search in the internet and I want to believe that you will be very honest, committed and capable of assisting in this business venture.
    On the 27th of May 2007, my client, His wife and their three Children were involved in a car accident Along express-high way.Unfortunately,they all lost their lives. Since then I have made several enquiries to your Embassy to locate any of my client’s extended relatives, this has also proved unsuccessful.
    After these several unsuccessful attempts, I decided to trace his relatives over the Internet to locate any member of his family but to no avail, hence, I contacted you to assist in repatriating the money and property left behind by my client before they get confiscated ordeclared unserviceable by the Bank here. These huge deposits were lodged particularly with the BANQUE ATLANTIQUE BENIN (BAB), where the Deceased had an account valued at about $9.700.000.00 (Nine Million Seven Hundred Thousand United States Dollars).
    The Bank has issued me a notice to provide the next of kin or have the account confiscated. Since I have been unsuccessful in Locating the relatives for over Three years now, I seek your consent to present you as the next of kin of the deceased since you have the same last name with him so that the proceeds of this account valued about us$9.7million dollars can be paid to you and then the sharing ratio should be 50% for me and 50% for you, I have all the necessary legal documents that can be used to back up with our claim we will make with the Bank.
    All I require is your honest cooperation to enable us seeing this Deal through and I guarantee that this will be executed under a legitimate arrangement that will protect you from any breach of the law.And the way we are going to achieve this. is as follows, I need the following information from you:
    Your Full Name…………………………………………………………………
    Your Email Address……………………………………………………………..
    Your Age……………………………………………………………………
    Your Country………………………………………………………………..
    Your Occupation………………………………………………………………
    Your Position……………………………………………………………….
    Your Telephone Number………………………………………………………..
    (For Communication Purpose)
    If this proposal satisfies you, please reach me either bymail;advocatganiouadechi, or phone; +229 99 47 94 50, formore clarification about how this will be done.
    I await your reply as soon as possible.
    Best Regards
    Ganiou ADECHI

इस बाबत माथुर सभा, लखनऊ के एक पदाधिकारी की यह राय मिली थी कि यह ‘फ़्राड’ है और इसके विरुद्ध FIR करा देनी चाहिए। पर्दे के पीछे के षड्यंत्रकारियों की पहचान होने और उनसे निबटने के अन्य मार्ग प्रशस्त होने के कारण मैंने नाहक FIR कराने और वकीलों के जाल-जंजाल मे न उलझने का निर्णय लिया ।

अब इन षड्यंत्रकारियों ने ‘तांत्रिक’प्रक्रियाओं का सहारा लेकर हमारे विरुद्ध अभियान तो चला ही रखा है साथ ही साथ मेरे लेख -विश्लेषण आदि पर भी कटाक्ष कर रहे हैं। वे यह नहीं सोच रहे कि मैं उन लोगों के प्रलोभन में क्यों नहीं फंस सका?जब हमने अपने पिताजी के सहपाठी और रूम मेट रहे पूर्व विधायक कामरेड भीखा लाल जी के समय ‘दरियाबाद’ में अपने कानूनी हक को प्राप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया और पूर्व विधायक कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह जी के समय भी कोई प्रयत्न नहीं किया एवं उक्त पत्रिका के प्रबंध संपादक से स्पष्ट कह दिया कि हम जैसे हैं ठीक हैं और जब उनके अयाचित सहयोग देने के प्रस्ताव अस्वीकार कर दिये तब यह षड्यंत्रकारी मेसेज देकर वे सब मुझे कैसे गुमराह कर सकते थे?

एक बार फिर इस ग्रुप के लोगों ने किसी के द्वारा ई-मेल (http://krantiswar.blogspot.in/2013/04/blog-post_30.html )भिजवाकर उलझाना चाहा जिसका पर्दाफाश करने पर प्रेषक महोदय ने बिफर कर एक और निन्दात्मक ई-मेल भेज दिया है।
पढे-लिखे समझदार लोग ‘तर्क’ और ‘बुद्धि’ का सहारा न लेकर जब ओछे हथकंडे अपनाते हैं तो लगता है कि उनका ‘मस्तिष्क’ वस्तुतः उनके पैर के तलवों में निवास करता है।

 
 
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