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Monthly Archives: March 2015

विद्रोही स्व-स्वर में स्थापित मान्यता ओं पर आधारित ‘राम राज्य’ एक उत्तम कलात्मक फिल् म — विजय राजबली माथुर

(फिल्म-सौजन्य से डॉ सुधाकर अदीब साहब )

72 वर्ष पूर्व 1943 में प्रदशित फिल्म ‘राम राज्य ‘ की पट कथा कानू देसाई साहब ने महर्षि वाल्मीकि की रामायण के आधार पर लिखी है। इसका निर्देशन विजय भट्ट साहब ने किया है और संगीत शंकर राव साहब का है। राम के आदर्श चरित्र को सजीव किया है प्रेम अदीब साहब ( डॉ सुधाकर अदीब जी के पितामह ) ने एवं सीता के त्यागमय जीवन को साकार किया है शोभना समर्थ जी ने।

गीत-संगीत और कलाकारों का अभिनय चित्ताकर्षक व मनोरम है। आम जन-मानस में राम व सीता की जो छवी है उस कसौटी पर फिल्म पूरी तरह से अपने उद्देश्य को प्रस्तुत करने में सफल रही है। सीता-वनवास एक धोबी की आशंका पर ही इस फिल्म में भी दिखाया गया है। इन दृश्यों को चरितार्थ करने में प्रेम अदीब साहब व शोभना समर्थ जी का अभिनय वास्तविक ही लगता है। लव-कुश एवं वाल्मीकि के चरित्र भी लोक-मान्यताओं के अनुरूप ही हैं। फिल्म के अंतिम भाग में राम के अश्व मेध यज्ञ के दृश्य का वह भाग आज के संदर्भ में भी काफी कुछ सही प्रतीत होता है जिसमें लव-कुश के मुख से वाल्मीकि को यह बताते हुये दिखाया गया है कि अयोध्या के नगरीय जीवन और जनता से उनके वन का जीवन और वनवासी उत्तम हैं। लेकिन आज नगरों की भूख शांत करने के लिए वनों का दोहन व वनवासियों का शोषण किया जा रहा है । आज फिर से लोक जीवन के हिमायती लव-कुश की परंपरा को प्रश्रय देने की महती आवश्यकता है।

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इस फिल्म में यद्यपि लोक प्रचलित मान्यतों के आधार पर ही प्रदर्शन है किन्तु मैंने अपने कई लेखों के माध्यम से राम-वनवास तथा सीता-वनवास के राजनीतिक,कूटनीतिक कारणों का उल्लेख किया है उनमें से कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं। :

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विद्रोही स्व-स्वर में नानाजी : डॉ राधे म ोहन लाल माथुर साहब का स्मरण आज क्यों? — विजय रा जबली माथुर

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नानाजी की पुण्य तिथि – 27 मार्च पर स्मरण- श्रद्धांजली :

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( बाएँ से नानाजी के भाई एवं नानाजी – डॉ राधे मोहन लाल माथुर )
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( बाएँ से मामाजी -डॉ कृपा शंकर माथुर, पूर्व विभाध्यक्ष एनथ्रोपालोजी, लखनऊ विश्व विद्यालय एवं नानीजी )

हमारे नानाजी को यह संसार छोड़े हुये आज 36 वर्ष पूर्ण हो गए हैं यों तो उनके संबंध में विचार इसी ब्लाग में अलग-अलग कई बार आ भी चुके हैं किन्तु पुनः कुछ खास-खास बातों का एक साथ उल्लेख करना उचित प्रतीत हो रहा है। नानाजी वैसे तो मुरादाबाद के थे किन्तु उनके पिताजी श्याम सुंदर लाल माथुर साहब नौकरी के सिलसिले में शाहजहाँपुर आ गए थे अतः उनके बाद नानाजी ने अपने दो अन्य भाइयों की भांति भारद्वाज कालोनी, शाहजहाँपुर में मकान बना लिया था जो अगल-बगल ही हैं। चित्र में नानाजी के चौथे भाई हैं उनका मकान ठीक नानाजी के बाद है और उनसे मिला हुआ उनके सबसे छोटे भाई का है। उनके दो भाई इन लोगों के साथ ही रहते थे। बचपन में दो बार नानाजी के यहाँ रह कर पढ़ना पड़ा है पहली बार 1962 – 64 में तब जब बाबूजी का ट्रांसफर नान फेमिली स्टेशन- सिलीगुड़ी हो गया था और दूसरी बार 1967 -68 में जब सिलीगुड़ी से लौटना तय हो गया था लेकिन स्टेशन घोषित नहीं हुआ था। इससे भी छुटपन में लखनऊ से शाहजहाँपुर नानाजी के पास जाते ही रहते थे।
*जब हम लोग लखनऊ में हुसैन गंज में थे 1957 में बाबूजी का वोट न्यू हैदराबाद में पड़ना था वहाँ नानाजी/मामाजी के घर गए थे । उनके घर के सामने ही वोट पड़े थे तब हर उम्मीदवार का अलग-अलग बाक्स होता था, जिसके बाक्स से मतपत्र निकलते उसके नाम गिने जाते थे। नानाजी की भी ड्यूटी लगी थी । शाम को लौट कर नानाजी ने बाबूजी को बताया था और मुझे आज भी याद है- दो बैलों की जोड़ी वाले बाक्स में कुछ मतपत्र ऊपर फंसे दीख रहे थे जिनको नानाजी ने बाक्स के भीतर करना चाहा तो उनके साथ के दूसरे महोदय ने उनसे कहा ऐसा न करो और उन्होने बाहर फंसे सारे मतपत्र खींच कर ‘लाल’ रंग के हंसिया-बाली वाले बाक्स में डाल दिये – निश्चय ही वह कर्मचारी कम्युनिस्ट पार्टी की ओर झुकाव रखते होंगे। आज जब पुड्डीचेरी में भाकपा का 22 वां राष्ट्रीय अधिवेन्शन चल रहा है नानाजी की पुण्यतिथि पर यह घटना याद आ रही है।
*चूंकि नवंबर 1962 में बाबूजी के सिलीगुड़ी जाने पर किसी भी स्कूल में शाहजहाँपुर में हम लोगों का दाखिला नहीं हो रहा था नानाजी ने कभी उनके पिताजी के जमाने में उनके घर खाना बनाने वाली मिश्राईंन के बड़े सुपुत्र (जो वाराणासी में उच्चाधिकारी थे ) द्वारा खोले गए विश्वनाथ जूनियर हाई-स्कूल के लिए उनके ही छोटे भाई जो तब कपड़ों की दुकान चलाते थे से बात की जिनहोने तुरंत अपने स्कूल मेनेजर – काशीनाथ वैद्य जी को हम दोनों भाइयों को दाखिला दिलाने के लिए कहा जिनहोने प्राचार्य शर्मा जी (जो सरदार पटेल हिन्दू इंटर कालेज के रिटायर्ड़ प्रिंसिपल थे ) से कह दिया। उस वक्त तक लोग-बाग पुराने सम्बन्धों की भारी कद्र करते थे जिस कारण हम लोगों का एक वर्ष खराब होने से बच सका।
*इसी प्रकार सितंबर 1967 में भी सत्र चालू हो चुकने के कारण हम भाई-बहन का दाखिला करने में दिक्कत आ रही थी। नानाजी के इन चौथे भाई के एक मित्र थे तिनकू लाल वर्मा जी जो ‘आर्य कन्या पाठशाला’, के मेनेजर थे जिनसे नाना जी ने बात करके बहन को वहाँ दाखिल करा दिया। लेकिन छोटे भाई को नौवें में तथा मुझे इंटर पार्ट वन में प्रवेश लेना था जिस कारण दिक्कत थी। सरदार पटेल कालेज के वाईस प्रिंसिपल एक माथुर साहब के होते हुये भी प्रिंसिपल टंडन जी ने स्पष्ट इंकार कर दिया था।
नानाजी ने अंततः गांधी फैजाम कालेज के प्रिंसिपल चौधरी मोहम्मद वसी साहब से संपर्क किया और उन्होने बिना किसी जान-पहचान के भी मुझे मेरे पसंद के विषयों के साथ दाखिला दे दिया। नानाजी के तीसरे भाई जिनको हम लोग बंबई वाले नानाजी कहते थे के एक सह-पाठी माशूक अली साहब जो नगर पालिका के पूर्व चेयरमेन छोटे खाँ साहब के खानदानी थे और हमें इतिहास पढ़ाते थे अक्सर बंबई वाले नानाजी को सलाम बोलने को कहते थे उसी प्रकार वह भी प्रोफेसर साहब को सलाम बोलने को कहते थे।
छोटे भाई का दाखिला चौक स्थित मिशन स्कूल में नाना जी ने करा दिया था – यह वही स्कूल था जिसमें क्रांतिकारी राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ जी भी पढे थे ।
* नानाजी टाउन हाल में होने वाले हर दल के नेता का भाषण सुनने जाते रहते थे मुझे भी ले जाते थे। डॉ राम मनोहर लोहिया, कामरेड एस एम बनर्जी, शेख अब्दुल्ला, सुचेता कृपलानी आदि को पहले चरण में 1964 तक 12 वर्ष की अवस्था में सुन चुके थे; नानाजी के पास उपलब्ध सत्यार्थ प्रकाश, महाभारत, गीता आदि पढ़ चुके थे। रामचरित मानस तो लखनऊ में ही नौ वर्ष की अवस्था तक माँ ने पढ़ने को दी थी । दूसरे चरण में 15 वर्ष की अवस्था में संत श्याम जी पाराशर के प्रवचन सुनने नाना जी के साथ गए हैं और उनकी पुस्तकों का अवलोकन किया है।
* 1973 में मेरठ में प्रथम जाब करते हुये भी एल आई सी की एक परीक्षा देने लखनऊ मामाजी के पास आया था और लौटते में शाहजहाँपुर होकर नानाजी से मिलने गया था । यूनिवर्सिटी की बादशाहबाग कालोनी से आई टी कालेज तक मामाजी व माईंजी भी पैदल ही मुझे बस तक छोडने आए थे। उस वक्त सिटी बस में चारबाग तक के कुल पचास पैसे लगे थे। लखनऊ मेल रात को साढ़े बारह बजे पहुंचता था और पटरी के सहारे ही चल कर मैं नानाजी के घर एक बजे पहुँच पाया था। नानाजी ने मेरी आवाज़ सुन कर दरवाजा खोल दिया था किन्तु बगल वाले घर से बंबई वाले नाना जी ने पूंछा कि आधी रात को दरवाजा क्यों खोल दिया? तब नानाजी ने तत्काल मेरा घर का नाम लेकर कहा कि मुझे लेने आया है। अतः मैं फिर वाकई नाना जी को अपने साथ मेरठ ले गया था जबकि माँ को ताज्जुब हुआ क्योंकि पहले से उनको पता न था तब फोन का ज़माना नहीं था। सीधी गाड़ी भी तब न थी- बरेली व हापुड़ में पेसेंजर ट्रेन बदलते हुये मेरठ सिटी फिर वहाँ से कैंट स्थित मिलेटरी क्वार्टर पहुंचे थे। क्वार्टर के सामने ही लाईन पार करते ही वह फैक्टरी थी जिसमें मैं जाब करता था। घर के इतने नजदीक ड्यूटी करते मुझे देख कर नानाजी को अत्यधिक प्रसन्नता हुई थी।
* 1974 में नानाजी के( चित्र में साथ वाले ) भाई की दूसरी बेटी -कमल मौसी की शादी में भाग लेने शाहजहाँपुर नानाजी के पास गया था । उसके बाद मेरा शाहजहाँपुर जाना नहीं हुआ है और नानाजी भी फिर न ही मेरठ न ही आगरा पहुँच पाये थे।
* 1977 में मामाजी के असामयिक निधन के बाद जब लखनऊ आए थे तब ही वह नानाजी से भी अंतिम भेंट थी। क्योंकि मामाजी (उनसे भी पूर्व मौसी भी नहीं रही थीं ) के बाद नानाजी अत्यधिक बीमार रहने लगे थे व काफी कमजोर हो गए थे। वह मोतियाबिंद का आपरेशन कराना चाहते थे मैंने भी और मौसेरे भाई तथा माईंजी ने भी उनको आपरेशन न कराने को कहा था। किन्तु नाना जी ने अक्तूबर 1978 में शाहजहाँपुर में आँखों का आपरेशन करा ही लिया था। तबसे निरंतर उनकी तबीयत बिगड़ती गई। 27 मार्च 1979 को उन्होने यह संसार छोड़ दिया। माँ-बाबूजी ही शाहजहाँपुर जा सके। मैं व भाई इसलिए न जा सके क्योंकि छोटी बहन आई हुई थीं व भांजी कुछ महीनों की ही थी । अतः बहन-भांजी के साथ हम भाइयों को आगरा में ही रहना पड़ा था। माँ ने बताया था कि नानाजी की अधिकांश किताबें देख-रेख के आभाव में दीमक ने खराब कर दी थीं। लखनऊ से पहुंची माईंजी को वे किताबें फेंकनी पड़ गईं थीं। माँ को माईंजी से उस दशा की किताबें मांगना उचित नहीं लगा था वरना वह मेरे किताबों के शौक के चलते मांग लातीं।

* हालांकि अखबार व किताबें तो हमें बाबूजी भी लाकर देते रहते थे लेकिन नानाजी के पास उपलब्ध साहित्य के अध्यन ने भी मेरे लेखन व विचार-धारा को प्रभावित किया है। माँ तो अक्सर यही कहती थीं कि यह ननसाल पर गया है।

 

विद्रोही स्व-स्वर में ‘नेकी न कर ,दूरिया ँ बढ़ा’ — विजय राजबली माथुर

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30-10-12 का नोट :
नेकी कर और दरिया मे बहा’ -यह कहावत बचपन से सुनते आए हैं और अब तक इसके मतलब यह समझते थे कि,किसी की मदद करके उसे भूल जाओ एवं उससे बदले मे मदद की उम्मीद मत करो। लेकिन अब हकीकत मे किसी की मदद करने का मतलब हो गया है-तौहीन का सामना करना और नुकसान उठाने के लिए तैयार रहना। केवल फेसबुक और ब्लाग जगत मे ही नहीं परिचितों और रिशतेदारों से भी।
किसी को नेत्र आपरेशन से बचाव हेतु ‘केलकेरिया फ्लोर’6 X का 4 tds स
ेवन करने का सुझाव दिया ,किसी चिकित्सक से पूछ कर ‘मुलेठी’और ‘निर्मल सुपारी’ पार्सल से भिजवाई किन्तु उस मरीज ने इंनका उपयोग नहीं किया। एक सरकारी अफसर की पत्नी होने के कारण अस्पताल मे आपरेशन कराना ‘स्टैंडर्ड’ जो था । आपरेशन मे जो तकलीफ और खर्चा हुआ उसी से तो समाज मे बड़े आदमी होने का आभास जो दिलाया जा सकता था।
आज के युग मे ‘नेकी न कर ,दूरियाँ बढ़ा’ कहावत गढ़ कर उस पर अमल करने की ज़रूरत महसूस होती है।
30 अक्तूबर 2012 को यह नोट लिखा था उसके बाद 25 जनवरी 2015 को निम्न संदर्भित पोस्ट के माध्यम से उसका और खुलासा करना पड़ा था।
http://vidrohiswar.blogspot.in/2015/01/blog-post_25.html
परंतु इस रिश्तेदार के रिश्तेदारों के माध्यम से समझाने की तमाम कोशिशों के बावजूद बचाव को न प्रस्तुत हुये। एक बीमारी के इलाज को कई बीमारियों तक बढ़ाने में उनकी जिन चाचियो/चचिया सासों का योगदान रहा उनके ही चंगुल में फंसे चल कर स्वास्थ्य व धन की काफी बरबादी कर ली फिर भी ठोकर खा कर भी सुधार की कोई संभावना नहीं दिखाई देती है। प्रत्येक को अपनी व अपने परिवार के हितों की रक्षा प्राथमिकता के आधार पर करनी चाहिए और यही सलाह इन लोगों को 1996 से सार्वजनिक रूप से देते आए हैं। लेकिन चूंकि इनके चचेरे भाइयों को अपने घर इसलिए नहीं पहुँचने दिया कि उनकी माताओं की भूमिका घातक रही है। अतः इन लोगों ने अपनी मदद हेतु भी अपने घर हम लोगों को नहीं पहुँचने दिया।
हमें तो विपरीत परिस्थितियों से जूझना ही पड़ता है अतः किसी भी प्रकार के प्रतिरोध का सामना करने के लिए सदैव प्रस्तुत रहते हैं। परंतु इन लोगों के व्यवहार से सीख यह मिलती है कि आज के जमाने में किसी के भले के लिए सोचना व आगाह करना गुनाह है और उससे बचना चाहिए।

 
 
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