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Category Archives: कमलेश बाबू

आगरा/1994 -95 /(भाग-6 )

गतांक से आगे ……

मै नहीं समझ सका कि क्यों डॉ शोभा यशवन्त को हस्तगत करना चाहती थीं और क्यों अजय की श्रीमती जी ने बउआ को वैसा न करने का सुझाव दिया(वह तो कमलेश बाबू की ममेरी बहन की नन्द हैं और के बी साहब ने ही उनकी शादी करवाई थी ) कि क्या वह यशवन्त को अपने पास रखना चाहती थीं?मुझसे किसी ने भी तब कोई जिक्र क्यों नहीं किया ?क्या यशवन्त किसी के पास रह लेता ?जब बउआ ने ग्यारह माह बाद बताया तब क्या उन्हें अपने लोगों के जीवन न रहने का एहसास हो गया था?उस समय इन सब बातों पर विचार करने का समय न था और बाद मे ध्यान से निकल गया था। कल जब 25 मार्च को भाग-5 लिख रहे थे तब दिमाग मे 25 मार्च 1981 की वह घटना भी कौंध रही थी कि तब शालिनी से एंगेज्मेंट हो चुकने के तुरंत बाद उन लोगों ने शालिनी का हाथ देख कर बताने को कहा था मेरे माता-पिता ने भी उन लोगों का समर्थन कर दिया था।

(बाएँ से दायें-बउआ,सरोजनी देवी-शालिनी की माँ,मधू-कुक्कू की पत्नी और कमलेश बाबू की भतीजी,शालिनी,खुद,बाबूजी और उनकी गोद मे डॉ शोभा की ज्येष्ठ पुत्री,पीछे की पंक्ति मे -अजय,कुक्कू,डॉ शोभा,सीमा,जय शंकर लाल-शालिनी के पिता )

(सीमा,मधू,शालिनी )

शालिनी की दोनों हथेलियों का अवलोकन करने से स्पष्ट था कि उनकी उम्र कुल 35 वर्ष ही है। अर्थात वह शादी अधिक से अधिक 13 वर्ष ही चलनी थी। यदि उसी समय हकीकत बता देता तो तत्काल रिजेक्ट कर दिया जाता और वह विवाह न होता। हाथ एंगेज्मेंट के पहले देखने को कहा जाता तो हकीकत ही बताना था। असमंजस मे तब चुप रहना मेरे लिए काफी घातक रहा। फिर वह बात दिमाग से इस प्रकार निकल गई जिस प्रकार गधे के सिर से सींग। जब नवंबर 1993 मे लव लीन ने शालिनी को बताया कि भुआ आपकी उम्र 36 वर्ष ही है तब भी पुरानी बात याद न आई और मैंने शालिनी को समझा दिया कि भतीजी की बात को अन्यथा न लें। किन्तु उसी दिन से वह बीमार पड़ गई थीं और अंततः 36 वे वर्ष मे दुनिया छोड़ ही गई।

जैसा कि पहले ही उल्लेख कर चुका हूँ कि शालिनी से विवाह कमलेश बाबू के पिताजी ने तय कराया था। पहले जितने भी लोगों ने संपर्क किया था सब का जिक्र बउआ डॉ शोभा से करती थीं और कमलेश बाबू की माताजी किसी न किसी आधार पर सभी लड़कियों को रिजेक्ट करा देती थीं। मुझसे मेरे माता-पिता ने कोई राय लेना कभी मुनासिब नहीं समझा । नीचे उन पत्रों की स्कैन कापियाँ दे रहा हूँ जिनकी पुत्रियों के प्रपोज़ल डॉ शोभा ने अपनी सास के हवाले से रिजेक्ट करवाए थे-

यह पत्र बार्डर सिक्योरिटी फोर्स के रिटायर्ड सब इंस्पेक्टर अमर सिंह जी का है जिनकी राय मैंने मांगी थी किन्तु उनके ठीक बताने के बावजूद डॉ शोभा ने बउआ को सूचित किया था कि उनकी सास कहती हैं मात्र 10 माह का अंतर कम है और इसी ग्राउंड पर बाबूजी ने वहाँ मना कर दिया था।

इन सभी पत्रों और उनके साथ आई फ़ोटोज़ को पहले बाबूजी अलीगढ़ डॉ शोभा के पास डाक से भेजते थे और डॉ शोभा अपनी सास साहिबा के कमेन्ट के साथ लौटाती थीं। जयपुर से आए एक फोटो पर डॉ शोभा की सास अर्थात के बी माथुर साहब की माताजी का रिमार्क मुझे बेहद बेहूदा लगा था कि -‘लड़की के कूल्हे भारी हैं’। मेरे बोलने की कहीं कोई गुंजाईश न थी अपने बारे मे ही मेरी कोई भूमिका नहीं थी।

आखिरी पत्र अजय के एक्सीडेंट के समय सहयोग देने वाले परिवार की बेटी की नन्द की बाबत है। पटना के मशहूर दवा व्यवसायी थे (के जी मेडिकल हाल वाले कृष्ण  गोपाल माथुर साहब ) जिनके यहाँ कई बार डकैती भी पड़ी और अंततः वे लोग पूना शिफ्ट हो गए। डॉ शोभा की सास ने यह कह कर रिजेक्ट कराया कि पटना का पानी खराब है वहाँ की लडकिया बीमार रहती हैं। नामनेर ,आगरा के वह माथुर साहब भी अब पूना शिफ्ट हो गए हैं किन्तु उस लड़की की शादी आगरा मे ही सेंट्रल बैंक के एक क्लर्क से उन्होने करा दी थी जो अब अधिकारी हैं। ये दोनों पति-पत्नी अपनी पुत्रियों की जन्मपत्रियाँ बनवाने  कमला नगर मेरे घर पर कई बार आए हैं।बड़ी बेटी के  विवाह हेतु मुझसे ही कुंडलियाँ भी मिलवाई हैं। रांची स्थित कोल इंडिया के रिटायर्ड डिप्टी चीफ सेक्यूरिटी आफ़ीसर आर पी माथुर साहब,विनीश जी के चाचा थे और मुझ से मित्रवत व्यवहार रखते थे। शालिनी व मुझे विनीश जी की पत्नी -ज्योति से उन्होने ही अपने घर पर परिचय करवाया था।

25 मार्च 1981 को शालिनी से एंगेज्मेंट के बाद कुक्कू की पत्नी मधू  के गाना गाने पर कमलेश बाबू ने स्टूल को तबला बना कर अपनी भतीजी के साथ संगत की थी। तमाम कारणों से तमाम को रिजेक्ट करने के बावजूद अंजाम क्या रहा ?डॉ रामनाथ ने भी शालिनी से 28 गुण मिलते बताए थे जब कि हकीकत मे 14 थे अर्थात नहीं मिलते थे (1981 तक मै खुद नहीं मिलाता था)। अब एहसास होता है कि कमलेश बाबू ने कुक्कू के जरिये डॉ रामनाथ को खरीदवा दिया था। डॉ रामनाथ ने पैसों के लालच मे प्रोफेशन और मेरे साथ विश्वासघात किया था।डॉ शोभा दूसरे कारणों से रिजेक्ट कराती रहीं तो भी बाबू जी डॉ राम नाथ के पास ज्योतिषीय जानकारी लेने हेतु जन्मपत्रियाँ भेजते थे। शालिनी की जन्मपत्री को छोड़ कर सभी मे उन्होने गुण नहीं मिलते बताया था। चूंकि बउआ -बाबूजी अपनी पुत्री-दामाद पर विश्वास करते रहे इसीलिए उन्हें विश्वासघात करना आसान रहा।(सब बातों का खुलासा गत वर्ष उनके लखनऊ आने पर हुआ और इसी डर से वे हमारे लखनऊ शिफ्ट करने का विरोध करते रहे थे)।

क्रमशः …….. 

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आगरा/1992-93/भाग-6

अप्रैल 1985 से जिन सेठ जी के यहाँ काम कर रहे थे और जिन्हें अपीलेट इन्कम टैक्स कमिश्नर श्रीमती आरती साहनी द्वारा जेल भेजने की कारवाई से राहत वकील साहब की राय पर दिलवाई उनके दुर्व्यवहार के कारण एक झटके मे नौकरी तो छोड़ दी किन्तु आर्थिक संकट विकट रूप मे सामने आ गया। एक तो रु 290/- की मकान की किश्त जमा करना होता था और बाद मे रेजिस्टरी के समय लगने  वाले स्टेम्प्स हेतु एक आर डी अकाउंट रु 110/-का खोला था उसकी भी किश्त जमा करनी थी। मैंने शंकर लाल जी से कोई और पार्ट टाईम जाब दिलवाने का निवेदन किया। एक-दो माह आश्वासन देते रहने के बाद जब उन्हें याद लगातार दिलाते रहे तो वह बोले जिन लोगों ने आश्वासन दिया था वे मुकर गए हैं अतः मैं खुद ही अपने यहाँ फ़ुल टाईम रख लेता हूँ और अपने बदले मे पार्ट टाइम अपने छोटे भाई के यहाँ दिला देता हूँ। चूंकि 06 घंटों वाले फुल टाईम के सेठ जी रु 1800/- देते थे अतः शंकर लाल जी ने फुल टाईम 04 घंटे रखते हुये रु 1200/- ही दिये। एक -दो माह बाद एक घंटे का पार्ट टाईम अपने छोटे भाई के यहाँ रु 400/- पर दिला दिया। राहत तो मिली किन्तु आमदनी पहले से कम हो गई। मंहगाई तो निरंतर ही बढ़ती ही रहती है लेकिन यदि स्वाभिमान की रक्षा करना था तो हानि सहना ही था।

जिस दौरान शंकर लाल जी और उनके भाई का जाब नहीं था किसी काम से कमलेश बाबू फरीदाबाद रुकते हुये हमारे पास आगरा आए थे। हमने बाबू जी से  जो उस समय अजय के पास फरीदाबाद मे थे कोई जिक्र नहीं किया था। सुबह का खाना बउआ ने अजय की श्रीमती जी से कमलेश बाबू को खिलवा दिया था। हमारे घर उन्हें चार बजे साँय पहुंचना था ट्रेन राईट टाईम आई थी किन्तु वह पहुंचे पाँच बजे। शालिनी ने सूजी का हलवा और बेसन की पकौड़ी नाश्ते मे चाय के साथ परोसी थीं। चुटकी भर हलवा चख कर पकौड़ी खाने से कमलेश बाबू ने इंकार कर दिया क्योंकि स्टेशन पर उतरने के बाद वह ठेले पर पकौड़ी खा कर,चाय पी कर आए थे। जब हमने यह पूछा की घर आ रहे थे तो स्टेशन के ठेले पर नाश्ता क्यों किया?क्या आपको बाबूजी-बउआ की गैर हाजिरी मे यहाँ भूखा रहने का शक था?उनका जवाब था की भूख ज़ोर से लग रही थी। इसका अर्थ यह हुआ कि फरीदाबाद मे अजय की श्रीमती जी ने उन्हें भरपेट खाना नहीं खिलाया जबकि बाद मे बउआ ने लौटने पर बताया कि वहाँ तो उन्होने पेट भर जाने की बात कही थी। बउआ झूठ नहीं बोलती थीं जिसका अर्थ हुआ कि कमलेश बाबू अजय की श्रीमती जी को नाहक बदनाम कर रहे थे। हालांकि वह उनकी एक ममेरी बहन की नन्द हैं और इसी लिए उनहीने शादी भी तय करवाई थी किन्तु शादी के समय उनके घर ‘चार की मेवा’ मे शराब की बोतल भेज कर बारात लौटने के बाद अजय से भयंकर झगड़ा भी किया था। कमलेश बाबू से शोभा की एंगेजमेंट के एक-डेढ़ माह के भीतर ही अजय का भयंकर एक्सीडेंट एम जी रोड पर हुआ था जिसमे तीन दिन डाक्टरों ने रिसकी बताए थे। आज तक उसकी पीड़ा से अजय ग्रसित हैं तब भी कमलेश बाबू कैसे-कैसे पाँसे फेंकते रहे हैं। दुर्भाग्य से हम उन्हें समय पर पहचान नहीं पाये। हमने हमेशा छोटे बहनोई के नाते उनकी बातों का  समर्थन किया जिसका खामियाजा भी खूब उठाया लेकिन आँखें नहीं खुलीं और उन्हें अच्छा  ही अच्छा समझने की भूल लगातार करते रहे,नुकसान उठाते रहे और शक दूसरों पर करते रहे।

झांसी लौट कर कमलेश बाबू ने शोभा से बाबूजी को चिट्ठी मे लिखवा दिया कि मेरी फुल टाईम जाब छूट गई है। मैंने या शालिनी ने कुछ नहीं कहा था किन्तु यशवन्त से उन्हें पता चला होगा। बाबूजी ने वहाँ से रु 2500/- का चेक मुझे डाक से भेज दिया। मैंने वह चेक अपने अकाउंट मे जमा करके अपना चेक रु 2500/- का बाबू जी के अकाउंट मे जमा कर दिया। हालांकि बाबूजी ने लौट कर जब पास बुक मे एंट्री कराई तो मुझ पर नाराज भी हुये कि रुपए क्यों लौटाए?प्रतीत होता है कि कमलेश बाबू लगातार आग लगाने-फूट डालने के कृत्य करते रहे ,बाबूजी और बउआ को उनके लक्षण कभी भी पसंद नहीं आए सिर्फ मेरी ही बुद्धि भ्रष्ट चल रही थी जो हर बार मै उनके बचाव मे ढाल बन कर खड़ा होता रहा तब भी जब वह बउआ के निष्कर्ष के मुताबिक यशवन्त को दिमागी ठेस पहुंचाने के कृत्य करते रहे।

एक बार1984 मे  वह रात नौ बजे हमारे घर झांसी से पहुंचे थे ,उन्हें कोई शादी आगरा केंट मे अटेण्ड करनी थी। उपरोक्त चित्र से ज्ञात होगा कि यशवन्त तब कितना बड़ा था। रात के सवा नौ बजे एक बड़ा सेव उसे खाने को पकड़ा दिया वह नही खा पा रहा था उसे घुड़क-घुड़क कर खाने का आदेश देते रहे। सोफ़े और चारपाई के बीच ठंडी जमीन पर उसे बैठा दिया तब तक वह बैठ नाही पाता था और बार-बार गिर जाता था ,उसके सिर मे चोट लगने से  रोने लगता था,मुझे या शालिनी को वह यशवन्त को पकड़ने नहीं दे रहे थे। अंततः बाबूजी ने अपनी गोद मे उसे सहारा दिया तब जाकर चुप हो पाया। वह नाश्ता करके लौट गए क्योंकि शादी की दावत खाना था लिहाजा हमारे घर भोजन नहीं किया। बउआ ने उनके जाने के बाद स्पष्ट कहा था कि शोभा की दोनों लड़कियां हैं इसलिए कमलेश बाबू यशवन्त की खोपड़ी मे चोट लगा कर उसका दिमाग कमजोर करना चाहते थे हालांकि वह उसके लिए खिलौने और मिठाई भी लाये थे जो चित्र मे दीख रहे हैं । पता नहीं क्यों मैंने समझा कर अपनी माँ को चुप कराया ?

 

आगरा/1992 -93 (भाग-4)-लखनऊ यात्रा

ऋषिराज की शादी 1992 मे दशहरा के रोज होना था । एक खानदानी परंपरा के अनुसार शादी के समय माँ को  लड़का या लड़की जिस की शादी हो उसके पीछे बैठना होता है। ताईजी का निधन होने के कारण चाची या बड़ी भाभी को बैठना था। चूंकि छोटी ताईजी का भी निधन हो चुका था और उन लोगों से इन लोगों के संबंध भी मधुर नहीं थे अतः अतः भाभी जी (सुरेश भाई साहब की पत्नी)से भी नहीं कहा और हमारी माँ कहीं आने-जाने की शारीरिक स्थिति मे नहीं थी ,इसलिए शालिनी को वह रस्म अदा करने हेतु अनुमति देने का अनरोध -पत्र महेंद्र जीजाजी ने बाबू जी के पास भेजा। जब बाबूजी ने अनुमति दे दी तब महेंद्र जीजाजी ने रु 11/- का money order भेज कर शालिनी के भाई को देने का अनुरोध किया । इसे ‘भात का न्यौता ‘कहा जाता है जिसका अर्थ है कि,पीहर से पीछे बैठने वाले के परिवार के लिए और उस लड़के( जिसकी शादी है )के लिए कपड़े आदि भेजे जाएँ। यह बात हम लोगों को अच्छी नहीं लगी और बाद मे माधुरी जीजी ने भी कहा कि,महेंद्र ने अपनी माँ के निर्देश पर वह पत्र चाचा को भेज दिया उन्हे खबर नहीं थी वरना वह उन लोगों(शरद मोहन) पर दबाव न डालने देतीं। बहरहाल शालिनी की माँ ने शालिनी,यशवन्त,मेरे तथा ऋषिराज के लिए वस्त्र भिजवाए। इसके बदले मे माधुरी जीजी ने शालिनी की भाभी संगीता के लिए साड़ी भिजवा दी थी (हालांकि रिवाज तो यह है कि यदि किसी विवाहिता को वस्त्र दिये जाते हैं तो साथ मे उसके पति के लिए भी शुगन का कुछ देना होता है जिसका पालन नहीं किया गया था)।

हम लोग आगरा से इस हिसाब से चले थे कि,रवीन्द्र पल्ली जाकार माइंजी से भी मिलेंगे। राजाजीपुरम से उनके यहाँ गए तो घर पर माइंजी और अंगद (शेष का पुत्र )ही मिले थे। शेष और उनकी पत्नी दिल्ली गए हुये थे। उनके घर काफी देर रहे थे,इस बार माइंजी का व्यवहार काफी अच्छा रहा था। उन्होने शेष की ‘आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस’की एक डिक्शनरी यशवन्त को भेंट की थी-

यह यादगार डिक्शनरी यशवन्त ने सम्हाल कर रखी हुई है जिससे वह काफी लाभान्वित भी हुआ है। खाने के वक्त तो माईंजी को शालिनी ने उनके साथ मदद की थी किन्तु शाम को जब हम लोग वापिस लौट रहे थे,माईंजी चाय बना रही थी शालिनी ने सोचा उन्हे कष्ट देने की बजाए खुद ही फ्रिज से पानी निकाल कर पी लें। पीने का पानी भभौने,जग आदि मे था, कोई बोतल न थी। माईंजी ने हँसते हुये पूछा कि पानी पीना है तो हमसे क्यों नहीं कहा?जिसका घर होता है उसे ही पता होता है कौन चीज कहाँ है? हम लोगों के घर की यह परंपरा न थी कि किसी के घर जाकर चीजें टटोल-खकोल की जाएँ-यह तो शालिनी के पीहर के संस्कार थे जो वह फ्रिज तलाश रही थीं। मैंने कहा भी था कि माईंजी से पूछ लो। माईंजी ने ग्लास मे पानी दे दिया। यह भी बताया कि लोग-बाग बोतल को मुंह से पीकर रख देते हैं इसलिए वह बोतल रखती ही नहीं हैं क्योंकि झूठा करने से इन्फेक्शन का भय रहता है। उनकी यह बात हमारे बाबूजी और बउआ के विचारों से मेल खाती है।

झांसी से कमलेश बाबू अपनी छोटी बेटी मुक्ता को लेकर आए थे। वह भी माईंजी से मिलना चाहते थे। बीच मे एक ही दिन निकला था अतः पुनः शालिनी नहीं गई। मै,यशवन्त,मुक्ता और कमलेश बाबू ही गए। जब पहुंचे तो वे लोग भोजन कर रहे थे। शेष की पत्नी ने उठ कर फिर से तहारी ही जो वे लोग खा रहे थे और बनाई। कमलेश बाबू ज्यादा नहीं रुके । खाकर चाय पीकर वापिस हो लिए। चूंकि वह माईंजी के लिए भांजा दामाद थे अतः उन्हें व मुक्ता को कुछ रुपए भी माईंजी ने दिये।मुक्ता ने नरेश से किन्ही केसेटो की फरमाईश की होगी सो उन्होने उसे लाकर भेंट कर दिये थे। उन लोगों से ये लोग खुले होंगे जो उनसे फरमाईश की ;मुझसे तो किसी ने कभी कोई फरमाईश नहीं की थी।

कमलेश बाबू की महेंद्र जीजाजी से काफी घुटन्त थी। रात मे सबसे ऊपरी छत पर ड्रिंक का कार्यक्रम था। मै शामिल नहीं हुआ तो कमलेश बाबू (जिन्होंने अजय की शादी मे 1988 मे ट्रेन मे शरद मोहन की मौजूदगी मे ढक्कन से मेरे मुंह मे शराब उंडेल दी थी और बाद मे चार की मेवा के साथ शराब की बोतल भी उनकी सुसराल मे भेज दी थी)बोले हम अजय की शादी मे (डॉ शोभा और कमलेश बाबू अजय और उनकी पत्नी का भी  नाम ही पुकारते हैं -भाई साहब या भाभी जी नहीं)खुद आपको ट्रेन मे पिला चुके हैं ,बच नहीं सकते। महेंद्र जीजाजी,कमलेश बाबू गठबंधन ने जबरिया मुझे भी ग्लास भर कर दिया मैंने उसे पानी की तरह पी कर उलट कर नीचे रख दिया उन लोगों की तरह चुसकियाँ लेकर नहीं। अगले दिन शाम को खाने से पूर्व भी ड्रिंक कार्यक्रम था और महेंद्र जीजाजी- कमलेश बाबू गठबंधन ने फिर उसी तरह दबाव बना कर मुझे ग्लास पकड़ाया तो वैसे ही पानी की तरह जल्दी से निगल कर मैंने ग्लास खाली कर दिया। उस वक्त तक न तो कमलेश बाबू शक के घेरे मे आ पाये थे न ही महेंद्र जीजाजी, और न ही रंग मे भंग करना मेरा स्वभाव था अतः उन लोगों का खेल चल गया।

राजाजीपुरम मे ही किसी पार्क मे ऋषिराज की बारात गई थी ,महेंद्र जीजाजी ने लड़की वालों के लिए  वहीं व्यवस्था करा दी थी। ऋषिराज की पत्नी के ताऊजी शालिनी के टेलर मास्टर वही फूफाजी थे जो हमारे फूफाजी के दोस्त थे।खाने का तीन प्रकार का बंदोबस्त था। नवरात्र के व्रतधारियों के लिए फलाहार,शाकाहार और मांसाहार। हम तो शाकाहारियों मे थे।

जिस दिन हम लोग माईंजी के घर गए थे ,लौटते मे अमीनाबाद होते हुये आए थे। कारण यह था कि पार्ट-टाईम वाले (रेकसन फुटवियर)सेठ जी ने अपने एक कस्टमर के यहाँ रिमाईंड करते आने को कहा था। मैंने उनका संदेश दे दिया था । उस दुकान के मालिक एक वृद्ध मुस्लिम सेठ जी थे जो आगरा अक्सर ब्रहस्पतिवार के दिन आते थे जिस दिन अमीनाबाद मे साप्ताहिक अवकाश रहता है। उन्होने 10 दिन मे आगरा आ कर उनका भुगतान करने का आश्वासन दिया और शिष्टाचार वश हम लोगों -शालिनी और यशवन्त समेत मुझे कोल्ड ड्रिंक पिलवाया।

मैंने बाजार से यशवन्त के लिए कुछ वस्त्र ले लिए ,शालिनी ने भी चिकन  का एक सलवार-सूट अपने लिए लिया था। उनकी इच्छा अपनी संगीता भाभी के लिए भी एक सलवार-सूट लेने की थी सो उन्होने उनकी पसंद के मुताबिक झीने गुलाबी  वस्त्र का लिया। उनकी बेटियों के लिए भी कुछ कपड़े लिए थे। अतः परंपरा निर्वाह हेतु मैंने संगीता के पति हेतु एक रूमाल भी रखवा दिया था। हम लोग चारबाग से गंगा-जमुना एक्स्प्रेस से चले थे और आगरा सिटी पर उतरे थे। उन लोगों के क्वार्टर पर ही पहले गए। शालिनी ने अपने लाये और माधुरी जीजी द्वारा भेजे वस्त्र  और पकवान वहाँ निकाल कर दे दिये। रास्ते मे यशवन्त को ओढ़ाने हेतु एक वह बढ़िया कंबल ले गए थे जो मुझे होटल मुगल से एक वर्ष दीपावली गिफ्ट मे मिला था। वह किस प्रकार सिटी क्वार्टर पर छूट  गया या उन लोगों ने छिपा कर रख लिया फिर उसका कोई अता-पता न चला।

दिन होने पर हम लोग अपने घर कमलानगर आ गए। उतनी ही देर मे वहाँ दो बार हम लोगों को चाय पिला दी गई थी। ………..

 

आगरा/1990-91(भाग-10)

काफी दिनों बाद एक बार फिर शालिनी वहाँ सुबह गई क्योंकि फिर स्कूल खुलने वाले थे। लौटते मे मुझे बुलाने जाना ही था,सुबह सीधे ड्यूटी चला गया था। चाय के बाद आँगन मे बैठना हुआ क्योंकि दिन बड़े थे उजाला था अतः लौटने मे थोड़ी देर होने पर भी दिक्कत न थी। शालिनी की माता थी परंतु वह बच्चों के साथ टी वी ही देखती थी। संगीता ने बताया कि उन्हे नेटरम मूर से तीन दिनों मे ही लाभ हो गया था परंतु मेरे बताने के मुताबिक 10 दिनो तक खा और लगा ली थी। वह बची हुई दवा मुझे देना चाहती थी। मैंने कहा कि सम्हाल कर रखे किसी को भी किसी कीड़े-मकोड़े के काटने पर देने के साथ-साथ यह लू -sunstrok की भी अचूक दवा है। खैर फिर नेटरम मुर्यार्टिकम अपने पास ही रखी,दवा की कीमत तो तुरंत भुगतान कर चुकी थी। चूंकि संगीता ने ही फिर पुरानी बात उठाई थी तो शालिनी ने भी बिना चूके कह दिया कि इन्हें दवा आपसे  लगवाने मे आनंद आया और आपने फिर दोबारा आकर लगाई ही नहीं। संगीता क्यों चूकती फटाफट कह दिया आप भेजती तभी तो आते। काफी पुरानी बात जो ध्यान से भी हट चुकी थी संगीता ने याद दिलाते हुये कहा कि जब कविता ने ऊपर से ही इंनका हाथ मेरे सीने पर फिरवा दिया था तो आपने कविता से एतराज किया था अब खुद आपने ही फिरवा दिया फिर रोक दिया होगा। शालिनी ने कहा न रोका न भेजा ,आप चाहती थी तो भेजने को कहा होता।

कविता ,संगीता की बड़ी बहन थी और अपने पति राकेश के साथ सिटी के क्वार्टर पर आई थी तब हम लोग वहाँ पहले से मौजूद थे। राकेश को कोई काम होगा वह अपना हाथ मुझे दिखा कर चाय पीने के बाद चले गए थे। बाद मे कविता ने भी अपना हाथ दिखाया था और संगीता को भी हाथ दिखवाने को कहा था। आम तौर पर मै किसी का भी हाथ दूर से ही देखता हूँ। परंतु कविता ने अपने हाथ की कुछ लकीरों के बारे मे पूछते हुये मेरा हाथ जबर्दस्ती अपने हाथ पर रख कर बताया था और इस क्रम मे खुद ही मेरे हाथ को इस प्रकार घुमाया कि उनके सीने को छू गया तब संगीता ठठा कर हंस दी थी । इस हंसी के बदले मे ही कविता ने मेरा हाथ तुरंत संगीता के सीने पर फिरा दिया था ,उसी का जिक्र अब संगीता ने किया था।

कविता के दो पुत्रियाँ थी और वह बेटा चाहती थी ,मेरे यह कहने पर कि योग है तो बोली थी कि फिर प्रयास करेंगे और इसी बात की खुशी मे मेरा हाथ अपने सीने तक ले गई थी और संगीता के हंसने पर उसके सीने पर फिरा दिया था। शालिनी ने तब संगीता पर हाथ फिराने का कविता से विरोध किया था। बाद मे कविता के पुत्र भी उत्पन्न हुआ। कविता के एक जेठ विश्वपति माथुर आगरा मे ही ट्रांस यमुना कालोनी मे रहते थे। उनसे भी परिचय इनही लोगों के माध्यम से हुआ था। वह हाईडिल मे जूनियर इंजीनियर थे और उनका स्वभाव बेहद अच्छा था। वह हर एक की मदद करने को हमेशा तत्पर रहते थे। उनसे हमारा मेल हो गया था और हम उनके घर भी चले जाते थे। एक बार कविता उनके घर आई हुई थी ,राकेश नहीं आए थे। संगीता ने मुझे उनके घर जाकर कविता को संगीता के सिटी के क्वार्टर पर लाने को शालिनी से कहा था। वी पी माथुर साहब के घर जाने मे एतराज था ही नहीं। किसी कारण से कविता उस दिन नहीं आई लेकिन उनके सामने ही विश्वपति जी ने उनकी शादी का एक किस्सा सुनाया। उन्होने बताया था कि,राकेश की शादी मे उन्होने अपने एक-दो साथियों के साथ मिल कर मजाक करने की योजना बनाई थी और एन फेरों से पहले राकेश से कहला दिया था कि कलर्ड टी वी मिलने पर ही फेरे हो सकेंगे। वे लोग एकदम परेशान हो गए ,और हैरान भी क्योंकि माथुर कायस्थों मे दहेज का रिवाज-चलन है ही नहीं। कविता के घर के लोग समझा कर हार गए तो कविता के भाई बोले बारात लौटा दो। तब संगीता मैदान मे आई और विश्वपति जी तथा अपने होने वाले जीजा राकेश से सीधे बात करने पहुँच गई कि उनकी मांग संभव नहीं भाई साहब नाराज हैं और बारात लौटाने को कह रहे हैं। विश्वपति जी ने संगीता से कहा कि तुम आ गई हो तो बिना टी वी के शादी करवा देंगे वरना बारात लौटा ही ले जाते। उन्होने संगीता से डांस करने की शर्त रखी । संगीता ने फेरे पड़ने के बाद डांस दिखाना कबूल किया और सच मे वादा पूरा भी किया। विश्वपतिजी ने कहा कि संगीता ने कविता की शादी करा दी। कविता ने हंस कर उनकी बात का समर्थन कर दिया।

शालिनी को यह बात घर आकर बताई थी जो उन्हे याद भी थी। अपनी आदत पुरानी बातो  को याद कर समय पर दोहराने की न होने पर भी पता नहीं कैसे शालिनी ने कहा कि विश्वपति भाई साहब ने कविता की शादी की जो कहानी सुनाई थी वह भी जरा इन्हे सुना दीजिये। मैंने कहा खुद ही बता दो तो बोली आपने सीधे उनसे सुना है ज्यादा ठीक से बता सकते हैं इसलिए इसे आप ही बताएं। संगीता भी मुस्कराते हुये बोली हाँ क्या कहानी थी आप ही बता दीजिये। मैंने पूरा विवरण सुना दिया तो हँसते-हँसते ,लॉट-पोट होते हुये संगीता ने कहा क्या बुरा काम किया ,मजाक ही सही मम्मी और भाई साहब तो उस वक्त बहौत परेशान थे ,चुटकियों मे हल तो निकाल लिया। शालिनी ने पहले कभी टूंडला मे होली की रंग-पाशी पर संगीता द्वारा श्वसुर और जेठ के समक्ष किए गए ‘मै तो नाचूँगी,मै तो नाचूँगी’ गाना गाते हुये डांस का जिक्र भी सुना दिया और कहा आपको डांस वगैरह पसंद नहीं है ,नहीं तो कभी देखते। संगीता बोली पसंद न हो तो भी मै डांस दिखा दूँगी,जब कभी मम्मी जी अगली बार कहीं जाएँ तो आप (शालिनी से) इशारा कर दीजिएगा।

मुझे उस समय यह सब बड़ा अजीब लगा और बेहद खोज-बीन के बाद भी इस सबका रहस्य न समझ सका। तब से अब तक के तमाम घटनाक्रमों  को मई 2011 मे कमलेश बाबू द्वारा कुक्कू के श्वसुर को अपना कज़िन बताने के बाद तुलना करने पर सारा का सारा रहस्य एक पल मे उजागर हो गया और उनके  तथा उनकी  छोटी बेटी के द्वारा  फेसबुक मे फेक आई डी बना कर टटोल-खकोल करने से उसकी पुष्टि भी हो गई।  लेकिन  उसका जिक्र अपने समय पर ही।

1991 की गर्मियों मे ही बड़े ताउजी के निधन का ‘टेलीग्राम’ अचानक आया ,वह पूर्ण स्वस्थ थे। एकाएक बाबू जी का जाना संभव नहीं था। बिना रिज़र्वेशन के मै ‘गंगा-जमुना’ एक्स्प्रेस से गया , टिकट तो मैंने लिया ही था परंतु शरद मोहन ने जेनरल कोच मे  आसानी से  बैठवा दिया था । इत्तिफ़ाक से उस दिन फैजाबाद होकर जाने का टर्न था तो सीधे ‘दरियाबाद’ स्टेशन पर ही उतरा था। ताईजी समेत सभी ने परिचय देने पर पहचाना परंतु गाँव के एक सज्जन ने देखते ही उन लोगों से पूछा कि क्या यह ‘दुलारे भैया’ का बेटा है? मैंने पूछा बिना देखे आपने कैसे पहचाना तो उनका उत्तर था तुम्हारी शक्ल उनसे मिलती है न पहचानने का क्या सवाल?

ताउजी रात मे बिना लालटेन लिए उठ गए थे और अंदाज मे गलती होने से बाथरूम की तरफ जाने की बजाए कुएं मे गिर पड़े थे ,ब्रेन हेमरेज से तत्काल उनकी मौत हो गई थी। रात मे ही उन्हें कुएं से निकाल लिया गया था। मै तो औपचारिक रूप से शोक प्रगट करने गया था,दकियानूस वाद  मानता न था अतः तेरहवी  तक रुकने का प्रश्न ही नहीं था। दो दिन के लिए दुकानों से गैर-हाजिर था। रायपुर से सुरेश भाई साहब रोजाना वहाँ नहाने आते थे इन लोगों ने मुझे भी उन्हीं के साथ बाहर के कुएं पर नहाने भेजा और नहाते ही भुने चने खाने को दिये। अगले दिन भी यही प्रक्रिया रही।

मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ कि इस शोक के माहौल मे भी ताईजी ने 1988 मे बाबूजी के नाम भेजे इस पत्र का जिक्र किया (मुझे यह पत्र बाबूजी के कागजात से उनके निधन के बाद मिला है) जिसमे उन्होने बाबूजी से वहाँ आकर ‘चकबंदी’ के माध्यम से अपना खेती का हिस्सा लेने की बात कही थी। मैंने तो यह कह कर पल्ला झाड लिया कि ये सब आप बड़े लोगों के बीच की बातें हैं। मैं आप का संदेश बाबूजी को दे दूंगा।

अगले दिन ताईजी ने लखनऊ मे माधुरी जीजी से मिलते जाने को कहा हालांकि उनके एक बेटा और एक बेटी दरियाबाद मेरे पहुँचने के बाद ही आ गए थे। नरेश मेरे साथ लखनऊ आए ,वैसे तब वह लखनऊ ही रहते थे। रात को अवध एक्स्प्रेस से मै आगरा रवाना हो गया।

जिस प्रकार चंद्र शेखर जी ने भाजपा और कांग्रेस से मिल कर वी पी सिंह की सरकार गिरवा दी थी उसी प्रकार उनकी सरकार को राजीव गांधी के वक्तव्य-“हरियाणा पुलिस के दो कांस्टेबल मेरी जासूसी करते हैं” ने गिरवा दिया था और मध्यावधि चुनाव चल रहे थे कि इस प्रचार के दौरान ही राजीव गांधी की निर्मम हत्या भी लिट्टे विद्रोहियों ने कर दी जिन्हें खुद राजीव गांधी और उनकी माँ इंदिरा गांधी ने प्रश्रय दिया था। 

 

आगरा/1988-89 (भाग-2)

मिश्रा जी के मकान मे ही शरद ने अपनी बेटी के होने की कथा कराई थी और हमारे माता-पिता को शामिल होने हेतु निमंत्रण देने को योगेंदर को भेजा था। बउआ तो नहीं गईं उन्होने बाद मे जाकर नई लड़की को हथौना के रु दिये। बाबूजी और मै गए थे। पहली बार बाबूजी को उनके यहाँ खाना खाने का न्यौता था किन्तु खाना-पूर्ती हेतु ही। यदि बाबूजी ने आने का वचन न दिया होता तो मेरा विचार उनके कथा और खाने का बहिष्कार करने का था। घर लौट कर मैंने उनसे कहा भी जाने की हामी भर कर खुद अपनी और मेरे दोनों की बेइज्जती करा ली। मिश्रा जी उनके मकान मालिक थे और उनके घर वालों को भी नहीं पूंछा था।

जैसे ही सिटी स्टेशन पर उनका क्वार्टर ठीक हुआ वे लोग उसमे रहने को भागे। जल्दबाज़ी मे शरद की पत्नी अपनी एक साड़ी और कपड़े धोने का तसला मिश्रा जी के घर भूल आयीं थीं। मिश्रा जी ने मुझ से उनका सामान उनके घर पहुंचाने को कहा और मुझे वैसा करना पड़ा। वे लोग चाहते थे कि मै मिश्रा जी को सहयोग करना बंद कर दूँ परंतु मै उनकी गलती के कारण मिश्रा जी द्वारा उन्हें बुरा-भला कहे जाने पर क्यों पार्टी का काम छोड़ देता?मैंने उनके सिटी के क्वार्टर पर उनसे संपर्क करना ही बंद कर दिया। जब शालिनी को माँ-भाभी से मिलना होता तो मै दुकान जाते मे साइकिल पर यशवंत के साथ बैठा कर दोनों को वहाँ छोड़ देता और लौटते मे वैसे ही वापिस हो लेता। न तो मुझे उनके यहाँ का भोजन पसंद आता था न ही उन लोगों का व्यवहार। अतः मै चाय के अलावा कुछ नहीं लेता था।

कुक्कू का ट्रांसफर नाभा से मुजफ्फर नगर हो चुका था। होली पर उन्होने अपनी माता को बुलाया था। छुट्टी के दिनों मे भी ड्यूटी करने वाले शरद मोहन अपनी माँ को लेकर मुजफ्फर नगर गए और उनकी पत्नी तथा बच्चों की रखवाली करने हेतु शालिनी को कहा गया और चूंकि क्वार्टर एकांत एरिया मे पड़ता था तो रात मे मुझे भी वहाँ रुकने का आग्रह किया। हालांकि इच्छा न होते हुये भी हमारे अपने माता-पिता द्वारा भी उन्हे सहयोग करने को कहने पर मुझे रात्रि चौकीदारी हेतु रुकना पड़ा। एक कमरे मे शरद की पत्नी और बेटियाँ तथा दूसरे कमरे मे शालिनी और यशवन्त सोये ,मै बारामदे मे था। गुसलखाना आदि थोड़ा नीचे स्थान पर बहौत आगे था। जब संगीता को उधर जाना होता तो शालिनी को जगा कर साथ ले जातीं और जब शालिनी को जाना होता तो वह कुछ दूर तक मुझे साथ ले लेतीं फिर नीचे खुद चली जातीं। एक बार सुबह के करीब शालिनी की आँख नहीं खुली तो संगीता मुझ से बोलीं शालिनी रानी तो जागी नहीं आप साथ चले चलिये। मै जहां तक शालिनी अपने साथ ले गई थीं वहाँ तक जा कर रुक गया तो संगीता नीचे तो उतरीं परंतु आगे उपयुक्त स्थान तक न जाकर वहीं बैठ गईं ,बात अटपटा लगने   की थी। मैंने उसी समय निश्चय किया कि अगले दिन चाहे जो हो मै यहाँ सोने नहीं आऊँगा। सुबह शालिनी के उठते ही मैंने इस हरकत का जिक्र किया तो उन्होने तपाक से कहा कि संगीता भाभी हैं ही आवारा शरद की तो किस्मत फूट गई। उन्होने बताया कि रात मे कई बार उन्हें चादर उढ़ा चुके हैं अब भी देख लो चादर अलग है ,भले ही सब कपड़े पहने थीं परंतु न पहनना ही उसे कहा जाएगा। जब मै अगले दिन नहीं गया तो बउआ ने पूछा यशवन्त और शालिनी भी तो वहाँ हैं क्वार्टर सन्नाटे मे है तुम क्यों नहीं  जा रहे हो?उन्हें क्या घटना बताते?वैसे ही बहाना कर दिया।

20 नवंबर 1988 को अजय की शादी ग्वालियर मे होना तय हुआ। यह भी कमलेश बाबू ने ही तय कराई थी। उनके एक माने हुये मामा जो उनके बी एच ई एल मे पर्चेज मेनेजर थे की बेटी की नन्द से उन्होने अजय की शादी तय करवाई थी।अजय के दोनों सालों से उनकी कुछ न कुछ रिश्तेदारी है। सुबह की ‘ताज एक्स्प्रेस’ से ग्वालियर गए थे और शाम की ‘ताज एक्स्प्रेस’से लौटना था। शादी दिन की थी। दरियाबाद से बाबूजी से बड़े भाई आए थे जिनसे भुआ की मुक़दमेबाज़ी चली थी अतः भुआ-फूफाजी नहीं आए थे। लाखेश भाई साहब बारात विदा हो जाने के बाद कानपुर से सीधे ग्वालियर पहुंचे थे और बैरंग लौट गए थे। कमलेश बाबू को शराब की धुन सवार थी। अजय ने उनके लिए बंदोबस्त कर दिया था। ट्रेन मे अजय के दोस्त अनिल गुप्ता, शरद मोहन से मिल कर कमलेश बाबू ने मेरे मुंह मे एक ढक्कन शराब उंडेल दी थी। चलने से पहले अजय मुझे फटकार चुके थे मै जाना नहीं चाहता था। बउआ ने कहा कि तुम्हारे न जाने से शालिनी भी नहीं जा रही हैं उनका एक ही देवर है और यशवन्त का एक ही चाचा अतः उनका ख्याल करके जाओ। उनकी बात रखने के कारण गया था।

एक रस्म ‘चार’ की होती है जिसमे लड़की वालों के यहाँ कुछ मेवा वगैरह भेजी जाती है कमलेश बाबू ने उसी ‘चार की थैली’मे एक बोतल शराब छिपा कर रख दी थी। इस कारण वहाँ खूब चो-चो हुयी होगी जो अजय ने सुनी होगी अतः रात को खाना निबटने के बाद अजय और कमलेश बाबू मे धुआँ-धार वाक-युद्ध हुआ। हम लोग तो ऊपर सोते थे शालिनी ने मुझ से बीच-बचाव करने को कहा लेकिन मैंने इंकार कर दिया मै पहले ही अजय से फटकार खा चुका था और गलती तो कमलेश बाबू की थी । शालिनी खुद मेरे मना करने पर भी चली गईं तब तक कमलेश बाबू और शोभा अपना सामान पैक करके रात मे ही झांसी लौटने की तैयारी मे थे। उन्होने जल्दी-जल्दी ऊपर आ कर मुझ से रोकने को कहा लेकिन मेरा तर्क था जब बाबूजी-बउआ वहीं हैं तो मै क्यों बीच मे पडू।पता नहीं कैसे फिर वे लोग रुक गए।

22 नवंबर को रिसेप्शन का खाना कुछ खास-खास रिशतेदारों का और मिलने वालों का था। शालिनी ने शरद की पत्नी संगीता से छोले-भटूरे बनवाने की बात कही थी परंतु वह तब आयीं जब काफी लोग खा कर जा चुके थे। सब कार्य खुद शालिनी ने ही किया। यशवन्त का जन्म दिन भी इसी दिन पहली बार मनाया गया। मिल्क केक भी संगीता के घर शालिनी ने जमवाया था वह भी तब पहुंचा जब वे लोग सिटी स्टेशन से हमारे घर पहुंचे।

हमारी दुकान के सेठ जी भी अपनी श्रीमती जी के साथ पधारे थे। उन्होने यशवन्त को जन्मदिन पर और अजय की पत्नी को मुंह दिखायी  के रु 50/-50/-दिये थे।  इसके अगले दिन शोभा और कमलेश बाबू अपने बच्चों को लेकर लौट गए। मेरे भी और अजय की भी शादी उन्होने तय करवाई थी परंतु फिर भी ऐसी ओछी हरकतें करते रहे तब इन बातों का अभीष्ट समझ नहीं आया था जिंनका खुलासा अब हमारे लखनऊ आने के बाद होता गया है इसी कारण वे लोग हमारे लखनऊ आने के विरोधी बने हुये थे क्योंकि उनका तिलस्म टूट गया। गफलत दूर हो गई और उनके चेहरे का नकाब उतर गया। उनकी छोटी बेटी ने अपने घर के  ‘सोनू’नाम से एक ऐसी आई डी बनाई जिसमे जन्म तिथि अपनी बड़ी बहन की डाल कर ब्लाग जगत के लोगों को गुमराह किया।मुक्ता का खास शगल है मेरे ब्लाग्स पर आई टिप्पणियों के माध्यम से प्रोफाईल खोल कर ब्लागर्स की ओवरहालिंग करना और अपने पिताजी कमलेश बिहारी माथुर को सूचित करना और दोनों मिल कर किसी को ब्लफ़ करके किसी को टोटका-टोने का सहारा लेकर मेरे विरुद्ध करने का प्रयास करते हैं जिसमे अभी तक पूर्ण सफल भी हैं।

 आज कमलेश बाबू और उनकी छोटी बेटी के प्रयास से मेरे ब्लाग्स पर विशेष कर इस ब्लाग पर विजिट कम हो गए हैं। वे नहीं समझ पा रहे हैं कि आज न सही आने वाली पीढ़ी के लोग तो पढ़ेंगे और सच को समझ ही जाएँगे।
अतीत मे वे इसलिए कामयाबी के साथ हमे क्षति पहुंचाते रहे कि हम उन पर शक नहीं रख रहे थे,अब वे सब शक के दायरे मे हैं और प्रत्येक क्षति हेतु मै उनको प्रथम उत्तरदाई मान रहा हूँ। मेरा लेखन अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं है अतः कुल मिला कर वे पाठकों की ही क्षति कर रहे हैं।यह ताज्जुब नहीं है कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं क्योंकि अब शीशे की तरह साफ है कि उनका स्वभाव ही ऐसा रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि इन्टरनेट के विद्वान इनके झांसे मे कैसे फंस जाते हैं उनकी अपनी बुद्धि कहाँ खो जाती है। इनमे वे लोग अधिक हैं जिनकी मैंने ब्लाग मे तारीफ लिख दी है और इन लोगों ने चुन कर उन्हीं को फाँसा है। जो लोग एक बार मुझ से अपने पुत्र-पुत्री हेतु ज्योतिषीय जानकारी भी प्राप्त कर चुके अब ब्लाग और फेस बुक पर मेरे विरुद्ध प्रचार मे संलग्न हैं। जो लोग दूसरे  रूप मे लाभ ले चुके वे अपने तरीके से विरोध कर रहे हैं। इससे उनके भी मानसिक स्तर का खुलासा हो गया कि कितने विद्वान और योग्य हैं वे और मै उनकी पोल देख कर सतर्क हो गया। अतः उन्हे भड़काने वाले अपने रिशतेदारों का आभारी ही हूँ।

 
 
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