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Category Archives: आगरा

तीसरे वर्ष मे

दो वर्ष पूर्व 03 अगस्त 2010 को इस ब्लाग को शुरू किया गया था ,उद्देश्य था ‘लखनऊ से लखनऊ’ तक के सफर का विवरण संकलित करना। जितना जो याद है और जितना लिखना आवश्यक है उतना अलग-अलग पोस्ट मे देता जा रहा हूँ। बीच-बीच मे कुछ असाधारण परिस्थितियों ने लेखन-क्रम को सिलसिलेवार रूप से हट कर लिखने पर विवश किया है। कभी-कभी न चाहते हुये भी बाहरी परिस्थितियाँ आंतरिक परिस्थितियों को प्रभावित कर ही देती हैं। लोगों को सहायता देना उनकी मदद करना एक शौक रहा है ,हालांकि इससे खुद को हानि ही हुई है। ब्लाग और फेसबुक से संबन्धित लोगों को निशुल्क ज्योतिषीय परामर्श देना भी इसी श्रेणी मे आता है। पूना मे प्रवास कर रही एक ब्लागर महोदया ने अपने बच्चों की चार कुंडलियों बनवाने के बाद एक दूसरे ब्लाग पर मेरे ज्योतिषीय विश्लेषण की खिल्ली उड़ाई । 19 अप्रैल 2012 को रेखा -राजनीति मे आने की सम्भावना के अंतर्गत ‘रेखा जी’ की कुंडली का विश्लेषण दिया था और 26अप्रैल 2012 को राष्ट्रपति महोदया ने उनको राज्यसभा मे मनोनीत कर दिया था। 

 रेखा के मनोनयन पर ही वह खिल्ली उड़ाई गई थी। उस खिल्ली की चेतावनी देने के लिए X-Y कुंडलियों का विश्लेषण दिया था। तब तमाम लोगों ने अपना-अपना भविष्य जानने के लिए मुझसे अपने विश्लेषण करवाए थे जिनमे चार कम्युनिस्ट विचारधारा के बड़े लोग भी शामिल थे। उनमे एक ने अपना विश्लेषण हासिल करने के बावजूद विदेश मे प्रवास करते हुये पूना प्रवासी का अनुसरण किया बल्कि और दस कदम आगे निकल गए ।उन महाशय ने ‘लाल झण्डा यूनिटी सेंटर’ ग्रुप मे  मुझे ब्लाक कर दिया जबकि वह और मैं दोनों ही प्रवर्तक द्वारा एडमिन बनाए गए थे। जिन पोस्ट को आधार बना कर मुझे ब्लाक किया गया उनमे कुछ और जोड़ कर उनकी एक ई-बुक ‘जन-क्रान्ति’ मुंशी प्रेम चंद जी के जन्मदिन 31 जूलाई पर प्रकाशित की जा चुकी है।

 यह ब्लाग हमारी बड़ी भांजी की बेटी के जन्मदिन पर शुरू किया गया था। पहले हम उन सबके जन्मदिन पर हवन करते थे। अप्रैल  2011 मे बहन जी के हमारे घर आगमन के बाद जो खुलासे हुये उनके मद्दे नज़र अब इस प्रक्रिया को स्थगित कर दिया गया है। कुछ लोगों को हमारा लेखन खूब अखरता है और कुछ लोगों को जीवन। अतः 17 जूलाई 2012 को ‘श्रद्धांजली सभा की सैर’ शीर्षक से किसके क्या विचार मेरे बारे मे हैं अपने को श्रद्धांजली के रूप मे प्रकाशित कर दिये थे। उसका विवरण भी उन ढ़ोंगी साम्यवादी पोंगा पंडित को पीड़ादायक लगा था। उनके संबंध मे लिखे मेरे नोट्स और लेख फेसबुक के दूसरे ग्रुप्स मे साम्यवादी चिंतकों द्वारा सराहे गए हैं। उस ग्रुप के प्रवर्तक ने भी अप्रत्यक्ष रूप से मेरा समर्थन किया है-‘आप अपना लेखन जारी रखें,RSS के कुत्ते दम दबा कर भाग जाएँगे…’। वाशिंगटन स्थित एक भारतीय परमाणु वैज्ञानिक ने मुझे सुझाव दिया है की जिस ग्रुप मे मेरे निष्कर्षों को महत्व और मुझे सम्मान दिया जाये उसी मे मैं सक्रिय रहूँ उनका सुझाव सहर्ष स्वीकार कर लिया है।  27 जूलाई 2012 को ‘जनहित’ नामक एक  नए ग्रुप का गठन भी कर दिया है।

कल 02 अगस्त को रक्षाबंधन पर्व था। 19 वर्ष पूर्व 1993 मे भी 02 अगस्त को यही पर्व था जिस दिन हमारी बहन जी फरीदाबाद से (मुझसे छोटे भाई अजय के पास से  उनको राखी बांध कर ) हमारे घर कमला नगर,आगरा  आई थीं । स्टेशन हम लोग लेने गए थे ,टिकट उनका गिर गया और उनके पैर के नीचे दब गया ,पर्स ,अटेची सब खोल कर देख लिया नहीं मिला जगह से हिल नहीं रही थीं एक ही रट कि पेनल्टी दे देंगे। समय खराब हो रहा था घर पर बउआ-बाबू जी इंतज़ार कर रहे थे। मैंने ज़बरदस्ती  हटाने के इरादे से कहा कि जब पेनल्टी देना ही है तो चलो तो ,जैसे ही आगे पैर बढ़ाया टिकट सामने दीख गया। शाम को हमने मोपेड़ खरीदने का तय किया हुआ था ले आए। बहन जी को चुभ गया। बउआ द्वारा मँगवाई मिठाई उन्होने नहीं खाई,अगले दिन खाने को कह कर टाल दिया। और अगले दिन यह कह कर तमक गई कि हम मीठा खा कर सफर नहीं कर सकते अतः न खाया। झांसी स्टेशन पर कमलेश बाबू उनको लेने पहुंचे थे परंतु दोनों एक-दूसरे को ढूंढते रहे और डॉ शोभा अकेले घर पहुँचीं। पूरी ट्रेन देख लेने और ट्रेन छूट जाने के बाद कमलेश बाबू घर पहुंचे। हमारी सहूलियत देख कर चिढ़ी थीं खुद तकलीफ उठाई। ऐसे ही दुनिया के और लोग हैं जाने क्यों उनको हमारी खुशी से कोफ्त होती है?                                          

आगरा से लखनऊ आने तक लगभग 15 वर्ष का विवरण लिखना शेष है। इस दौरान इस वर्ष जनवरी मे ‘विद्रोही स्व-स्वर मे-प्रथम भाग’ को ई बुक के रूप मे संकलित भी किया जा चुका है। उम्मीद है कि शीघ्र सम्पन्न कर सकूँगा।

रिश्तेदार जलन के कारण मुझे सफल नहीं देखना चाहते,सांप्रदायिक तत्व अपने पर चोट के कारण और प्रगतिशील एवं वैज्ञानिक होने का दावा करने वाले इसलिए नहीं कि वस्तुतः उनकी कथनी और करनी मे अन्तर है। मेरा प्रयास ‘धर्म’ की वास्तविक व्याख्या प्रस्तुत करके सांप्रदायिक शक्तियों के नीचे से ज़मीन खींच लेने का था परंतु वह नक्कारखाने मे तूती की आवाज़ बन कर रह गया है। जहां एक ओर कारपोरेट लाबी का पसंदीदा  ‘कबीर’; नामक NGO  का कर्ता जनता की वाहवाही बटोर रहा है वहीं ‘कबीर कला मंच’ की शीतल साठे भूमिगत रह कर जनता की सेवा मे तत्पर हैं ,सुनिए उनकी आवाज़ मे देश की दशा-

Aye Bhagat singh tu Zinda hai by Hashiya

 शहीदे आजम भगत सिंह ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के अध्यन के बाद क्रांतिकारी बने थे। उन्होने खुद कॉ ‘नास्तिक’ घोषित किया था क्योंकि उस समय नास्तिक का अभिप्राय जिसका ईश्वर पर विश्वास न हो से लिया जाता था। स्वामी विवेकानंद ने बताया था कि ‘आस्तिक=जिसका खुद पर विश्वास हो’ और ‘नास्तिक=जिसका खुद पर विश्वास न हो’। भगत सिंह जी कॉ खुद पर विश्वास था अतः वह आस्तिक हुये न कि नास्तिक।मैं  अपने ऊपर आस्था और विश्वास रखते हुये अर्थात आस्तिक होते हुये अपने सीमित अवसरों एवं साधनों से जन-कल्याण के कार्यों मे तत्पर रहता हूँ क्योंकि अपने लिए जिये तो क्या जिये?   ‘बाजारवाद ‘ के विरुद्ध संजीव कुमार जी की अदाकारी भरा संघर्ष देखें-

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आगरा/१९८०-८१(भाग १)/एवं कारगिल-प्लेटिनम का मलवा

१९८० में बउआ की तबियत ज्यादा खराब हुई,वह अंगरेजी दवा लेती नहीं थीं .एक परिचित डा.साहब के पिताजी मशहूर वैद्य थे उन्हें हाल बता कर दवा दी जिससे उन्हें तत्काल फायदा हुआ. यह उन दिनों की बात है जब संजय गांधी की विमान दुर्घटना में हत्या धीरेन्द्र ब्रह्मचारी की कृपा से हुई थी.मैं १५ दिन छुट्टी पर रहा और घरेलू काम किया .यूं.ऍफ़.सी.श्री पल्लाकल सुरेश रामादास नें कुछ रविवार जिनमें काम कर चुका था के कम्पेंसेशन में छुट्टी दे दी और अतिरिक्त छुट्टी हेतु अग्रिम रविवार के लिए भी कम्पेंसेटरी  आफ सेंक्शन कर दिए.मैंने ‘हिन्दी साहित्य सम्मलेन,प्रयाग’की आयुर्वेद रत्न परीक्षा हेतु मंजूरी माँगी उसे भी रामदास साहब ने फॉरवर्ड कर दिया और हेमंत कुमार जी ने भी सैंक्शन कर दिया.हालांकि इस डिग्री से होटल मेनेजमेंट को कोई फायदा नहीं हो रहा था.मंजूरी लेकर कोर्स करने का फायदा यह  था कि,प्रति वर्ष एक्जाम के दौरान १५ दिन की पेड़ लीव मिल जाए.
 हेमंत कुमार जी छात्र जीवन में सयुस(समाजवादी युवजन सभा)  में रहे थे और बांग्लादेश आन्दोलन में दिल्ली के छात्र प्रतिनिधि की हैसियत  से भाग ले चुके थे.लेकिन होटल मुग़ल के पर्सोनल मेनेजर के रूप में कर्मचारियों के हितों के विपरीत कार्य करके हायर मेनेजमेंट  को खुश करना चाहते थे.कारगिल,लद्दाख में आई.टी.सी.ने एक लीज प्रापर्टी ‘होटल हाई लैंड्स’ली थी.यह होटल ,होटल मुग़ल के जी.एम्.के ही अन्डर था.पेंटल साहब सीराक होटल,बम्बई ट्रांसफर होकर जा चुके थे और सरदार नृप जीत  सिंह चावला साहब नये जी.एम्.थे,वह भी एंटी एम्प्लोयी छवि के थे.यूं.ऍफ़.सी.शेखर साहब की जगह पी.सुरेश रामादास साहब आ गए थे जो पूर्व मंत्री एवं राज्यपाल सत्येन्द्र नारायण सिंहां के दामाद थे और अटल बिहारी बाजपाई के प्रबल प्रशंसक थे.१९८० के मध्यावधी चुनावों में इंदिरा गांधी पहली बार आर.एस.एस.के समर्थन से पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापिस आ चुकीं थीं.२५ मार्च १९८१ को मेरी शादी करने की बाबत फाइनल फैसला हो चूका था.इतनी तमाम विपरीत परिस्थितियों में मुझे अस्थायी तौर पर (मई से आक्टूबर)होटल हाई लैंड्स ,कारगिल ट्रांसफर कर दिया गया.इनकार करके नौकरी छोड़ने का यह उचित वक्त नहीं था.
२४ मई १९८१ को होटल मुग़ल से पांच लोगों ने प्रस्थान किया.छठवें अतुल माथुर,मेरठ से सीधे कारगिल ही पहुंचा था.आगरा कैंट स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली पहुंचे और उसी ट्रेन से रिजर्वेशन लेकर जम्मू पहुंचे.जम्मू से बस   द्वारा श्री नगर गए जहाँ एक होटल में हम लोगों को ठहराया गया.हाई लैंड्स के मेनेजर सरदार अरविंदर सिंह चावला साहब -टोनी चावला के नाम से पापुलर थे,उनका सम्बन्ध होटल मौर्या,दिल्ली से था.वह एक अलग होटल में ठहरे थे,उन्होंने पहले १५ हजार रु.में एक सेकिंड हैण्ड जीप खरीदी जिससे ही वह कारगिल पहुंचे थे.४-५ रोज श्री नगर से सारा जरूरी सामान खरीद कर दो ट्रकों में लाद कर और उन्हीं ट्रकों से हम पाँचों लोगों को रवाना कर दिया.श्री नगर और कारगिल के बीच ‘द्रास’क्षेत्र में ‘जोजीला’दर्रा पड़ता है.यहाँ बर्फबारी की वजह से रास्ता जाम हो गया और हम लोगों के ट्रक भी तमाम लोगों के साथ १२ घंटे रात भर फंसे रह गए.नार्मल स्थिति में शाम तक हम लोगों को कारगिल पहुँच चूकना था.( ठीक इसी स्थान पर बाद में किसी वर्ष सेना के जवान और ट्रक भी फंसे थे जिनका बहुत जिक्र अखबारों में हुआ था).
इंडो तिब्बत बार्डर पुलिस के जवानों ने अगले दिन सुबह बर्फ कट-काट कर रास्ता बनाया और तब हम लोग चल सके.सभी लोग एकदम भूखे-प्यासे ही रहे वहां मिलता क्या?और कैसे?बर्फ पिघल कर बह रही थी ,चूसने पर उसका स्वाद खारा था अतः उसका प्रयोग नहीं किया जा सका .तभी इस रहस्य का पता चला कि,इंदिरा जी के समक्ष एक कनाडाई फर्म ने बहुत कम कीमत पर सुरंग(टनेल)बनाने और जर्मन फर्म ने बिलकुल मुफ्त में बनाने का प्रस्ताव दिया था.दोनों फर्मों की शर्त थी कि ,’मलवा’ वे अपने देश ले जायेंगें.इंदिराजी मलवा देने को तैयार नहीं थीं अतः प्रस्ताव ठुकरा दिए.यदि यह सुरंग बन जाती तो श्री नगर से लद्दाख तक एक ही दिन में बस  द्वारा पहुंचा जा सकता था जबकि अभी रात्रि हाल्ट कारगिल में करना पड़ता है.सेना रात में सफ़र की इजाजत नहीं देती है.
मलवा न देने का कारण
तमाम राजनीतिक विरोध के बावजूद इंदिरा जी की इस बात के लिए तो प्रशंसा करनी ही पड़ेगी कि उन्होंने अपार राष्ट्र-भक्ति के कारण कनाडाई,जर्मन या किसी भी विदेशी कं. को वह मलवा देने से इनकार कर दिया क्योंकि उसमें ‘प्लेटिनम’की प्रचुरता है.सभी जानते हैं कि प्लेटिनम स्वर्ण से भी मंहगी धातु है और इसका प्रयोग यूरेनियम निर्माण में भी होता है.कश्मीर के केसर से ज्यादा मूल्यवान है यह प्लेटिनम.सम्पूर्ण द्रास क्षेत्र प्लेटिनम का अपार भण्डार है.अगर संविधान में सरदार पटेल और रफ़ी अहमद किदवई ने धारा ‘३७०’ न रखवाई होती तो कब का यह प्लेटिनम विदेशियों के हाथ पड़ चूका होता क्योंकि लालच आदि के वशीभूत होकर लोग भूमि बेच डालते और हमारे देश को अपार क्षति पहुंचाते.धारा ३७० को हटाने का आन्दोलन चलाने वाले भी छः वर्ष सत्ता में रह लिए परन्तु इतना बड़ा देश-द्रोह करने का साहस नहीं कर सके,क्योंकि उनके समर्थक दल सरकार गिरा देते,फिर नेशनल कान्फरेन्स भी उनके साथ थी जिसके नेता शेख अब्दुल्ला साहब ने ही तो महाराजा हरी सिंह के खड़यंत्र  का भंडाफोड़ करके काश्मीर को भारत में मिलाने पर मजबूर किया था .तो समझिये जनाब कि धारा ३७० है ‘भारतीय एकता व अक्षुणता’ को बनाये रखने की गारंटी और इसे हटाने की मांग है-साम्राज्यवादियों की गहरी साजिश.और यही वजह है काश्मीर समस्या की .साम्राज्यवादी शक्तियां नहीं चाहतीं कि भारत अपने इस खनिज भण्डार का खुद प्रयोग कर सके इसी लिए पाकिस्तान के माध्यम से विवाद खड़ा कराया गया है.इसी लिए इसी क्षेत्र में चीन की भी दिलचस्पी है.इसी लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा हेतु गठित आर.एस.एस.उनके स्वर को मुखरित करने हेतु ‘धारा ३७०’ हटाने का राग अलापता रहता है.इस राग को साम्प्रदायिक रंगत में पेश किया जाता है.साम्प्रदायिकता साम्राज्यवाद की ही सहोदरी है.यह हमारे देश की जनता का परम -पुनीत कर्तव्य है कि भविष्य में कभी भी आर.एस.एस. प्रभावित सरकार न बन सके इसका पूर्ण ख्याल रखें अन्यथा देश से काश्मीर टूट कर अलग हो जाएगाजो भारत का मस्तक है .
कारगिल का विवरण अगली बार…….
 
 
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