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विद्रोही स्व-स्वर में बउआ को 22 वीं पुण्य तिथि पर श्रद्धांजली ——– विजय राजबली माथुर

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(स्व.कृष्णा माथुर : जन्म- 20 अप्रैल 1924 मृत्यु – 25 जून 1995 )

जिस समय रात्रि पौने आठ बजे बउआ (माँ ) ने अंतिम सांस ली मैं और यशवंत ही पारिवारिक सदस्य वहाँ थे। इत्तिफ़ाक से कंपाउंडर महोदय ग्लूकोज चढ़ाने आए हुये थे। 16 जून 1994 को शालिनी व 13 जून 1995 को बाबूजी के निधन के बाद आगरा में मैं और यशवंत ही थे। अजय अपने परिवार के साथ फरीदाबाद में कार्यरत होने के कारण थे। दो दिन पूर्व 23 जून को ही आगरा से गए थे ड्यूटी ज्वाइन करने। शालिनी के निधन के बाद शोभा (बहन ) ने यशवंत को माँ से अपने साथ ले जाने को मांगा था, किन्तु अजय की श्रीमती जी ने ऐसा न करने की उनको सलाह दी थी। यदि माँ ने मेरी सलाह के बगैर अपनी बेटी को अपना पौत्र सौंप दिया होता तो उस समय मैं ही अकेला वहाँ होता।
यशवंत की निष्क्रिय फेसबुक आई डी पर यह सूचना थी जिसे उसने 18 जून 2016 को अचानक देखा —
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एकदम से धक्का लगा छोटे बहनोई साहब के अचानक निधन समाचार से। जब इस बाबत बहन से ज़िक्र किया तो यह उत्तर मिला जिससे और भी धक्का लगा —

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भले ही हमें साढ़े तीन माह बाद ही पता चला लेकिन जब चल गया तो छोटी बहन को इस समय कोई भी उत्तर देना नैतिकता के विरुद्ध होगा और फिर वह महिला होने के नाते भी तमाम सहानुभूतियाँ बटोर ही लेंगी।दिल तो कोई भी चीर कर नहीं दिखा सकता लेकिन दिल पर हाथ रख कर ईमानदारी से सोचने पर सच का एहसास तो हो ही जाता है। फिर भी इतना तो कहना ही होगा कि, मेरे घर के पते के विजिटिंग कार्ड शोभा, कमलेश बाबू और उनके बड़े बेटी-दामाद को मैंने खुद अपने हाथ से दिये थे जब वे लोग 2011 में लखनऊ कमलेश बाबू की भतीजी की शादी में आए थे। वहाँ जाकर खुद मैंने कमलेश बाबू व उनके बड़े दामाद को घर पर आने का आग्रह किया था । शोभा – कमलेश बाबू तो दो दिन हमारे घर पर रुके भी थे जबकि उनके बेटी – दामाद व धेवती मिल कर चले गए थे ।कमलेश बाबू के भाई दिनेश हमारे घर दो बार आ चुके थे और फोन पर उनकी पत्नी ने बताया था कि शादी का कार्ड डाक से भेज चुके हैं। पता उनके पास भी था । उनके जरिये भी सूचित किया जा सकता था। यहाँ के प्रवास और फिर लौटने के बाद उन लोगों के किस कदम के कारण तब से टेलीफोनिक संपर्क टूटा यह तो अपने दिल पर हाथ रख कर सोचने की बात थी। ई -मेल एड्रेस भी कमलेश बाबू तथा उनके दोनों दामादों व छोटी बेटी के पास थे। खैर बड़े होने के नाते इल्जाम तो हमें ही सहने ही होंगे।
माँ और कमलेश बाबू दोनों के जन्मदिन एक ही थे 20 अप्रैल। इस बार किसी की पुण्यतिथि पर हवन नहीं कर सका हूँ। मौका मिलते ही कमलेश बाबू की आत्मा की शांति हेतु भी कर लेंगे।

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विद्रोही स्व-स्वर में स्मृति के झरोखों से —— विजय राजबली माथुर

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जितेंद्र जी ने यह फोटो 20 मई 2016 को गांधी प्रतिमा,जी पी ओ पार्क, लखनऊ में अपने फोन में किसी के माध्यम से लिया था जिस समय किसान जागरण यात्रा की धरना – सभा चल रही थी। उनकी ख़्वाहिश है कि, इस चित्र को आधार बना कर कोई पोस्ट सार्वजनिक रूप से दी जाये। किसानसभा की रैली से संबन्धित पोस्ट्स पहले ही ‘कलम और कुदाल ‘ ब्लाग पर दी जा चुकी हैं। अतः इस निजी चित्र द्वारा निजी स्मृतियों का वर्णन करना अधिक उपयुक्त रहेगा।
बात कुछ उल्टी लग सकती है किन्तु जितेंद्र जी के चित्र के माध्यम से उनके पिता जी कामरेड हरमिंदर पांडे जी का ज़िक्र पहले करना उचित प्रतीत होता है जिनसे अभी तक सिर्फ एक ही बार 08 जून 2011 को भेंट हुई है जबकि जितेंद्र जी से यह दूसरी मुलाक़ात थी।
कामरेड हरमिंदर पांडे जी ने 22, क़ैसर बाग भाकपा के प्रदेश कार्यालय पर अपनी टीचर्स यूनियन की एक बैठक बुलाई थी । डॉ गिरीश जी ने उसमें भाग लेने हेतु मुझे भी sms भेज दिया था, अतः मैं पहुँच गया था। परिचय होने पर जब हरमिंदर पांडे जी को यह पता चला कि, मुझे लेखन का शौक है और आगरा में मेरे लेख साप्ताहिक व त्रैमासिक पत्रों में छप चुके हैं। मीटिंग शुरू होने से पूर्व जो समय था उसमें उन्होने कुछ लेखों की जानकारी प्राप्त की थी। ‘रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना ‘ में मैंने जो विश्लेषण किया है उससे वह अत्यधिक प्रभावित हुये थे। उन्होने गिरीश जी से कहा था कि, इनके लेख ‘पार्टी जीवन ‘ में छाप दिया करें जिससे कामरेड्स को असलियत का पता चल सके एवं वे जनता के बीच चर्चा कर सकें तथा सांप्रदायिक शक्तियों की पोल खोली जा सके। उनसे हाँ-हूँ तो कर दी गई लेकिन आज तक उनकी बात पर अमल नहीं किया गया । क्यों? क्योंकि जैसा मैंने अनुभव किया ‘कथनी’ और ‘करनी ‘ में अन्तर है जबकि शायद पांडे जी ने इसे न समझा हो। मीटिंग समापन के बाद उनके प्रस्थान करने पर उनके विरुद्ध चर्चा भी कानों तक पहुंची जिससे साफ हो गया कि, भला फिर कैसे उनकी सिफ़ारिश मानी जा सकती थी ?
पार्टी जीवन में मेरे लेख न छ्पें तो भी मैं अपने ब्लाग्स के माध्यम से बराबर लेखन में सक्रिय हूँ। और ज़्यादा लोगों तक मेरी बात पहुँच रही है और उसी को दबाने हेतु बाजारवादी कामरेड्स ओछे हथकंडे अपनाने से भी नहीं चूक रहे हैं। पार्टी जीवन के एक संपादक जो प्रदेश पार्टी के सीता राम केसरी भी हैं खुद को ‘एथीस्ट ‘ होने का भी ऐलान करते हैं और पार्टी दफ्तर में ही चमेली के तेल की खुशबू वाली धूप बत्ती जला कर तांत्रिक प्रक्रियाएं भी करते हैं।
संभवतः हरमिंदर पांडे जी इन सब गतिविधियों से अनभिज्ञ होंगे तभी उन्होने मेरे लेख छापने की सिफ़ारिश कर दी थी। पार्टी कार्यालय में जब जितेंद्र जी से पहली बार मुलाक़ात हुई थी और उन्होने अपने पिताजी का नाम लेकर परिचय दिया था तो वास्तव में हमें भी उनसे मिल कर बहुत अच्छा लगा था। फेसबुक के माध्यम से उनसे निरंतर संपर्क है फिर भी किसानसभा की रैली में मिलने पर उन्होने उत्साहित होकर यह चित्र खिंचवा कर स्मृति पटल पर इस मुलाक़ात को चिरस्थाई कर दिया है। किसानसभा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड अतुल अंजान साहब से मेरा परिचय कराते हुये (वैसे मैं अंजान साहब से आगरा से ही परिचित था ) जितेंद्र जी ने मेरे ब्लाग- लेखन का ज़िक्र बतौर तारीफ किया था।
कामरेड जितेंद्र पांडे और उनके पिताजी कामरेड हरमिंदर पांडे साहब सैद्धान्तिक रूप से साम्यवाद के प्रति समर्पित हैं तभी ढोंग-पाखंड-आडंबर विरोधी मेरे विचारों का समर्थन कर देते हैं। वरना तो बाजारवादी/कार्पोरेटी/मोदीईस्ट कामरेड्स तो मुझे हर तरह तबाह करने की किसी भी तिकड़म से नहीं चूकते हैं। मुझे उम्मीद है कि, इन दोनों से मुझे आगे भी समर्थन मिलता रहेगा।

 
 
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