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Monthly Archives: April 2016

विद्रोही स्व-स्वर में ‘ज्ञान ‘ से शत्रुत ा रख कर जीत – विक्टरी कैसे हासिल होगी ? —— विजय राजबली माथुर

ब्रह्म समाज के माध्यम से राजा राम मोहन राय ने विलियम बेनटिक से भारत में ‘अङ्ग्रेज़ी’ शिक्षा लागू करवाईथी। उनका दृष्टिकोण था कि, अङ्ग्रेज़ी साहित्य द्वारा उनके स्वतन्त्रता संघर्षों का इतिहास भी हमारे नौजवान सीखेंगे और फिर भारत की आज़ादी के लिए मांग बुलंद करेंगे और हुआ भी यही। मोहनदास करमचंद गांधी,सुभाष चंद्र बोस,जवाहर लाल नेहरू,भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद सभी अङ्ग्रेज़ी साहित्य से भलीभाँति परिचित थे और आज़ादी के बड़े योद्धा बने।
हालांकि वर्तमान केंद्र सरकार का उद्देश्य ‘संस्कृत’ को बढ़ाने के पीछे कुछ और है जैसे कि, तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने सस्ते भारतीय क्लर्क पाने के उद्देश्य से ‘अङ्ग्रेज़ी’ को लागू किया था लेकिन वह आज़ादी के आंदोलन का एक बड़ा हथियार भी बनी। उसी प्रकार राजा राम मोहन राय सरीखा व्यापक दृष्टिकोण अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है। जब आप संस्कृत जानेंगे तब आप ब्राह्मण वाद की लूट की चालाकी को भी समझेंगे और उसका प्रतिकारकर सकेंगे।
उदाहरणार्थ आपको स्तुतियों में एक शब्द मिलेगा- ‘सर्वोपद्रव्य नाशनम ‘ अब ब्राह्मण यजमान से ऐसे ही वाचन करवाता है जिसका आशय हुआ कि, सारा द्रव्य नष्ट कर दो। जब आपकी प्रार्थन्नुसार सब द्रव्य नष्ट होगा तब आप ब्राह्मणों के मकड़ जाल में – दान दक्षिणा देने के फेर में फसेंगे।
लेकिन अगर आप ‘संस्कृत’ के ज्ञाता बन जाते हैं तब आप जानेंगे कि, इस शब्द का पहले संधि-विच्छेद करना फिर वाचन करना है।
अर्थात जानकारी होने पर वह शब्द ‘सर्व’ + उपद्रव ‘ + नाशनम पढ़ा जाएगा जिसका अर्थ है सारे उपद्रव अर्थात पीड़ाओं को नष्ट कर दो। अब आप दान-दक्षिणा के फेर में नहीं फंस सकते।
चतुराई इसी में है कि, अधिकाधिक लोग ‘संस्कृत’ की जानकारी हासिल करके वेदों के माध्यम से सारे विश्व की मानवता की एकता की बात को बुलंद करें और ब्रहमनवाद की लूट को ध्वस्त करें।
कुछ ब्राह्मण वादी नहीं चाहते कि संस्कृत पर उनका एकाधिकार समाप्त हो वे उसको सार्वजनिक करने का विरोध कर रहे हैं उनके जाल में नहीं फंसना चाहिए और ज्ञान का विस्तार करना चाहिए जिससे मानव कल्याण संभव हो।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1070815762980399

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लेकिन क्या करेंगे जब अति विद्वजन घोंगावादी प्रवृति को त्यागने को ही राज़ी न हों। कभी एथीज़्म/नास्तिकता के नाम पर तो कभी मूल निवासी के नाम पर संस्कृत का विरोध करने वाले वस्तुतः पोंगापंथी ब्राह्मण वाद के उस सिद्धान्त को ही लागू रखने के पक्ष धर हैं जिसके अनुसार ‘वेद’ पढ़ने का अधिकार शूद्रों को न था और गलती से वेद वचन सुन लेने वाले शूद्र के कान मे सीसा (lead ) डाल कर उसे बहरा बना दिया जाता था। आज के उदारीकरण के युग का सीसा- lead एथीज़्म और मूल निवासी में रूपांतरित हो गया है। यह वर्ग संस्कृत पर ब्राह्मणों के एकाधिकार वादी वर्चस्व को टूटने न देने के लिए और बहुसंख्यक जनता को मूर्ख बनाए रख कर उल्टे उस्तरे से मूढ़ने हेतु संस्कृत के विरोध में डट कर आवाज़ बुलंद कर रहा है।
जिसका एक और उदाहरण ‘दुर्गा -सप्त शती’ से प्रस्तुत है जिसमें एक स्तुति के बीच शब्द ‘ चाभयदा ‘ आता है इसका वाचन पोंगा-पंडित ऐसे ही कराते हैं जिसका अर्थ हुआ कि, आप प्रार्थना कर रहे हैं – और भय दो। जब आप भय मांगेगे तो वही मिलेगा जिसके निराकरण के लिए आप दान-दक्षिणा के फेर में फंस कर अपनी आय व्यर्थ व्यय करेंगे।
अब यदि आपको संस्कृत का ज्ञान होगा तब आप इसको संधि- विच्छेद करके यों पढ़ेंगे : च + अभय + दा अर्थात ‘और अभय दो’ जब आप अभय ( भय = डर नहीं ) मंगेगे तो निडर बनेंगे और ब्राह्मण वाद से गुमराह नहीं होंगे। हमने एक ब्लाग के माध्यम से जन – हित में स्तुतियाँ देना प्रारम्भ किया था किन्तु ज़्यादातर लोगों के हज़ारे के कारपोरेट भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन का समर्थन करने के कारण उस ब्लाग को हटा लिया था । लोग जब जाग्रत ही नहीं होना चाहते तब किया भी क्या जा सकता है। वेदना होती है विद्वानों से मूर्खता की बातें जान कर ।
जिन वेदों में विशेषकर ‘अथर्व वेद’ जो ‘आयु का विज्ञान’ है में समझाया गया है कि नव रात्र अर्थात नौ जड़ी-बूटियों का सेवन करके ‘नीरोग’ कैसे रहा जाये उसे पौराणिक ब्राह्मण वादियों ने झगड़े की जड़ बना कर समाज में विग्रह उत्पन्न कर दिया है और मूल निवासी तथा एथीज़्म वादी उस चक्रव्यूह में उलझे हुये हैं। जे एन यू विवाद के मूल में भी यही अज्ञानता है। ‘ज्ञान’ से शत्रुता रख कर जीत – विक्टरी कैसे हासिल होगी ?
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विद्रोही स्व-स्वर में उदारीकरण का जनता पर प्रभाव : ‘सच्चे साधक धक्का खाते और चमचे मज़े उड़ाते हैं’ —— विजय राजबली माथुर

1991 में अल्पमत सरकार के प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहा राव साहब ने वर्ल्ड बैंक के पूर्व अधिकारी मनमोहन सिंह जी को वित्तमंत्री बनाया था जिनके द्वारा शुरू किए गए ‘उदारीकरण ‘ को न्यूयार्क में जाकर आडवाणी साहब द्वारा उनकी नीतियाँ चुराया जाना बताया गया था। उस उदारीकरण की रजत जयंती वर्ष में तमाम विद्वान उसकी प्रशंसा में कसीदे गढ़ रहे हैं जो विभिन्न समाचार पत्रों में सुर्खियों के साथ छ्प रहे हैं।
उदारीकरण से 19 वर्ष पूर्व 20 वर्ष की अवस्था में रु 172और 67 पैसे मासिक वेतन से मैंने रोजगार शुरू किया था। छह माह में खर्च के बाद इतने पैसे बच गए थे कि, रु 150/-का टेलीराड ट्रांज़िस्टर,रु 110 /-की एक कलाई घड़ी व भाई-बहन समेत अपने लिए कुछ कपड़े बनवा सके थे। अगले छह माह में बचत से रु 300/- का एक टेबुल फैन व माता जी पिताजी के लिए कुछ वस्त्र ले सके थे। तब बैंक में S B a/c मात्र रु 5/- से खुला था और चेक-बुक या किसी चीज़ का कोई शुल्क नहीं लगता था।
उदारीकरण के 25 वर्ष बाद आज कोई बचत नहीं हो पाती है। निखद कही जाने वाली अरहर की दाल खरीदना भी संभव नहीं है। बैंकों में चेकबुक लेने का भी शुल्क देना पड़ता है, बैंक बेवजह के sms भेजते हैं और उनका भी शुल्क काट लेते हैं। दूसरी ब्रांच के लिए नगद जमा करने पर भी 1 प्रतिशत शुल्क काट लेते हैं। बचत न होने से जमा नहीं होता अतः निकासी भी मुमकिन नहीं तब a/c बंद कर दिया जाता है। पहले स्टाफ का व्यवहार सौम्य होता था अब रूखा रहता है।
उदारीकरण से अमीर ही और अमीर हुये हैं गरीब की तो कमर ही टूट गई है और अब तो ज़बान भी बंद की जा रही है।
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इस 19 मार्च को उत्तर प्रदेश सरकार के एक अंडरटेकिंग में कार्यरत एक एक्जिक्यूटिव इंजीनियर साहब जो आगरा में भी हमसे ज्योतिषीय परामर्श लेते रहे थे तीन वर्षों के अंतराल के बाद पधारे थे। वह मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश यादव के कार्य से संतुष्ट दीख रहे थे किन्तु उनको कानून-व्यवस्था की एकमात्र शिकायत थी। केंद्र की सरकार के निर्णयों से वह अधिक असंतुष्ट थे। FDI की सर्वाधिक आलोचना उन्होने की। उनका मत था कि, यदि FDI से देश का विकास होता अर्थात लोगों को बेहतर शिक्षा,स्वस्थ्य व जीवन स्तर प्राप्त होता तब यह ठीक हो सकती थी। किन्तु सरकार जिसको विकास कहती है वह विकास नहीं है। उनके अनुसार बढ़िया कपड़ा और कारें विकास का प्रतीक नहीं हैं क्योंकि ये सबको सुलभ ही नहीं हैं। वह कह रहे थे विकास वह होता यदि उनको सार्वजनिक परिवहन से मेरे पास 15 कि मी चल कर आने -जाने की सुविधा मिलती और निजी गाड़ी का प्रयोग न करना पड़ता। FDI से जो नए-नए माल खुल रहे हैं वे देश में असमानता की खाई को ही नहीं चौड़ा कर रहे हैं वरन भ्रष्टाचार के नए आयाम भी गढ़ रहे हैं।


इस बात को उन्होने उदाहरण देते हुये स्पष्ट किया कि जैसे उनके बचपन में उनके पिताजी उन लोगों की ख़्वाहिश पूरी कर देते थे वैसे ही जब वह अपने बच्चों की ख़्वाहिश पूरा करना चाहते हैं तो परेशानी महसूस करते हैं। उनके जमाने में जो बाज़ार में उपलब्ध था उसे पूरा करना उनके पिताजी के लिए मुश्किल न था। आज जब उनके बच्चे माल देखते -सुनते हैं तो चलने को कहते हैं और वहाँ जब रु 500/- में एक चम्मच आइसक्रीम एक -एक बच्चे को दिलाते हैं तो तत्काल डेढ़ हज़ार रुपए निकल जाने पर भी न बच्चों को संतुष्टि मिलती है न ही उनको खुद को तसल्ली मिल पाती है। माल के बाहर क्वालिटी की आइसक्रीम सस्ते में जी भर मिल सकती थी अगर दूसरा विकल्प न होता तो। इस प्रकार माल कल्चर विदेशी कंपनियों को न केवल फायदा पहुंचाने का वरन भारतीय पहचान मिटाने का भी बड़ा संबल बन गया है। वेतन से माल की ख़रीदारी करना संभव नहीं है , माल से माल खरीदने का मतलब है भ्रष्टाचार को अंगीकार करके शान दिखाना।


उनका यह भी साफ-साफ कहना था कि, अगले लोकसभा चुनाव आते-आते जन-असंतोष इतना भड़क जाएगा कि इस सरकार के बूते उसे सम्हालना मुश्किल हो जाएगा, साथ ही सरकार के मंत्री-सांसद जनता का सामना करने की स्थिति में ही नहीं रहेंगे। जिन सरकारी अधिकारी-कर्मचारी के दम पर सरकार चलती है उनका असंतोष भी चरम पर होगा और ये परिस्थितियाँ इस सरकार व इसकी पार्टी को पुनर्मूष्क: भव की स्थिति में ला देंगी। यदि इंजीनियर साहब का आंकलन सही भी निकले तब भी अभी तो तीन वर्ष और दो माह का समय कष्टप्रद है ही।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1039968139398495

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इस समाचार से कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि अर्थशास्त्रीय ‘ग्रेशम ‘ के सिद्धान्त के अनुसार " खराब ‘मुद्रा’ अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है "। उसी प्रकार समाज में खराब लोग हावी रहते हैं और अच्छे लोगों को व्यवहार से दूर कर देते हैं।
*1991ई में आगरा छावनी से भाकपा प्रत्याशी को किसी तकनीकी कारण से अपना गेंहू की बाल- हंसिया वाला चुनाव चिन्ह न मिल सका था अतः कामरेड जिलामंत्री के निर्देश पर मैं प्रदेश कार्यालय से उनको मिले चिन्ह ‘फावड़ा-बेलचा’ के लिए अधिकार-पत्र लेकर वापिस लौट रहा था। लखनऊ जंक्शन से अवध एक्स्प्रेस गाड़ी पकड़ना था। स्टेशन पर बैठ कर इंतज़ार कर रहे थे साथ में एक और सज्जन आकर बैठ गए थे। अनायास बातों-बातों में हस्तरेखा विज्ञान पर चर्चा छिड़ गई थी। उत्सुकता वश एक गेरुआ वस्त्र धारी अधेड़ पुरुष भी जगह मांग कर हम लोगों के साथ बैठ गए थे। वह भी अपना हाथ देखने के लिए ज़ोर देने लगे। जब उनके हाथ देखे तो बाकी बातें कुबूल करते हुये एक बात पर वह कहने लगे इस बात को छोड़ें बहुत पुरानी हो गई है। बात कितनी भी पुरानी हो हाथ में अपनी अमिट रेखा के साथ उपस्थित थी। हालांकि मैं सीधे-सीधे कहने से बच रहा था किन्तु दूसरे यात्री ने साफ-साफ कह दिया कि वह साधू बनने से पूर्व एक अध्यापक थे और किसी की हत्या करने के बाद भेष बदल कर जी रहे थे। उसके बाद वह गेरुआ साधू ट्रेन आने पर हम लोगों से बच कर दूसरे कम्पार्टमेंट से गए।
** 2000 ई में जब दयालबाग, आगरा के सरलाबाग क्षेत्र में मैंने ज्योतिष कार्यालय खोला था तब पास के मंदिर के पुजारी महोदय भी मुझे अपना हाथ दिखाने आए थे । उस वक्त वह 30 वर्ष आयु के थे और 25 वर्ष की आयु में मथुरा में एक हत्या करके फ़रारी पर आगरा में पुजारी बन गए थे जिस बात को बड़ी मुश्किल से उन्होने कुबूला था । उन्होने काफी मिन्नत करके कहा था कि इस बात का किसी से भी ज़िक्र न करूँ कि वह पंडित जी भी मुझे अपना हाथ दिखाने आए थे।
***आगरा में ही सुल्तानगंज की पुलिया स्थित एक मंदिर के पुजारी महोदय का इतिहास यह था कि वह इंदौर स्थित एक मार्बल की दुकान से गबन करके भागे हुये थे। उनका बेटा आठवीं कक्षा में लगातार तीन वर्ष फेल होने के बाद उनका सहायक पुजारी हो गया था जिसके चरण मथुरा में पोस्टेड एक तहसीलदार अग्रवाल साहब भी छूते थे क्योंकि वह पंडित था।
आज की दुनिया का यही दस्तूर है कि,’ सच्चे साधक धक्का खाते और चमचे मज़े उड़ाते हैं’। फिर समाज-देश में क्यों न अफरा-तफरी और बद- अमनी हो।

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*49 वर्ष पूर्व अर्थशास्त्र विषय का अध्यन करने के दौरान जो नियम ज्ञात हुये उनको समाज में आज हर क्षेत्र में लागू होता देखा जा रहा है। एक है ग्रेशम का सिद्धान्त जिसके अनुसार " खराब ‘मुद्रा’ अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है "। उसी प्रकार समाज में खराब लोग हावी रहते हैं और अच्छे लोगों को व्यवहार से दूर कर देते हैं।
*दूसरा है ‘उपयोगिता का सिद्धान्त ‘ जिसके अनुसार किसी भी वस्तु की उपयोगिता सदा एक सी नहीं बनी रहती है और उस वस्तु का मूल्य उसकी उपयोगिता के अनुसार ही तय होता है।
* तीसरा सिद्धान्त ‘ मांग और आपूर्ती ‘ का है जिसके अनुसार वस्तु की मांग अधिक होने व आपूर्ती कम होने पर मूल्य अधिक व मांग कम होने एवं आपूर्ती अधिक होने पर मूल्य कम हो जाता है।
लेकिन सामाजिक/व्यावहारिक जीवन में ‘ खराब मुद्रा’ वाला सिद्धान्त ‘उपयोगिता ‘ तथा ‘मांग व आपूर्ती ‘ वाले सिद्धांतों पर भारी पड़ता है। खराब चलन के लोग कृत्रिम रूप से तिकड़म द्वारा अच्छे चलन वालों को निकृष्ट घोषित करा देते हैं जिससे उनकी उपयोगिता कम हो जाती है और समाज में उनका मूल्य भी कम आँका जाता है। सामान्य सामाजिक जीवन में इन प्रक्रियाओं पर ध्यान न दिये जाने के कारण राजनीतिक जीवन में भी इनकी पुनरावृति होती है जिसका समाज पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ता है।
अहंकार ग्रस्त राजनीतिज्ञ चापलूसी को अधिक महत्व देते हैं न की योगिता की उपयोगिता को। परिणाम स्वरूप राजनीति व समाज को तो हानि पहुँचती ही है परंतु अंततः उन राजनीतिज्ञों को भी कालांतर में इसके दुष्परिणाम भोगने पड़ जाते हैं। चतुर व बुद्दिमान राजनीतिज्ञ भूल सुधार लेते हैं किन्तु अहंकार ग्रस्त राजनीतिज्ञों को अपनी भूल का एहसास होता ही नहीं है और वे चापलूसों से ही घिरे रह कर व्यर्थ के दोषारोपण सहते रहते हैं बनिस्बत सुधार कर लेने के।

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