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Monthly Archives: June 2013

विद्रोही स्व-स्वर में तो फिर वे क्यों ऐ सा करते हैं?(भाग-3) —विजय राजबली माथुर

माँ की 19वीं पुण्य तिथि पर विशेष

गत अंकों में खुद को ‘खुदा’समझने वाले अहंकारी लोगों की इस ज़िद्द का वर्णन किया है कि वे बिना किसी लाभ की प्राप्ति के सिर्फ मुझको परेशान रखने में ही आनंदित होते रहते हैं। उसी कड़ी में आज फिर माँ की पुण्य तिथि के अवसर पर कुछ और वारदातों का ज़िक्र करना अब उचित प्रतीत हो रहा है।
14 जून 1995 को बाबूजी को अंतिम संस्कार हेतु घाट ले जाने के बाद से माँ जो अचेत हुईं तो 25 जून की रात्रि पौने आठ बजे कंपाउंडर के सामने ही मृत्यु को प्राप्त हुईं। कंपाउंडर साहब तो रोजाना की तरह ग्लूकोज,दवा आदि देखने आए थे फिर उन्होने उस दिन का अपना शुल्क भी नहीं लिया और शरीर में लगी नलियाँ आदि निकाल गए। मैं और यशवन्त ही घर पर थे। अजय तो 23 जून को मेरे बहुत मना करने के बावजूद फरीदाबाद चले गए थे । जिस प्रकार 13 जून की रात्रि दो बजे बाबूजी को धरती पर लेटाने में मुझे पड़ौसी सतीश शर्मा जी के पुत्र शलभ ने मदद की थी उसी प्रकार 25 जून की रात्रि नौ बजे भी उसी शलभ ने मेरी मदद इस बार भी की। यशवन्त तो साढ़े बारह वर्ष का ही तब था लेकिन शलभ भी 21-22 वर्ष का ही रहा होगा। सतीश जी ने शायद कुछ पूर्वाभास के आधार पर अपने पुत्र को रिहर्सल हेतु हमारी मदद को भेजा होगा क्योंकि अक्तूबर 1996 में वह भी दिवंगत हो गए थे।
शलभ शर्मा और सतीश जी ने ही बाबूजी के समय की तरह ही इस बार भी बर्फ घर पर पहुंचवाई । शलभ ने ही रात्रि में डॉ शोभा व अजय को ‘टेलीग्राम’ मेरी तरफ से भेज दिये,अर्जुन नगर अशोक-नवीन को फोन द्वारा सूचना भी दे दी। खर्च का भुगतान भी मैंने बाद में ही किया था उस वक्त उन्होने ही कर दिया था और तुरंत लेने से इंकार कर दिया था। अगले दिन 26 जून को भयंकर गर्मी थी जबकि 25 की रात्रि बारिश भी हो गई थी। झांसी से शोभा और फरीदाबाद से अजय नहीं पहुँच पाये थे । किसी ने संभवतः सतीश शर्मा जी को नशे में लाकर भड़का दिया था( उनका पुत्र और पत्नी जो रात्रि मथुरा जाते-जाते रुक गए थे सुबह ही मथुरा चले जा चुके थे) वह दबाव बना रहे थे कि गर्मी बढ़ रही है अतः भाई -बहन का इंतज़ार किए बगैर माँ को घाट ले चलो। उनकी यह बात स्वीकार नहीं की जा सकती थी चाहे जितने भी उनके एहसान थे।इसलिए भड़क कर उन्होने पास-पड़ौस के लोगों को घाट पर साथ जाने की मनाही कर दी। स्थिति का आंकलन करते हुये मैंने समझा कर यशवन्त को माँ के पार्थिव शरीर के पास अकेला छोड़ा और मोपेड से जाकर कामरेड एस कुमार को सूचित कर दिया था अतः वह कामरेड अनंत राम को लेकर आ गए थे। शोभा के आने के बाद फिर सतीश शर्मा जी दबाव बनाने लगे कि अब बहन आ गई ,बेटी को तो माँ की चिंता होती है बेटे को कोई परवाह नहीं वह माँ को छोड़ कर चला गया था अब भाई का इंतज़ार न करो और जल्दी घाट ले जाओ। पुनः उनके दबाव को रद्द कर दिया था।
अजय के आने बाद जब घाट ले जाने लगे तो यशवन्त जो 17 जून 1994 को शालिनी,14 जून 1995 को बाबूजी को घाट ले जाते समय साथ रहा था इस बार भी चल रहा था। अतः अजय की 6 वर्षीय पुत्री भी अड़ गई कि वह भी भैया के साथ अम्मा को घाट पहुँचाने चलेगी। बच्ची की ज़िद्द को देखते हुये अजय ने साथ ले लिया। घाट पर जब टाल से लकड़ी ले जाने में ये छोटे बच्चे भी मदद कर रहे थे तो इसे देख कर दूसरे लोग जो अपने परिजन का अंतिम संस्कार करके लौट रहे थे उनके एक बुजुर्ग ने हम लोगों की सहायता करने को कहा और इस प्रकार घाट पर माँ के अंतिम संस्कार के समय काफी भीड़ हो गई भले ही शर्मा जी ने पड़ौस के लोगों को रोक लिया था । http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/04/1994-95-11.html
गोविंद बिहारी मौसाजी जिनको अलीगढ़ के रिश्ते में कमलेश बाबू चाचा मानते रहे ने बाबू जी के वक्त रानी मौसी को माँ के पास नहीं आने दिया था और उनको कह दिया था कि विजय के घर जाओगी तो टांग तोड़ दी जाएगी। हालांकि उनका पुत्र असित सीधे घाट पर पहुँच गया था। इस बार उन लोगों ने पूरा बहिष्कार किया था। लेकिन अज्ञात लोगों ने घाट पर जो सहायता की वह अविस्मरणीय है।
माँ के बाद यशवन्त और मैं घर पर अकेले रह गए थे अतः ड्यूटी जाने पर मैं उसे भी अपने साथ ले जाता था। सुबह 7-15 पर वह स्कूल जाता 12 -30 बजे घर आता ड्रेस बदल कर खाना खा कर मेरे साथ एक बजे बाज़ार चलता लौट कर रात्रि 7-30 पर आने के बाद जब रोटी सेंकते तो 8 बजते-बजते वह ऊँघते हुये खाना खाता। नवंबर में पूनम के आने तक यही सिलसिला चलता रहा।
आज जब डॉ शोभा/कमलेश बाबू और कमलेश बाबू के सखा व भतीज दामाद कुक्कू और उसका भाई शरद मोहन माथुर,पार्सल बाबू मिल कर यशवन्त का भविष्य तबाह करने के मिशन में लगे हुये हैं तब सोचता हूँ कि क्या यशवन्त उतना ही मूर्ख है जितना वे सोचते हैं? यशवन्त को गुमराह करने हेतु वीणा श्रीवास्तव/रश्मि प्रभा/सोनिया बहुखंडी गौड़ सरीखे खुदगर्ज लुटेरे ब्लागर्स की भी मदद ली गई थी। इन लोगों की मार्फत हमारी पार्टी के भी कुछ राजनेताओं तथा सहयोगी एक पार्टी के एक राजनेता को भी हमारे विरुद्ध लामबंद किया गया है। जिस प्रकार जय शंकर लाल और उनके बेटे कुक्कू व शरद मोहन माथुर अपने-अपने विभागों को लूटते रहे उसे व अन्य लोगों को देखते हुये लखनऊ यूनिवर्सिटी के एक गार्ड यादव जी का कथन याद आता है जो बिलकुल खरा सच ही है कि-‘सीतापुर’ के लोग ‘ठग’ व ‘चोर’ होते हैं उनसे हमेशा सावधान रहिएगा। अतीत में डॉ शोभा ने माँ को बताया था कि जय शंकर लाल माथुर 2 बोरा छोटी इलाईची गायब/चोरी होने के मामले में फंसे थे तब कमलेश बाबू के पिताजी -सरदार बिहारी माथुर,क्लेंम्स इंस्पेक्टर-रेलवे ने उनको बचाया था। इसके बाद टूंडला जंक्शन पर जय शंकर लाल को ‘बुकिंग’ व ‘पार्सल’ का हेड एवं सरदारी बिहारी साहब को ‘विजिलेन्स आफ़ीसर’,अलीगढ़ के रूप में प्रमोशन मिल गया था। सीतापुरी आदत सभी सीतापुरियों में समान होती होगी तभी तो कोई सीतापुरिया कुछ न मिलने पर आई डी-पासवर्ड ही चुरा लेता है जिसके सहारे उपयुर्क्त ब्लागर्स से संबन्धित पोस्ट्स व टिप्पणियों में हेरा-फेरी करके उनको निर्दोष सिद्ध किया जा सके।
मेरी माँ अक्सर कहावतें दोहराया करती थीं-"साँच को आंच नहीं" तथा "एक चुप सौ को हरावे" इन पर अब तक विश्वास करते हुये मैं तमाम झंझावातों पर पार पा चुका हूँ। माँ को नाना जी ने 4थे क्लास के बाद स्कूल नहीं भेजा था किन्तु उनका ज्ञान आज के एम.ए.,पी.एच डी से अधिक ही था उनके आंकलन हमेशा सही निकलते थे। हो सकता है आनुवंशिक तौर पर उनके ये गुण कुछ हद तक मुझे भी मिले हों तभी मेरे भी पूर्वानुमान अक्सर सही ही निकलते हैं। यशवन्त के बड़े भाई के जीवित न रहने का भान होने पर मैंने माँ को बता दिया था और वह सही निकला जब 24 नवंबर 1982 को प्रातः 4 बजे जन्म लेकर उसी दिन साँय 4 बजे वह दिवंगत भी हो गया था। जब अलीगढ़ के ज्योतिषी और बाल रोग विशेज्ञ डॉ शोभा की बड़ी बेटी के लिए जन्म से आठ माह खतरनाक बता रहे थे तब मैंने माँ को आश्वस्त कर दिया था कि वह निश्चय ही जीवित रहेगी। 30अप्रैल 2011 को यह भांजी/भांजा दामाद अपनी बिटिया के साथ यहाँ लखनऊ भी आए थे।

" अभी कुछ दिन पहले यह भांजी ,उसकी बेटी और भांजा दामाद कुछ घंटों के लिए हमारे घर भी लखनऊ आने पर आये थे."-http://vidrohiswar.blogspot.in/2011/06/blog-post.html

माँ का आशीर्वाद मेरे साथ है इस बात को उनकी ही पुत्री डॉ शोभा क्यों नहीं समझ पा रही है? अन्यथा पूना निवासी अपनी छोटी पुत्री के सहयोग से ‘पूना प्रवासी’ ब्लागर को हमारे विरुद्ध खड़ा नहीं करवातीं जिसने ब्लाग जगत में हमारे विरुद्ध लामबंदी कर रखी है और यशवन्त को हर-संभव नुकसान पहुंचाने को प्रयासरत है। सीतापुरिए कुक्कू/शरद व अन्य राजनेता को हमारे विरुद्ध नहीं लगाया जाता।जिनकी बुद्धि पैर के तलवों में बसती है मैं उनसे किसी बुद्धिमानी की अपेक्षा बिलकुल भी नहीं करता हूँ। निजी आत्म-विश्वास व माँ की सीख मेरा संबल व पूंजी हैं।

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विद्रोही स्व-स्वर में तो फिर वे क्यों ऐ सा करते हैं?(भाग-2) —विजय राजबली माथुर

आज ही के दिन उन्नीस वर्ष पूर्व जब मैं शालिनी के देहावसान की सूचना देने अर्जुन नगर रानी मौसी के घर गया था तब यशवन्त साथ नहीं गया था क्योंकि उस वक्त बाबूजी व माँ घर पर थे। रानी मौसी ने नवीन को भी बताने को कहा था और उसी के साथ वह आईं थीं। शोभा व अजय को टेलीग्राम करने जाते वक्त भी यशवन्त घर पर ही रहा था,एक दिन पूर्व जब 16 जून की साँय राजा-की-मंडी स्टेशन पर पार्सल बाबू शरद मोहन के घर सूचना देने जाते समय ज़रूर वह साथ गया था।(http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/03/1994-95-5.html) रात्रि में पार्सल बाबू की माँ व पत्नी आए थे और उनके जाने के बाद पार्सल बाबू भी आए थे। 17 ता.की सुबह भी उनकी माँ व पत्नी एक साथ आए थे और उनके भिलाई वाले ताऊजी अलग से जबकि खुद पार्सल बाबू (कमलेश बाबू के सखा व भतीज दामाद कुक्कू के छोटे भाई) अपने रेलवे के सहकर्मी आठ-नौ लोगों के साथ। टेलीफोन विभाग के आर सी माथुर (जिनके एक भाई झांसी में कार्यरत थे और एक बहन अलीगढ़ में कमलेश बाबू के घर के निकट रह रहीं थीं और उनकी माता जी से घनिष्ठ मेल था जिन्होने बाद में आर सी माथुर की बेटी की शादी अपने एक भांजे से करवाई थी-http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/04/1994-95-8.html) घाट पर डॉ रामनाथ के साथ उनके स्कूटर से गए थे। घाट पर आर सी माथुर ने डॉ रामनाथ को कुछ पाठ पढ़ाया होगा जिस कारण उन्होने मुझसे कहा था कि यदि कोई समस्या हो तो हमसे मदद ज़रूर लेना। तत्काल मैं समझ गया था कि घाट पर कोई षड्यंत्र रचा गया है। अतः उसी क्षण से डॉ रामनाथ से दूरी बना ली और खुद ही ‘ज्योतिष’ का ज्ञान बढ़ाना शुरू कर दिया (http://krantiswar.blogspot.in/2012/06/blog-post_16.html)

जब डॉ रामनाथ ने पार्सल बाबू की पत्नी से मंत्रणा के बाद 1993 में कहा था उन्होने शालिनी को TB होने का शक ज़ाहिर किया है और पार्सल बाबू की पत्नी ने कहा था कि डॉ रामनाथ ने TB का शक ज़ाहिर किया है तभी से उन लोगों के बीच खिचड़ी पकने का एहसास मुझे पहले से था। इसी लिए मैंने TB स्पेशलिस्ट कामरेड डॉ विनय आहूजा को दिखाया था जिन्होने सम्पूर्ण टेस्ट व जांच के बाद TB का कोई भी लक्षण न होना बताया था। (http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/03/1992-93-10.html)

बाद की घटनाओं से सिद्ध हुआ था कि कमलेश बाबू के इशारे पर कुक्कू ने डॉ रामनाथ को 1981 में ही खरीद लिया था और डॉ रामनाथ मेरे लिए आस्तीन का साँप बन गए थे जिन्होने 14 गुण पर शालिनी से शादी की राय 28 गुण मिलना बता कर दे दी थी। (http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/04/1994-95-6.html)

इस षड्यंत्र के तहत यह प्रचारित किया गया कि शालिनी की मृत्यु अस्वाभाविक थी और मुझे जेल पहुंचाने का भी बंदोबस्त किया जाने लगा (बाद में रेकसन शूज के पार्टनर सेठ नारायण दास जी ने बताया था कि उनके बड़े भाई से दूसरा अकाउंटेंट खोजने को कहा गया था क्योंकि सूचनादाता पूर्ण आश्वस्त था कि मुझे जेल में पहुंचा ही दिया जाएगा)उधर डॉ शोभा ने माँ से यशवन्त को हस्तगत करने का भी असफल प्रयास किया था । इन घटनाओं से अब विश्लेषण करने पर भान होता है कि डॉ शोभा/कमलेश बाबू ऊपर-ऊपर मिलकर चलते हुये मेरे व यशवन्त के लिए भीतर-भीतर खाई खोद रहे थे। सन 2000 ई.में जयपुर में अपनी बड़ी पुत्री की श्वसराल जयपुर से लौटते में आगरा ठहरने पर डॉ शोभा ने पूनम से कहा था कि दादा को पार्सल बाबू के घर वालों से मिल कर चलना चाहिए था। कभी मेरे राजनीति में भाग लेने पर कभी किस से मेल रखें या किस से न रखें को मुद्दा बना कर डॉ शोभा पूनम को गुमराह करने का प्रयास करती रही हैं। गलती हमारी ही रही जो हम उनको बहन-बहनोई मान कर चलते रहे।

बहरहाल जब जून 1995 में माता-पिता की भी मृत्यु हो गई और मैं व यशवन्त अकेले रह गए तब इस घृणित प्रचार अभियान को तेज़ धार दी गई। अतः मुझे पत्रों (जिनकी प्रतियाँ उनके रिशतेदारों को भी भेजी थीं)के माध्यम से पार्सल बाबू की माँ से स्पष्ट पूछना पड़ा कि जैसा कि वह अफवाह उड़ा रही हैं कि किसी प्रेम के चलते रास्ता साफ किया गया है तो वह उस प्रेमिका का भी नाम बताएं कि वह किसकी बेटी अथवा किसकी पत्नी है । प्रेम काठ,लोहा,सीमेंट,रेत आदि निर्जीव पदार्थों से तो उनके आरोपों में नहीं है अतः बिना किसी का नाम बताए झूठा आरोप लगाने पर उनके विरुद्ध कानूनी कारवाई की जाएगी। तब जा कर दुष्प्रचार थम गया था। लेकिन मुझे यह भी तय करना पड़ा कि माँ-पिता द्वारा चयनित पूनम से विवाह कर लेना ही उचित रहेगा अन्यथा बाबाजी व नानाजी की भांति पुनर्विवाह न करने की स्थिति में ये दुष्ट लोग फिर कभी दोबारा सिर उठा सकते हैं।

लेकिन आज भी कमलेश बाबू/कुक्कू गठबंधन ब्लाग जगत व राजनीतिक क्षेत्र में अपनी पिनें ( धन -लोलुप प्यादों)को चुभो कर परेशान कर ही रहा है। वैसे हम भी अब 19 वर्षों से झेलते-झेलते पीड़ाओं के अभ्यस्त हो गए हैं। परंतु अनुत्तरित प्रश्न यह है कि जो लोग हमें परेशान तो करते हैं लेकिन खुद लाभान्वित भी नहीं हो पाते हैं "तो फिर वे क्यों ऐसा करते हैं?"

 

विद्रोही स्व-स्वर में तो फिर वे क्यों ऐ सा करते हैं? —विजय राजबली माथुर

यों तो मुझे अतीत में विचरण करते रहने की आदत नहीं है और सिर्फ इसलिए पीछे देखता हूँ कि कब-कब और कहाँ -कहाँ,कैसे-कैसे ठोकर लगी जिससे भविष्य में उससे बचा जा सके।लेकिन जब आज 18 वर्ष पीछे की घटना का वर्णन कर रहा हूँ तो किसी ठोकर लगने की बात नहीं है और न ही कोई भावुकता की बात है। सिर्फ यह बतलाना चाहता हूँ कि किस प्रकार निकटतम एवं घनिश्ठ्तम लोग भी मौके का किस प्रकार फायदा उठाते हैं।

जैसा कि पिछले पोस्ट से स्पष्ट होता है कि 18 वर्ष पूर्व हमारे बाबूजी ने यह संसार छोड़ा था। यों बुखार आदि होता रहता है दो-तीन दिन से बाबूजी को बुखार था और दवा ले रहे थे बउआ की तबीयत भी ठीक नहीं थी मैंने डॉ के पास चलने को कहा तो बाबूजी ने कहा कि कल दिन में चलेंगे। लेकिन 13 जून 1995 की रात को 1-30 पर उनका प्राणान्त हो गया जबकि रात को 9 बजे तक उन्होने खुद ही हैंड पंप चलाकर पानी स्तेमाल किया था। उस दिन उन्होने कह कर मुझसे करेले की सब्जी बनवाई थी किन्तु चखा भर था अगले दिन खाने को कह दिया था। 16 जून 1994 को शालिनी के देहांत के बाद से पहले माँ और बाबूजी ही खाना बनाते थे परंतु फिर मैंने सुबह ही दोनों वक्त की सब्जी बना कर रखना व सुबह की रोटी सेंकना शुरू कर दिया था। शाम को बाबूजी यशवन्त को भूख लगने की बात कह कर मेरे घर पहुँचने तक पराँठे सेंक लेते थे। इधर दो दिन से मैं बाज़ार ड्यूटी पर नहीं गया था। सुबह पाँच बजे अर्जुन नगर रानी मौसी आदि के घर मोपेड़ से सूचना देने जा रहा था यशवन्त भी साथ चलने की ज़िद्द करने लगा। माँ ने कह दिया लेते जाओ हम अकेले रह लेंगे लेकिन उन्होने अपनी अंगूठी व चूड़ियाँ उतार कर मुझे देते हुये कहा कि सोने की जेब में रख लो और वह अकेले ही बाबूजी के पार्थिव शरीर के पास बैठी रहीं।

अर्जुन नगर से लौटते में बिजली न आने की समस्या पर लोगों के जाम का सामना करना पड़ा। यह कहने पर भी कि घर में माँ अकेली पिता जी के पार्थिव शरीर के साथ हैं हमें जाने दिया जाये जामकर्ताओं ने यह कह कर इंकार किया कि सब ऐसे ही बहाना करते हैं। बड़ी मुश्किल से हम जाम से निकल सके और यही कारण है कि व्यक्तिगत रूप से मैं सड़क जाम करने के विरुद्ध रहता हूँ। वहाँ से आकर डॉ शोभा व अजय को ‘तार'(TELEGRAM) जो अब( 15 जूलाई से बंद होने जा रहे हैं ) करने गए फिर यशवन्त साथ गया और माँ फिर अकेली रहीं। झांसी से शोभा/कमलेश बाबू तो 5 -30 तक पहुँच गए किन्तु अजय नहीं पहुंचे । उस दिन शोभा को सपरिवार फरीदाबाद घूमने पहुँचना था और अजय उन लोगों के इंतज़ार में रुके रहे थे। रात्रि 7 -30 पर वह पहुंचे तब बाबूजी को घाट ले जाया जा सका। वहाँ से लौटते-लौटते 9 बज चुका था। नहाने-धोने के बाद मैं गहरा कर सो गया था।

शायद बाबूजी को घाट ले जाने के बाद माँ अनकांशस हो गईं थीं। अजय और शोभा उन पर कुछ खाने का दबाव बनाते-बनाते जब थक गए और उनका जवाब नहीं मिला तो शोभा मुझे जगा कर और यह कह कर ले गईं कि अब तुम्ही माँ को खिलाओ हम लोगों से नहीं मान रही हैं। जब वह अचेत थीं तो मेरे कहने से भी कोई फर्क नहीं पड़ना था किन्तु छोटे भाई-बहन की त्यौरिया चढ़ी हुई थीं। मैंने कहा कि आज छोड़ दो कल देखेंगे और मैं फिर सो गया। 14 जून से जो माँ अचेत हुईं तो 25 जून को प्राणान्त तक अचेत ही रहीं एलोपैथी इलाज का धेला भर भी असर नहीं हुआ। 5 दिन नर्सिंग होम में भी रहीं ,डॉ अशोक गर्ग (जिनके पास अजय इलाज के लिए ले गए थे उनका संबंध RSSसे था मैं उनसे इलाज कराने का पक्षधर नहीं था )का कहना था कि पेट पंकचर करके नलियाँ डाल देंगे उनसे लिक्विड दिया जा सकेगा किन्तु पेट पंकचर करते में यदि मृत्यु हो जाये तो उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। अतः मैंने इस आपरेशन को नहीं होने दिया।

बाबूजी की डेथ और माँ की बीमारी के दौरान पूनम के पिताजी का जवाबी पत्र बाबूजी के नाम आया था। उस वक्त अजय और कमलेश बाबू नर्सिंग होम में थे मैं भी किसी काम से कहीं गया हुआ था। जब लौटा तो पता चला कि शोभा और अजय की पत्नी के मध्य यह विवाद छिड़ गया था कि पत्र अजय खोल कर जवाब देंगे कि कमलेश बाबू। मैंने सीधे-सपाट दोनों से कहा कि मुझसे छोटे होने के कारण न अजय और न ही कमलेश बाबू को कोई हक है कि वे लिफाफा खोलें और जवाब दें। माँ इस स्थिति में नहीं हैं अतः मैं खुद ही देखूंगा और जवाब जो देना होगा उसे इस वक्त टाल दूँगा सिर्फ बाबूजी के न रहने व माँ की बीमारी की सूचना भेज दूँगा। और वही मैंने किया। हालांकि शोभा/कमलेश बाबू व अजय और उनकी पत्नी चुप तो हो गए किन्तु भविष्य में कोई चाल चलने की सोच कर ही।

अगले ही दिन शोभा/कमलेश बाबू झांसी चले गए ,उनकी बेटियाँ भी वहाँ अकेली थीं। 23 जून को मेरे बहुत मना करने के बावजूद अजय भी अपनी पत्नी व बेटी के साथ फरीदाबाद लौट गए। 25 की रात 7-45 पर माँ का भी प्राणान्त होने के समय फिर यशवन्त ही मेरे साथ मौजूद रहा। हालांकि आज बाबूजी की अंतिम विदाई के 18 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं परंतु लगता है कि अभी कल की ही घटना है। माँ के तुरंत बाद ही अजय ने तो सम्पर्क तोड़ लिया था ,मई 2011 में शोभा/कमलेश बाबू के लखनऊ आगमन के बाद से मैंने उन लोगों से सम्पर्क तोड़ लिया है। क्योंकि यह खुलासा हो चुका था कि पूना वासी छोटी भांजी ने पूनम की श्रीवास्तव बिरादरी के ब्लागर्स चुन कर उनको मेरे व यशवन्त के विरुद्ध अपने पिता श्री के माध्यम से उकसाया था। इसका प्रभाव हमारी हमारी पार्टी के कुछ विशिष्ट पदाधिकारियों पर भी है जो उन ब्लागर्स से संबन्धित हैं।

यह सब सार्वजनिक करने का उद्देश्य छोटे बहन-भाई को कोसना नहीं है बल्कि यह सोच कर हैरानी होती है कि आखिर मुझे,पूनम को या यशवन्त को नुकसान पहुंचाने पर बहन-भाई को तो कुछ लाभ होगा नही;सिर्फ ऐरे-गैरे नत्थू -खैरे ही लाभ उठा सकेंगे तो फिर वे क्यों ऐसा करते हैं?

 

विद्रोही स्व-स्वर में पत्र उस पिता के न ाम जो इस संसार में नहीं हैं —विजय राजबली माथुर

पुण्य तिथि-13 जून पर विशेष :

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स्व.ताज राज बली माथुर (चित्र महायुद्ध से लौटने के बाद )

बाबूजी प्रणाम ,

चूंकि आत्मा अजर-अमर है अतः इस समय जहां भी आपकी आत्मा होगी इस पत्र का संदेश वहाँ आप तक अवश्य ही पहुँच जाएगा। मैंने जब एक बार आपसे कहा था कि आपने सच्चाई और ईमानदारी सिखा कर पंगु बना दिया है इस संसार में मैं चल नहीं पा रहा हूँ। तब आपने जवाब दिया था कि हमने तो सभी बच्चों को सच्चाई और ईमानदारी ही सिखाई थी जैसे तुम्हारे बहन-भाई ने अपना अलग रास्ता चुन लिया तो तुम भी चुन लेते या अब चुन लो लेकिन हमने गलत नहीं सिखाया है। न आपने गलत सिखाया था न मैं उसे छोड़ सकता था न छोड़ा है। हाँ जैसे कि यह मार्ग कंटकाकीर्ण होता है वैसा ही है मैं तो बचपन से ही अभ्यस्त था लेकिन मेरे साथ-साथ पूनम और यशवन्त को भी इसका अभ्यस्त बन कर कष्ट उठाना पड़ रहा है। पूनम का अक्सर प्रश्न होता है कि जब आपने किसी का बिगाड़ा नहीं है तब लोग आपकी ही क्यों खिलाफत करते हैं। कल फेसबुक पर इसका जवाब यह मिल गया है-

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औरों की बात छोड़िए आपके ही पुत्र व पुत्री भी मुझे गलत समझते व कहते हैं। डॉ शोभा ने तो पूनम से मेरी शिकायत करते हुये ही कहा था कि दादा ने नेतागिरी के चक्कर में अपनी नौकरी गवाई ,नेतागिरी ही करनी थी तो सच्चाधारी और ईमानदार बनने की क्या ज़रूरत थी?अजय न नेतागिरी में रहे न ही सच्चे व ईमानदार तो उनको क्यों बार-बार नौकरी में झंझट हुये और उनको किसी दूसरे के फ़ाईनान्स पर ठेकेदारी करनी पड़ी मैं होता तो यह सवाल डॉ शोभा से उठाता परंतु पूनम यह सब क्या जानती थीं? फिर छोटी नन्द से सवाल उठाने का साहस भी उनमें नहीं है। खुद शोभा के मुताबिक ही अजय की स्थिति मेरे मुताबिक भी खराब थी जब उन्होने पूनम से यह सब कहा था -दो वर्ष पूर्व लखनऊ आने पर।

हाँ डॉ शोभा के पति कमलेश बाबू जो शादी के समय 1975 में ‘मेशीनिस्ट’ थे हरद्वार BHEL में वह झांसी आकर ‘फोरमेन’ के रूप में रिटायर होकर अब नेल्लोर में इंजीनियर बन कर हवाई यात्राएं जो करने लगे सो डॉ साहिबा को भाभी से बड़े भाई की शिकायतें करने का हक हासिल हो गया था।हरिद्वार में CITU की यूनियन में सक्रिय रह कर कमलेश बाबू BHEL के मेटीरियल से सिलाई मशीनें,पंखे आदि बना कर यूनियन के दम पर बाहर बेच कर धन कमाते रहे और झांसी आने के बाद मेनेजमेंट के खासमखास बन गए ऐसा सब करना मेरे लिए संभव नहीं था। मैं तो यह प्रयास करता हूँ कि नेतृत्व करने वाले लोग ईमानदार व सच्चे हों तो सब का कल्याण हो सके। 1976 में कमलेश बाबू ने यह प्रयास किया था कि आप दरियाबाद में अपना पुश्तैनी हिस्सा ले लें और उनको अपना प्रतिनिधि बना कर वहाँ भेज दें जिसके लिए वह BHEL की अपनी नौकरी भी छोडने को तैयार थे। उस वक्त रायपुर कोठी पर कब्जे वाले सुरेश भाई साहब से उनकी खूब छ्नती थी। अब मथुरानगर में कब्जे वाले ऋषिराज,नरेश और उमेश उनके प्रिय हैं।

मेरे लखनऊ आने के बाद शोभा/कमलेश बाबू ने दरियाबाद के लोगों को यह अफवाह उड़ा कर डरा दिया है कि मैं लखनऊ अपना हक लेने के इरादे से आया हूँ। उन लोगों ने RSS से सम्पर्क करके ब्लाग जगत व हमारी पार्टी तथा लोकेलटी में भी हमारे विरुद्ध लामबंदी कर रखी है। पूनम का चयन करने के बाद आप व बउआ तो यह संसार छोड़ गए शोभा/कमलेश बाबू ने भरसक प्रयास किया कि आप लोगों के बाद आप लोगों के चयन को मैं रद्द कर दूँ जो मैंने नहीं किया। अतः उन लोगों ने पूनम की बिरादरी के ब्लागर्स का चयन अपनी पूना वासी पुत्री की सहायता से मेरे विरुद्ध आग उगलने हेतु किया जिसमे वे अपने को सफल समझ रहे हैं। RKL,PTS,RSS,BSR,RPP सदृश्य ब्लागर्स/राजनेता उनको भरपूर सहयोग प्रदान कर रहे हैं। निशुल्क-निस्वार्थ सहायता करने के मेरे प्रयास को ध्वस्त करने हेतु मार्ग-दुर्घटना व पारिवारिक जनों को रुग्ण करने का तांत्रिक प्रयास उन लोगों द्वारा चलाया जा रहा है। तात्कालिक रूप से वे सफल तो हो सकते हैं किन्तु दीर्घकालिक रूप से उन सब को ही यह कुचक्र मंहगा साबित होगा।

क्योंकि स्वामी विवेकानंद के अनुसार समय से आगे विचार करने वाले को गलत समझा जाता है इसीलिए मुझे भी आज गलत समझा जा रहा है। अगले 50/100 वर्ष में मैं सही साबित हो जाऊंगा ऐसा मुझे दृढ़ विश्वास है। मुझे नहीं लगता कि आपके द्वारा दी गई ‘ईमानदारी’ व ‘सच्चाई’ की शिक्षा गलत सिद्ध होगी।

आपका पुत्र
विजय

 

विद्रोही स्व-स्वर में संकल्प कितना मंह गा?—विजय राजबली माथुर

जिस पत्रिका के लिए मैंने सहयोग का आश्वासन दिया है उसी के पी टी एस महोदय के संपर्क उन राजनीतिक ब्लागर व राजनेता महोदय से घनिष्ठतम हैं । अतः उन्होने मुझे प्रवचन देते हुये बताया है कि मुझसे पूर्व कई लोग उनके साथ काम करने आए जिनमें कोई 10 दिन में तो कोई महीने भर में पलायन कर गया था। उन्होने अपने छात्र जीवन के किस्से बताते हुये यह भी जतलाया कि वह मार-धाड़ में भी रहे हैं और बाबू जगजीवन राम,इन्दिरा जी एवं एच एन बहुगुणा जी के साथ उनके मंच से बतौर छात्र नेता भाषण दे चुके हैं। कप्यूटर मरम्मत करने वाले और एक डिजाईनर साहब को वह बनाए रखना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि मुझे उनके साथ लंबी रेस मे रहना चाहिए ,तमाम लोग परेशान कर सकते हैं लेकिन वह मेरा समर्थन करेंगे। उनके प्रवचनों का अर्थ मैंने यह तत्काल लगा लिया था कि वह मुझे परेशान करने व उखाड़ने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। क्योंकि उनके प्रवचनों के एक भी शब्द का मेरे कार्य से कोई किसी भी प्रकार का संबंध नहीं था। सम्पूर्ण प्रवचन अनावश्यक व अनर्गल था। मुझे किसी अन्य कार्य करने वाले के कार्यों में हस्तक्षेप कहाँ?और क्यों करना था?किसी को भी मेरी शिकायत करने को क्यों तत्पर होना था?मुझे किसी से क्यों टकराना था?सब कुछ अव्यवहारिक बातें थीं उनके प्रवचन में किन्तु उनका कुछ तो अर्थ होगा ही जो मुझसे कहने की आवश्यकता आन पड़ी।

उनके प्रवचन के अगले दिन रास्ते में लौटते में एक मारुति कार (जिस पर उ .प्र.सचिवालय की तख्ती लगी थी)ने पीछे से मेरी साईकिल मे टक्कर मारी । पुनः उससे अगले दिन साईकिल के हैंडिल में एक स्कूटर वाले साहब ने टक्कर मारी ;इस सब का क्या उद्देश्य हो सकता है किसी व्याख्या का मोहताज नहीं है।

जब इस सब का प्रभाव मुझ पर नहीं दिखाई दिया तो आर के एल साहब की माफिक तांत्रिक प्रक्रिया का सहारा लेकर मेरी पत्नी की तबीयत खराब करा दी परंतु तब भी मुझे अडिग देखते हुये साथ ही साथ पुत्र की तबीयत पर भी हमला किया गया।यह सब उस सब के बावजूद है जबकि मैंने उनके परिवार के कल्याण हेतु एक स्तुति उनको ई-मेल द्वारा भेजी है। यह आर पी पी/आर एस एस की शुद्ध नकल प्रक्रिया है।

पी टी एस साहब ने तिकड़म करते हुये मेरा आई डी/पास वर्ड हासिल कर लिया तो उसका मुक़ाबला करने हेतु पास वर्ड भी तब्दील करना पड़ा एवं एक नई आई डी/पास वर्ड सार्वजनिक कार्य हेतु बनाना पड़ा।

बहरहाल याह बात साफ है कि यदि मैं दिये आश्वासन की पूर्ती करता हूँ तो कितनी जोखिम उठानी पड़ेगी पी टी एस महोदय की क्या-क्या कृपा हो सकती हैं? मुझे पूर्वानुमान है।

 

विद्रोही स्व-स्वर में हमें क्या करना चा हिए?—विजय राजबली माथुर

प्रत्येक व्यक्ति विभिन्न सोच रखता और तदनुरूप कार्य करता है। मेरा विचार अपने माता-पिता को कष्ट न पहुँचने देने का रहा है अतः मैंने भरसक प्रयास किया कि उनकी बातों को जैसे का तैसा पूरा किया जाये जैसा कि वे चाहते थे। मैं उनको पूर्ण संतुष्ट करने में कामयाब रहा या नहीं मैं खुद कोई दावा नहीं कर सकता। किन्तु दो वर्ष पूर्व लखनऊ आने पर छोटी बहन ने पूनम से कहा था कि माँ मेरा अत्यधिक पक्षपात करती थीं। मुझे नहीं लगता कि उन्होने छोटे भाई या बहन का ध्यान मुझ से कम रखा। बल्कि उन लोगों से ही मेरे बारे में भी सलाह लेती रहती थीं जो बात मुझे नागवार भी लगती थी। यहाँ तक कि,बहनोई साहब की एक भतीजी (जिसका खुलासा माता-पिता की मृत्यु के काफी बाद सिर्फ पाँच वर्ष पूर्व ही हुआ है और जिसे दो वर्ष पूर्व लखनऊ हमारे यहाँ आने पर खुद उन्होने स्वीकार भी किया है ) की नन्द से विवाह भी बहन-बहनोई की पसंद से ही तय किया गया था। परंतु बहन-बहनोई ने पत्नी के बाद माता-पिता से यशवन्त को हस्तगत करने का भी प्रयास किया था जिसे छोटे भाई की पत्नी ने विफल कर दिया था । यही कारण है कि माता-पिता की भी मृत्यु हो जाने पर उन लोगों ने तिकड़म से भाई को हमसे दूरी बनाने पर बाध्य कर दिया और हमें मिल कर हमें तबाह करने के षड्यंत्र में कुक्कू/पार्सल बाबू को लगा दिया। कुक्कू बहनोई साहब के बचपन के दोस्त व भतीज दामाद जो ठहरे। वे लोग आगरा छोडने के हमारे निर्णय के विरुद्ध थे। लेकिन मुझे यशवन्त की इच्छा को देखना चाहिए था या बहन/बहनोई की इच्छा को?

स्वभाविक रूप से मैंने यशवन्त की इच्छा को वरीयता दी तो उन लोगों को नागवार लगना ही था। लिहाजा पूना निवासी हमारी छोटी भांजी ने ब्लाग्स में मेरे व यशवन्त के पोस्ट्स पर प्राप्त टिप्पणियों के सहारे टिप्पणी दाताओं की प्रोफाईल चेक कर -कर के कुछ ब्लागर्स को चुन कर हमारे विरुद्ध अपने पिता अर्थात हमारे बहनोई साहब के माध्यम से उकसाया। हैरानी की बात यह है कि ये पढे-लिखे और विद्वान ब्लागर्स कैसे किसी का निजी मोहरा बन गए और क्यों हमारे विरुद्ध लामबंदी में संलग्न हो गए?

दरियाबाद से संबन्धित एक ब्लागर और पटना से संबन्धित एक ब्लागर को इस आधार पर चुना गया कि वे पूनम की श्रीवास्तव बिरादरी से संबन्धित थे। इन लोगों में एक फिलहाल पूना प्रवासी है और हमारी भांजी के पड़ौस में भी रहना हुआ है। इनमें बी एस आर ने अपने रिश्तेदार एक प्रादेशिक राजनेता आर के एल को जो उनके भाइयों के मोहल्लेदार भी हैं को हमें परेशान करने का कार्य सौंप रखा है। इन साहब को हमारे अपने पार्टी कार्यालय जाने पर भी आपत्ति है और फिर दोबारा आगरा न जाने पर भी। उनको यह जानने की उत्कंठा है कि मैं आगरा जाने पर किस-किस के यहाँ ठहर सकता हूँ। उनको यशवंत से कुछ कन्सेशनल और कुछ मुफ्त काम कराने एवं मुझसे निशुल्क दो जन्मपत्रियों का विश्लेषण कराने के बाद भी हमारे परिवार के सभी सदस्यों पर नाहक तोहमत लगाने की एहसान फरामोशी करके आनंदानुभूति होती है।

चूंकि लखनऊ यशवन्त की ख़्वाहिश के कारण आए थे अतः कानपुर के अपने संपर्कों द्वारा वहाँ जाब में उसकी भुआ द्वारा परेशान करवाया गया और मुझको सुझाव दिया गया कि मैं उससे जाब छुड़ा कर बहनोई साहब के मित्र बिल्डर के यहाँ जाब करने को कहूँ। परंतु मैंने उसको घर पर ही साईबर चलाने का प्रबंध कर दिया था। आर के एल के पेशेवर मित्र के माध्यम से उसे इस कार्य मे क्षति पहुंचाई गई। आर पी पी के माध्यम से पूना/पटना में जाब दिलवाने का उसे प्रलोभन दिया गया जिसके विफल होने पर उसे आर्थिक चोट पहुंचाने का उपक्रम किया गया। संबन्धित लोगों से कट आफ करने पर आर के एल आपत्ति करते हैं। वह इस पर भी आपत्ति करते हैं कि मैं अपनी पसंद की पार्टी में क्यों राजनीति में हूँ? आगरा में एक बार बहन ने भी पूनम से मेरे राजनीति में भाग लेने पर आपत्ति की थी।

मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि मुझे क्यों किसी दूसरे की सलाह पर कार्य करने चाहिए?मैं खुद क्यों अपने निर्णय नहीं ले सकता?हमें क्या करना चाहिए ? क्यों दूसरे लोग हमें बिन सलाह मांगे बताना चाहते हैं कि हम क्या करें और क्या नहीं?सबसे बड़ा ताज्जुब तो यह होता है कि जिस श्रीवास्तव बिरादरी में डॉ राजेन्द्र प्रसाद जैसे राष्ट्रपति,लाल बहादुर शास्त्री जी जैसे प्रधानमंत्री और डॉ सम्पूर्णान्द जैसे संविधान शास्त्री हुये हों उस बिरादरी में हुये ब्लागर्स व राजनेता किस स्वार्थ/बुद्धिहीनता के कारण अपनी उसी बिरादरी की पूनम का विरोध करने की हमारे बहन-बहनोई की मुहिम का मोहरा क्यों बने हुये हैं?

 
 
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