RSS

Category Archives: गुरुशरण

आगरा/1994 -95 /भाग-18

…. जारी …..

हालांकि मै सी पी आई मे न होकर सपा मे था किन्तु सी पी आई नेता कामरेड किशन बाबू श्रीवास्तव से घरेलू आधार पर आना-जाना था। डॉ शोभा /कमलेश बाबू के उपद्रवकारी रुख-रुझान को देखते हुये मैंने पूनम के पिताजी से निवेदन किया था कि यदि पटना मे कोई दूसरा आपसे प्रोग्राम मे कोई तबदीली कराना चाहे तो आप का .किशन बाबू के अलावा किसी की बात न स्वीकार करें। सेंट्रल बैंक से रिटायर्ड बाबूजी के एक भांजे गुरुदेव शरण माथुर भी अक्सर घर आते रहते थे ले जाने की टीम मे वह भी शामिल थे। एन वक्त पर वह अपनी श्रीमतीजी को भी शामिल करना चाहते थे जिनकी मौसेरी बहन( के जी मेडिकल हाल वाले की बेटी ) ज्योति हैं। मैंने उनको भी शामिल नहीं किया और यह भी ठीक ही किया क्योंकि बाद मे पता चला कि गुरुशरण के बहनोई राकेश तो शरद मोहन के मौसेरे भाई थे। यह साहब भी शरद मोहन के भेदिया के तौर पर ही आते थे।

04 नवंबर को टूंडला से मगध एक्स्प्रेस पकड़ने हेतु प्रस्थान करना था ,08 बजे रात्रि तक घर छोड़ देना था उसी के अनुरूप डॉ शोभा और अशोक (बउआ के फूफा जी की बेटी सीता मौसी का बड़ा बेटा )को सूचित किया था ;कामरेड किशन बाबू समेत सभी यथोचित समय से पहुँच गए थे। रात का खाना और ट्रेन हेतु नाश्ता मैंने हलवाई से बनवा लिया था और डॉ शोभा के सुपुर्द कर दिया था । खाना तो डॉ साहिबा ने सब को खिला दिया था किन्तु नाश्ता जैसा का तैसा रखा रहा गाड़ी पटना काफी लेट पहुँचने के बावजूद किसी को नहीं दिया।

05 नवंबर को पटना जंक्शन  पर पूनम के भाई,चचेरे भाई और चाचा गण उपस्थित थे। सबसे परिचय ई ओ साहब (पूनम के ज्येष्ठ भ्राता) ने कराया। हेल्थ विभाग वाले उनके चाचा के पुत्र कारें ड्राईव कर रहे थे उनसे परिचय तब कराया जब ठहराने के होटल पहुँच गए। वहाँ स्नान करने के बाद चाय बिस्कुट हुआ। बालाघाट वाले सीनियर मेनेजर साहब ने नाश्ते हेतु आलू के पराठों का आर्डर दिया था लेकिन विलंब के कारण फिर केनसिल कर दिया। कुछ लोग गोल घर घूमने गए किन्तु कमलेश बाबू ने यशवन्त को वहाँ नहीं चढ़ने दिया। मै घूमना-फिरना पसंद न होने के कारण गया नहीं था।


आर्यसमाज पटना मे ही दिन का खाना भी खिलवाया गया जो वहाँ के घर वालों के लिए बना था और अच्छा था। मुहूर्त का वक्त हेल्थ विभाग वाले चाचा के इंतज़ार मे गुजार दिया गया और इल्जाम गाड़ी लेट होने पर लगाया गया। गाड़ी भी उन्हीं के कहने पर बदली गई थी फिर भी इल्जाम हम पर थोप दिया यह भी नहीं सोचा कि  सिर्फ मेरा नहीं खुद उनकी बेटी के भविष्य का भी प्रश्न है। पुरोहित ने जब हमारी ओर के किसी बड़े से हवन मे आहुती दिलवाने को कहा तब कमलेश बाबू ने गुरुशरण माथुर साहब को आगे कर दिया जबकि मै कामरेड किशन बाबू को आगे रखना चाहता था।

दिन की शादी के बावजूद लाईटिंग मे धन तबाह किया गया था रात को अपनी तरफ के लोगों को भोजन पर आमंत्रित किया था उनके दिखावे हेतु। सुना है भोजन रात का भी अच्छा था। दिन का खाना देर से खाने के कारण मुझे भूख नहीं थी उस पर पूनम की देहरादून वाली चाची ने (जिन्होने डॉ अस्थाना को जासूस बना कर भिजवाया था)एक-एक  डिनर प्लेट मे सब कुछ अगड़म-बगड़म कचरे की भांति भर कर मुझे व पूनम को थमा दिया था। जब खुद पूनम ने ही न खा कर प्लेट नीचे रख दी तब बिन भूख के मै कहाँ ठूँसता?इस प्रकार अन्न की बरबादी होते देख मन खिन्न हो गया। दिन मे फेरों के बाद भी पूनम की माता जी अपने लोगों के पैर छूने का आदेश दे रही थीं जबकि हम लोगों के रिवाज मे ऐसा नहीं है तब डॉ शोभा की चुप्पी पर भी मन खिन्न हो गया था। रीति-रिवाज पर चर्चा करने की बजाए वे लोग आगरा आने पर आलतू-फालतू बातें ही करते रहे थे। ऐन मौके पर फजीहत खड़ी कर रहे थे। मेरे ज्योतिषीय परामर्श को ठुकरा कर वे लोग 25 सितंबर प्रतिपदा के दिन पटना से चले थे नतीजतन लौट कर जब 29 सितंबर को पटना पहुंचे तो उन लोगों का स्कूटर रिक्शा आर ब्लाक के पास पलट गया था जिसमे सभी को चोटें आई थीं और इस घटना को अब बताया था पत्र मे सूचित नहीं किया था। इस घटना को आधार बना कर भी बालाघाट वाले मेनेजर साहब ने अपने चाचा-चाची के सहयोग से केनसिल कराने का भरसक प्रयास किया था किन्तु पूनम की दादी जी केनसिल नहीं करवाना चाहती थीं अतः किसी की न चल सकी।

रात को होटल चले गए । अगले दिन, दिन का खाना  घर पर  था । घर काफी बड़ा है वहीं एक दिन पूर्व का कार्यक्रम भी रखते तो काफी धन बर्बाद होने से बचा सकते थे। रात को गुरुदेवशरण ,कमलेश बाबू और डॉ शोभा के बीच क्या खिचरी पकी कि,गुरुदेवशरण ने पूनम के पिताजी से पूनम को होटल भेज कर कोई रस्म करवाने को कहा। अजीब बात थी जब आर्यसमाज विधि -वेदिक पद्धती अपनाई थी तो दक़ियानूसी रस्म का सवाल कहाँ था?और फिर 1981 मे मेरे वक्त और 1988 मे अजय की शादी के वक्त खुद बाबूजी ने वह रसमे नहीं की थीं तो अब उनके न रहने पर उनके स्थान पर गुरुशरण या कमलेश बाबू कैसे उन रस्मों को कर सकते थे?परंतु पूनम के पिताजी पर तो कमलेश बाबू का ऐसा जादू चढ़ा था कि वह बोले कि वह ठीक कह रहे हैं। बड़ी मुश्किल से मैंने कामरेड किशन बाबू की मदद से उन्हें बेमतलब की कुराफ़ात न करने पर राज़ी किया। मै पहले रेजिस्टर्ड पत्र मे लिखित मे कह चुका था कि कोई भी परिवर्तन मेरे या कामरेड किशन बाबू की जानकारी बगैर नहीं होगा परंतु उनकी बुद्धि शायद कमलेश बाबू ने उन्हें टोटके की सिगरेट पिला कर जाम कर दी थी। बात न चल पाने से रुष्ट होकर गुरुदेवशरण अपने मौसिया श्वसुर साहब के घर पटना सिटी खाने चले गए और इनके खाने का बहिष्कार कर दिया। घर पर खाना चलताऊ था जो पूनम के चाचाओं की पसंद का था और सुधा डेरी का खट्टा-मीठा दही भी एक चाचा का करिश्मा था जो उनके अपने घर वालों को नसीब भी न हुआ।

पहले उन लोगों ने तय किया था कि सब को होटल भेज देंगे और वहाँ से लौटने की ट्रेन पर बैठा देंगे। फिर प्रोग्राम चेंज करके होटल से सबका सामान घर मँगवा लिया और घर से विदा करने का निर्णय हुआ। गुरुशरण अड़े थे कि वह होटल से ही जाएँगे जबकि ये लोग होटल खाली करना चाहते थे। एक बार फिर कामरेड किशन बाबू को संकटमोचक बना कर उनके पास भेजा जो उन्हें सामान समेत घर पर लाये। पूनम के पिताजी गुरुशरण की खुशामद दर खुशामद करें कि खाना खा लें या कम से कम एक रसगुल्ला खा लें और वह आड़े -तिरछे मटकते नो-नो करते रहे।  अंततः मुझे  ई ओ साहब से कहना पड़ा कि अपने पिताजी को समझाएँ  कि अड़ियल टट्टू की खुशामद न करे। तब जा कर वह ड्रामा बंद हुआ।

इन लोगों ने रात के खाने के पेकेट हर व्यक्ति के लिए बना कर डॉ शोभा को सौंप दिये थे और मिठाई एकमुश्त दे  दी थी। ट्रेन मे डॉ शोभा ने सबको खाने के पेकेट पकड़ा दिये और मिठाई किसी को न दी। हर पेकेट मे आठ- आठ पूरियाँ और दो-दो साबुत बेंगन भी थे। अधिकांश ने खाना फेंका। खाना पूनम की सबसे छोटी चाची ने पेक किया था । छोटा-खोटा का सूत्र यहाँ भी लागू हुआ। कामरेड किशन बाबू मुगल सराय पर उतर गए उन्हें वाराणासी कुछ काम था। बाद मे उनकी बीमार पत्नी कामरेड मंजू श्रीवास्तव ने बताया था कि स्टेशन पर खाना किसी गरीब को देकर किशन बाबू ने स्टेशन के बाहर मिठाई खरीद कर खाई तब जाकर उनकी तबीयत ठीक हुई। जो मिठाई रास्ते के लिए दी गई थी यदि डॉ शोभा सबको दे देती तो यह शिकायत न  सुननी पड़ती।

स्टेशन रवाना होने से पूर्व पूनम की माँ जी ने मुझसे कहा कि आइये आपको अपनी सासू माँ से भी मिलवा दें। वह पूनम व मुझे लेकर दादी जी जो बीमार थीं और बिस्तर पर थी के पास ले गई। सम्पूर्ण परिवार मे वयोवृद्ध दादी जी के व्यवहार को ही अच्छा कहा जा सकता है। वही आत्मीयता से बोलीं। पूनम को भी अच्छी सीख दी।वस्तुतः बचपन मे पूनम अपनी दादी  जी के पास माँ-पिता को छोड़ अकेले रही भी हैं  इसलिए भी वह विशेष मानती रही होंगी।

क्रमशः ….. 

 

आगरा /1990-91 (भाग-8 )

इन दिनों विहिप आदि का रामजन्मभूमि आंदोलन भी ज़ोरों पर था। शिला पूजन आदि के नाम पर धन बटोरा जा रहा था विद्वेष भड़काया जा रहा था। ‘मंटोला’ क्षेत्र मे पी ए सी के माध्यम से तत्कालीन एस एस पी कर्मजीत सिंह घरों से निवासियों को खदेड़ने मे कामयाब रहे थे। वह कल्याण सिंह के चहेते थे बाद मे मायावती के चहेते बन कर डी जी पी बने। हमारी पार्टी भाकपा ‘सांप्रदायिकता विरोधी’ अभियान चलाती रहती थी ,अक्सर जिला मंत्री मिश्रा जी मुझ से भी विचार व्यक्त करने को कहते थे। मै संत कबीर के दोहों के माध्यम से अपनी बात सिद्ध करता था जो उन्हें तब पसंद आता था और वह भी कभी-कभी ऐसा ही करते थे।

इन्ही वर्षों के लगभग ‘पनवारी’ नामक गाँव मे एक दलित को घोड़ी पर चढ़ कर बारात निकालने से रोकने हेतु जातीय संघर्ष भी हुआ था। (सन ठीक से याद नहीं है)। कमलानगर मे भी कर्फ़्यू लागू था। बउआ -बाबूजी उस समय फरीदाबाद मे अजय के पास थे। एक दिन शरद की बड़ी बेटी मेरे साथ साइकिल पर बैठ कर आ गई थी। सुबह शालिनी ने ही सिटी पर मिलते आने को कहा था। दिन मे उन्हें बुखार चढ़ गया था ,शाम को खाना बनाने का विचार नहीं था परंतु भतीजी के अचानक आ जाने पर बनाना पड़ा हालांकि वह 4या 5 वर्ष की ही रही होगी। जब कर्फ़्यू लगा उस समय वह हमारे घर थी। दो दिन के बाद पहुंचाने का वादा कर्फ़्यू ने पूरा नहीं होने दिया। शरद के एक मौसेरे भाई आशुतोष मेडिकल कालेज मे शायद तब हाउस जाब कर रहे थे ,एक दोपहर आकर अपने स्कूटर से शरद की बेटी को ले गए । डॉ होने के नाते वह बिना पास के आ-जा सकते थे। अपने हास्टल से सिटी क्वार्टर पहुंचे उन लोगों का हाल-चाल लेने तो उनकी भाभी संगीता ने अपनी बेटी को ले आने को उनसे कहा था।

कर्फ़्यू समाप्त होने के काफी बाद एक दिन राज कुमार शर्मा जी (सप्तदिवा वाले विजय जी के बड़े भाई) एक और सज्जन के साथ यों ही मिलने चले आए थे। वह हमारी विचार -धारा से परिचित थे फिर भी बोले कि परंपरा तोड़ कर दलितों को बारात नहीं निकालनी चाहिए थी। पढे-लिखे सहायक अभियंता जी साईन्स साईड के थे फिर भी अवैज्ञानिक बातों के जरिये पोंगावाद का समर्थन कर रहे थे। वस्तुतः अमीर लोग गरीबों को ऊपर उठते नहीं देख सकते बल्कि उन्हें कुचले रखना चाहते हैं इसीलिए जातिवाद का समर्थन करते हैं।

लगभग यही धारणा शरद और उनकी माँ की भी थी। घर मे भी उनके यहाँ दकियानूस वाद  ही हावी था। संगीता को फिर रेलवे अस्पताल मे इलाज नहीं कराया जबकि फ्री होता। मेडीकल कालेज मे फेफड़ों की टी बी बताया गया और फेफड़ों से इंजेक्शन के जरिये पानी निकाला जाता था। एक दिन शालिनी सुबह मेरे साथ ड्यूटी जाने के समय यशवन्त को लेकर चलीं और सिटी क्वार्टर पर रुक गई। शाम को उन्हे लेने गया तो पता चला कि शरद टाईम न होने के नाम पर अपनी पत्नी को मेडीकल कालेज ड्यू टाईम पर नही ले गए थे। अतः उन लोगों ने शालिनी से कहा था कि अगले दिन ड्यूटी जाने से पहले मै संगीता को उनकी सास के साथ मेडीकल कालेज ले चलूँ और फेफड़ों से पानी निकाले  जाने के बाद अपनी ड्यूटी चला जाऊ और वे लोग अपने घर लौट आएंगे। मन  मे बुरा तो यह लगा कि जब संगीता के कहने पर डॉ रामनाथ को बुला लाया था तो झांसी से योगेन्द्र को बुला कर रेलवे अस्पताल भेज दिया था और मेरा समय बेवजह खराब करा दिया था तो अब मै साथ चलने से इंकार कर दूँ ।फेफड़ों मे भरा पानी पीठ की किसी नस से सीरिञ्ज द्वारा खींच कर निकाला जाता था।

 परंतु सब को मदद करने की आदत के कारण हामी भर दी और वादा भी निभाया।अतीत मे अजय की शादी और यशवन्त के जन्मदिन कार्यक्रम मे छोले -भटूरे बनाने का  शालिनी से  वायदा करके भी संगीता ने पूरा नहीं किया था। तब भी शालिनी की तमन्ना रहती थी कि मै उनकी भाभी को मदद कर दूँ। कभी तो शालिनी संगीता के असंगत व्यवहार पर उनमे बचपना होने की बात कह देती थीं जबकि उस समय खुद संगीता दो बच्चियों की माँ थीं। कभी -कभी खुद शालिनी को ही संगीता का व्यवहार पीड़ा पहुंचाता था। यो ही एक बार दिन मे यशवन्त को लेकर वह सिटी के क्वार्टर पर रुक गई थीं। शाम को दुकान से लौटते मे मै बुलाने गया था।चाय देने के बाद संगीता ने पूछा कि आपने मजेदार खबर सुनी है?उन लोगों के यहाँ ‘अमर उजाला’ आता था जो क्रिमिनल खबरें ज्यादा छापता था। दुकान पर ‘पंजाब केसरी’ आता था वहीं पढ़ लेता था ,घर पर नहीं लेता था। बाकी अखबार पार्टी (भाकपा)आफिस पर पढ़ लेता था। उस दिन पार्टी आफिस न जाकर वहाँ मौजूद था लिहाजा मै उस समाचार से बेखबर था। फिर खुद ही संगीता ने अखबार से वह खबर पढ़ कर सुनाई -दिल्ली मे आमने -सामने रहने वाले दो दम्पतियों के रोमांस की खबर को चटक ढंग से छापा गया था। एक परिवार का पुरुष दूसरे परिवार की महिला को लेकर नैनीताल मे गुलछर्रे उड़ाने गया था ,वह महिला अपने पति को झूठ बोल कर पीहर जाने के नाम पर पडौसी के संग गई थी। उसके पति ने सोचा कि पड़ौसन अकेली है उसका पति भी नहीं है वह उसे लेकर नैनीताल पहुँच गया। दोनों अलग-अलग होटलों मे ठहर कर एक -दूसरे की बीबियों के साथ मौज-मस्ती करते रहे। एक शाम दोनों अपनी-अपनी पड़ौसनो के साथ  विपरीत दिशा से घूमते हुये आमने-सामने आ गए और एक-दूसरे का कालर पकड़ कर मार-धाड़ करने लगे। भीड़ मे लोगो  ने उन्हें छुड़ा कर अपनी-अपनी बीबियों के साथ चुप-चाप चले जाने को कहा और चेतावनी दी कि यदि लड़े तो पुलिस को सौंप दिया जाएगा। इस खबर को जिस खुशी और मस्ती से संगीता ने पढ़ा था शालिनी को बुरा लगा होगा ,वहाँ तो चुप रहीं घर आकर मुझसे बोलीं दिन मे उन्हें बताया तो ठीक था परंतु उस खबर को मुझे इस अंदाज मे क्यों सुना रहीं थीं क्या वह मेरी पत्नी थीं। मैंने उन्हें जवाब दिया तुम्ही  समझो अपनी भाभी की बड़ी तरफदारी करती हो वह क्या हैं?उनमे बचपना है?या आवारगी?

‘पनवारी कांड ‘के कर्फ़्यू के दौरान ही गुरुशरण भाई साहब की बेटी की शादी भी पड़ी। लड़के वालों के बारात लाने से इंकार करने के कारण उन्होने दिल्ली जाकर शादी की  थी। शामिल न हो सके थे। अतः जब उनकी बेटी पीहर आई तो उन्होने सूचित किया कि शैली आई है। हम लोगों ने उनके घर जाकर अपनी हैसियत के अनुसार शैली को रु 21/- भेंट कर दिये।

हमने कभी बदले की आकांक्षा नहीं रखी और अपनी तरफ से सदा संबंध मधुर बनाए रखने का प्रयास किया जिसे मेरी कमजोरी समझा गया।

 
 
%d bloggers like this: