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विद्रोही स्व-स्वर में देश की जनता भूखी है या कारपोरेट ने जनता लूटी है ? —— विजय राजबली माथुर

हमारी पार्टी के एक साथी की तबीयत खराब होने की सूचना आज फोन पर प्राप्त हुई तो शाम को चार बजे उनको देखने उनके घर गया । उनके स्वास्थ्य की कुशल क्षेम हमने पूछी तो उन्होने हम से यह सवाल किया कि, आप आज आए कैसे ? आज तो आपको रास्ते में काफी दिक्कत हुई होगी क्योंकि आज ‘बड़ा मंगल ‘ है। अब से 59 वर्ष पूर्व जब हम लोग लखनऊ में ही थे तब तो जेठ महीने का दूसरा मंगल ही बड़ा मंगल होता था। 1961 में बाबूजी के स्थानांतरण के बाद हम लोग लखनऊ से बाहर रहे फिर जब 48 वर्ष बाद पुनः यहीं आए तब यहाँ जेठ माह के चारों मंगल को बड़ा मंगल की संज्ञा दे कर जगह-जगह पूरी – सब्जी , पकौड़ी – छोले आदि – आदि बांटते और लपकते लोगों को पाया। यह मुफ्त वितरण सड़कों पर जगह – जगह जाम का कारण बंनता है। अपने घर से एक किलो मीटर दूर ज़रूर ऐसा जाम पाया किन्तु रिंग रोड पर भारी वाहन आज रोके जाने से रास्ता साफ – सुथरा मिल गया था क्योंकि हाई – वे के किनारे – काफी दूर ऐसे कैंप लगे थे जिन पर गरीब ही नहीं कार, जीप वाले भी लाईन लगाए खड़े देखे थे।
पहले जब हम यहाँ थे तब लोग मीठा शर्बत, बूंदी या अंगूरदाना ही बांटते थे । अब नमकीन भोजन बांटा जाने लगा है। सपा से संबन्धित एक अल्पसंख्यक नेता के
परिवार में तो एक वक्त का पूरे परिवार का भोजन ही ऐसे कैंप में बंटतेभोजन से जुटालिया जाता है।
अल्पसंख्यक मजहब से संबन्धित जिन वरिष्ठ साथी को मैं देखने गया था ऐसे नज़ारों पर उनकी टिप्पणी थी कि दरअसल देश की जनता भूखी है इसलिए जहां भी मुफ्त खाना मिलता है भीड़ जुट जाती है। उन्होने एक पुराने किस्से काज़िक्र करते हुये बताया कि एक बहुत गरीब मजदूर जो एक ढाबे पर काम करता था और जिसका कोई संबंधी न था जब नहीं रहा तो उन लोगों ने चंदा जूटा कर उसका अंतिम संस्कार करा दिया था। उस चंदे की रकम में से उस वक्त तीन हज़ार रुपए बच गए थे। उन लोगों ने उन तीन हज़ार बचे रुपयों से पूरी – सब्जी बनवा कर फैजाबाद रोड पर बँटवा दी। उस दिन न तो मंगल था न नौरात्र की अष्टमी – नवमी तब भी उसे पाने की होड में कार सवार भी जुट गए थे और किसी ने भी न पूछा कि आज यह भोजन किस लिए बांटा जा रहा है, बस सबको लपकने की होड थी। इसलिए वह तब से यही कहते हैं कि, देश की जनता भूखी है।
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जहां तक ज्योतिष विज्ञान का संबंध है भोजन आदि ‘दान ‘ करना किसी – किसी के लिए कितना घातक हो सकता है इसे लखनऊ के गोंमती नगर क्षेत्र में रहने वाले UPSIDC के एक एक्ज़ीक्यूटिव इंजीनियर साहब भुक्त – भोगी के रूप में सही से बता सकते हैं। लगभग दस वर्ष पूर्व जब यह इंजीनियर साहब आगरा में पोस्टेड थे वहाँ मेरे संपर्क में आए थे तब मुझे उनको लिखित में ‘दान ‘ का निषेद्ध करना पड़ा था। वह लोगों को खूब खाना दान में खिलाते थे और खूब
लुटते थे क्योंकि उनको ‘अन्न दान ‘ नहीं करना चाहिए था। उन्होने मुझसे दान निषेद्ध की बात इसलिए लिखित में ली थी क्योंकि मुझसे पूर्व वह जिन भी पोंगा – पंडितों के फेर में थे वे उनसे खूब दान करवाते थे जो उनके लिए परेशानी का सबब था। जब मंदिर के पुजारियों को ज्योतिषी मानते हुये उनसे सलाह ली जाती है तब ऐसे ही दुष्परिणाम मिलते हैं जो ज्योतिष को बदनाम भी करते हैं और हतोत्साहित भी।
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दो सप्ताह पूर्व टाटा डोकोमो ने sms के जरिये सूचित किया कि, वे 15 मई 2016 से CDMA सर्विस बंद कर रहे हैं जब उनसे कहा कि, GSM सर्विस में इसे ट्रांसफर कर दें तो तमाम अड़ंगे खड़े कर दिये। अखबार से पता लगा कि, रिलायंस ने अपने ग्राहकों को GSM की सिम CDMA के बदले खुद ही दे दी थीं। लेकिन फिर भी तमाम लोगों को हैंड सेट तो नए खरीदने ही पड़े। भले ही हमने दूसरे आपरेटर पर mnp करा लिया और अपना पुराना नंबर सुरक्षित बचा लिया लेकिन दस दिन झंझट तो रहा ही बेवजह नया हैंड सेट व सिम खरीदने में अतिरिक्त व्यय हुआ ही।
इस तरह ये कारपोरेट घराने जब तब जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते रहते हैं। बाजारवाद व्यापार जगत पर ही नहीं राजनीति पर भी हावी है। अब विधानसभाओं व संसद में प्रतिनिधि कारपोरेट घरानों के चहेते ही आसानी से चुन जाते हैं और जन पक्षधरता वाले लोग बड़ी कठिनाई से वहाँ पहुँच पा रहे हैं। फिर भला जनता के हितार्थ काम कैसे हो? श्रम कानूनों को उदारीकरण के आवरण में कारपोरेट हितैषी एवं श्रमिक विरोधी बनाया जा रहा है।
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