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Category Archives: गोविंद बिहारी

आगरा/1994 -95 /भाग-12 (बउआ के निधन के बाद )

…. पिछले अंक से जारी……

बाबूजी के निधन के 12 दिन बाद ही बउआ का भी निधन हो गया था। 23 तारीख को अजय फरीदाबाद मेरे रुके रहने को कहने के बावजूद चले गए थे। वहाँ अटेची खोली भी नहीं थी ,अपने काम पर भी नही गए थे कि पुनः लौटना पड़ा। थकान या सदमा जो भी हो उनकी तबीयत गड़बड़ा गई,बुखार भी हो गया,बेहद कमजोरी हो गई। डॉ की दवा लेनी पड़ी। उठना बैठना भी मुश्किल हो गया था। अजय के छोटे वाले साले नरेंद्र मोहन (जो वैसे उनकी पत्नी से बड़े ही हैं और जिनकी पत्नी कमलेश बाबू की ममेरी बहन हैं )मिलने और शोक व्यक्त करने आए । उन्होने अपनी कार से फरीदाबाद अजय को छोड़ आने का प्रस्ताव रखा क्योंकि रेल का सफर करने की अजय की हिम्मत नहीं थी। किन्तु स्वाभिमान के चलते अजय ने उनकी पेशकश को नामंज़ूर कर दिया। डॉ शोभा और कमलेश बाबू की गैर हाजिरी मे तो अजय की श्रीमती जी का व्यवहार ठीक ही था,वही खाना -नाश्ता देखती थीं और स्कूल खुल जाने पर यशवन्त के समय से भी तैयार कर देती थी।

चूंकि मैंने  बाबूजी और बउआ के न रहने पर दोनों बार पोस्ट कार्ड पर सब को सूचना दी थी अतः लगातार दो मौतों के बाद कुछ लोगों ने पोस्ट कार्ड पर संवेदना भेजी थी जिनमे बाराबंकी से  सपा नेता कामरेड रामचन्द्र  बक्श सिंह का भी पोस्ट कार्ड था और आगरा से शरद मोहन माथुर का भी। ग्वालियर से अजय के साले साहब आए थे और उनके एक दो दिन बाद देहरादून से हमारी माईंजी भी शाम के वक्त 12 घंटे का बस का सफर करके पहुँचीं थीं। अगले दिन माईंजी ने कहा कि वह पीपल मंडी स्थित अपनी एक रिश्ते की बहन के यहाँ भी शोक व्यक्त करने जाएंगी जिनके पति बैकुंठ नाथ माथुर का कुछ समय पूर्व जबर्दस्त हार्ट अटेक से देहांत हो गया था। इन माथुर साहब से मेरा पूर्व परिचय था और मै उनके घर जा चुका था। माईंजी ने मुझसे साथ चलने को कहा तब यशवन्त स्कूल मे था।

चलते समय मैंने अपने साथ कुछ अतिरिक्त रुपए रख लिए लेकिन माईंजी ने कहा कि उनके साथ जाने पर मुझे रुपए खर्च करने नहीं हैं अतः न रखू।परंतु मै एहतियातन वे रुपए ले ही गया। बैकुंठ नाथ जी  के घर काफी देर माईंजी की अपनी बहन से बात हुई। चलते समय वह अपना पर्स उठाना भूल गईं। पीपल मंडी तिराहे पर आकर माईंजी ने कहा कि रानी जी के यहाँ भी मिल लेते हैं उनका घर भी माईंजी का देखा हुआ नहीं था और रास्ते से उन्हें अकेला छोडना उचित भी न था अतः मुझे मजबूरन जाना ही पड़ा। माईंजी ने अपनी फुफेरी नन्द के घर के लिए आम आदि फल ले लिए और जब रुपए देने के लिए पर्स चाहा तो था ही नहीं। तब बोलीं कि विजय हमारा पर्स तो वहीं छूट गया लगता है अब तुम्ही पैसे दे दो घर चल कर तुम्हारा सब हिसाब कर देंगे। मैंने कहा माईंजी वह तो कोई बात नहीं यदि मैंने सुबह आप की बात मानी होती तब इस समय मै भी खाली हाथ होता। उनको कहना पड़ा हाँ तुमने रुपए रख कर ठीक ही किया। फिर रिक्शा आदि सब जगह मै ही रुपए देता रहा।

चूंकि मै गोविंद बिहारी मौसा जी (अलीगढ़ रिश्ते के कमलेश बाबू के चाचा ) के घर जाना बंद कर चुका था अतः बगल के घर मे नवीन के बारामदे मे बैठ गया। जब रानी मौसी चाय लाई तब माईंजी से उन्होने मुझे भी बुलवा लिया। माईंजी के लिहाज पर मुझे रानी मौसी के घर चाय पीनी पड़ गई। माईंजी के काफी बुलाने पर भी गोविंद बिहारी मौसा जी बाहर माईंजी से नमस्ते तक करने न आए। माईंजी ने रानी मौसी से पूछा कि गोविंद बिहारी अगर पर्दा न करते हो तो वही उनसे अंदर नमस्ते कर आयें। झेंप कर रानी मौसी को फिर माईंजी को घर के अंदर ले ही जाना पड़ा। झेंप दूर करने के लिए ही तब मौसा जी ने माईंजी को खाना खा कर जाने को कहा। जब अंदर खाना टेबुल पर लग गया और उन लोगों ने मुझे बाहर के कमरे से नहीं बुलवाया तो माईंजी खुद उठ कर आईं और मुझसे चल कर खाने को कहा मेरे इंकार करने पर माईंजी ने आदेशात्मक स्वर मे मुझे एक ही रोटी खा लेने को कहा। अपनी शादी से पहले ही माईंजी मुझे जब मै कोई सवा या डेढ़ साल का था अपनी बहनो व भाइयो से अपने पास बुला कर सारा-सारा दिन रखती थीं उनकी बात गिरा कर तौहीन करना मेरे लिए मुमकिन न था अतः अपमान का कड़ुवा घूंट पीकर उनके साथ गया तो गोविंद बिहारी मौसा जी को भी नमस्ते किया जिसका उन्होने कोई रिस्पांस नहीं दिया और माईंजी ने खुद देख भी लिया। हालांकि रानी मौसी ने नमस्ते का उत्तर दे दिया था।

माईंजी ने एक नंबर देकर कई बार विष्णू को देहरादून फोन करवाया और वहाँ कोई और मिलता रहा पैसे बर्बाद जाते रहे। रानी मौसी के घर से चलने पर माईंजी ने पहले उनके एक भाई के घर हंटले हाउस रुकने को कहा। उन दो भाइयों मे से एक माईंजी की पीपल मंडी वाली बहन के घर गए हुये थे जो उनकी सगी बहन थीं । अतः माईंजी ने फोन पर बात करके उनसे अपना पर्स लेते आने को कहा। माईंजी को तब तक रुकना था। मैंने कहा यदि आप बुरा न माने तो मै चला जाऊ ,यशवन्त आ चुका होगा और वह परेशान होगा। माईंजी ने मुझे इजाजत दे दी और जब मै घर पहुंचा तो पाया कि अजय और उनकी श्रीमतीजी की खुशामदें करने के बावजूद यशवन्त ने खाना नहीं खाया था -भूखा था। उसने अपने चाचा-चाची से एक ही जिद लगा रखी थी कि जब तक पापा नही लौट आएंगे खाना नहीं खाऊँगा। उसने छोटी बहन से उनके द्वारा कहलवाए जाने पर भी खाना नहीं खाया था।

अजय की श्रीमती जी ने कहा कि अब शाम हो गई है यशवन्त को सुबह का खाना नहीं देंगे ,उन्होने जल्दी-जल्दी उसके लिए ताज़ी सब्जी बना कर पराँठे सेंक दिये तब उसने खाना खाया। सुनने पर माईंजी को खेद भी हुआ । उन्हें उनके भाई पी सी माथुर साहब घर के पास चौराहे पर छोड़ कर चले गए थे। रात को माईंजी ने दिन भर का सारा खर्च जोड़ कर रुपए 350/- मुझे लौटा दिये। ….. 

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आगरा/1994 -95 / (भाग-7)

गतांक से आगे ……

अजय को फरीदाबाद लौटना था वह भी प्राईवेट जाब तब छोड़ कर किसी के साझे मे अपना काम कर रहे थे,कितना नुकसान उठाते अतः आर्यसमाँजी पद्धति से हवन कराने का निर्णय बाबूजी ने लिया। कमला नगर आर्यसमाज मे उस समय कोई पुरोहित न था अतः वहाँ से पता करके उनके सेक्रेटरी के घर अजय गए जहां सेक्रेटरी साहब तो नहीं मिले किन्तु उनकी पत्नी ने सामग्री लिखवा दी और दिये समय पर पुरोहित भिजवाने का आश्वासन दे दिया। निर्धारित दिन और समय पर हवन कुंड और समिधा लेकर हींग -की -मंडी आर्यसमाज के पुरोहित अशोक शास्त्री जी पहुँच गए। विधानपूर्वक उन्होने शांति हवन करा दिया। जो दक्षिणा  बाबूजी  ने उन्हें दी बिना किसी हुज्जत के उन्होने स्वीकार कर ली। बल्कि जो साड़ी और बर्तन बाबूजी ने अजय से उन्हें देने के लिए मँगवाए थे वे भी लेने से उन्होने यह कह कर मना कर दिया कि न उसका कोई औचित्य है न ही आर्यसमाज मे चलता है। उनका कहना था आपको देना है तो किसी और पंडित को दे दें। बड़ी मुश्किल से बाबूजी और अजय ने उन्हें वे चीजें ले जाने को यह कह कर राजी किया कि आप ही जिसे चाहे दे दें।

अजय की बेटी अनुमिता तब पौने पाँच वर्ष की थी हवन के बाद बोली ताऊजी क्या आप हमे मोपेड़ पर नहीं घुमा सकते हैं?लिहाजा उसे बैठा कर थोड़ा आगे ही बढ़े थे कि उसने कह दिया बस घूमना हो गया अब वापिस चलिए। मुझे जानकारी नहीं थी किन्तु यशवन्त ने बताया कि मम्मी की इच्छा अनुमिता को एक फ़्राक देने की थी अब वह नहीं हैं इसलिए आप दिला दीजिये। तुरंत कुछ खरीदने-देने की मेरी इच्छा तो नहीं थी परंतु यशवन्त की इच्छा को देखते हुये उसी की पसंद की एक फ़्राक जिसे उस बच्ची ने भी पसंद किया ले दी जिसे यशवन्त ने ही अपनी चाची को सौंपा। फ़्राक को तो यशवन्त ने बताया था कि मम्मी देना चाहती थीं उनकी इच्छा को पूरा करने के लिए दी है उसे तो उन लोगों ने स्वीकार कर लिया। किन्तु यशवन्त अपनी तरफ से रु 4/- का हारलिक्स बिस्कुट का एक पैकेट और डेढ़ रुपया अपनी बहन को दे रहा था जिसे उस बच्ची ने ले भी लिया था। अजय ने पैसे उससे छीन कर उछाल दिये और बिस्कुट का पैकेट लौटा देने को कहा ,मन मसोस कर बच्ची ने रख दिया। यशवन्त को बहुत बुरा लगा और वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसे रोता छोड़ कर वे लोग रवाना हो गए। मुझे बेहद ताज्जुब हुआ और धक्का भी लगा परंतु कर क्या सकता था?यशवन्त को ही बेमन से डांट दिया। बउआ -बाबूजी अजय से कुछ नहीं बोले यह बात भी समझ से परे थी।

डॉ रामनाथ, विजय शर्मा (सप्तदीवा साप्ताहिक के सम्पादक) और आस-पास के लोग 13 वी न करके आर्यसमाज से हवन कराने पर बिदक गए। गोविंद बिहारी मौसा जी (रानी मौसी के पति एवं अलीगढ़ के रिश्ते से  कमलेश बाबू के चाचा ) ने अपने घर पर मुझसे कहा कि -“तेरवी न करके जीजाजी ने अपना मुंह काला करवाया है,वह कबसे आर्यसमाजी हो गए?”

मुझे तो उनकी बात तीखी चुभी ही थी और मैंने इस दिन के बाद  उनके घर जाना छोड़ दिया और मन मे सोचा कि आपके जीजाजी (साढू) भले ही आर्यसमजी न हुये पर मै होके दिखाऊँगा। बउआ को भी छोटे फुफेरे बहनोई द्वारा अपने पति की तौहीन बेहद बुरी लगी। उन्होने बताया कि उनके फूफा जी ने उनकी भुआ (अर्थात गोविंद बिहारी जी के श्वसुर साहब ने उनकी सास )  के न रहने पर 5 दिन भी नहीं केवल 3 दिन बाद ही आर्यसमाज से हवन कराया था।मैंने एक पत्र भेज कर उनसे पूछा कि हमारे बाबूजी के बारे मे तो आपने तपाक से कह दिया कि अपना मुंह काला करवाया जो तेरवी न की तो आप अपने श्वसुर साहब के लिए क्या कहना चाहेंगे? रानी मौसी भी इस विषय पर अपने पिता को गलत नहीं ठहरा सकती थीं जबकि उनके सामने ही उनके पति ने मेरे पिता को गलत ठहरा दिया था।

इससे पूर्व गोविंद बिहारी मौसा जी के ही कहने पर मै कई बार यशवन्त को लेकर राजा-की-मंडी क्वार्टर पर गया था। किन्तु वे लोग उपेक्षित व्यवहार उसके साथ भी कर रहे थे। गोविंद बिहारी मौसा जी ने कहा था कि उनके कहने से एक बार और ले जाऊँ उस दिन शरद मोहन का आफ था वह घर पर थे किन्तु तुरंत ड्रेस पहन कर स्टेशन रवाना हो गए उनकी माता जी सोने चली गई और उनकी पत्नी ने अपनी पुत्रियों को रंग – ड्राइंग कापियाँ दे कर अलग कमरे मे बैठा दिया। लिहाजा मै यशवन्त को लेकर फ़ौरन सीधे अर्जुन नगर रानी मौसी के घर यह तथ्य बताने गया। तभी उन्होने तेरवी न करके आर्यसमाजी हवन कराने पर आपत्ति जताई थी। उसी दिन के बाद से गोविंद बिहारी मौसा जी के साथ-साथ शरद मोहन के घर भी जाना बंद कर दिया। 

 

आगरा /1990-91 (भाग- 7 )

गोविंद बिहारी मौसा जी (बउआ की फुफेरी बहन रानी मौसी के पति) जो कमलेश बाबू के चाचा के मित्र होने के कारण उनके चाचा भी हुये अपनी भतीजी की शादी शरद मोहन,पार्सल बाबू से करवाना चाहते थे। वह और मौसी स्कूटर पर बैठ कर टूंडला भी गए थे। परंतु शरद की माता जी ने उन दोनों को हमारे रिश्ते को ध्यान मे रखते हुये रु 11/-11/-देकर बिदा कर दिया था और शरद की शादी अलवर की काली पप्पी  अर्थात संगीता से कर दी। वह मुझ से तब से विशेष चिढ़ गए थे। उन्होने यह नहीं सोचा कि मै किस हैसियत से उन लोगों को बाध्य कर सकता था। 1990-91 मे आर एस एस की हलचलें तथा जार्ज बुश का तांडव बढ्ने का उनके दिमाग पर पूरा-पूरा असर था। उन्होने मुझे सद्दाम हुसैन कहना शुरू कर दिया था। अतः मैंने भी उनके घर जाना कम कर दिया था।

संगीता ने बाद मे बताया था कि जहां उनकी भतीजी की शादी हुई थी वहाँ से तलाक भी हो गया था। वह लड़का संगीता के पीहर वालों मे था। रानी मौसी की बड़ी भतीजी की एक नन्द की शादी शरद के मौसेरे भाई से हुई थी,उसका भी तलाक हो गया था। गोविंद बिहारी मौसाजी अपनी बड़ी साली को इंदिरा गांधी कह कर मज़ाक उड़ाने लगे थे। जबकि सीता मौसी का व्यवहार तो रानी मौसी से बहौत ज्यादा अच्छा था। इसलिए कई बार दोनों का घर अगल-बगल होते हुये भी केवल सीता मौसी के घर से लौट आते थे और रानी मौसी के घर नहीं जाते थे।

तारीख तो अब ठीक से ध्यान नहीं परंतु इन्हीं दिनों सेठ जी ने भी अपने ‘भरतपुर हाउस’मे बने नए मकान का गृह प्रवेश किया था। मुझे सुबह आठ बजे से वहाँ बुला लिया था दूसरे कर्मचारियों के साथ ही। उनकी पूजा समाप्त होने के बाद उनके कहने पर मैंने भी लोगों को प्रशाद के दोने उठा-उठा कर दिये थे। गर्मी का मौसम था। एक ग्लास पानी को भी उनके यहाँ किसी ने नहीं पूंछा। न ही प्रशाद लेने को किसी ने कहा ,वैसे भी मुझे ढ़ोंगी प्रशाद मे दिलचस्पी नहीं थी,उल्लेख तो उनका शिष्टाचार जतलाने हेतु किया है। जब दोपहर  मे भोजन प्रारम्भ हुआ तो मै चुप-चाप घर चला आया,मुझ से तो उन्होने भोजन का न पहले जिक्र किया था न उस दिन जबकि सुबह से बुला लिया था। बाद मे दुकान पर बोले कि,बिना खाना खाये क्यों चले आए? मैंने भी स्पष्ट कह दिया आपने खाने को कब कहा था? दूसरे कर्मचारी कह रहे थे कि खाने को तो उनसे भी नहीं कहा था पर वे खा आए। सबकी बात मै नहीं जानता परंतु मै कभी भी दूसरों के घर खाना-नाश्ता के फेर मे नहीं पड़ता। यदि मुझे विशेष तौर पर कहा जाता है तभी गौर करता हूँ वरना नही।काम की जानकारी होने और मजबूत पकड़ के कारण दुकान पर तो मै अपने हिसाब से काम कर लेता था और उसी समय मे कटौती करके भाकपा की गतिविधियों मे भाग ले लेता था और वह चुप रह जाते थे,परंतु अब घर पर मौका था कि वह अमीरी-गरीबी के भेद को स्पष्ट करते सो उन्होने कर दिखाया।

क्रमशः…..

 
 
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