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Monthly Archives: June 2014

विद्रोही स्व-स्वर में 26 जून :1975 और 1995 —विज य राजबली माथुर

26 जून 1975 को जब मैं एक साथी के साथ मेरठ -दिल्ली पेसेंजर से मिंटो ब्रिज पर उतरा और पूर्व की भांति सचिवालय गया तो प्रवेश नहीं करने दिया गया तभी पता चला कि एमर्जेंसी लग गई है। वस्तुतः हम लोग नौकरी की तलाश में परिचितों के पास दिल्ली जाया करते थे वह साथी बेरोजगार हो गए थे और मैं भी सस्पेंशन के कारण बेरोजगारी के कगार पर था। खैर फिर बाज़ार घूमते हुये स्टेशन मेरठ वापसी हेतु चले। ‘इंडियन एक्स्प्रेस’ ने अपने दफ्तर के बाहर भी काला बैनर लगा रखा था और अखबार भी काले हाशिये में ब्लैंक कवर पेज रखा था। ट्रेन में कुछ तथाकथित पत्रकार और व्यापारी ज़ोर-ज़ोर से बातें कर रहे थे कि जयप्रकाश नारायण और मोरारजी आदि नेताओं ने विदेशों से इंदिरा जी को हटाने की मदद मांगी थी इसलिए अराजकता पर नियंत्रण हेतु एमर्जेंसी लगाई गई है।

28 जून की रात को मेरठ से पुरानी दिल्ली होते हुये आगरा 29 जून को पहुँच गए क्योंकि एमर्जेंसी के बाद रुकने का कोई औचित्य नहीं था।

बाद में होटल मुगल,आगरा में पदमाशंकर पांडे (केरल की राज्यपाल श्रीमती शीला दीक्षित की नन्द का देवर) जो पर्सोनेल विभाग में थे ने बताया था कि एमर्जेंसी तो 25 जून की सुबह नौ बजे ही लगनी थी क्योंकि तब केंद्रीय गृहमंत्री रहे शीला जी के श्वसुर उमाशंकर दीक्षित साहब बेचैनी से उत्तर-प्रदेश के राजभवन में चक्कर काट रहे थे और एमर्जेंसी की घोषणा न होने से व्याकुल थे। परंतु घोषणा बाद में मध्य रात्रि में की गई ।

बीस वर्ष बाद 26 जून 1995 को माँ का दाह-संस्कार करना पड़ा और उस समय कुछ लोगों ने किस प्रकार अड़ंगा लगाया उसका विवरण इस पोस्ट द्वारा पूर्व-प्रकाशित है:

"ट्रक चलने से पूर्व ही कामरेड एस कुमार और कामरेड अनंत राम राठौर भी आ गए थे ,वे भी साथ चले। फिर शर्मा जी ने हमारे दूसरे साईड वाले सिन्धी महोदय को स्कूटर पर यह देखने के लिए भेज दिया कि कालोनी के लोगों को उनके द्वारा रोके जाने से इतने कम लोगों के साथ हम कैसे,क्या करते हैं?पता नहीं कुछ लोग खुद को खुदा क्यों समझने लगते हैं? हम लोग जब घाट पर टाल से लकड़ियाँ ढो रहे थे तब तक कुछ दूसरे लोग दाह संस्कार करके लौट रहे थे। उनके बुजुर्गवार एक सदस्य ने उन युवकों से कहा कि देखो इनके छोटी-छोटे बच्चे भी लगे हुये हैं तुम लोग इनकी मदद करो। फिर तो देखते-देखते आनन-फानन मे हम लोगों की कई क्वितल लकड़ियाँ मौके पर पहुँच गईं। हम उन लोगों को सिर्फ ‘धन्यवाद’ ही दे सकते थे। कालोनी के पढे-लिखे ,सभ्य ?सुसंस्कृत ?लोगों के व्यवहार और इन अनपढ़ तथा-कथित गवार ,अंनजाने लोगों के व्यवहार का यही तो अंतर था।शर्मा जी तथा दूसरे लोगों को उन सिन्धी महोदय से ज्ञात हो गया होगा कि उन लोगों द्वारा पीछे हटने के बावजूद अजनबी और गरीब लोगों द्वारा किस प्रकार अचानक हमारी सहायता की गई।"
http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/04/1994-95-11.html

26 जून 1975 को ट्रेन में सुनी बातें झूठ का पुलिन्दा थीं और 26 जून 1995 को अड़ंगेबाज़ों का ड्रामा भी झूठ के पहाड़ पर चढ़ कर खेला गया था। आज 39 और 19 वर्ष पुरानी बातों का अचानक ख्याल आया और उनको लिपिबद्ध कर लिया है।

 

विद्रोही स्व-स्वर में बाबूजी का स्मरण ‘ फदर्स डे’ पर —विजय राजबली माथुर

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परसों 13 जून को बाबूजी की 20 वीं पुण्यतिथि थी और कल 14 जून को उनके अंतिम संस्कार का दिवस । जून का तीसरा रविवार होने के कारण आज अंतर्राष्ट्रीय ‘पितृ दिवस’ है। हम लोग ‘वसुधेव कुटुंबकम’ के अनुगामी हैं इसलिए विश्व पितृ दिवस पर एक बार फिर पिताजी का स्मरण करने का सुअवसर मिल गया है।
यों तो इस ब्लाग में अनेक अवसरों पर बाबूजी का स्मरण किया गया है परंतु ‘फादर्स डे’ पर ज़िक्र करते समय 50-52 वर्ष पीछे लौट चलता हूँ। 1962 में चीन के आक्रमण के समय बाबूजी का स्थानांतरण बरेली से सिलीगुड़ी (जो उस वक्त नान फेमिली स्टेशन था ) हो गया था और हम लोग शाहजहाँपुर में नानाजी के पास रहे थे। बीच सत्र में हम लोगों के दाखिले में अनेकों अड़चनें आईं। छोटी बहन को तो प्रवेश आर्य कन्या पाठशाला में नाना जी के एक भाई के सहपाठी तिनकू लाल वर्मा जी के प्रबन्धक होने के कारण सुगमता से मिल गया। छोटे भाई व मेरे लिए दिक्कतें आईं। अंततः नानाजी के घर खाना बनाने वाली मिसराईन जी के बड़े सुपुत्र द्वारा स्थापित ‘विश्वनाथ जूनियर हाई स्कूल’ के प्रबन्धक उनके छोटे भाई से नानाजी ने समस्या बताई तो उन्होने हम लोगों का दाखिला करवा दिया।

सिलीगुड़ी में पिताजी के साथ कमरे पर कानपुर के एक क्रिश्चियन लाल साहब रहते थे और वे दोनों मिल कर खाना बनाते खाते थे। फिर जब 1963 में फेमिली रखने की इजाजत मिल गई तो बाबूजी माँ और छोटी बहन को कुछ समय के लिए वहाँ ले गए थे और हम दोनों भाई नानाजी के पास ही रहे। परंतु पहले निर्णय यह हुआ था कि बहन तो न्यू हैदराबाद,लखनऊ में मामाजी के पास रहेगी मैं सप्रू मार्ग,लखनऊ में भुआ के पास तथा भाई शाहजहाँपुर में नानाजी के पास। किन्तु माँ के फुफेरे भाई -गोपाल मामाजी ने उनको समझाया कि शोभा को वह अपने साथ ले जाएँ और मुझे व अजय को एक साथ भुआ अथवा नानाजी के पास छोड़ें। व्यवस्था बदल जाने के कारण बाबूजी,माँ व बहन तो रिज़र्वेशन के हिसाब से सिलीगुड़ी चले गए थे मैं भुआ के पास से अजय के साथ रहने शाहजहाँपुर भेजे जाने के इंतज़ार में रह गया था। बाद में लाखेश भाई साहब मुझे शाहजहाँपुर छोड़ आए थे जो अब डेढ़ कि मी के फासले पर रहते हुये भी मुझसे दूरी बनाए हुये हैं।

बाराबंकी से बाबूजी के चाचा (स्व राय धर्म राजबली माथुर साहब) भुआ के पास मुझसे मिलने आए थे और बड़े ताउजी ने पत्र भेज कर माता-पिता दोनों की गैर हाज़िरी में रहने पर साहस कायम रखने की हिदायत दी थी। कुछ समय बाद माँ भी शाहजहाँपुर लौट आईं थीं। भुआ ने माँ व हम सब को 1964 की गर्मी की छुट्टियों में लखनऊ बुलवाने का विचार किया था जिसकी भनक लगने पर छोटी ताईजी ने बाबाजी से नानाजी को पत्र भेज कर दरियाबाद बुलवा लिया था। लगभग 15 दिन हम लोग रायपुर कोठी ,दरियाबाद में रहे थे। उन दिनों लगभग रोजाना ही पेड़ से टूटे ताज़े कटहल की सब्जी बनती थी। आम,जामुन,फालसे,राब आदि खाने का अवसर तब मिला था। दरियाबाद में उस समय पोस्टेड एक सक्सेना दारोगा जी अक्सर बाबाजी से मिलने आते थे वह बाबू जी के सहपाठी रहे थे।
27 मई(उस दिन नेहरू जी का निधन हो जाने से लखनऊ में सन्नाटा था ) को हम लोगों को लखनऊ भुआ के पास जाना था। अलाहाबाद जाने के लिए छोटे ताऊ जी भी लखनऊ तक आए भीड़ के कारण हम लोगों को तो बैठवा दिया किन्तु उनको खड़े ही रहना पड़ा। बाराबंकी से वीरेंद्र चाचा भी लखनऊ के लिए सवार हुये वह भी उनके साथ ही खड़े-खड़े आए। तब वीरेंद्र चाचा पढ़ रहे थे फिर 1974 में दिल्ली के माडल टाउन में बाबूजी के साथ उनके घर गए थे । वीरेंद्र चाचा लानसर रोड स्थित मौसाजी के घर से खुद आकर लिवा ले गए थे। 1975 में मेरठ से मैं कई बार केन्द्रीय सचिवालय जाकर वीरेंद्र चाचा से मिलता रहा था परंतु एमेर्जेंसी लगने पर मैं आगरा बाबूजी के पास चला गया था। बाद में वीरेंद्र चाचा अमेरिका जाकर सेटिल हो गए। धीरेन्द्र की शादी में उनसे मुलाक़ात नरेंद्र चाचा के यहाँ मथुरा में हुई थी तब एक लंबे अरसे से विदेश में रहने के बावजूद उनमें वही पुरानी आत्मीयता पाई थी। जब बाबूजी और माँ फरीदाबाद में भाई के पास उसकी पुत्री के जन्म के समय गए थे तब नरेंद्र चाचा ने मुझसे कहा था कि तुम खुद को अकेला न समझना। दरियाबाद तो आगरा से लगभग 400 कि मी होगा और फरीदाबाद 200 कि मी किन्तु मथुरा सिर्फ 50 कि मी है कभी भी बेझिझक चले आना। बाबू जी के चचेरे भाई-बहनों का स्वभाव तो वही पुरानी आत्मीयता वाला है परंतु बाबूजी के अपने भतीजे व भांजे मुझसे विद्वेष भाव रखते हैं।
आज जो लेखन के प्रति मैं अभिरुचि रखता हूँ इस प्रवृति को प्रोत्साहन बाबूजी द्वारा 1960-61 में लखनऊ में मेरे लिए रविवार को ‘स्वतंत्र भारत’ लेकर पढ़ने देने से प्रारम्भ हुआ था। जिस राजनीतिक दल भाकपा में मैं काफी समय से सक्रिय रहा हूँ उसके एक पूर्व प्रदेश सचिव कामरेड भीखा लाल जी ने भी मुलाक़ात होने पर बाबू जी के सहपाठी व रूम मेट रहने के आधार पर बड़ी ही आत्मीयता बरती थी। बाबूजी का व्यवहार सबके प्रति काफी अच्छा रहा है जिस कारण उनके नाम का आज उनके न रहने के 19 वर्ष बाद भी यह प्रभाव है कि उनके लोग मेरे प्रति भी आत्मीयता का भाव रखते हैं।

 

विद्रोही स्व-स्वर में पिताजी को श्रद्ध ांजली के बहाने —विजय राजबली माथुर

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बाबूजी (निधन-13 जून 1995 )और बउआ(निधन-25 जून 1995) चित्र 1978 मे रिटायरमेंट से पूर्व लिया गया

आज बाबूजी को यह संसार छोड़े हुये 19 वर्ष व्यतीत हो गए हैं। परंतु उनकी दी हुई शिक्षा व सीख आज भी मेरे लिए पथ -प्रदर्शक के रूप मेरे साथ बनी हुई हैं। आर्थिक रूप से जिस प्रकार बाबूजी समृद्ध नहीं हो पाये थे उसी प्रकार 62 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुकने के बाद भी मैं भी आर्थिक समृद्धता से कोसों दूर हूँ और इसी लिए दूर हूँ निकटतम एवं घनिष्ठतम कहे जाने वाले रिशतेदारों से भी। आज रिश्तों का नहीं आर्थिक समृद्धि का महत्व है जिसमें मैं पिछड़ा हुआ हूँ। एक बार मैंने बाबूजी से सवाल उठाया था कि आपने बचपन से ईमानदारी ऐसी सिखा दी है जो मुझे न ऊपर उठने देती है और न ही आर्थिक समृद्धि मिलने देती है। बाबू जी ने इस प्रश्न के उत्तर में बड़ी सीधी बात कही थी कि हमने तो तुम तीनों को एक सी बातें बताई हैं लेकिन जब तुम्हारे छोटे भाई-बहन उनको ठुकरा कर आगे बढ़ गए हैं तो तुम भी ठुकरा सकते थे। यदि मैं माँ-पिताजी को ठुकरा सकता होता तो 1973 में ही माईंजी की बात मान कर ठुकरा सकता था। मैं मेरठ से एल आई सी की एक परीक्षा देने लखनऊ आया था और बादशाह बाग में मामाजी के घर ठहरा था। उसी मौके पर माईंजी ने कहा था कि विजय अब तुम सर्विस कर रहे हो जीजी-जीजाजी से अलग हो जाओ नहीं तो उनकी ही तरह रह जाओगे। मैंने माईंजी से विनम्रतापूर्वक कह दिया था कि माईंजी चाहे जो हो बउआ-बाबूजी को छोडना व ठुकराना मेरे लिए संभव नहीं है और 1995 में मृत्यु-पर्यंत वे दोनों मेरे साथ ही रहे जबकि उनसे एक वर्ष पूर्व शालिनी का निधन हो चुका था। वे लोग पूनम से मेरे पुनः विवाह कर ने का दबाव बनाए हुये थे उनके पिताजी से पत्राचार चला चुके थे। बाबूजी के निधन और माँ के अचेतावस्था में पहुँच जाने के बाद छोटे भाई व बहन चाहते थे कि आगे पत्राचार वे करें परंतु मैंने उन दोनों को हस्तक्षेप नहीं करने दिया। जब माईंजी देहरादून से आगरा शोक व्यक्त करने आईं थीं तब फिर उन्होने कहा था कि विजय तुम किसी नीडी और कम पढ़ी लड़की से विवाह करो और जीजी-जीजाजी की पसंद का ख्याल न करो । उस अवसर पर मैंने माईंजी को कोई जवाब तो नहीं दिया था चुप ही रहा परंतु उनके सुझाव पर अमल नहीं किया। नतीजा यह है कि आज माईंजी को आदर्श मानने वाले छोटे भाई-बहन मेरे खिलाफ तो हैं ही खिलाफत में लामबंदी भी किए हुये हैं।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/703406903054622

"प्रदेश भाकपा के आह्वान पर लखनऊ में 22-क़ैसर बाग स्थित कार्यालय से एक प्रदर्शन जुलूस जिलाधिकारी कार्यालय तक निकाला गया। प्रदर्शन का उद्देश्य महिलाओं पर हिंसा,बच्चियों की सुरक्षा,बिगड़ी कानून-व्यवस्था,प्रशासन और अपराधियों की मिली-भगत से महिलाओं की इज्ज़त और ज़िंदगी पर हो रहे घातक हमलों के प्रति जनता का ध्यानकर्षण करना व राज्यपाल महोदय को प्रदेश सरकार की अकर्मण्यता के बारे में ज्ञापन द्वारा सूचित करना था।
ज्ञापन में मांग की गई है कि,घरेलू हिंसा हेतु अधिनियम-2005 लागू किया जाये,प्रदेश में वादों के जल्दी निपटारे हेतु विशेष अदालतों का गठन किया जाये तथा उसकी समय सीमा निर्धारित की जाये। हिंसा पीड़ित बेसहारा महिलाओं के पुनर्वास की व्यवस्था की जाये ।महिलाओं व बच्चियों पर हिंसा व उनकी हत्या को अंजाम देने वाली वीभत्स घटनाओं को रोका जाये।
जिलाधिकारी की ओर से सिटी मेजिस्ट्रेट ने ज्ञापन लिया और ज़रूरी कारवाई किए जाने का आश्वासन दिया।
प्रदर्शन का नेतृत्व डॉ गिरीश व कामरेड आशा मिश्रा ने किया जिसमें जिलामंत्री के अतिरिक्त अन्य लोगों में शामिल होने वाले प्रमुख कामरेड थे-दीपा पांडे,बबीता,अपने पुत्र सहित मुख्तार साहब,मास्टर सत्यनारायन,कनहाई लाल,रूपनारायण लोधी,मधुराम मधुकर एवं विजय माथुर। "

कल 12 जून 2014 को फेसबुक पर यह नोट प्रदर्शन में भाग लेने के उपरांत दिया था। तब 39 वर्ष पूर्व 12 जून 1975 को अलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा साहब के उस निर्णय का भी स्मरण हो आया था जिसमें उन्होने प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिराजी के 1971 के रायबरेली से निर्वाचन को अवेद्ध घोषित कर दिया था। एक 12 जून को एक शक्तिशाली महिला के विरुद्ध कोर्ट का निर्णय आता है और उसी 12 जून को भाकपा ने महिला उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष -दिवस के रूप में चुना। इस संघर्ष आंदोलन में भाग लेने हेतु मुझे फोन करके समय व स्थान की जानकारी हासिल करनी पड़ी।ज़िले की ओर से अधिकृत रूप से अखबार या व्यक्तिगत रूप से कोई जानकारी मुझे नहीं दी गई थी।प्रदर्शन के बाद लौटते में प्रदेश सचिव जी को मैंने इस बात की सूचना मौखिक रूप से दे दी थी। 2014 के लोकसभा चुनावों में 543 में से भाकपा को केवल एक स्थान प्राप्त हुआ है जबकि 1952 में 17 स्थान प्राप्त करके यह पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में थी। इस स्थिति के बावजूद प्रदेश के एक पदाधिकारी जो लखनऊ ज़िले के सदस्य होते हुये भी ज़िले के इंचार्ज हैं मुझे निष्क्रिय कराने हेतु पार्टी मीटिंग्स की सूचनाएँ भी प्राप्त नहीं होने देते हैं। जब फेसबुक पर CPIML के लोगों द्वारा CPI की आलोचना देखता हूँ तो व्यथित हो जाता हूँ परंतु जब इस प्रकार का अंदरूनी व्यवहार देखता हूँ तब लगता है कि वे सही कह रहे हैं। जब नए लोग आ ही नहीं रहे हैं तब पुराने लोगों को हटाने का प्रयास तो CPIML के दृष्टिकोण का ही समर्थन करता है। यशवंत को भी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करवा दी थी किन्तु दो वर्षों में एक बार भी ज़िले में जेनरल बाडी मीटिंग नहीं हुई है जिसमें वह भाग ले सकता। आगरा में तो वर्ष में दो-तीन जेनरल बाडी मीटिंग्स में साधारण सदस्यों को भाग लेने व पार्टी-शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल जाया करता था। बाबूजी के सहपाठी और रूम मेट रहे कामरेड भीखा लाल जी की पार्टी होने के कारण मैं तो अपमान सह कर भी बना हुआ हूँ किन्तु क्या आगे यशवंत और उस जैसे लोग बने रहना पसंद करेंगे?

 

विद्रोही स्व-स्वर में पिताजी को श्रद्ध ांजली के बहाने —विजय राजबली माथुर

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बाबूजी (निधन-13 जून 1995 )और बउआ(निधन-25 जून 1995) चित्र 1978 मे रिटायरमेंट से पूर्व लिया गया

आज बाबूजी को यह संसार छोड़े हुये 19 वर्ष व्यतीत हो गए हैं। परंतु उनकी दी हुई शिक्षा व सीख आज भी मेरे लिए पथ -प्रदर्शक के रूप मेरे साथ बनी हुई हैं। आर्थिक रूप से जिस प्रकार बाबूजी समृद्ध नहीं हो पाये थे उसी प्रकार 62 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुकने के बाद भी मैं भी आर्थिक समृद्धता से कोसों दूर हूँ और इसी लिए दूर हूँ निकटतम एवं घनिष्ठतम कहे जाने वाले रिशतेदारों से भी। आज रिश्तों का नहीं आर्थिक समृद्धि का महत्व है जिसमें मैं पिछड़ा हुआ हूँ। एक बार मैंने बाबूजी से सवाल उठाया था कि आपने बचपन से ईमानदारी ऐसी सिखा दी है जो मुझे न ऊपर उठने देती है और न ही आर्थिक समृद्धि मिलने देती है। बाबू जी ने इस प्रश्न के उत्तर में बड़ी सीधी बात कही थी कि हमने तो तुम तीनों को एक सी बातें बताई हैं लेकिन जब तुम्हारे छोटे भाई-बहन उनको ठुकरा कर आगे बढ़ गए हैं तो तुम भी ठुकरा सकते थे। यदि मैं माँ-पिताजी को ठुकरा सकता होता तो 1973 में ही माईंजी की बात मान कर ठुकरा सकता था। मैं मेरठ से एल आई सी की एक परीक्षा देने लखनऊ आया था और बादशाह बाग में मामाजी के घर ठहरा था। उसी मौके पर माईंजी ने कहा था कि विजय अब तुम सर्विस कर रहे हो जीजी-जीजाजी से अलग हो जाओ नहीं तो उनकी ही तरह रह जाओगे। मैंने माईंजी से विनम्रतापूर्वक कह दिया था कि माईंजी चाहे जो हो बउआ-बाबूजी को छोडना व ठुकराना मेरे लिए संभव नहीं है और 1995 में मृत्यु-पर्यंत वे दोनों मेरे साथ ही रहे जबकि उनसे एक वर्ष पूर्व शालिनी का निधन हो चुका था। वे लोग पूनम से मेरे पुनः विवाह कर ने का दबाव बनाए हुये थे उनके पिताजी से पत्राचार चला चुके थे। बाबूजी के निधन और माँ के अचेतावस्था में पहुँच जाने के बाद छोटे भाई व बहन चाहते थे कि आगे पत्राचार वे करें परंतु मैंने उन दोनों को हस्तक्षेप नहीं करने दिया। जब माईंजी देहरादून से आगरा शोक व्यक्त करने आईं थीं तब फिर उन्होने कहा था कि विजय तुम किसी नीडी और कम पढ़ी लड़की से विवाह करो और जीजी-जीजाजी की पसंद का ख्याल न करो । उस अवसर पर मैंने माईंजी को कोई जवाब तो नहीं दिया था चुप ही रहा परंतु उनके सुझाव पर अमल नहीं किया। नतीजा यह है कि आज माईंजी को आदर्श मानने वाले छोटे भाई-बहन मेरे खिलाफ तो हैं ही खिलाफत में लामबंदी भी किए हुये हैं।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/703406903054622

"प्रदेश भाकपा के आह्वान पर लखनऊ में 22-क़ैसर बाग स्थित कार्यालय से एक प्रदर्शन जुलूस जिलाधिकारी कार्यालय तक निकाला गया। प्रदर्शन का उद्देश्य महिलाओं पर हिंसा,बच्चियों की सुरक्षा,बिगड़ी कानून-व्यवस्था,प्रशासन और अपराधियों की मिली-भगत से महिलाओं की इज्ज़त और ज़िंदगी पर हो रहे घातक हमलों के प्रति जनता का ध्यानकर्षण करना व राज्यपाल महोदय को प्रदेश सरकार की अकर्मण्यता के बारे में ज्ञापन द्वारा सूचित करना था।
ज्ञापन में मांग की गई है कि,घरेलू हिंसा हेतु अधिनियम-2005 लागू किया जाये,प्रदेश में वादों के जल्दी निपटारे हेतु विशेष अदालतों का गठन किया जाये तथा उसकी समय सीमा निर्धारित की जाये। हिंसा पीड़ित बेसहारा महिलाओं के पुनर्वास की व्यवस्था की जाये ।महिलाओं व बच्चियों पर हिंसा व उनकी हत्या को अंजाम देने वाली वीभत्स घटनाओं को रोका जाये।
जिलाधिकारी की ओर से सिटी मेजिस्ट्रेट ने ज्ञापन लिया और ज़रूरी कारवाई किए जाने का आश्वासन दिया।
प्रदर्शन का नेतृत्व डॉ गिरीश व कामरेड आशा मिश्रा ने किया जिसमें जिलामंत्री के अतिरिक्त अन्य लोगों में शामिल होने वाले प्रमुख कामरेड थे-दीपा पांडे,बबीता,अपने पुत्र सहित मुख्तार साहब,मास्टर सत्यनारायन,कनहाई लाल,रूपनारायण लोधी,मधुराम मधुकर एवं विजय माथुर। "

कल 12 जून 2014 को फेसबुक पर यह नोट प्रदर्शन में भाग लेने के उपरांत दिया था। तब 39 वर्ष पूर्व 12 जून 1975 को अलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा साहब के उस निर्णय का भी स्मरण हो आया था जिसमें उन्होने प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिराजी के 1971 के रायबरेली से निर्वाचन को अवेद्ध घोषित कर दिया था। एक 12 जून को एक शक्तिशाली महिला के विरुद्ध कोर्ट का निर्णय आता है और उसी 12 जून को भाकपा ने महिला उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष -दिवस के रूप में चुना। इस संघर्ष आंदोलन में भाग लेने हेतु मुझे फोन करके समय व स्थान की जानकारी हासिल करनी पड़ी।ज़िले की ओर से अधिकृत रूप से अखबार या व्यक्तिगत रूप से कोई जानकारी मुझे नहीं दी गई थी।प्रदर्शन के बाद लौटते में प्रदेश सचिव जी को मैंने इस बात की सूचना मौखिक रूप से दे दी थी। 2014 के लोकसभा चुनावों में 543 में से भाकपा को केवल एक स्थान प्राप्त हुआ है जबकि 1952 में 17 स्थान प्राप्त करके यह पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में थी। इस स्थिति के बावजूद प्रदेश के एक पदाधिकारी जो लखनऊ ज़िले के सदस्य होते हुये भी ज़िले के इंचार्ज हैं मुझे निष्क्रिय कराने हेतु पार्टी मीटिंग्स की सूचनाएँ भी प्राप्त नहीं होने देते हैं। जब फेसबुक पर CPIML के लोगों द्वारा CPI की आलोचना देखता हूँ तो व्यथित हो जाता हूँ परंतु जब इस प्रकार का अंदरूनी व्यवहार देखता हूँ तब लगता है कि वे सही कह रहे हैं। जब नए लोग आ ही नहीं रहे हैं तब पुराने लोगों को हटाने का प्रयास तो CPIML के दृष्टिकोण का ही समर्थन करता है। यशवंत को भी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करवा दी थी किन्तु दो वर्षों में एक बार भी ज़िले में जेनरल बाडी मीटिंग नहीं हुई है जिसमें वह भाग ले सकता। आगरा में तो वर्ष में दो-तीन जेनरल बाडी मीटिंग्स में साधारण सदस्यों को भाग लेने व पार्टी-शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल जाया करता था। बाबूजी के सहपाठी और रूम मेट रहे कामरेड भीखा लाल जी की पार्टी होने के कारण मैं तो अपमान सह कर भी बना हुआ हूँ किन्तु क्या आगे यशवंत और उस जैसे लोग बने रहना पसंद करेंगे?

 

विद्रोही स्व-स्वर में एकला चलो रे :क्रा ंतिस्वर के चार वर्ष—विजय राजबली माथुर

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अखबार पढ़ने का शौक तो बचपन ही से था तभी तो बाबूजी लखनऊ में रविवार को ‘स्वतंत्र भारत’का साप्ताहिक अंक 1959-60 में 6-7 वर्ष की उम्र से ही मुझे खरीद देते थे । फिर लखनऊ से बरेली जाने पर आफिस की क्लब से क्रांतिकारियों के उपन्यास,धर्मयुग,साप्ताहिक हिंदुस्तान भी मेरे पढ़ने के लिए ही ले आते थे। 1962 में उनके सिलीगुड़ी ट्रांसफर के बाद हम लोग शाहजहाँपुर में नानाजी के पास थे वहाँ नानाजी के एक भाई ‘नेशनल हेराल्ड’ लेते थे जब खाली मिलता था उसे पढ़ लेता था और हिन्दी में अर्थ नानाजी से पूछ कर समझ लेता था। 1968से 1974 तक मेरठ में फिर बाबूजी आफिस क्लब से धर्मयुग,साप्ताहिक हिंदुस्तान के अलावा सारिका,सरिता, तथा एक दिन पुराने हिंदुस्तान व नवभारत टाईम्स ले आते थे । पढ़ने के साथ-साथ अपने विचार लिखता चलता था और 1973 में ‘पी सी टाईम्स’ साप्ताहिक में मेरे कुछ लेख छपे भी।इससे पूर्व इसी वर्ष आगरा के ‘पेडलर टाईम्स’ में एक कविता तथा ‘युग का चमत्कार’ साप्ताहिक में एक लेख स्वामी दयानन्द’सरस्वती’पर ‘अंधेरे उजाले’ शीर्षक से छप चुका था। 1980 से ‘सप्तदिवा साप्ताहिक’,आगरा में अक्सर मेरे लेख छपते रहे इस पत्रिका से सहायक संपादक व फिर उप सम्पादक के रूप में सम्बद्ध भी रहा। बाद मे 2003 में साप्ताहिक ‘ब्रह्मपुत्र समाचार’ ,आगरा में भी मेरे लेख छपे वहीं त्रैमासिक पत्रिका ‘अग्रमंत्र ‘ में भी मेरे लेख स्थान पा सके बल्कि मुझे उप सम्पादक के रूप में सम्बद्ध भी किया गया जबकि वह पत्रिका वैश्य समुदाय की थी और कायस्थ होने के बावजूद मुझे अपवाद रूप से जोड़ा गया था। लखनऊ आने पर भी शुरू-शुरू में एक साप्ताहिक पत्र में मेरे लेख छपे।
02 जून 2010 से ब्लाग ‘क्रांतिस्वर’ प्रारम्भ करने के बाद से समस्त लेखन ब्लाग द्वारा ही हो रहा है फिर भी एक-दो पत्र-पत्रिकाओं ने कुछ ब्लाग-पोस्ट्स को प्रकाशित भी किया है। अगस्त 2010 से ही दूसरा ब्लाग ‘विद्रोही स्व स्वर में’ भी प्रारम्भ हो गया था।इस ब्लाग में लखनऊ से 1961 में चल कर वापिस 2009 में लखनऊ लौटने तक का वर्णन करने का लक्ष्य था किन्तु कुछ वजहों से 1996 के बाद के घटनाक्रम लिख नहीं सके हैं।
‘क्रांतिस्वर’

इस ब्लाग में राजनीति,ज्योतिष,सामाजिक,धार्मिक विषयों पर लेख दिये हैं और ‘ढोंग-पाखंड-आडंबर’पर ज़बरदस्त प्रहार किया है। परिणामतः कुछ लोगों ने लामबंदी करके मेरे व मेरे परिवार को तबाह करने का अभियान चलाया हुआ है जिनमें निकटतम रिश्तेदार व अपनी पार्टी के लोग भी शामिल हैं।
जन-कल्याण हेतु स्तुतियेँ देने हेतु ‘जनहित में’ नामक ब्लाग शुरू किया था जिसे 2011 के हज़ारे/केजरीवाल आंदोलन के विरोध में दो बार स्थगित किया था अब मोदी/केजरीवाल/हज़ारे/RSS के प्रति विरोध प्रकट करने हेतु प्राइवेट ब्लाग में तब्दील करके सार्वजनिक रूप से हटा लिया है।
सर्वे भवन्तु सुखिनःसर्वे सन्तु निरामयः
इसके माध्यम से फेसबुक पर उपलब्ध स्वास्थ्य संबन्धित जानकारी को सार्वजनिक रूप से एक स्थान पर संग्रहित करके देना शुरू किया है। अपने पास उपलब्ध पूर्व जानकारी को भी इस ब्लाग के माध्यम से प्रकाशित किया है।
कलम और कुदाल
इस ब्लाग के माध्यम से अपने विभिन पत्र-पत्रिकाओं में पूर्व-प्रकाशित लेख तथा खुद को पसंद औरों के लेख स्कैन कापी के रूप में लगाए हैं। कुछ विद्वानों के फेसबुक-नोट्स को भी इसके माध्यम से प्रकाशित किया है।

साम्यवाद (COMMUNISM)
इस ब्लाग का प्रारम्भ CPI के वरिष्ठ नेताओं संबंधी मेरे ब्लाग-पोस्ट्स एक पोंगापंथी किन्तु प्रभावशाली कामरेड द्वारा डिलीट करने व मुझे उस ब्लाग के एडमिन के रूप में हटाये जाने के बाद हुआ है। वस्तुतः वह बैंक कर्मी ‘क्रांतिस्वर’ में प्रकाशित मेरी कुछ ब्लाग पोस्ट्स को छल द्वारा डिलीट करना चाहता था इसीलिए उसने तिकड़म द्वारा पार्टी के ब्लाग में मुझे एडमिन बनाया था जिससे वह मेरा ID पासवर्ड हासिल कर सके। उसका यह मंसूबा पूरा न हो पाने के कारण उसने अपनी नापसंद के बर्द्धन जी व अंजान साहब से संबन्धित मेरे ब्लाग पोस्ट्स हटा कर मुझे एडमिनशिप से हटा दिया था।
http://communistvijai.blogspot.in/2013/09/blog-post_11.html
इस ब्लाग में अन्य कम्युनिस्ट विद्वानों के लेखों को भी स्थान दिया है जिस कारण खिन्न होकर सीतापुर से संबन्धित उक्त बैंक कर्मी कामरेड ने छल द्वारा फेसबुक लिंक हेतु इस ब्लाग में झंझट खड़ा करवा दिया है। क्योंकि हमारे इस ब्लाग के कारण उनके द्वारा संचालित ब्लाग पर विजिट्स कम हो गए थे। बजाए अपनी गुणवत्ता सुधारने के उक्त विद्वेषी साहब ने इस ब्लाग पर झंझट खड़ा करना उचित समझा है।
जन-साम्यवाद
साम्यवाद (COMMUNISM) ब्लाग पर झंझट लगने पर इस ब्लाग को शुरू किया था अतः इस पर भी उन लोगों द्वारा झंझट लगवा दिया गया है। ‘सत्य’ का सामना करने की हिम्मत न होने के कारण सत्य को उद्घाटित होने देने से रोकना ही उनको ठीक लगा है।
जनहित में
साम्यवाद और जन-साम्यवाद दोनों नए ब्लाग्स में झंझट खड़ा करा दिये जाने से मुझे इस एक और नए ब्लाग को शुरू करना पड़ा है। लेकिन उन टेढ़ी चाल वाले कामरेड ब्लागर साहब ने इस ब्लाग में भी झंझट खड़ा करा दिया है।

ढोंग-पाखंड-आडंबर के विरुद्ध लड़ाई में साथ देने के बजाए ‘एथीस्टवादी’ उसमें अड़ंगा लगा कर अप्रत्यक्ष रूप से पोंगापंथियों की ही मदद कर रहे हैं। ऐसी मानसिकता की बहुलता के कारण ही जनता से साम्यवादी पार्टियां कटी-कटी रहती हैं।

मुख्य रूप से ‘क्रांतिस्वर’ ब्लाग के माध्यम से तमाम झंझावातों के बावजूद हमारा अभियान जारी है और आजीवन जारी रहेगा। हालांकि मुझे यह भी मालुम है की इस छल-छद्यम की दुनिया में मेरी आवाज़ ‘नक्कारखाने में तूती की आवाज़’ ही बनी रहेगी। सच्चाई किसी को कभी भी स्वीकार नहीं होगी और मैं सच्चाई का रास्ता कभी भी छोडूंगा नहीं।
~विजय राजबली माथुर ©

 
 
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