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Category Archives: कारगिल

आगरा /१९८२-८३(भाग १)

बउआ ने परंपरागत नाव उतरने की रस्म  के वास्ते शालिनी को पीहर से बुलवाने हेतु बाबूजी से पत्र भिजवा दिया जिसे जे.एस.एल.साहब ने मंजूर कर लिया.दरअसल हमारे खानदान में परंपरा है कि,बेटों को प्रत्येक १४ जनवरी (मकर संक्रांति पर)नाव चढ़ने की रस्म कराई जाती है,कभी वास्तविक नाव का प्रयोग होता रहा होगा परन्तु बाबूजी तो हम दोनों भाइयों को खोये की बर्फी को नाव मान कर उसके साथ रस्म पूरी करा देते थे.जब शादी हो जाए तो पुत्र और पुत्र वधु को एक साथ बैठा कर नाव उतरने की रस्म करा दी जाती है,अर्थात अब इसके बाद से नाव चढ़ने की रस्म ख़त्म.
संक्रांति पर बड़ों को बया देने की प्रथा है जिसमें कुछ सामर्थ्यानुसार धन वगैरह भी दिया जाता है.शालिनी ने मुझ से बउआ को रु.५१/-देने हेतु लिए परन्तु दिए उन्हें रु.३१/-ही .मैंने यह बात बउआ को नहीं बतायी लेकिन समझते देर न लगी कि जिसके पिता रेलवे में छोटी इलाईची के घपले में फंसे उसके घर के सभी लोग घपलेबाज ही होंगे.
इस बार गर्मियों में फिर मुझे कारगिल जाने वाली टीम में शामिल कर दिया गया-एन.एस.चावला और हेमंत कुमार जी गत वर्ष खाई मात का बदलना लेने पर उतारू थे.लिहाजा शालिनी को उनकी इच्छानुसार टूंडला भेज दिया गया.
इस बार फ्रंट आफिस सुपरवाईजर श्री इन्दर राज चंढोक को कारगिल मेनेजर बना कर भेजा गया.इंजीनियरिंग से दुसरे शख्स को भेजा गया ,पुराने गए लोगों में केवल मुझे ही रिपीट किया गया था.हेमंत कुमार जी के आफिस में बैठ कर चंढोक साहब ने मुझे आश्वासन दिया था इस बार स्टाफ को भोजन तुम्हारे अनुसार दिया जाएगा.लेकिन यह कोरा आश्वासन ही था.
कारगिल-1982 मे एक बार फिर 
एक रोज घुमते समय पिछली बार जिस ट्रक में जोजीला पर फंसे थे उसके ड्राइवर साहब मिल गए और देखते ही बोले-“अरे तुम फिर आ गया” उन्हें क्या बताते ,इधर-उधर बात घुमा दी.
चंढोक साहब तो टोनी चावला जी के भी पर-बाबा निकले.दो दिन बाद ही उनकी पत्नी मय दोनों बेटों और चंढोक साहब की बहन को लेकर वहां आ गयीं.चंढोक साहब ने भी आर्मी के मेजर साहब से मेल कर लिया उनके कोई रिश्तेदार लेफ्टिनेंट जेनरल थे उनके हवाले से.
एक रोज चंढोक साहब के बड़े बेटे गौरव को काफी तेज बुखार था और मेरी चंढोक साहब से बोलचाल उनके व्यवहार के कारण बंद थी.उन नन्द -भौजाई में भी खट-पट होने के कारण चंढोक साहब अपनी श्रीमती जी से खफा थे.अतः अपने बेटे की भी परवाह नहीं किये.जब बेहद परेशानी बढ़ गई तो मिसेज चंढोक ने मुझ से कहा कि चूंकि मैं पहले भी आ चूका हूँ और डा. आदि से परिचय हो सकता है उनकी मदद करूँ.जीप साथ भेजने को उन्होंने अपने अधिकार से कहा.जिन सरकारी डा. साहब को बशीर साहब टोनी चावला जी के लिए पिछले वर्ष लाये थे ,मैं उनके घर गया और उनसे चलने का निवेदन किया.
डा. साहब आये और वांछित दवाएं दीं ,कुछ परहेज बताया और फीस भी नहीं ली.तब तो बशीर साहब लाये थे इस लिए फीस नहीं ली इस बार मेरे बुलाने पर भी फीस नहीं ली.सरकारी डा. होकर घर आ जाना और फीस नहीं लेना शेख मोहम्मद अब्दुल्ला साहब के शासन में जे.एंड के.में ही संभव था यहाँ यूं.पी.में तो ऐसा होता नहीं है.
बहरहाल एक दो दिन में गौरव बिलकुल ठीक हो गया.ठण्ड और गैर वाजिब भोजन के कारण मेरा जबड़ा जकड गया था और सरकारी अस्पताल में डा.साहब को दिखाया उन्होंने एक्सरे (जो वहां तो फ्री हो गया था)देख कर एक्सरसाईज करने को कहा था और दवाएं बाहर से लिख दी थीं.उन दवाओं से लाभ न होने के कारण उन्होंने आपरेशन करने को कहा तो चंढोक साहब भी चौंक गए और बोले आपरेशन तुम आगरा जाकर अपने घर वालों के बीच कराओ,उनकी श्रीमती जी ने उनसे मुझे आगरा लौटने की लिखित परमीशन भी दिलवा दी और इस प्रकार इस बार एक ही माह के भीतर आगरा लौटना हो गया.
इस बार चंढोक साहब सपरिवार मुझे रात्रि विश्राम-स्थल तक छोड़ने आये थे.अगले दिन सुबह तडके पांच बजे एक ट्रक से निकले जिससे बात चंढोक साहब ने ही तय करा दी थी.श्री नगर शाम तक पहुंचे ,बीच में एक स्थान पर तेज गर्मी के कारण नहर पर ट्रक रुका और ड्राइवर समेत सभी लोग नहाए उसी ट्रक में पी.डब्ल्यू.डी.के एक जे.ई.साहब भी जा रहे थे जिन्होंने मुझ पर जबरदस्ती पानी डाल कर भिगो दिया अतः मुझे भी नहाना ही हुआ.
यह जे.ई.साहब खूब खाऊ आदमी थे अपनी दास्तानें सुनाते आ रहे थे कि ,कब कैसे ठेकेदार को कहाँ फंसा कर उससे कितने रु.या फ्रिज कब हडपा.उन्होंने मुझसे कहा शिकारा -विकार में मत रुको मैं मुफ्त में रुकवा दूंगा और श्रीनगर में डल-झील के पास एक मंदिर में ले जाकर सामान रखवा दिया.वह अलग पीने-खाने चले गए और मैं अलग अपना भोजन करके लौटा.
पिछली बार मैं बिस्तर भी ले गया था जो कारगिल में बंधा रहा था -होटल ने ही प्रोवाईड किया था अतः इस बार ले नहीं गया था.जे.ई.साहब के चक्कर में मंदिर में भीषण ठण्ड में रात गुजारनी पडी.अगली सुबह का रोडवेज बस का टिकट ले लिया था जब मैं चलने लगा तो जे.ई.साहब ने मुझ से रु.५/-पंडित जी को देने हेतु मांग लिए-यही उनका मुफ्त ठौर था .
श्रीनगर से बस ने जम्मू रात में पहुंचा दिया जहां बस स्टैंड की छत पर खुले में रात गुजारी और सुबह होते ही बस पकड़ कर दिल्ली चला,टिकट रात ही में ले लिया था.शाम ५ बजे तक दिल्ली पहुंचे और दूसरी बस पकड़ कर आगरा रात ११-१२ बजे तक घर .इतनी जल्दी और अचानक रात में पहुँचने पर बउआ -बाबूजी एकबारगी घबडा गए.सब बातें समझा दीं.

1981 और 1982 मे जाना-आना मिला कर 4 ट्रिप हुये लेकिन मैं एक बार भी जम्मू नहीं रुक कर सीधा आगरा पहुंचा . जबकि लोग-बाग खास-तौर से छुट्टी एवं पैसे का बंदोबस्त करके ‘वैष्णो देवी’जाते हैं ,मैं मुफ्त मे आते-जाते भी मंदिर नहीं गया .कारण था ढोंग और पाखंड पर अविश्वास .यदि कोई अपने देश का भाग समझ कर पर्यटन हेतु जाता है और प्रशाद आदि के फेर मे नहीं पड़ता है तब तो ठीक है.मंदिरवाद केवल प्रदूषण बढ़ाता है और मस्तिष्क को विकृत करता है.अपने मस्तिष्क को पोंगापंथी सड़ांध  से बचाने हेतु ‘वैष्णो देवी’ मंदिर नहीं गया ,हालांकि आर्य समाज के संपर्क मे तो 16 वर्ष बाद ही आ पाया.

अभी कुछ बातें और कारगिल की फिर ड्यूटी पर न लिए जाने का तमाशा अगली बार……
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आगरा/१९८०-८१(भाग १)/एवं कारगिल-प्लेटिनम का मलवा

१९८० में बउआ की तबियत ज्यादा खराब हुई,वह अंगरेजी दवा लेती नहीं थीं .एक परिचित डा.साहब के पिताजी मशहूर वैद्य थे उन्हें हाल बता कर दवा दी जिससे उन्हें तत्काल फायदा हुआ. यह उन दिनों की बात है जब संजय गांधी की विमान दुर्घटना में हत्या धीरेन्द्र ब्रह्मचारी की कृपा से हुई थी.मैं १५ दिन छुट्टी पर रहा और घरेलू काम किया .यूं.ऍफ़.सी.श्री पल्लाकल सुरेश रामादास नें कुछ रविवार जिनमें काम कर चुका था के कम्पेंसेशन में छुट्टी दे दी और अतिरिक्त छुट्टी हेतु अग्रिम रविवार के लिए भी कम्पेंसेटरी  आफ सेंक्शन कर दिए.मैंने ‘हिन्दी साहित्य सम्मलेन,प्रयाग’की आयुर्वेद रत्न परीक्षा हेतु मंजूरी माँगी उसे भी रामदास साहब ने फॉरवर्ड कर दिया और हेमंत कुमार जी ने भी सैंक्शन कर दिया.हालांकि इस डिग्री से होटल मेनेजमेंट को कोई फायदा नहीं हो रहा था.मंजूरी लेकर कोर्स करने का फायदा यह  था कि,प्रति वर्ष एक्जाम के दौरान १५ दिन की पेड़ लीव मिल जाए.
 हेमंत कुमार जी छात्र जीवन में सयुस(समाजवादी युवजन सभा)  में रहे थे और बांग्लादेश आन्दोलन में दिल्ली के छात्र प्रतिनिधि की हैसियत  से भाग ले चुके थे.लेकिन होटल मुग़ल के पर्सोनल मेनेजर के रूप में कर्मचारियों के हितों के विपरीत कार्य करके हायर मेनेजमेंट  को खुश करना चाहते थे.कारगिल,लद्दाख में आई.टी.सी.ने एक लीज प्रापर्टी ‘होटल हाई लैंड्स’ली थी.यह होटल ,होटल मुग़ल के जी.एम्.के ही अन्डर था.पेंटल साहब सीराक होटल,बम्बई ट्रांसफर होकर जा चुके थे और सरदार नृप जीत  सिंह चावला साहब नये जी.एम्.थे,वह भी एंटी एम्प्लोयी छवि के थे.यूं.ऍफ़.सी.शेखर साहब की जगह पी.सुरेश रामादास साहब आ गए थे जो पूर्व मंत्री एवं राज्यपाल सत्येन्द्र नारायण सिंहां के दामाद थे और अटल बिहारी बाजपाई के प्रबल प्रशंसक थे.१९८० के मध्यावधी चुनावों में इंदिरा गांधी पहली बार आर.एस.एस.के समर्थन से पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापिस आ चुकीं थीं.२५ मार्च १९८१ को मेरी शादी करने की बाबत फाइनल फैसला हो चूका था.इतनी तमाम विपरीत परिस्थितियों में मुझे अस्थायी तौर पर (मई से आक्टूबर)होटल हाई लैंड्स ,कारगिल ट्रांसफर कर दिया गया.इनकार करके नौकरी छोड़ने का यह उचित वक्त नहीं था.
२४ मई १९८१ को होटल मुग़ल से पांच लोगों ने प्रस्थान किया.छठवें अतुल माथुर,मेरठ से सीधे कारगिल ही पहुंचा था.आगरा कैंट स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली पहुंचे और उसी ट्रेन से रिजर्वेशन लेकर जम्मू पहुंचे.जम्मू से बस   द्वारा श्री नगर गए जहाँ एक होटल में हम लोगों को ठहराया गया.हाई लैंड्स के मेनेजर सरदार अरविंदर सिंह चावला साहब -टोनी चावला के नाम से पापुलर थे,उनका सम्बन्ध होटल मौर्या,दिल्ली से था.वह एक अलग होटल में ठहरे थे,उन्होंने पहले १५ हजार रु.में एक सेकिंड हैण्ड जीप खरीदी जिससे ही वह कारगिल पहुंचे थे.४-५ रोज श्री नगर से सारा जरूरी सामान खरीद कर दो ट्रकों में लाद कर और उन्हीं ट्रकों से हम पाँचों लोगों को रवाना कर दिया.श्री नगर और कारगिल के बीच ‘द्रास’क्षेत्र में ‘जोजीला’दर्रा पड़ता है.यहाँ बर्फबारी की वजह से रास्ता जाम हो गया और हम लोगों के ट्रक भी तमाम लोगों के साथ १२ घंटे रात भर फंसे रह गए.नार्मल स्थिति में शाम तक हम लोगों को कारगिल पहुँच चूकना था.( ठीक इसी स्थान पर बाद में किसी वर्ष सेना के जवान और ट्रक भी फंसे थे जिनका बहुत जिक्र अखबारों में हुआ था).
इंडो तिब्बत बार्डर पुलिस के जवानों ने अगले दिन सुबह बर्फ कट-काट कर रास्ता बनाया और तब हम लोग चल सके.सभी लोग एकदम भूखे-प्यासे ही रहे वहां मिलता क्या?और कैसे?बर्फ पिघल कर बह रही थी ,चूसने पर उसका स्वाद खारा था अतः उसका प्रयोग नहीं किया जा सका .तभी इस रहस्य का पता चला कि,इंदिरा जी के समक्ष एक कनाडाई फर्म ने बहुत कम कीमत पर सुरंग(टनेल)बनाने और जर्मन फर्म ने बिलकुल मुफ्त में बनाने का प्रस्ताव दिया था.दोनों फर्मों की शर्त थी कि ,’मलवा’ वे अपने देश ले जायेंगें.इंदिराजी मलवा देने को तैयार नहीं थीं अतः प्रस्ताव ठुकरा दिए.यदि यह सुरंग बन जाती तो श्री नगर से लद्दाख तक एक ही दिन में बस  द्वारा पहुंचा जा सकता था जबकि अभी रात्रि हाल्ट कारगिल में करना पड़ता है.सेना रात में सफ़र की इजाजत नहीं देती है.
मलवा न देने का कारण
तमाम राजनीतिक विरोध के बावजूद इंदिरा जी की इस बात के लिए तो प्रशंसा करनी ही पड़ेगी कि उन्होंने अपार राष्ट्र-भक्ति के कारण कनाडाई,जर्मन या किसी भी विदेशी कं. को वह मलवा देने से इनकार कर दिया क्योंकि उसमें ‘प्लेटिनम’की प्रचुरता है.सभी जानते हैं कि प्लेटिनम स्वर्ण से भी मंहगी धातु है और इसका प्रयोग यूरेनियम निर्माण में भी होता है.कश्मीर के केसर से ज्यादा मूल्यवान है यह प्लेटिनम.सम्पूर्ण द्रास क्षेत्र प्लेटिनम का अपार भण्डार है.अगर संविधान में सरदार पटेल और रफ़ी अहमद किदवई ने धारा ‘३७०’ न रखवाई होती तो कब का यह प्लेटिनम विदेशियों के हाथ पड़ चूका होता क्योंकि लालच आदि के वशीभूत होकर लोग भूमि बेच डालते और हमारे देश को अपार क्षति पहुंचाते.धारा ३७० को हटाने का आन्दोलन चलाने वाले भी छः वर्ष सत्ता में रह लिए परन्तु इतना बड़ा देश-द्रोह करने का साहस नहीं कर सके,क्योंकि उनके समर्थक दल सरकार गिरा देते,फिर नेशनल कान्फरेन्स भी उनके साथ थी जिसके नेता शेख अब्दुल्ला साहब ने ही तो महाराजा हरी सिंह के खड़यंत्र  का भंडाफोड़ करके काश्मीर को भारत में मिलाने पर मजबूर किया था .तो समझिये जनाब कि धारा ३७० है ‘भारतीय एकता व अक्षुणता’ को बनाये रखने की गारंटी और इसे हटाने की मांग है-साम्राज्यवादियों की गहरी साजिश.और यही वजह है काश्मीर समस्या की .साम्राज्यवादी शक्तियां नहीं चाहतीं कि भारत अपने इस खनिज भण्डार का खुद प्रयोग कर सके इसी लिए पाकिस्तान के माध्यम से विवाद खड़ा कराया गया है.इसी लिए इसी क्षेत्र में चीन की भी दिलचस्पी है.इसी लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा हेतु गठित आर.एस.एस.उनके स्वर को मुखरित करने हेतु ‘धारा ३७०’ हटाने का राग अलापता रहता है.इस राग को साम्प्रदायिक रंगत में पेश किया जाता है.साम्प्रदायिकता साम्राज्यवाद की ही सहोदरी है.यह हमारे देश की जनता का परम -पुनीत कर्तव्य है कि भविष्य में कभी भी आर.एस.एस. प्रभावित सरकार न बन सके इसका पूर्ण ख्याल रखें अन्यथा देश से काश्मीर टूट कर अलग हो जाएगाजो भारत का मस्तक है .
कारगिल का विवरण अगली बार…….
 
 
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