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Monthly Archives: November 2013

विद्रोही स्व-स्वर में हँसता हुआ भागा रो ता हुआ रोगी और एक ही फायर में मुर्दा जी उठा —वि जय राजबली माथुर

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(स्व .हर मुरारी लाल ,स्व.के .एम् .लाल और स्व .सावित्री देवी माथुर )

(चित्र में कुर्सी पर बैठे हुये माँ के फूफाजी स्व .हर मुरारी लाल साहब खड़े हैं गोपाल मामजी -स्व.के .एम् .लालसाहब एवं रानी मौसी –स्व .सावित्री देवी माथुर साहिबा )

बहुत मुश्किल है कुछ यादों को भुलाया जाना (भाग-5-माँ के फूफाजी )…………………………………..
आज फिर बउआ के फूफाजी का स्मरण यों ही अनायास नहीं है। अभी कुछ समय पहले ही हमने स्वास्थ्य संबंधी एक नया ब्लाग अपनी श्रीमतीजी के कहने पर शुरू किया है। तब से ही मन में उनके द्वारा की गई कुछ चर्चाएं घुमड़ रही थीं। अक्सर वह हमारे नानाजी से मिलने आते रहते थे और हम लोग बाबूजी की सिलीगुड़ी पोस्टिंग के दौरान नानाजी के पास कुछ वर्ष रहे थे अतः उनकी बातें सुनने का सौभाग्य मिल गया था। कुछ रहस्यपूर्ण राजनीतिक बातें तो उन्होने विशेष रूप से मुझसे ही की थीं जिस पर नाना जी और उनके दूसरे भाई भी आश्चर्य चकित हुये थे तथा उनसे प्रश्न किया था कि उन लोगों को अब तक ये बातें क्यों नहीं बताई थीं?जिसके उत्तर में उनका कहना था यह लड़का आगे इंनका लाभ उठा सकेगा आप लोग सुन कर भी कुछ नहीं करते। उनका आंकलन गलत नहीं था परंतु मैं उनके अनुमान का आधार नहीं जानता। इसी प्रकार चूंकि नानाजी होम्योपेथी चिकित्सा करते थे उनसे चिकित्सकों के बारे में वह चर्चाएं करते रहते थे। आज उन्हीं पर प्रकाश डालना चाहता हूँ।
एक घटना के बारे में उन्होने बताया था कि एक डाक्टर साहब नियमों के पक्के और हर गरीब-अमीर से समान व्यवहार करने वाले थे। उनके पास मरीजों की काफी भीड़ लगी रहती थी क्योंकि वह नाम मात्र शुल्क पर इलाज करते थे। एक रोज़ उनके क्षेत्र का एक सफाई कर्मी रोता चिल्लाता उनके पास लाया गया और उनसे अनुरोध किया गया कि वह उसे पहले देख लें। किन्तु उन्होने उसे अपने नंबर आने तक इंतज़ार कराने को कहा। उसकी कराह और पीड़ा को देख कर दूसरे मरीजों ने भी आग्रह किया कि डॉ साहब उसको ही पहले देख लीजिये। लेकिन डॉ साहब ने नियम का हवाला देते हुये उसे अपनी बारी का इंतज़ार करने को कहा। डॉ साहब ने तब तक के लिए उसके तीमारदार से उसे भुने चने खिलाते रहने को कह दिया। दो -ढाई घंटे बाद जब उसको नंबर आने पर बुलाया गया तब वह नदारद था। इंतज़ार में बैठे बाकी मरीजों ने बताया कि डॉ साहब वह तो हँसता-हँसता चला गया यह कहता हुआ कि ,"कौन डॉ साहब का इन्तजार करे?मेरा तो दर्द उनको दिखाये बगैर ही ठीक हो गया।अब तो मैं शौच को जा रहा हूँ । "
डॉ साहब ने भी हँसते हुये कहा कि उसके दर्द की वही दवा थी जो मैंने उसको दिलवा दी थी तो फायदा तो होना ही था और इस बात को मैं जानता था। लोगों की उत्सुकता पर डॉ साहब ने बताया कि कल रात बस्ती में एक शादी थी जिसमें उसने खूब चर्बी वाले भोजन खाये होंगे और वह चर्बी आंतों पर दबाव बना रही होगी जिसको भुने चनों ने सोख लिया और उसका पेट दर्द खत्म हो गया होगा ।
एक और घटना का ज़िक्र नानाजी से माँ के फूफा जी ने जो किया था उसका उल्लेख करना इसलिए ज़रूरी है कि आज के एलोपेथी चिकित्सक तो इस घटना को झुठला देंगे जबकि वह डॉ साहब भी एलोपेथी के ही थे। उनकी बताई घटना इस प्रकार थी :
एक गर्भिणी स्त्री को अक्सर मूर्छा आ जाया करती थी जिसका इलाज यह डॉ साहब करते थे। किन्तु किसी रिश्तेदार के कहने पर उस महिला के घर वालों ने किसी बड़े डॉ के फेर में इनको दिखाना बंद कर दिया था। एक सुबह जब डॉ साहब टहल कर लौट रहे थे तो उन्होने देखा कि उस महिला के घर वाले एक अर्थी ले जा रहे हैं जिससे खून की बूंदें भी टपकती जा रही थीं। किसी से उन्होने उत्सुकता वश पूछ लिया कि कौन है यह जब उनको बताया गया कि एक प्रिगनेंट औरत कल रात में मर गई है और यह उसी की अर्थी है। डॉ साहब बुदबुदाये कि ज़िंदा को फूंकने जा रहे हैं ,पुलिस को खबर हो जाये तो सबके सब बंद हो जाएँगे और तेज़-तेज़ कदमों से आगे बढ़ गए।

डॉ साहब की बात पर लोगों में फुसफुसाहट हुई कि डॉ साहब ने यह क्यों कहा कि ज़िंदा को फूंकने जा रहे हैं। कुछ जानकारों ने हिम्मत करके लपक कर डॉ साहब को रोका और पूछा कि डॉ साहब आप क्या कह रहे थे?डॉ साहब बोले कि कुछ नहीं कहा आप लोग अपना काम करें। एक साहब बोले कि डॉ साहब आपने कहा था कि ज़िंदा को फूंकने जा रहे हैं। डॉ साहब बोले तो जाओ फूँकों। लोगों की मिन्नत के बाद बोले कि इस मुर्दे को लेकर हमारे साथ हमारे घर चलो । लोगों ने वैसा ही किया।

अपने घर के चबूतरे पर डॉ साहब ने उस महिला की अर्थी को रखवा कर उसके बंधन खुलवा दिये और खुद घर के भीतर घुस गए। जब लौटे तो उनके हाथ में लोडेड बंदूक थी । लोगों ने कहा कि डॉ साहब यह क्या?तब तक डॉ साहब ने हवा में फायर कर दिया और वह महिला हिलने-डुलने लगी। थोड़ी देर में उसने पूछा यह क्या तमाशा है हमारे साथ यह भीड़ क्यों और हमें बांधा क्यों?अब तो सभी लोगों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। डॉ साहब ने अपने घर से उस महिला को वस्त्र दिलवाए और लोगों को सख्त हिदायत दी कि अब से कभी भी मूर्छा आने पर वह किसी और डॉ के पास नहीं जाएँगे तथा उनको ही सूचित करेंगे। निर्धारित समय पर उस महिला ने संतान को जन्म दिया और स्वस्थ रही।

दरअसल उस महिला को मृगी नहीं थी जैसा कि उसके घर वाले समझते थे और दूसरे डॉ साहब भी। उस महिला का गर्भस्थ शिशु कभी कभी स्थानच्युत होकर अपना हाथ उस महिला के हृदय पर रख देता था जिससे उतनी देर को वह महिला मूर्छावस्था में पहुँच जाती थी। जब तक इन डॉ साहब को बुलाया जाता था यह बिना कोई दवा दिये उसके पेट पर हाथ फेर कर शिशु को सही अवस्था में पहुंचा देते थे जिससे मूर्छा हट जाती थी। लेकिन घर के लोग मृगी के शक में दूसरे डॉ से दिखाने लगे जिनको इस तथ्य का पता न था। विगत दिवस की घटना में वह गर्भस्थ शिशु अपनी माँ के हृदय पर हाथ रखने के बाद सो गया था और मूर्छा लंबी होने से घर वालों ने मृत मान कर दाह-संस्कार का निर्णय कर लिया था। इत्तिफ़ाक से यह डॉ साहब टहल कर लौट रहे थे तो अर्थी से गिरती खून की बूंदों को देख कर समझ गए थे कि उस महिला की मौत नहीं हुई है। उनके द्वारा बंदूक के फायर करने से गर्भस्थ शिशु जाग गया था और उसने अपना हाथ अपनी माँ के हृदय के ऊपर से हटा लिया था जिससे वह पूर्व वत गतिमान हो गई थी।

लोगों की ज़रा सी चूक और दूसरे डॉ द्वारा हकीकत न समझने से एक महिला और उसके अजन्मे शिशु की अकारण मौत हो सकती थी जिसे इन अनुभवी चिकित्सक की सोझ बूझ से बचा लिया गया था।

नानाजी और बउआ के फूफाजी के मध्य होने वाली तमाम राजनीतिक बातों को ध्यान में रख कर मैं व्यवहार की कसौटी पर कई बार कस चुका हूँ। हालांकि आज न वह नानाजी और न ही उनके वे पुत्र-पुत्री (जो चित्र में साथ हैं)ही इस संसार में हैं किन्तु 50 वर्ष पूर्व सुनी हुई उन बातों को स्मरण करते हुये ऐसा लगता है कि अभी कल ही की तो बातें हैं।

 

विद्रोही स्व-स्वर में बोनस की ज़िंदगी—व िजय राजबली माथुर

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दिसंबर 1981 का यह चित्र होटल मुग़ल शेरटन,आगरा में ‘सुपरवाईजर अकाउंट्स’के रूप में कार्यरत रहने के दौरान साथ खड़े असिस्टेंट मेनेजर द्वारा फोटोग्राफर से खिंचवाया गया था। इस पर यूनिट फ़ाईनेंशियल कंट्रोलर रत्नम पंचाक्क्षरम साहब ने कहा था-‘he looks like Chandrashekhar’ जिस पर साथ खड़े कपूर साहब ने कह दिया ‘tomorrow we will salute him’तिस पर पंचाक्क्षरम साहब ने कहा-‘why not yesterday’। फिक्ज़्ड एसेट्स इनवेंटरी में पौने छह लाख का घपला पकड़ने पर बजाए मुझे पुरुसकृत करने के पंचाक्क्षरम साहब द्वारा 1984 में मुझे सस्पेंड और 1985 में बर्खास्त करा दिया गया।
अभी हाल ही में भाकपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के एक शक्तिशाली सदस्य द्वारा लखनऊ ज़िला कार्यकारिणी के एक सदस्य से कहा गया है कि यह ‘चंद्रशेखर’की ही तरह लेखक,पत्रकार,कलाकार है जो 40 सदस्यों पर प्रधानमंत्री बन गया था।
मैं कभी चंद्रशेखर को ठीक समझता था;परंतु मोरारजी के बाद बाबू जगजीवन राम के विरुद्ध खड़े होने तथा वी पी सिंह सरकार को गिराने के बाद आडवाणी से गले मिलने के चंद्रशेखर के कृत्यों के कारण वह मेरी पसंद से बाहर हो चुके हैं। अतः उक्त कथन कुछ रहस्यपूर्ण प्रतीत हुआ।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=601652216563425&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=1&theater

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(मेरे दाईं ओर खड़े हुये राम प्रकाश चतुर्वेदी उनके दाईं बाबू मेथ्यू बैठे हुये सुभाष कपूर,उनके दाईं खड़े ठाकुर दास,उनके दाईं बैठे एडवर्ड गोरडेन तथा सामने की ओर टेलीफोन लिए बैठे अरुण चतुर्वेदी (राज बब्बर के मित्र समीर चतुर्वेदी के छोटे भाई)

32 वर्ष पूर्व के इन चित्रों को शेयर करने का कारण मात्र उपरोक्त फेसबुक स्टेटस ही नहीं है। उसमें वर्णित होटल मुगल जाब से हटने का कारण तो तात्कालिक परिस्थितियों पर आधारित था किन्तु उसके अनंतर ‘आंतरिक’ और ‘बाह्य’ शक्तियों की ईर्ष्या भी एक सबल आधार थी जिसने परिस्थितियों को यों करवट दिलवाई। जून 1975 में आपात काल लागू होने के बाद मेरा मेरठ वाला जाब बर्खात्सगी के कारण छूट गया तो मैं आगरा आ गया और सितंबर में होटल मुगल में जाब पा गया था। 20 नवंबर 1975 को बहन शोभा का विवाह हो गया था जिनको दिसंबर में बाबूजी ने अलीगढ़ से बुलवाया था और उनको वापिस ले जाने कमलेश बाबू जनवरी 1976 में आगरा आए थे। तब माँ ने उनसे शिकायती लहजे में कहा था कि यह (अर्थात मैं) मकान नहीं बना रहा हूँ । उस पर कमलेश बाबू का जवाब था कि ‘हाँ’ अब तो यही मकान बना सकते हैं बाबूजी नहीं क्योंकि चाहे एक-एक कमरे के लें उनको तो तीन मकान लेने पड़ेंगे। मतलब साफ था कि यदि बाबूजी बनाएँगे तो उसमें शोभा को भी हिस्सा देना पड़ेगा। उससे पूर्व शोभा से उन्होने अलीगढ़ में ही कहा था कि बाबूजी दरियाबाद में अपना हिस्सा ले लें तो वह BHEL,हरिद्वार से नौकरी छोड़ कर उनके बिहाफ पर देखने दरियाबाद चले जाएँगे। अर्थात उनकी निगाह तो बाबूजी की पैतृक संपत्ति तक पर थी।
इसलिए जब 1978 में मैंने कमलानगर,आगरा में आवास-विकास परिषद से एक एल आई जी मकान किश्तों पर ले लिया तो कमलेश बाबू को लगा होगा कि बाबू जी ने बेटी को हिस्सा न देने के कारण मेरे नाम कर दिया है। यदि ऐसा होता तो क्या छोटे भाई अजय ने चुप-चाप बख्श दिया होता? रु 275/-प्रतिमाह की किश्तों पर वह मकान एलाट हुआ था। अपने वेतन से किश्त अदा करने के बाद बिजली आदि के खर्च मैं ही देता था और जब रहने पहुंचे थे तो बाबूजी रिटायर हो चुके थे। लेकिन तमाम रिशतेदारों (जिनमें बहन-बहनोई भी थे उनका खुलासा तो 2011 में ही हो पाया है) समेत होटल के सहकर्मियों को भी अखरा था कि मात्र 26 वर्ष की आयु में कैसे इसका अपना मकान बन गया। असिस्टेंट मेनेजर ईर्ष्यालु होटल कर्मियों का नायक था और चंद्रशेखर संबंधी उसका उद्धरण इसी संदर्भ में था। किश्तें 1993 तक चलनी थीं और 1985 में जाबलेस होने के कारण मैं विफल होकर मकान से वंचित हो जाऊंगा ऐसी उन सब की सोच थी। किन्तु मैंने चने-परमल भी खा कर दुकान-दुकान की नौकरी करके किश्तें पूरी चुका दी और रेजिस्टरी भी बिना रिश्वत दिये करा ली। टर्मिनेशन के बाद पिटीशन देने के कारण AITUC के और उसके जरिये CPI के संपर्क में आ गया था। 1993 में भाकपा,आगरा में दोबारा ज़िला कोषाध्यक्ष नियुक्त हुआ था।तत्कालीन जिलामंत्री कामरेड के माध्यम से गवर्नर मोती लाल बोरा जी को आवास-विकास विभाग द्वारा परेशान किए जाने की शिकायत भिजवाई थी जिस पर उन्होने राष्ट्रपति शासन के दौरान त्वरित कारवाई करवाई और मेरा कार्य बगैर रिश्वत दिये सम्पन्न हो सका था।
1994 में शालिनी की मृत्यु के बाद शोभा ने माँ से साढ़े दस वर्षीय यशवन्त को अपने साथ ले जाने का प्रस्ताव किया और अजय की पत्नी ने उस प्रस्ताव को रद्द करा दिया (मुझे ये सब बातें बहुत बाद में तब पता चलीं जब माँ व बाबूजी ने पूनम से विवाह कर लेने की बात की)। शालिनी के सबसे बड़े भाई कुक्कू जो कमलेश बाबू के भतीज दामाद थे (2011 में ही लखनऊ में इस बात का खुलासा हो सका) के माध्यम से 1982 में मुझे दो बार मार डालने का प्रयास हुआ था। परंतु 24 नवंबर 1982 को यशवन्त का बड़ा भाई सुबह चार बजे जन्म लेकर शाम चार बजे यह संसार छोड़ गया था परंतु मुझे मार डालने के उनके प्रयास विफल हो गए थे।
जिस प्रकार हमारी भुआ कैलाश किशोरी साहिबा ने रामेश्वरम में बिजली के DC करेंट की चपेट मे आ कर एक हाथ तुड़वाने के बावजूद अपने एक भाई से मुकदमे बाज़ी मे छल के जरिये जीत हासिल की और मेरे विरुद्ध भी सुनियोजित अभियान चलाया उसी प्रकार उनकी सगी भतीजी साबित करते हुये डॉ शोभा (पत्नी कमलेश बिहारी माथुर S/O सरदारी बिहारी माथुर,विजिलेन्स आफिसर,रेलवे,अलीगढ़)ने मेरे व यशवन्त के विरुद्ध अभियान चला रखा है। अजय व उनकी पुत्री के भी विरुद्ध हैं। माईंजी के तथा भुआ के बेटों के माध्यम से शोभा/कमलेश बाबू ने अजय का मुझसे भी संपर्क तुड़वा रखा है। शालिनी के घर वाले तो कमलेश बाबू के रिश्तेदार पहले से ही थे जिनको मेरे विरुद्ध उनका गुप्त-आंतरिक समर्थन था।
पूना में बस गई शोभा की छोटी पुत्री चंद्रप्रभा उर्फ मुकतामणि ने पूना प्रवासी(और पटना की मूल निवासी)रश्मिप्रभा के माध्यम से न केवल ब्लाग जगत में मेरे व यशवन्त के विरुद्ध लामबंदी करके अभियान चलाया बल्कि रश्मिप्रभा की एक रिश्तेदार के माध्यम से उनके रिश्तेदार भाकपा पदाधिकारी (यूनियन बैंक आफ इंडिया का कारिंदा)के माध्यम से पार्टी में भी मेरे विरुद्ध अभियान चलवाया था जिसके अंतर्गत ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ब्लाग में लेखन की आड़ में मेरा आई डी/पासवर्ड उस भ्रष्ट पदाधिकारी ने हासिल कर लिया जिसका उद्देश्य रश्मिप्रभा आदि ब्लागर्स संबंधी मेरे पोस्ट्स को ब्लाग से उड़ा देना था। इसमें विफल रहने पर नौ अक्तूबर 2013 को उस पदाधिकारी ने मुझे उस ब्लाग के लेखन/एडमिन कार्य से हटा दिया था। 10 अक्तूबर को ही ‘साम्यवाद (COMMUNISM)’नामक एक नया ब्लाग मैंने प्रारम्भ कर दिया है और 23 नवंबर 2013 से ‘UNITED COMMUNIST FRONT’ नामक एक नया फेसबुक ग्रुप प्रारम्भ कर दिया है। इस प्रकार (चाहे रिशतेदारों का जितना भी विरोध हो) हमें अनेक लोगों का समर्थन और प्रोत्साहन मिल ही जाता है और वही हमारा संबल व पूंजी है। सच में हमारे लिए यह’आत्म बल का पुरस्कार ‘ ‘कठिनाइयों व दुखों’ की तुलना में हज़ार गुना अधिक मूल्यवान है। ज्योतिष में पूर्ण आयु 60 वर्ष को मान लिया जाता है। इस प्रकार मैं अपनी पूर्ण आयु प्राप्त कर चुका हूँ और बोनस की इस ज़िंदगी में जितना भी सार्वजनिक सेवा कार्य सम्पन्न कर सकूँगा उतना ही अधिक दूसरे लोग लाभ उठा सकेंगे। जो भी लोग मुझे रास्ते से हटाने में सफल होंगे वे सार्वजनिक सेवा के मार्ग को बाधित करके जन-द्रोही कार्य ही सम्पन्न करेंगे। इसलिए मैं पूर्ण रूप से निश्चिंत हूँ।

 

विद्रोही स्व-स्वर में बहुत मुश्किल है क ुछ यादों का भुलाया जाना (भाग-4)

पहले कुछ चाचाजी साहब की लखनऊ यात्रा के संबंध में,फिर पलटते हैं अतीत के कुछ पन्नों को :

02 नवंबर 2013
https://www.facebook.com/groups/331682593586639/permalink/536345669786996/

कल धन्वन्तरी जयंती पर एक विस्तृत लेख ‘सर्वे भवन्तु…’ब्लाग में दिया था समस्त मानवता के स्वस्थ जीवन व्यतीत करने हेतु। इस स्वास्थ्य संबंधी ब्लाग एवं ‘साम्यवाद…’ब्लाग निकालने हेतु मुझे मेरी पत्नी ‘पूनम’ द्वारा प्रेरित किया गया है। कल ही पटना से चल कर पूनम के एक चाचा लखनऊ ‘संजय गांधी …’संस्थान में इलाज के वास्ते आए हैं। घरेलू उपाय न आज़माने एवं घर के वास्तु दोषों का निवारण न करवाने (जिनके बारे में उनको मैंने नौ वर्ष पूर्व बताया था)के कारण ही उनको गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। लोग एलोपेथी पर अंध भक्ति रखने के कारण जो कष्ट उठाते हैं उससे मुझे वेदना होती है इसी कारण स्वास्थ्य संबंधी ब्लाग शुरू किया था क्योंकि ‘चिकित्सा समाज सेवा है-व्यवसाय नहीं’। हम इन दीपावली पर्वों पर सभी जनों के शारीरिक एवं मानसिक खुशहाली की कामना करते हैं।
08 नवंबर 2013
https://www.facebook.com/groups/331682593586639/permalink/539622606125969/
आजकल मेरी श्रीमतीजी के एक चाचा SPGI में किडनी की खराबी की वजह से ही इलाज कराने पटना से आए हुये हैं। उनकी तकलीफ देख कर वेदना हुई परंतु वे लोग एलोपेथी पर अंध-भक्ति के कारण इन प्राकृतिक उपचारों पर ध्यान नहीं देते हैं और न ही वास्तु दोषों (जो नौ वर्ष पूर्व अवगत करा दिये थे)का ही निवारण करा सके हैं। वे लोग चुटियाधारी,रामनामी गमछा ओढ़े पोंगा-पंडितों के चक्र में रहे हैं जिस कारण आज इतनी तकलीफ उठा रहे हैं। यदि और लोग सबक सीख कर इस पोस्ट का लाभ उठा सकें तो उत्तम है।
http://vijaimathur05.blogspot.in/2013/11/kidney-cleanser-foods.html
श्रीमतीजी को जब पटना से चाचाजी साहब के लखनऊ आने के बारे में सूचना न प्राप्त हो सकी तब उन्होने सीधे चाची जी से फोन वार्ता द्वारा उनका हाल पूछा और हम छह नवंबर को उनसे एक घंटे इंतजार के बाद भेंट कर सके क्योंकि वह आँखों के OT में थे जब हम SGPGI पहुंचे थे । नौ तारीख को जब हम दोबारा मिलने गए तब डॉ द्वारा उनको डिस्चार्ज करने की बात कही गई क्योंकि वह पहले से बेहतर हो गए । अतः अगले दिन10 तारीख की शाम को हम फिर मिलने गए तब उनके गोरखपुर जाकर आगे का इलाज कराने की जानकारी मिली। चूंकि हम लोग उनके लिए खाना-नाश्ता ले जाते थे अतःडायलेसिस से आते ही चाचा जी ने शायद उसी को मद्दे नज़र रखते हुये पूनम व मुझे आशीर्वाद स्वरूप कुछ रुपए भेंट किए या फिर पूनम ने उनके पुत्र को छोटे भाई के रूप में जो दिया था उसमें से आधा लौटा दिया।
चाचा जी ने अपने मकान के वास्तु-दोष का निराकरण न कराने का कारण यह बताया कि उनको किसी पंडित ने समझा दिया था कि ‘नैऋत्य’कोण का बढ़ा होना उनके लिए शुभ है। मैं चूंकि ब्राह्मण या पंडित जाति का नहीं हूँ इसलिए चाचा जी ने मेरे सुझाव को न मान कर ब्राह्मण पंडित का आसरा लिया और उसने उनको गुमराह करके कष्टों में पहुंचा दिया। इस दोष का प्रभाव उनके दोनों पुत्रों व पौत्र पर भी पड़ा है। ब्लाग्स में भी पटना की मूल निवासी एवं पूना प्रवासी श्रीवास्तव ब्रादरी की एक ब्लागर जिसने खुद चार-चार जन्म पत्रियों का विश्लेषण मुझसे निशुल्क प्राप्त किया था मेरे ज्योतिष ज्ञान पर IBN7 में कार्यरत अपने चमचा श्रीवास्तव ब्लागर द्वारा प्रहार करवाया था। इस पूना प्रवासी ब्लागर ने पूना स्थित मेरी छोटी भांजी और चाचाजी की एक और भतीजी के साथ गठबंधन करके हमारे दोनों तरफ के रिशतेदारों के बीच भी हमारे विरुद्ध व्यापक दुष्प्रचार अभियान चलाया है जिस कारण ही गत वर्ष पूनम को बुलाने जाने पर हम लोगों ने गोलघर पर समय व्यतीत कर दिया लेकिन उनके भाई जान के घर इसलिए नहीं गए थे,क्योंकि वह पूना स्थित अपनी चचेरी बहन(जिसके छली भाई को मैंने लखनऊ अपने घर नहीं आने दिया था तब उनका कथन था कि वह खुद आयें या उनका वह चचेरा भाई आए एक ही बात है) और उसकी माँ को निर्दोष मानते हैं । इन सब बातों का विस्तृत वर्णन चाचाजी और चाची जी को बता दिया है। अभी तो वह इलाज में व्यस्त हैं लेकिन बाद में गौर करेंगे तो उनको ही लाभ होगा।
अगस्त 2009 में जब हम आगरा से पटना जाने पर इन्ही चाचाजी से मिलने गए थे क्योंकि तब वह दिल्ली हार्ट -सर्जरी के लिए जाने वाले थे।तब भी उनकी वह धूर्त भाभी (जिनकी पुत्री पूना में है) समस्त वार्ता के दौरान इस तथ्य के बावजूद उपस्थित रहीं कि मैं उनको ‘नमस्ते’ -अभिवादन तक नहीं करता हूँ। उनकी धूर्तता के परिणाम स्वरूप मुझे लखनऊ का मकान लेने में ज्ञात जानकारी के अनुसार एक लाख रुपयों की ठगी का शिकार होना पड़ा था। हालांकि उन धूर्त को खुद कोई लाभ तो न हुआ परंतु मुझको नुकसान पहुंचाने से उनको परम संतोष की प्राप्ति हुई । अतः मैं उन धूर्त समेत उनकी समस्त संतानों को घृणास्पद मानता हूँ और पूनम के भाई जान को मेरा यह दृष्टिकोण नापसंद है। मैं उनकी पसंदगी की खातिर और अधिक नुकसान झेलने को बिलकुल तैयार नहीं हूँ। उन्होने अपने पूरे परिवार को मेरे प्रति नफरत से भर दिया है जिसका मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता और मैं उनकी धूर्त चाची (और बच्चों समेत)को रिश्तेदार के रूप में कुबूल नहीं कर सकता।
दिसंबर में पटना में एक समारोह में शामिल होने का निमंत्रण भी है और खुद पूनम का कुछ काम भी अटका पड़ा है फिर भी इसलिए जाना संभव नहीं है कि वह कार्यालय उनके भाई जान के घर के बगल में स्थित है। हालांकि लखनऊ होकर गई चाची जी ने तो अपने घर भी रुकने का प्रस्ताव दिया है किन्तु कार्य हेतु तो पूनम को अपने भाई जान के पड़ौस में ही जाना होगा और फिर उनके घर न जाएँ यह उनके लिए संभव न होगा। पूना प्रवासी ब्लागर,हमारी भांजी और पूनम की एक चचेरी बहन की तिकड़ी छल द्वारा आज हमें जो नुकसान पहुंचा लें इसके खामियाजे से वे लोग भी बच न सकेंगे। यदि लखनऊ होकर लौटे चाचाजी,चाची जी इतना नुकसान-परेशानी उठाने के बाद मेरी बात समझ सके होंगे तो आगे से उनको भी बचाव करके लाभ व स्वस्थ्य लाभ दोनों मिल सकेगा। हम उनकी कुशलता के लिए मंगलकामना करते हैं।
 
 
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