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Category Archives: कुक्कू

‘शालिनी’–एक ज्योतिषयात्मक विश्लेषण

18 वर्ष बाद प्रथम बार लिपिबद्ध श्रद्धांजली-

(सिकन्दरा,आगरा मे अक्तूबर 1993 मे लिए सामूहिक चित्र से ‘शालिनी माथुर’)

04 जनवरी 1959 को साँय 06 बजे मैनपुरी मे जन्मी शालिनी की मूल जन्म पत्री तो कभी दिखाई ही नहीं गई ,बताया गया कि खो गई है परंतु जो हस्त-लिखित प्रतिलिपि हमारे यहाँ भेजी गई थी उसका विवरण यह है-

रविवार,कृष्ण पक्ष दशमी,पूष मास,विक्रमी संवत 2015,’स्वाती नक्षत्र’।
लग्न-मकर और उसमे ‘शुक्र’।
तृतीय भाव मे- ‘मीन’ का केतू।
चतुर्थ भाव मे -मेष का मंगल।
नवे भाव मे-कन्या का राहू।
दशम भाव मे -तुला का चंद्र।
एकादश भाव मे-वृश्चिक के बुध व गुरु।
द्वादश भाव मे -धनु के सूर्य व शनि।

ग्रहों का विश्लेषण देने से पूर्व यह भी बताना ज़रूरी है कि शालिनी के पिताजी और के बी माथुर साहब (डॉ शोभा के पति) के पिताजी ‘रेलवे’ के साथी थे और उनही के माध्यम और उनकी सिफ़ारिश पर विवाह हुआ था। जन्म कुंडली डॉ रामनाथ जी ने मिलाई थी ,14 गुण मिलने पर विवाह नहीं हो सकता था अतः उन्होने 28 गुण मिल रहे हैं बताया था। शालिनी के भाई ‘कुक्कू’ के बी माथुर साहब के पुराने मित्र थे । इससे निष्कर्ष निकाला कि डॉ रामनाथ को खरीद लिया गया था और उन्होने हमारे साथ विश्वासघात किया था। इस धोखे के बाद ही खुद ‘ज्योतिष’ का गहन अध्यन किया और तमाम जन्म-कुंडलियों का विश्लेषण व्यवहारिक ज्ञानार्जन हेतु किया। (  रेखा -राजनीति मे आने की सम्भावनालेख 19 अप्रैल 2012 को दिया था और 26 अप्रैल 2012 को वह ‘राज्य सभा’ मे नामित हो गईं। )

शालिनी के एंगेजमेंट के वक्त जब कुक्कू साहब की पत्नी मधू (जो के बी माथुर साहब की भतीजी भी हैं) ने गाना गाया तब के बी साहब ने स्टूल को तबला बना कर उनके साथ संगत की थी। इस एंगेजमेंट के बाद कुक्कू के मित्र वी बी एस टामटा ने टूंडला से इटावा जाकर शालिनी का हाथ देख कर उनके 35 वर्ष जीवित रहने की बात बताई थी और इसका खुलासा खुद शालिनी ने किया था। यह भी शालिनी ने ही बताया था कि कुक्कू उनको मछली के पकौड़े खूब खिलाते थे। कुक्कू अश्लील साहित्य पढ़ने के शौकीन थे और पुस्तकें बिस्तर के नीचे छिपा कर रखते थे। यह भी रहस्योद्घाटन खुद शालिनी ही ने किया था।

05 जनवरी 1981 से 10 दिसंबर 1981 तक शालिनी की ‘गुरु’ महादशा मे ‘मंगल’ की अंतर्दशा थी। यह काल भूमि लाभ दिलाने वाला था। इसी बीच 25 मार्च 1981 को एंगेजमेंट और 08 नवंबर 1981 को मेरे साथ विवाह हुआ । अर्थात विवाह होते ही वह स्वतः मकान स्वामिनी हो गई।

11 दिसंबर 1981 से 04 मई 1984 तक वह ‘गुरु’ महादशांतर्गत ‘राहू’ की अंतर्दशा मे थीं जो समय उनके लिए हानि,दुख,यातना का था। नतीजतन उनका प्रथम पुत्र 24 नवंबर 1982 को टूंडला मे प्रातः 04 बजे जन्म लेकर वहीं उसी दिन साँय 04 बजे दिवंगत भी हो गया।
इसी काल मे 1983 मे ‘यशवन्त’ का भी जन्म हुआ जो बचपन मे बहुत बीमार रहा है।

05 मई 1984से 07 मई 1987 तक का कार्यकाल  ‘शनि’ की महादशांतर्गत ‘शनि’ की ही अंतर्दशा का उनके लिए लाभदायक था। परंतु   इसी काल मे 24/25 अप्रैल  1984 को मुझे होटल मुगल शेरेटन ,आगरा से सस्पेंड कर दिया गया क्योंकि मैंने इंटरनल आडिट करते हुये पौने 06 लाख का घपला पकड़ा था तो बजाए मुझे एवार्ड देने के घपलेबाजों को बचाने हेतु यही विकल्प था मल्टी नेशनल कारपोरेट घराने के पास। (यही कारण है कारपोरेट घरानों के मसीहा ‘अन्ना’/’रामदेव’ का मैं प्रबल विरोधी हूँ)।
लेकिन 01 अप्रैल 1985 से मुझे हींग-की -मंडी ,आगरा मे दुकानों मे लेखा-कार्य मिलना प्रारम्भ होने से कुछ राहत भी मिल गई।

26 फरवरी  1991 से 25 अप्रैल 1994 तक ‘शनि’ मे ‘शुक्र’ की अंतर्दशा का काल उनके लिए श्रेष्ठतम था। इस बीच मुझे कुछ नए पार्ट टाईम जाब भी मिलने से थोड़ी राहत बढ़ गई थी। इसी बीच 11 अप्रैल 1994 को लखनऊ के रवींद्रालय मे प्रदेश भाकपा के सपा मे विलय के  समय मैं भी आगरा ज़िला भाकपा के कोषाध्यक्ष पद को छोड़ कर सपा मे आ गया था। किन्तु नवंबर 1993 मे अपनी माँ के घर खाना खा कर शालिनी बुखार से जो घिरीं वह बिलकुल ठीक न हुआ।

26 अप्रैल 1994 से अक्तूबर तक ‘शनि’महादशांतर्गत ‘सूर्य’की अंतर्दशा उनके लिए सामान्य थी। किन्तु 16 जून 1994 को साँय 04 बजे से 05 बजे के बीच उनका प्राणान्त हो गया। 

इस समय के अनुसार शालिनी की जो मृत्यु कुंडली बनती है उसका विवरण यह है-

ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी,संवत-2051 विक्रमी,पूरवा फाल्गुनी नक्षत्र।
लग्न तुला और उसमे-गुरु व राहू।
पंचम भाव मे -कुम्भ का शनि।
सप्तम भाव मे-मेष के केतू व मंगल।
नवे भाव मे -मिथुन के सूर्य और बुध।
दशम भाव मे-कर्क का शुक्र।
एकादश भाव मे -सिंह का चंद्र।

अब इस मृत्यु कुंडली का ग्रह-गोचर फल इस प्रकार होता है –
गुरु भय और राहू हानि दे रहे हैं। शनि पुत्र को कष्ट दे रहा है। केतू कलह कारक है और ‘मंगल’ पति को कष्ट दे रहा है। बुध पीड़ा दे रहा है तो ‘सूर्य’ सुकृत का नाश कर रहा है और शुक्र भी दुख दे रहा है। जब सुकृत ही शेष नहीं बच रहा है तब जीवन का बचाव कैसे हो?

जन्म कुंडली मे ‘बुध’ ग्रह की स्थिति भाई-बहनों से लाभ न होने के संकेत दे रही है तो ‘क्रोधी’ भी बना रही है । ‘केतू’ की स्थिति अनावश्यक झगड़े मोल लेने की एवं पारिवारिक स्थिति सुखद न रहने की ओर संकेत कर रही है।  ‘ब्रहस्पति’ की स्थिति पुत्रों से दुख दिलाने वाली है।


कैंसर –

हालांकि डॉ रामनाथ ने शालिनी को टी बी होने की बात कही थी  जो TB विशेज्ञ की जांच मे सिद्ध न हो सकी। 


बाद मे 1994 मे ही  डॉ रमेश चंद्र उप्रेती ने बताया था कि आँतें सूज कर लटक चुकी हैं एक साल इलाज से लाभ न हो तो आपरेशन करना पड़ेगा। उनकी मृत्यु के उपरांत जन्म-कुंडली की ओवरहालिंग से जो तथ्य ज्ञात हुये उनके अनुसार उनको आंतों का’ कैंसर ‘ रहा होगा जिसे किसी भी मेडिकल डॉ ने डायगनोज नहीं किया। इसी लिए सही इलाज भी नही दिया। 
ज्योतिष के अनुसार शनि ग्रह का कुंडली के ‘प्रथम’-लग्न भाव और ‘अष्टम’ भाव से संबंध हो तथा साथ ही साथ ‘मंगल’ ग्रह से ‘शनि’ का संबंध हो तो निश्चय ही ‘कैंसर’ होता है। 
शालिनी की जन्म कुंडली मे प्रथम भाव मे ‘मकर’ लग्न है जो ‘शनि’ की है। यह ‘शनि’ अष्टम  (सिंह राशि  )भाव के स्वामी ‘सूर्य’ के साथ द्वादश भाव मे स्थित है। द्वादश भाव (धनु राशि) का स्वामी ब्रहस्पति  एकादश भाव मे ‘मंगल’ की वृश्चिक राशि मे स्थित है। 
अनुमानतः 16-17 वर्ष की उम्र से शालिनी की आंतों मे विकृति प्रारम्भ हुई होगी जो मछली के पकौड़े जैसे पदार्थों के सेवन से बढ़ती गई होगी। चाय का सेवन अत्यधिक मात्रा  मे वह करती थीं जिससे आँतें निरंतर शिथिल होती गई होंगी। डॉ उप्रेती ने तले-भुने,चिकने पदार्थ और चाय से कडा परहेज बताया था फिर भी उनकी माता ने डॉ साहब के पास से लौटते ही मैदा की मठरी और एक ग्लास चाय उनको दी। इस व्यवहार ने ही रोग को असाध्य बनाया होगा।

मेडिकल विशेज्ञों की लापरवाही और खुद को उस वक्त ज्योतिष का गंभीर ज्ञान न होने के कारण ग्रहों की शांति या ‘स्तुति’ प्रयोग न हो सका। इसी कारण अब ‘जन हित मे’ स्तुतियों को सार्वजनिक करना प्रारम्भ किया है जिससे जागरूक लोग लाभ उठा कर अपना बचाव कर सकें। लेकिन अफसोस कि ‘पूना’ स्थित ‘चंद्र प्रभा’,ठगनी प्रभा’ और ‘उर्वशी उर्फ बब्बी’ की तिकड़ी ब्लाग जगत मे भी मेरे विरुद्ध दुष्प्रचार करके लोगों को इनके लाभ उठाने से वंचित कर रही है। 
शालिनी अपने पुत्र यशवन्त की ‘माँ’ और ‘माता’ तो न बन सकीं किन्तु ‘जननी’ तो थी हीं। जिस प्रकार हम अपने बाबूजी और बउआ की मृत्यु की कैलेंडर तारीख को ‘हवन’ मे सात विशेष आहुतियाँ देते हैं उसी प्रकार शालिनी हेतु भी उन विशेष आहुतियों से उनकी ‘आत्मा’ की शांति की प्रार्थना करते हैं। किसी ‘ढ़ोंगी’ का पेट धासने  की बजाए वैज्ञानिक विधि से हवन करना हमे उचित प्रतीत होता है। 




 

आगरा 1994-95/भाग-8

इस हादसे के बाद मेरी तबीयत भी खराब हो गई ,किसी भी प्रकार की डाक्टरी दवा बेअसर जा रही थी। तेज बुखार के साथ -साथ बेहद कमजोरी हो गई थी। चम्मच तक पकड़ना मुश्किल हो गया था। बाबूजी चम्मच से तरल पदार्थ -दाल,सूजी का पेय आदि पिला देते थे। किन्तु यह अच्छा नहीं लगता था। न पानी अच्छा लग रहा था न पिया जा रहा था। अतः मैंने बाबू जी से कहा कि डाक्टर की दी दवाएं बंद करके केवल सूखा ग्लूकोज पावडर मुझे दें । उन्होने यही किया जिससे प्यास भी लगने  लगी और पेशाब भी सही होने लगा। दो तीन दिन मे कमजोरी दूर हो गई। बुखार भी इसी से ठीक हो गया और थोड़ा-थोड़ा भोजन भी अच्छा लगने लगा। कुछ दिनो बाद ड्यूटी जा सका। सभी दूकानदारों ने पूरा सहयोग दिया। मेक्सवेल के शंकर लाल जी,रेकसन के मुरलीधर जी और ईस्टर्न ट्रेडर्स के मोहन लाल जी के ज्येष्ठ पुत्र अपने टाईपिस्ट के साथ तथा वाकमेक्स के सुंदर लाल जी के साले और ज्येष्ठ पुत्र तो घर पर शोक प्रकट करने भी आए थे।

जूलाई मे स्कूल खुलने पर यशवन्त को भी भेजा। बउआ ,बाबूजी की मदद से खाना बना रही थीं किन्तु वह खुद अस्वस्थ थीं । कई बार रोटी सेंकते-सेंकते पीछे फर्श पर गिर गईं और  गैस चूल्हा जलता रह गया। मैंने फिर बाबू जी से सख्ती के साथ उन्हें व बउआ को खाना बनाने को मना किया। मै खुद खाना बनाने लगा और ईस्टर्न के मोहन लाल जी से मिन्नत करके उनका पार्ट टाईम छोड़ दिया। वह मुझे छोडना नहीं चाह रहे थे समय घटाने को तैयार थे वही वेतन देते हुये भी। सुबह और शाम खाना बनाने के साथ मुश्किल होती अतः उनका जाब छोड़ ही दिया। फिर भी यशवन्त को भूख लगने का बहाना करके शाम को मेरे आने से पहले ही बउआ और बाबूजी खाना बना लेते थे। तब मैंने दोनों वक्त की सब्जी सुबह ही बना कर रखना शुरू कर दिया ताकि बउआ-बाबूजी पर ज्यादा भार न पड़े।

एक तरफ बुढ़ापे मे माँ-पिताजी को भी मानसिक आघात,शारीरिक कष्ट और यशवन्त की भी चिन्ता थी तो दूसरी तरफ ‘चिता मे भी रोटी सेंकने ‘ वालों की भी कमी न थी। पर्दे के पीछे षड्यंत्र रचा गया और रिश्ते दारों तथा कालोनी के लोगों के बीच यह अफवाह फैलाई गई कि शालिनी को जहर दिया गया है। ‘कोना शूज’ वाले निरंजन आहूजा( जो श्रीमती आरती साहनी ,इन्कम टैक्स अपीलेट कमिश्नर द्वारा बुक्स आफ अकाउंट्स जब्त किए जाने से परेशान थे और जिंनका केस वकील की सलाह पर मेरे परिश्रम के बल पर सुलझा था) जिनकी बात अपमानजनक लगने पर मैंने उनका जाब छोड़ दिया था। इस मौके पर हींग-की-मंडी मे इस अफवाह के सृजक थे। उन्होने( जिनको मैंने वकील साहब द्वारा कानून पढ़वाकर जेल जाने से बचाया था) रेकसन वाले नारायण दास जी के समक्ष शंकर लाल जी से कहा था नया अकाउंटेंट ढूंढ लो तुम्हारा अकाउंटेंट जेल जाने वाला है। शंकर लाल जी हमारी ही कालोनी मे रहते थे और सब परिवार को   अच्छी तरह जानते थे और शू चेम्बर के प्रेसीडेंट थे अतः उन्होने निरंजन आहूजा को डांट कर चुप रहने को कहा कि झूठी अफवाहें न उड़ाएं । किन्तु लोगों को कानाफूसी करने और नाहक बदनाम करने का मसाला तो मिल ही गया था।

कमलनगर के ही एफ ब्लाक मे रहने वाले आर पी माथुर साहब से हमने जिक्र किया जो LLB भी थे। उन्होने कहा अफवाहों से चिंतित न हो जरूरी समझो तो जवाब देना वरना चुप रहना। उनकी श्रीमती जी ने बताया कि शालिनी की माँ भी अफवाहें फैलाने वालों मे हैं। भरतपुर पोस्टिंग के दौरान दैनिक यात्री रहे आर सी माथुर साहब शरद मोहन के मित्र बन गए थे वह भी आग मे घी डालने वालों मे थे ,अब उनकी पुत्री कमलेश बाबू के मौसेरे भाई की पत्नी भी हो गई है।*

इन सब परिस्थितियों मे राजनीति से विश्राम रहा। ……….

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*कमलेश बाबू की एक बहन के पति कुक्कू के रिश्तेदार हैं और उनकी शादी मे कुक्कू बाराती बन कर अलीगढ़ पहुंचे थे। आर सी माथुर की पुत्री कमलेश बाबू के मौसेरे भाई की पत्नी होने के साथ-साथ उनकी बड़ी बेटी की सुसराल मे भी रिश्तेदार है। उनकी छोटी बेटी के पति कुक्कू की भुआ के सुसराल के रिश्तेदार हैं। कमलेश बाबू ने अपनी  एक बहन और दोनों बेटियों की शादिया कुक्कू की रिश्तेदारी मे की हैं उनकी छोटी बेटी की देवरानी तो कुक्कू की बेटी की नन्द है। अतः कमलेश बाबू और डॉ शोभा उन लोगो से मिल कर हमारे साथ भीतरघात करते रहे जिसका खुलासा लखनऊ आते ही हो गया। इसीलिए डॉ शोभा ने मुझसे फोन पर  28 जनवरी 2010 को कहा था कि वे लोग मेरे लखनऊ आने के पक्ष मे नही थे। लखनऊ मे बिल्डर लुटेरिया के माध्यम से हम लोगो को हर तरह से परेशान करना उनका खास शगल बन गया है। यशवन्त को बिग बाजार की नौकरी छुड़वाकर लुटेरिया की नौकरी करवाने का उनका  प्रस्ताव मैंने आगरा  मे रहते ही ठुकरा दिया था।

कुछ ब्लागर्स को भी इन लोगो ने भड़का कर मुझे व यशवन्त को परेशान करने का उपक्रम कर रखा है जिनमे कुछ उनकी छोटी बेटी के शहर पूना मे हैं। एक प्रवासी ब्लागर ने 06 अक्तूबर 2010 को यशवन्त पर एक पोस्ट लिख कर उसका भविष्य चौपट करने का प्रयास इनही लोगो के इशारे पर किया था। के बी साहब की छोटी बेटी ने मुझसे फोन पर कहा था “मै…. को जानती हूँ,मैंने उनका प्रोफाईल देखा है। “सीधा अर्थ है कि वे लोग यशवन्त और मेरे ब्लाग्स पर प्राप्त टिप्पणियों के माध्यम से पहुँच बना कर ब्लागर्स को गुमराह करते रहते हैं। ताज्जुब तो पढे लिखे लोगों का इन लोगो के कुचक्र मे फँसने का है। कुक्कू उसकी पत्नी मधू ( के बी साहब की भतीजी ) बहने,बहनोई,भांजे-भांजी,भाई-भाई की पत्नी और भतीजिया तथा कुक्कू के पुत्र-पुत्री और उसके मित्र के बी साहब की पुत्रियाँ हमे सपरिवार नष्ट करने के अभियान मे संलग्न हैं। परंतु किसी के आगे झुक कर हकीकत लिखने से पीछे नहीं हट सकता। 

 

आगरा/1994 -95 /(भाग-6 )

गतांक से आगे ……

मै नहीं समझ सका कि क्यों डॉ शोभा यशवन्त को हस्तगत करना चाहती थीं और क्यों अजय की श्रीमती जी ने बउआ को वैसा न करने का सुझाव दिया(वह तो कमलेश बाबू की ममेरी बहन की नन्द हैं और के बी साहब ने ही उनकी शादी करवाई थी ) कि क्या वह यशवन्त को अपने पास रखना चाहती थीं?मुझसे किसी ने भी तब कोई जिक्र क्यों नहीं किया ?क्या यशवन्त किसी के पास रह लेता ?जब बउआ ने ग्यारह माह बाद बताया तब क्या उन्हें अपने लोगों के जीवन न रहने का एहसास हो गया था?उस समय इन सब बातों पर विचार करने का समय न था और बाद मे ध्यान से निकल गया था। कल जब 25 मार्च को भाग-5 लिख रहे थे तब दिमाग मे 25 मार्च 1981 की वह घटना भी कौंध रही थी कि तब शालिनी से एंगेज्मेंट हो चुकने के तुरंत बाद उन लोगों ने शालिनी का हाथ देख कर बताने को कहा था मेरे माता-पिता ने भी उन लोगों का समर्थन कर दिया था।

(बाएँ से दायें-बउआ,सरोजनी देवी-शालिनी की माँ,मधू-कुक्कू की पत्नी और कमलेश बाबू की भतीजी,शालिनी,खुद,बाबूजी और उनकी गोद मे डॉ शोभा की ज्येष्ठ पुत्री,पीछे की पंक्ति मे -अजय,कुक्कू,डॉ शोभा,सीमा,जय शंकर लाल-शालिनी के पिता )

(सीमा,मधू,शालिनी )

शालिनी की दोनों हथेलियों का अवलोकन करने से स्पष्ट था कि उनकी उम्र कुल 35 वर्ष ही है। अर्थात वह शादी अधिक से अधिक 13 वर्ष ही चलनी थी। यदि उसी समय हकीकत बता देता तो तत्काल रिजेक्ट कर दिया जाता और वह विवाह न होता। हाथ एंगेज्मेंट के पहले देखने को कहा जाता तो हकीकत ही बताना था। असमंजस मे तब चुप रहना मेरे लिए काफी घातक रहा। फिर वह बात दिमाग से इस प्रकार निकल गई जिस प्रकार गधे के सिर से सींग। जब नवंबर 1993 मे लव लीन ने शालिनी को बताया कि भुआ आपकी उम्र 36 वर्ष ही है तब भी पुरानी बात याद न आई और मैंने शालिनी को समझा दिया कि भतीजी की बात को अन्यथा न लें। किन्तु उसी दिन से वह बीमार पड़ गई थीं और अंततः 36 वे वर्ष मे दुनिया छोड़ ही गई।

जैसा कि पहले ही उल्लेख कर चुका हूँ कि शालिनी से विवाह कमलेश बाबू के पिताजी ने तय कराया था। पहले जितने भी लोगों ने संपर्क किया था सब का जिक्र बउआ डॉ शोभा से करती थीं और कमलेश बाबू की माताजी किसी न किसी आधार पर सभी लड़कियों को रिजेक्ट करा देती थीं। मुझसे मेरे माता-पिता ने कोई राय लेना कभी मुनासिब नहीं समझा । नीचे उन पत्रों की स्कैन कापियाँ दे रहा हूँ जिनकी पुत्रियों के प्रपोज़ल डॉ शोभा ने अपनी सास के हवाले से रिजेक्ट करवाए थे-

यह पत्र बार्डर सिक्योरिटी फोर्स के रिटायर्ड सब इंस्पेक्टर अमर सिंह जी का है जिनकी राय मैंने मांगी थी किन्तु उनके ठीक बताने के बावजूद डॉ शोभा ने बउआ को सूचित किया था कि उनकी सास कहती हैं मात्र 10 माह का अंतर कम है और इसी ग्राउंड पर बाबूजी ने वहाँ मना कर दिया था।

इन सभी पत्रों और उनके साथ आई फ़ोटोज़ को पहले बाबूजी अलीगढ़ डॉ शोभा के पास डाक से भेजते थे और डॉ शोभा अपनी सास साहिबा के कमेन्ट के साथ लौटाती थीं। जयपुर से आए एक फोटो पर डॉ शोभा की सास अर्थात के बी माथुर साहब की माताजी का रिमार्क मुझे बेहद बेहूदा लगा था कि -‘लड़की के कूल्हे भारी हैं’। मेरे बोलने की कहीं कोई गुंजाईश न थी अपने बारे मे ही मेरी कोई भूमिका नहीं थी।

आखिरी पत्र अजय के एक्सीडेंट के समय सहयोग देने वाले परिवार की बेटी की नन्द की बाबत है। पटना के मशहूर दवा व्यवसायी थे (के जी मेडिकल हाल वाले कृष्ण  गोपाल माथुर साहब ) जिनके यहाँ कई बार डकैती भी पड़ी और अंततः वे लोग पूना शिफ्ट हो गए। डॉ शोभा की सास ने यह कह कर रिजेक्ट कराया कि पटना का पानी खराब है वहाँ की लडकिया बीमार रहती हैं। नामनेर ,आगरा के वह माथुर साहब भी अब पूना शिफ्ट हो गए हैं किन्तु उस लड़की की शादी आगरा मे ही सेंट्रल बैंक के एक क्लर्क से उन्होने करा दी थी जो अब अधिकारी हैं। ये दोनों पति-पत्नी अपनी पुत्रियों की जन्मपत्रियाँ बनवाने  कमला नगर मेरे घर पर कई बार आए हैं।बड़ी बेटी के  विवाह हेतु मुझसे ही कुंडलियाँ भी मिलवाई हैं। रांची स्थित कोल इंडिया के रिटायर्ड डिप्टी चीफ सेक्यूरिटी आफ़ीसर आर पी माथुर साहब,विनीश जी के चाचा थे और मुझ से मित्रवत व्यवहार रखते थे। शालिनी व मुझे विनीश जी की पत्नी -ज्योति से उन्होने ही अपने घर पर परिचय करवाया था।

25 मार्च 1981 को शालिनी से एंगेज्मेंट के बाद कुक्कू की पत्नी मधू  के गाना गाने पर कमलेश बाबू ने स्टूल को तबला बना कर अपनी भतीजी के साथ संगत की थी। तमाम कारणों से तमाम को रिजेक्ट करने के बावजूद अंजाम क्या रहा ?डॉ रामनाथ ने भी शालिनी से 28 गुण मिलते बताए थे जब कि हकीकत मे 14 थे अर्थात नहीं मिलते थे (1981 तक मै खुद नहीं मिलाता था)। अब एहसास होता है कि कमलेश बाबू ने कुक्कू के जरिये डॉ रामनाथ को खरीदवा दिया था। डॉ रामनाथ ने पैसों के लालच मे प्रोफेशन और मेरे साथ विश्वासघात किया था।डॉ शोभा दूसरे कारणों से रिजेक्ट कराती रहीं तो भी बाबू जी डॉ राम नाथ के पास ज्योतिषीय जानकारी लेने हेतु जन्मपत्रियाँ भेजते थे। शालिनी की जन्मपत्री को छोड़ कर सभी मे उन्होने गुण नहीं मिलते बताया था। चूंकि बउआ -बाबूजी अपनी पुत्री-दामाद पर विश्वास करते रहे इसीलिए उन्हें विश्वासघात करना आसान रहा।(सब बातों का खुलासा गत वर्ष उनके लखनऊ आने पर हुआ और इसी डर से वे हमारे लखनऊ शिफ्ट करने का विरोध करते रहे थे)।

क्रमशः …….. 

 
 
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