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विद्रोही स्व-स्वर में क्यों होते हैं मे रे खिलाफ कई लोग ? —— विजय राजबली माथुर

28 Feb

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ईश्वर= जो समस्त ऐश्वर्यों से सम्पन्न हो अर्थात आज कोई भी नहीं। धर्म= शरीर व समाज को धारण करने वाले तत्व जैसे ‘ सत्य,अहिंसा (मनसा- वाचा- कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य’। जो ‘नास्तिक संप्रदाय’ धर्म के खिलाफ है वह स्व्भाविक रूप से ‘ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरकारी ,पुरोहितवादी/ब्राह्मण वाद’ को अप्रत्यक्ष समर्थन देकर मजबूत करता है। इसीलिए समष्टिवादी ‘साम्यवाद’ भारत की धरती पर जन-उपेक्षा का शिकार होकर लुटेरे शोषकों के हमले झेल रहा है और निर्दोष कन्हैया कुमार जेल में यातनाग्रस्त हैं।
ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरकारी/बाजरवादी क्रियाओं को धर्म की संज्ञा देना जनता को धोखे में रख कर उसके शोषकों का बचाव करना मात्र है। क्यों नहीं जनता को ‘धर्म’ का ‘मर्म’ समझा कर अपने साथ लाया जाता ?

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