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Monthly Archives: January 2015

विद्रोही स्व-स्वर में क्या सही ? क्या गल त ? —विजय राजबली माथुर

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने विद्यार्थी काल से ही मुझे पसंद रहे हैं और हिन्दी तथा अङ्ग्रेज़ी निबंध मैं तब -तब उन्हीं पर लिखता था जब-जब ‘मेरे प्रिय नेता’ या ‘YOUR FAVOURITE LEADER’ पर परीक्षा में लिखना होता था। इसलिए उनका यह कथन कि अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना सबसे बड़ा अपराध है न केवल मुझे प्रिय लगता है बल्कि मैं अक्सर उसी का अनुसरण भी करता हूँ।इसी कारण अधिकांशतः अधिकांश लोगों का बुरा भी बना रहता हूँ। मुझ पर नरेंद्र तोमर साहब का यह कथन हू-ब – हू लागू होता है-" जिस किसी भी व्यक्ति की सोच और उसका व्यवहार , खासतौर पर धार्मिक मामलों में, आम प्रचलित सोच और व्यवहार से अलग और उनका विरोधी होता है, वह न केवल समाज बल्कि अक्सर अपने परिवार में भी ज़्यादातर अकेला ही होता है। "

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बिलकुल सही व सटीक आंकलन है यह और मैं इसका पूर्ण भुक्त-भोगी भी हूँ। मैं प्रचलित मजहबों/संप्रदायों/रिलीजन्स को धर्म नहीं मानता हूँ बल्कि उनको ‘ढोंग-पाखंड-आडंबर’ मानता हूँ। धर्म और भगवान की इस व्याख्या को ही मैं सही और वैज्ञानिक मानता हूँ :

धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

भगवान =भ (भूमि-ज़मीन )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी)

चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं।

इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।

लेकिन हमारे प्रत्येक रिश्तेदार को मेरा दृष्टिकोण नापसंद है और वे मुझे ‘नास्तिक’ कहते हैं जबकि मैं ‘नास्तिक’ स्वामी विवेकानंद के अनुसार उनको मानता हूँ जिनको खुद अपने ऊपर विश्वास नहीं है। मज़ेदार बात यह है कि खुद को ‘नास्तिक’ कहने का दंभ भरने वाले लोग भी मेरा नहीं ढ़ोंगी पोंगापंथियों का ही दृष्टिकोण मानते हैं। ‘पदार्थ-विज्ञान’ (MATERIAL SCIENCE ) पर आधारित जिस हवन -पद्धति को मैं मानता हूँ उसका उपहास ढ़ोंगी-पाखंडी और एथीस्ट -नास्तिक दोनों ही समान रूप से करते हैं। बल्कि इन दोनों प्रकार के लोग मुझे उत्पीड़ित करने हेतु ‘तांत्रिक’ प्रक्रिया का प्रयोग करते हैं चाहे वे अलीगढ़ के KBM हों या फिर नास्तिक DGS और सीतापुर से संबन्धित KMM तथा SMM हों या फिर नास्तिक पी टी सीतापुरिया । इन लोगों ने पूना,पटना,रांची,दरियाबाद से संबन्धित ब्लागर्स के संपर्क द्वारा भी हमारे लेखन के प्रति विष-वमन किया है तथा मेरी श्रीमती जी के खास सगे लोगों को भी दिग्भ्रमित किया हुआ है।श्रीमती जी की भाभी जी ने मुझे इस बात के लिए लांछित किया कि मैंने उनकी आरा वाली चचिया सास के षडयंत्रों की सूचना देकर उनको आगाह क्यों किया? उनके अनुसार उनके कुनबे में कोई भी गलत नहीं है। उनकी बात सच है तो फिर 24 दिसंबर 2014 को उनकी चचिया सास की बेटी द्वारा पूना से भेजे इस मेसेज का क्या अर्थ है( जो कि 18 वर्ष में पहली बार संपर्क साधने का कोई प्रयास है) और किस भाषा व ध्येय के जरिये कि इस संदेश के अगले दिन मेसेजदाता के एक चाचा का पटना में निधन हो गया। ज़ाहिर है श्रीमती जी की आरा वाली चाची की यह बेटी अपनी माँ के कारनामों से पूरी तरह वाकिफ थी जिसने श्रीमती जी के भाई साहब को इतना बीमार करा दिया था कि वह आफिस जाने में असमर्थ हो गए ।इस मेसेज के जरिये श्रीमतीजी को चेताया गया था कि उनको अपने भाई साहब के पास पटना में होना चाहिए था। जब भाभी जी को इसकी सूचना देनी चाही तो उन्होने अपनी चचिया सास की इस बेटी के संबंध में कुछ भी सुनने से इंकार कर दिया।

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जब भाई साहब को अस्पताल में भर्ती कराया गया और श्रीमती जी की ख़्वाहिश को देखते हुये भाभी जी को उनके जन्मदिवस की बधाई देते हुये श्रीमती जी के वहाँ पहुँचने की सूचना दी तो उनका साफ-साफ कहना था कि उनको अभी ज़रूरत नहीं है वह वहाँ से रिटर्न टिकट तैयार रखेंगी। अतः टिकट केंसिल करवाकर जाना रद्द कर दिया:

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भाई साहब की जन्मपत्री का विश्लेषण करते हुये उनको मंदिरों में व पंडितों को ‘दान का निषेद्ध’ स्पष्ट बता दिया था बावजूद इसके वह अपने चाचा के साथ गया तीर्थ यात्रा पर गए जिस कारण उनका ‘पुण्य कर्म’ नष्ट हो गया व उनकी चाचियों की तांत्रिक प्रक्रिया कारगर हो गई। SPGI, लखनऊ में नवंबर 2013 में श्रीमती जी की देवघर वाली चाची ने उनसे कहा था कि वह अपनी भतीजियों की चिंता न किया करें जबकि साथ ही साथ अपने रुग्ण पति के समक्ष ही मुझसे उनके बेटों का गार्जियन व उनके बेटों को मेरे बेटे का गार्जियन बनने की बात भी काही थी। इस कथन का प्रयोजन क्या हो सकता है?
आरा वाली और देवघर वाली श्रीमती जी की चाचियों ने उनके भाई साहब व भाभी जी का दिमाग उसी प्रकार काबू कर रखा है जिस प्रकार कभी रमेश कटारा ने कामरेड रमेश मिश्रा जी का दिमाग काबू कर लिया था और अब पी टी सीतापुरिया DGS साहब का दिमाग काबू किए हुये है। जबकि श्रीमती जी उनके लिए चिंतित हैं भाई साहब को आगाह की जाने वाली कोई भी बात भाभी जी सुनने को बिलकुल ही तैयार नहीं हैं और उनकी चाचिया इसका पूरा बंदोबस्त कर चुकी हैं।

‘सदकर्म,अकर्म और दुष्कर्म’ सिद्धान्त के अनुसार यदि कोई कार्य किया जाना चाहिए और किया न जाये तो वह ‘अकर्म’ होता है और सामाजिक या कानूनी अपराध न होते हुये भी परमात्मा के दृष्टिकोण से वह ‘दंडनीय अपराध’ होता है जिसका दंड अकर्म करने वाले को भुगतना ही होता है। इसी अकर्म से बचने हेतु 23 वर्ष पूर्व रमेश कटारा के प्रति रमेश मिश्रा जी को आगाह किया था और डेढ़ वर्ष पूर्व DGS साहब को पी टी सीतापुरिया के प्रति। लेकिन जैसे उन दोनों ने मेरे द्वारा दी सूचना को मेरी ‘धृष्टता ‘ माना था उसी प्रकार भाभी जी व भाई साहब ने मेरे द्वारा प्रदत्त सूचना को ‘धृष्टता’ व अनधिकृत चेष्टा माना है। परंतु मैं निश्चिंत हूँ कि मैं ‘अकर्म’ -दोष से सुरक्षित हूँ।

 
 
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