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Monthly Archives: September 2013

विद्रोही स्व-स्वर में बहुत मुश्किल है क ुछ यादों का भुलाया जाना (भाग-2 ) —विजय राजबली मा थुर

डॉ गिरीश
चार वर्ष पूर्व जब हम आगरा से लखनऊ आए थे तो कुछ उलझनों में फंस जाने के कारण क़ैसर बाग पार्टी कार्यालय में संपर्क न कर सके ,पहला उद्देश्य यहाँ सेटिल होना था। सेटिल होने के बाद 25 सितंबर 2010 को हम डॉ गिरीश जी से संपर्क कर सके उससे पूर्व जब भी हम गए वह बाहर के टूर पर रहे। डॉ गिरीश जी को हम आगरा से इसलिए जानते थे कि वह अक्सर ही वहाँ पार्टी कार्यालय और पार्टी कार्यक्रमों में आते रहते थे। कामरेड अशोक मिश्रा जी से भी पूर्व परिचय था किन्तु इत्तिफ़ाक से वह भी न मिल पाये थे। डॉ साहब ने प्रदेश पार्टी के मुखिया होते हुये भी जिस आत्मीयता से भेंट की वह स्मरणीय रहेगी। लगभग तीन घंटे हम उनके साथ रहे। आगरा पार्टी ,वहाँ के कामरेड्स और मेरी घरेलू समस्याओं पर भी उन्होने चर्चा की। उनका कहना था कि यदि मैं पहले मिला होता तो मेरी समस्याओं का निदान वह कामरेड ख़ालिक़ के माध्यम से सहजता से करा देते।
जब भी कभी मैं कार्यालय में उनसे मिला वह पूर्ण सौहाद्र के साथ मिले। कामरेड मिश्रा जी ने भी पहचान लिया था। AISF के कार्यक्रम के दौरान मैं डॉ साहब के निर्देशानुसार उपस्थित रहा था। उस कार्यक्रम के समापन के अवसर पर जब डॉ साहब ने उनको सहयोग करने वालों के नाम घोषित किए तो उनमें मेरा भी नाम शामिल था। यह डॉ साहब की महानता ही थी कि मुझ जैसे क्षुद्र कार्यकर्ता का नाम भी उन्होने भरे सभागार में अत्यंत सक्रिय कामरेड्स के साथ लिया। उनके निर्देशानुसार यशवन्त ने भी अपनी उपस्थिती दर्ज कराई थी अतः उसे भी मेरे अतिरिक्त AISF के बैग डॉ साहब ने प्रदान किए।
यों तो मैं ज़िले का कार्यकर्ता हूँ परंतु डॉ साहब के निर्देश पर जब भी उन्होने याद किया मैं हाजिर होता रहा। मई 2013 में उन्होने मुझसे प्रदेश कार्यालय में कंप्यूटर कार्य में सहयोग करने को कहा और मैं सुविधानुसार वहाँ पहुँच जाता था। परंतु जिनके साथ कार्य करना था वह किसी दूसरे का दखल नहीं चाहते थे। इस बात से डॉ साहब के टूर से लौटने पर मैंने अवगत करा दिया था और स्पष्ट कर दिया था कि इसी कारण बीच-बीच में अनुपस्थित रहा था। वह साहब डॉ साहब के सामने बड़े भोले बन जाते थे लेकिन उन के टूर पर जाते ही अपने असली रंग में दिखने लगते थे जिन सब बातों का ज़िक्र पिछले पोस्ट्स में विस्तृत रूप से हो चुका है।
मैंने 11 जूलाई 2013 को डॉ साहब से संदेह व्यक्त कर दिया था कि वह जनाब अब ‘टकराव’के रास्ते पर हैं। 13 जूलाई 2013 की मीटिंग में वह मेरी कुर्सी और मेरे पैरों पर ही ठोकरें नहीं मारते रहे बल्कि पेट में भी उंगली भोंकते रहे। मैं डॉ साहब के सम्मान के कारण चुप-चाप बर्दाश्त करता रहा किन्तु उनको बाद में सूचित कर दिया था। इसी कारण 07 सितंबर 2013 की मीटिंग में मैं अनुपस्थित (पहली बार) हुआ। 09 सितंबर को कामरेड अतुल अंजान से संबन्धित मेरी एक पोस्ट को डिलीट करने के साथ ही साथ उन प्रदीप तिवारी साहब ने मुझे ब्लाग एडमिन एंड आथरशिप से हटा दिया। छह वर्ष से पी टी साहब ने प्रदेश सचिव को ब्लाग से दूर रखा था मैंने प्रदेश सचिव डॉ गिरीश साहब एवं प्रदेश सह -सचिव डॉ अरविंद राज स्वरूप साहब को निवेदन दिया कि वे ब्लाग एडमिन बन जाएँ जिसे उन दोनों ने स्वीकार कर लिया। किन्तु पी टी साहब को तीखा चुभ गया और उस पर अंजान साहब के समाचार को ब्लाग पोस्ट के रूप में देना उनको बिलकुल भी बर्दाश्त न हुआ।
प्रदीप तिवारी द्वारा मुझे धमकाना,ठोकर मारना,पेट में उंगली भोंकना आदि-आदि तो ‘सोशल एप्रोच’ है। लेकिन अंजान साहब या गुरुदास दासगुप्ता जी से संबन्धित पोस्ट मेरे द्वारा देना ‘व्यक्तिगत एप्रोच’ है। अतः एक नया ब्लाग-,शुरू कर दिया है। इस नए ब्लाग के माध्यम से अपने राष्ट्रीय नेताओं के विचारों को सुगमता‘साम्यवाद(COMMUNISM)’ से प्रकाशित कर सकूँगा। यदि डॉ साहब मुझे बुला कर मुझसे कार्य न करवाते तो मैं आज यह नया ब्लाग चलाने के बारे में सोच भी न सकता था। अतः मैं हृदय से आदरणीय डॉ गिरीश जी का आभारी हूँ कि उन्होने मुझे इस लायक बनने की प्रेरणा दी।

 

विद्रोही स्व-स्वर में पूर्वानुमान सही निकला—विजय राजबली माथुर

http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/06/blog-post_9.html
दिये गए लिंक पर मैंने 09 जून 2013 को ही लिखा था-
1)-उनके प्रवचनों का अर्थ मैंने यह तत्काल लगा लिया था कि वह मुझे परेशान करने व उखाड़ने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे।
2)- पी टी एस साहब ने तिकड़म करते हुये मेरा आई डी/पास वर्ड हासिल कर लिया तो उसका मुक़ाबला करने हेतु पास वर्ड भी तब्दील करना पड़ा एवं एक नई आई डी/पास वर्ड सार्वजनिक कार्य हेतु बनाना पड़ा।
3)-बहरहाल याह बात साफ है कि यदि मैं दिये आश्वासन की पूर्ती करता हूँ तो कितनी जोखिम उठानी पड़ेगी पी टी एस महोदय की क्या-क्या कृपा हो सकती हैं? मुझे पूर्वानुमान है।

http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/07/blog-post.html

इस लिंक पर 03 जूलाई को लिखा था-

1)-"पी टी एस के मुझसे खफा होने का कारण मात्र इतना सा है कि उनके बड़े नेता जी ने मुझे उनकी सहायता करने को कहा है जिसे मैंने सहर्ष निस्वार्थ भाव से स्वीकार कर लिया है। पहले उन्होने इर-रिलीवेंट कहानियाँ सुना -सुना कर मुझे भयभीत करने का प्रयास किया जिसमें असफल रहने पर फिर तांत्रिक प्रक्रियाओं के सहारे से मुझे ही नहीं परिवारी जनों को भी त्रस्त करने लगे। एक रोज़ मार्ग में साईकिल में पीछे से ‘उ.प्र.सचिवालय’ की तख्ती लगाए कार ने टक्कर मारी तो अगले दिन एक स्कूटर ने सामने से हैंडिल में टक्कर मारी।फिर उन्होने सार्वजनिक ब्लाग में लेखन अधिकार देने के साथ-साथ एडमिन राईट्स भी दे दिये जिसके आधार पर उनके सामने मुझे अपनी आई डी से ब्लाग पोस्ट निकालने को कहा। स्व्भाविक रूप से उन्होने आई डी पासवर्ड हासिल किया होगा जिसे मैंने घर पहुँचने से पूर्व ही पुत्र के माध्यम से बदलवा लिया और वह अपने मिशन में असफल रह गए। लेकिन अब मैंने सार्वजनिक लेखन हेतु एक नई आई डी ही बना ली अतः पुनः अपने सामने उनके द्वारा पोस्ट डलवाने पर मुझे कोई दिक्कत नहीं रही किन्तु उन्होने इसके पासवर्ड से खिलवाड़ करने का प्रयास किया जिससे यह आभास हुआ कि वह मूलतः मेरी निजी आई डी का पासवर्ड हस्तगत करके मेरे ब्लाग में पूना प्रवासी ब्लागर और उसके समर्थकों के संबंध में लिखे विषय में हेरा-फेरी करके उन लोगों को साफ-साफ बचाना चाहते थे। "
2)-जो बड़े कम्युनिस्ट के रूप में स्थापित होने के बाद भी क्षुद्र ब्लागर्स के हितों के संरक्षणार्थ तांत्रिक प्रक्रियाओं का सहारा लेकर खुद को सहायता देने वाले को ही तहस-नहस कर देना चाहते हैं। यह खुद भी एक जन्मपत्री का वैवाहिक विश्लेषण मुझसे प्राप्त कर चुके हैं।

http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/08/13.html
इस लिंक पर लिखा था-

1)-मैंने एजेंडा से बाहर के उस प्रस्ताव को जो अध्यक्ष की अनुमति के बिना ही रखा गया था मीटिंग -मिनिट्स में दर्ज ही नहीं किया था। अतः घोटालू साहब की योजना ध्वस्त हो रही थी जिस कारण वह बौखला गए थे और मेरी कुर्सी में लातें ठेलते-ठेलते मेरे पैरों पर भी ठोकर मारने लगे और दबाव डालने लगे कि मैं उस अवैध प्रस्ताव को मिनिट्स में दर्ज करूँ जबकि मीटिंग संचालक एवं अध्यक्ष ने और संपादक महोदय ने भी मुझसे न लिखने पर कोई आपत्ति न की थी। घोटालू साहब की अभद्रता की इंतिहा तब हो गई जब वह मेरे पेट में उंगली भोंक कर लिखने का दबाव बनाने लगे। मैंने पूरी तरह घोटालू साहब और उनके दुष्कृत्यों की उपेक्षा कर दी।
2)-वस्तुतः पूना प्रवासी भृष्ट-धृष्ट -निकृष्ट-ठग ब्लागर की एक साथी घोटालू साहब की भाभी होती हैं जिनका ताल्लुक हमारे गृह ज़िले से है और वही घोटालू साहब के परम मित्र एक राजनीतिक दल के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष की भी रिश्तेदार हैं जिनको घोटालू साहब ने एक पूर्व विधायक के अतिरिक्त हमें परेशान करने हेतु लगाया था। इन सबके सम्मिलित प्रयासों के बावजूद मैंने घुटने नहीं टेके तो घोटालू साहब अब निकृष्टत्तम धूर्तता पर उतर आए हैं।

http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/08/blog-post_18.html
इस लिंक पर लिखा था-
"भृष्ट-धृष्ट ब्लागर और उसके साथी ब्लागर्स तथा घोटालू साहब मेरे ज्योतिषीय विश्लेषणों को गलत साबित करके ‘पोंगापंथी-ढ़ोंगी-ठग व लुटेरे’ लोगों का बचाव करना चाहते हैं जो जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते हैं। ये लोग शोषकों-उतपीडकों/व्यापारियों/उद्योगपतियों के दलाल हैं और उनके ही दूसरे ढ़ोंगी-पोंगापंथी दलालों का संरक्षण करने हेतु मुझ पर प्रहार करवा रहे हैं।"
http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/09/1.html
इस अंक में लिखा था-
13 जूलाई को उसी शख्स ने मीटिंग के दौरान मेरे कुर्सी पर,पैरों पर अपने पैरों से और मेरे पेट पर अपनी उंगली से प्रहार किए थे। उसी की कारगुजारी के कारण मुझे 18 वर्ष बाद बाहर के डाक्टर का आसरा लेकर पुत्र का इलाज करना पड़ा। तब से अब तक परिवार के सभी सदस्यों के इलाज पर लगभग रु 2000/-फिजूल खर्च हो चुके है। इस नए रमेश कटारा ने अपने मित्र एक दूसरे दल के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष के माध्यम से मुझे पार्टी से अलग करवाने का विफल प्रयास किया था और अब सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ लोगों को मेरी छवी खराब करने के अभियान में लगाया है।
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मैंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ब्लाग में 04 जून 2013 को पहली पोस्ट दी थी और कल दिनांक 09 सितंबर 2013 की पोस्ट देने के बाद उन तिकड़मी महोदय ने मुझे लेखन अधिकार से वंचिन्त कर दिया है। 04 जून तक ब्लाग फालोर्स की संख्या छह वर्षों में कुल 50 थी और 09 स्तंबर तक कुल 68 अर्थात जहां छह वर्षों में पार्टी ब्लाग का प्रचार नहीं किया गया था वहीं मेरे प्रयत्नों से 95 दिनों में कुल 18 नए फालोर्स बढ़ गए थे। पिछले छह वर्षों में प्रदेश पार्टी सचिव को ब्लाग से दूर रखा गया था किन्तु मैंने प्रदेश पार्टी सचिव एवं सहायक सचिव को भी ब्लाग लेखन में एडमिन बनवा दिया था। शायद यह बात भी अहंकारी प्रदीप तिवारी साहब को अखरी होगी इसी लिए मुझे लेखन अधिकार से वंचित कर दिया -उनकी तानाशाही उनको मुबारक। हो सकता है कि अब वह मुझे पार्टी से निकलवाने का भी उपक्रम करें।

उनको तो पार्टी पोस्ट से आय होती है लेकिन मैं सार्वजनिक किसी भी संस्था और पार्टी के जरिये कभी भी कोई कमाई नहीं करता रहा हूँ इसलिए मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैं अपने निजी 5 और पत्नी का एक कुल 6 ब्लाग पहले से ही संचालित कर रहा हूँ इसलिए पार्टी ब्लाग से हटाये जाने के लिए प्रदीप तिवारी साहब का शुक्रिया अदा करता हूँ।

 

विद्रोही स्व-स्वर में बहुत मुश्किल है क ुछ यादों का भुलाया जाना (भाग-1 ) —विजय राजबली मा थुर

आर्यसमाज -कमलानगर,आगरा में यशपाल आर्य जी ने एक प्रवचन देते हुये एक ब्रिटिश जज साहब का वृतांत सुनाया था जिसके अनुसार वह जज साहब शार्ट -कट के लिए घर से अदालत जाते वक्त ‘रेड लाईट एरिया’ का रास्ता अपना लेते थे। यद्यपि वह संयमित प्राणी थे किन्तु उनके अवचेतन मस्तिष्क पर वहाँ चल रही गालियां अंकित हो गई थीं। जब वृद्धावस्था में वह गंभीर रुग्ण हुये और अनकांशस रहने लगे तब कभी-कभी उनके मुख से वे भद्दी गलियाँ निकल जाती थीं जो उन्होने कभी रास्ते में सुनी थीं। डाक्टरों ने जब इसकी खोज की तब पता चला कि जज साहब अदालत जाने के लिए जिस रास्ते का उपयोग करते थे ये गालियां उसी का दुष्परिणाम हैं। यह तो अवचेतन मस्तिष्क की बात थी। किन्तु चेतन अवस्था में कुछ घटना-क्रम इस प्रकार असर डालते हैं कि चाह कर भी उनको भुलाना संभव नहीं होता क्योंकि फिर-फिर उसी प्रकार की घटनाओं का जब-जब दोहराव होता है तब-तब उन पुरानी घटनाओं की यादें तरो-ताजा हो जाती हैं।

कामरेड रमेश मिश्रा :
होटल मुगल शेरटन,आगरा से ‘सुपर वाईजर अकाउंट्स’ की पोस्ट से बर्खास्तगी को कानूनी चुनौती देने के दौरान कामरेड अब्दुल हफीज साहब से संपर्क हुआ था जो त्याग की सच्ची मूर्ती थे और उनको संत कामरेड की संज्ञा प्राप्त थी। उनको लोग प्यार से ‘चचे’ भी पुकारते थे और वह आगरा में भाकपा के पर्यायवाची थे। कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय आम जनता में चचे की पार्टी से था। यह ठीक उसी प्रकार था जैसे कि लखनऊ में कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय यहाँ के आम नागरिक कामरेड अतुल अंजान की पार्टी से लेते हैं। हफीज साहब ने पार्टी के आडिटर कामरेड हरीश आहूजा एडवोकेट के पास मुझे भेज दिया जिन्होने मेरा केस तैयार कराया। कामरेड आहूजा ने मुझे भाकपा में शामिल कर लिया। वह प्रत्येक ब्रहस्पतिवार को ‘मजदूर भवन’ पर एक स्कूल चलाते थे जिसमें बतौर पार्टी शिक्षक कामरेड डॉ रामगोपाल सिंह चौहान,कामरेड डॉ महेश चंद्र शर्मा और पार्टी के जिलामंत्री कामरेड रमेश मिश्रा आया करते थे।
एक दिन मैं किसी और कार्य से मजदूर भवन की तरफ से निकल रहा था तो आहूजा साहब ने इशारा करके मुझे पास बुलाया और कहा कि आपको डॉ चौहान और डॉ शर्मा पार्टी आफिस में याद करते हैं और आप कल ही उनसे संपर्क करें और वहीं जाया करें यहाँ आने की आवश्यकता नहीं है। कामरेड डॉ चौहान साहब ने मुझे पार्टी कार्यालय में कार्य करने को कहा और मैं उनके तथा डॉ शर्मा जी के निर्देशन में उनको सहयोग करने लगा। जिलमंत्री कामरेड रमेश मिश्रा जी ने मुझे अपने घर से कुछ पार्टी साहित्य भी पढ़ने को दिया और कई सभाओं में मुझे मेरे घर से लेकर अपने साथ गए और वापिस भी घर पहुंचा देते थे। डॉ चौहान के बीमार पड़ने पर उनके सुझाव पर मुझे ज़बरदस्ती ज़िला कोषाध्यक्ष के पद पर नियुक्त करा दिया। उनका पूर्ण विश्वास मुझे हासिल रहा। प्राइमरी शिक्षक संघ के एक नेता कामरेड रमेश कटारा जो कुछ ‘तांत्रिक’ प्रक्रियाओं के भी विशेज्ञ थे एक के बाद एक मिश्रा जी के विश्वस्तों को उनसे दूर कराते जा रहे थे। कटारा साहब ने मिश्रा जी का मस्तिष्क जाम कर दिया था और उनका विवेक समाप्त कर दिया था उनके बड़े पुत्र को पढ़ाई से विरक्त कर दिया था। उनकी निगाह मिश्रा जी का कारोबार हड़पने पर लगी थी जिसके लिए उनको उनसे सहयोग करने वालों से दूर करना ज़रूरी था। मिश्रा जी के माध्यम से कटारा साहब प्रदेश कंट्रोल कमीशन में शामिल हो गए थे। उनकी फितरत के कारण मुझे भी 1994 में भाकपा से अलग होना पड़ा था।
कई आंदोलनों में मिश्रा जी कलेक्टरेट पर मिलते थे और घरेलू हाल-चाल पूछते रहते थे। एक बार दयालबाग में इत्तिफ़ाकीया वह मिल गए तो बोले आजकल दिखाई नहीं पड़ते क्या बात है? मैंने जब कहा कि अब मैं किसी भी राजनीतिक दल में नहीं हूँ और निष्क्रिय हूँ। तब कामरेड मिश्रा जी ने कहा कि यह नहीं हो सकता कि एक राजनीतिक व्यक्ति निष्क्रिय बैठा रहे आप को वापिस अपनी मूल पार्टी में लौटना होगा मैं आपके घर आऊँगा। और वाकई मिश्रा जी मुझे मेरे घर से अपने साथ लेकर पार्टी कार्यक्रमों में शामिल करने लगे जबकि औपचारिक रूप से मैं पुनः सदस्य भी नहीं बना था।2006 में आगरा कमिश्नरी पर संसद-सदस्य राज बब्बर के साथ डॉ गिरीश (जो अब प्रदेश सचिव हैं) एक प्रदर्शन में शामिल हुये थे। मिश्र जी मुझे लेकर गए थे और पार्टी के नए कार्यालय पर चलने को कहा था जहां डॉ गिरीश जी एक ट्रेक्टर ट्राली पर बैठ कर गए थे मैं भी उसी में था। पार्टी कार्यालय पर डॉ गिरीश जी की उपस्थिती में कामरेड मिश्रा जी ने मुझे पुनः सदस्यता प्रदान करने की औपचारिकता पूर्ण की थी। 2008 के सम्मेलन में मिश्रा जी ने मुझे भी सह-सचिव के रूप में अपने साथ नियुक्त किया था। किन्तु कुछ घरेलू कारणों से मुझे 2009 में आगरा छोड़ कर लखनऊ सेटिल होना पड़ा और अब लखनऊ की पार्टी ज़िला काउंसिल में सक्रिय हूँ।

आज चार वर्ष बाद अचानक कामरेड रमेश मिश्रा जी की याद आने का प्रबल कारण यह है कि जिस रमेश कटारा को मिश्रा जी ने प्रदेश कंट्रोल कमीशन में शामिल कराया था और जिसके कारण मुझसे उनकी दूरी बनी थी उसको खुद मिश्रा जी ने ही पार्टी से निष्कासित करा दिया था और उसी के बाद मुझसे संपर्क किया था। आज उस रमेश कटारा का नया अवतार प्रदीप तिवारी के रूप में मुझे नज़र आ रहा है जिसने 12 जूलाई को डॉ गिरीश जी की जीप के साथ एक हादसा करने में सफलता प्राप्त की थी।13 जूलाई को उसी शख्स ने मीटिंग के दौरान मेरे कुर्सी पर,पैरों पर अपने पैरों से और मेरे पेट पर अपनी उंगली से प्रहार किए थे। उसी की कारगुजारी के कारण मुझे 18 वर्ष बाद बाहर के डाक्टर का आसरा लेकर पुत्र का इलाज करना पड़ा। तब से अब तक परिवार के सभी सदस्यों के इलाज पर लगभग रु 2000/-फिजूल खर्च हो चुके है। इस नए रमेश कटारा ने अपने मित्र एक दूसरे दल के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष के माध्यम से मुझे पार्टी से अलग करवाने का विफल प्रयास किया था और अब सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ लोगों को मेरी छवी खराब करने के अभियान में लगाया है। काश आज कामरेड रमेश मिश्रा जी प्रदेश में पदाधिकारी बने होते तो इस नए रमेश कटारा को उसका सही रास्ता दिखा देते।

 
 
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