RSS

Category Archives: जन्मदिन

आगरा/1988 -89 (भाग-3 )-मुजफ्फरनगर यात्रा

दुकानों की नौकरी मे और तो कोई परेशानी नहीं थी परंतु वेतन अपर्याप्त था। अतः यदा-कदा बेहतर नौकरी के लिए प्रयास करते रहते थे। चूंकि होटल अकाउंट्स का साढ़े नौ वर्ष का अनुभव था  सहारनपुर के एक नए  होटल के लिए आवेदन कर दिया था। भूल भी चुके थे ,वहाँ से इनटरवीयू काल आ गया। निश्चित तिथि से एक दिन पहले मुजफ्फरनगर कुक्कू के यहाँ चले गए क्योंकि वह बेहद बुलाते रहते थे और रास्ते मे उनका शहर पड़ रहा था। हालांकि कूकू की माता जी नहीं चाहती थीं कि मै उनके घर जाऊ। यह भी एक कारण रहा उनके घर जरूर जाने का । लगभग ढाई-तीन बजे कूकू साहब के घर गांधी कालोनी पहुंचा था। उनका आफिस पास ही था अतः उनकी श्रीमती जी ने नेहा और शिवम को उनके दफ्तर भेजा ,वह वहाँ नहीं थे किसी साईट पर गए हुये थे, अतः दोबारा उन दोनों को भेज कर आफिस से उन्हें फोन कराने को कहा और उन्हें गर्म समौसे लाने को भी कह दिया।

औपचारिक हाल चाल पूछ कर कूकू साहब की श्रीमती जी (हमारे बहनोई कमलेश बाबू की भतीजी जैसा अब 2011 मे उनसे  पता चल पाया) ने अपनी सास साहिबा की करामात का बखान कर डाला क्योंकि वह जानती थी कि मै पहले ही उनसे नाखुश हूँ अतः उन्हें कोई भय नहीं था। उन्होने आप बीती जो घटना बताई वह हृदय विदारक है। उन्होने बताया कि उनकी सास जी ने उनके रेलवे वाले देवर शरद मोहन माथुर की मार्फत षड्यंत्र करके उन्हें दोनों बच्चों समेत मारने की हिमाकत की थी। उनके अनुसार टूंडला वाली बुढिया से उनके विरुद्ध टोटका करवाकर उनका दिमाग अस्त-व्यस्त कर दिया गया था जिससे वह बच्चों को लेकर विपरीत दिशा की ट्रेन मे बैठ कर चली गई। कूकू जब टिकट लेकर आए तो उन लोगों को नहीं पाया और चूंकि कूकू तथा उनकी पत्नी मधु दोनों के पिता रेलवे के थे वह तमाम नियमों आदि से परिचित थे। काफी दौड़-धूप के बाद उन्होने मधु को बच्चों समेत बरामद कर लिया। परंतु सारा सामान गायब हो गया जिसमे वह गहना भी था जिसे वह संगीता (मधु की देवरानी) की कस्टडी से ले कर आ रही थीं। उनका शक था शरद मोहन ने ही अपने रेलवे साथियों की मदद से सब सामान पार कर दिया है। (1982 मे कूकू ने अपनी माँ के साथ मुझ पर उसी टूँड़ला वाली बुढ़िया से कुछ करवाया था जो मै आगरा मे बस से उतरते समय गिर कर घायल हुआ था और डा राजेन्द्र कुमार टंडन ने इलाज के साथ पुलिस को फोन करना चाहा था किन्तु बाबूजी ने रोक दिया था ,इस का जिक्र पहले हो चुका है)। बड़ी जल्दी कूकू की पत्नी पर उन्ही के छोटे भाई द्वारा वही षड्यंत्र किया गया जैसा उन्होने अपनी माँ के इशारे पर मेरे साथ किया था। प्रकृति मे देर है पर अंधेर नहीं मैंने मन मे सोचा किन्तु मधु को दिये आश्वासन  के अनुसार किसी से इस घटना का जिक्र नहीं किया। 

अगले दिन कूकू साहब मेरे साथ बस से सहारनपुर भी गए उन्होने सहारनपुर साईट का टूर लगा लिया था। आने-जाने का बस का टिकट मेरा भी उन्ही ने लिया मुझे नहीं लेने दिया। होटल मे मेरा एपोइनमेंट रु 1300/- वेतन पर किया गया मैंने रु 1500/- मांगे थे अतः मैंने ज्वाइनिंग से इंकार कर दिया। लच होटल की तरफ से सभी उम्मीदवारों को कराया गया था। कूकू साहब मुझसे कह कर गए थे उन्ही के साथ लौटूँ अतः उनके इंतजार मे आस-पास ऐसे ही घूम लिया।

मै अपने साथ जो साबुन नहाने व कपड़ा धोने के तथा सिर मे डालने हेतु जो तेल ले गया था उन्हें मधु ने अपने पास रख कर अपने घर से नया साबुन इत्यादि दिया। लौटते मे मेरा सामान मेरे सुपुर्द कर दिया। अतिथि सत्कार मे वह अपनी सास के मुक़ाबले काफी चौकस रहीं जबकि उनकी सास उन्हें पगली कहती थीं। बातचीत मे यह बात मालूम होकर कि शरद की छोटी बेटी का पहला  जन्मदिन पहली मई को अर्थात पंद्रह दिन बाद पड़ रहा है। कूकू साहब ने रात के भोजन के बाद सबको घूमने ले चल कर क्राकरी वाले ,भोजन वाले इत्यादि को एडवांस दे दिया और अपने घर अपनी भतीजी का पहला जन्मदिन मनाने का निर्णय किया। मेरे सामने तो उनकी पत्नी मधु ने खुशी -खुशी उनका समर्थन और साथ दिया था बावजूद इसके कि उनके मन मे शरद और संगीता के प्रति घृणा भाव था। कूकू साहब ने मुझसे कहा था वह पत्र अपनी माता को डाक से भेज रहे हैं परंतु मै उनका निर्णय व्यक्तिगत रूप से दे दूँ। मुझे जाना तो उनके घर था ही क्योंकि यशवन्त और शालिनी उनके सिटी वाले क्वार्टर पर थे कारण कि हमारे बाबूजी व बउआ अजय के पास फरीदाबाद गए हुये थे और घर मे अकेले रहना शालिनी ने कबूल नहीं किया था।

मैंने जब लौट कर कूकू साहब की सूचना उनकी माता जी को दी तो उन्हें धक्का लगा। वह मधु से चिढ़ती थीं लेकिन कूकू से बेहद लगाव था। वह कहती थीं कि उन्हें केवल अपने पाँच बच्चों से ही लगाव है। अर्थात उन्हें अपने बच्चों के बच्चों से कोई लगाव नही था,  इसी कारण यशवन्त को भी उपेक्षा से देखती थीं और शायद इसीलिए अपने पोता – पोती को भी उनकी माँ मधु के कारण गायब कराना चाहती रही होंगी। उन्होने शालिनी को हिदायत दी कि वह कूकू के घर न जाएँ जबकि मै कूकू और उनकी पत्नी को वचन दे आया था कि उनकी बहन/नन्द को और भांजे को जरूर लेकर आऊँगा। काफी द्वंद और दबाव के बाद मै शालिनी को अपने बड़े भाई के यहाँ जाने को बाध्य कर सका ,उन्होने अपनी माँ के आदेश का पालन करना जरूरी समझा था बजाए अपने पति की बात और इज्जत रखने के। शालिनी की छोटी बहन सीमा ने अपनी माँ के आदेश का अक्षरशः पालन किया और वे लोग मुजफ्फरनगर नहीं पहुंचे जबकि रेलवे का होने के कारण योगेन्द्र को कुछ खास खर्चा नहीं पड़ता। शालिनी की बड़ी बहन रागिनी ने अपनी माँ के आदेश का आधा पालन किया ,वह खुद न आई न बच्चों को भेजा केवल उनके पति अनिल साहब अकेले पहुँच गए। मेरे कारण सिर्फ शालिनी द्वारा ही अपनी माता के उल्लंघन की घटना घटित हुई।

कूकू साहब का बंदोबस्त काफी अच्छा था उन्होने दिल खोल कर खर्च किया था। तमाम उनके आफिस के इंजीनियर और दूसरे स्टाफ की शिरकत रही। आस-पास के पड़ौसी और उनके कुछ रिश्तेदार भी शामिल हुये। लौट कर मैंने शालिनी से कारण जानना चाहा कि क्यों उनकी माता वहाँ जाने से रोकना चाह रही थीं और वह क्यों उनकी बात मानना चाह रही थी। शालिनी ने जो जवाब दिया वह हैरतअंगेज था- उनका कहना था भाभी जी (मधु)दोहरे स्वभाव की हैं ,सामने कुछ कहती हैं पीछे कुछ और ,और सबको कोसती हैं । तब मैंने मेरे पहले मुजफ्फरनगर जाने के दौरान मधु द्वारा बताया घटना -क्रम बता कर उसकी सच्चाई जानना चाहा और यह भी कि उन्होने मुझे इस बाबत क्यों नहीं बताया?शालिनी का जवाब न बताने के बारे मे उनकी माँ की कड़ी हिदायत थी। घटना छिपाना उनकी माँ और और दूसरे रेलवे वाले भाई की इज्जत बचाने हेतु था।

यही बात जब मैंने अपने माता-पिता के फरीदाबाद से लौटने पर   उन्हें बताई तो उनका कहना था वे इन बातों को जानते हैं । मेरे यह पूछने पर कि वे कैसे जानते हैं तो उन्होने बताया कि शोभा- कमलेश बिहारी ने उन्हें बताया था और मुझे बताने को मना किया था इसलिए वे छिपाए रहे। वाह क्या कमाल रहा मेरे पत्नी के रूप मे शालिनी ने इसलिए छिपाया कि उन्हें उनकी माँ ने ऐसा आदेश दिया था। और मेरे माता-पिता ने इसलिए छिपाया कि उनके बेटी-दामाद ऐसा चाहते थे। हमारे बहन-बहनोई शालिनी की माता के मंसूबे क्यों पूरे कर रहे थे ?क्या रहस्य था?हालांकि अब सब उजागर हो गया है उसका वर्णन अभी नहीं फिर कभी। 

हो सकता है शालिनी ने अपनी भाभी संगीता और माता को बताया हो कि उनकी मधु भाभी ने मुझसे भेद बता दिया है। एक बार अकेले मौका पड़ने पर संगीता उसी घटना को लक्ष्य करके सफाई दे रही थी कि भाभी जी (उनकी जेठानी मधु) का दिमाग सही काम नहीं करता है और वह उल्टी-सीधी बातें करती हैं। वह अपना गहना पार करने का शक उनके (संगीता)ऊपर रखती हैं। क्या उन्होने मुझसे कुछ कहा था?मैंने उन्हें स्पष्ट इंन्कार कर दिया क्योंकि मै अब तक सारा घटनाक्रम समझ चुका था और जतलाना नहीं चाहता था कि सब की सारी पोलें मुझे मालूम हैं। ऊपर-ऊपर से शरद और संगीता कुछ जतलाना नहीं चाहते थे परंतु उनकी माता के दृष्टिकोण से साफ था वह मेरे और विरुद्ध हो गई थीं ,उन्हें भय था कि कहीं मै कूकू की पत्नी मधु को सहयोग न कर दूँ । यदि ऐसा होता तो उन्हें बहौत भारी पड़ता कि उनकी बड़ी पुत्रवधू और बीच का दामाद भी उनके खिलाफ क्यों हैं?मेरा दृष्टिकोण साफ था/है कि मै किसी के घरेलू मामलों मे हस्तक्षेप नहीं करता हूँ चाहे मुझे खुद कितना भारी नुकसान होता रहे। मै किसी की घरेलू फूट से अपना फायदा नहीं चाहता वरना चुटकियों मे शालिनी की माता से अपने अपमान और नुकसान का बदला उन्ही की बड़ी पुत्रवधू को सहयोग देकर ले सकता था।वैसे मैंने मधु को भी सहानुभूति का पात्र नहीं समझा था क्योंकि उनके पति कुक्कू अपनी माता के कुचक्रों मे साझीदार रहे हैं। तब यदि वह अपने पति को गलत चाल चलने से रोक पाती तो दूसरी बात थी। फिर खुद उन्होने भी अपनी नन्द को यह कह कर गुमराह किया था कि तुम बड़ी हो अपनी चलाना। सास -श्वसुर को अपनी बात मनवाने के लिए बुद्धि की जरूरत होती है यों ही नहीं घुमाया जा सकता। लिहाजा तटस्थ रहना ही उचित था।

लौटते मे हम लोग फरीदाबाद अजय के घर बाबूजी -बउआ से मिलते हुये आए थे ,उसका वर्णन अगली बार……..

Advertisements
 

आगरा/1988-89 (भाग-2)

मिश्रा जी के मकान मे ही शरद ने अपनी बेटी के होने की कथा कराई थी और हमारे माता-पिता को शामिल होने हेतु निमंत्रण देने को योगेंदर को भेजा था। बउआ तो नहीं गईं उन्होने बाद मे जाकर नई लड़की को हथौना के रु दिये। बाबूजी और मै गए थे। पहली बार बाबूजी को उनके यहाँ खाना खाने का न्यौता था किन्तु खाना-पूर्ती हेतु ही। यदि बाबूजी ने आने का वचन न दिया होता तो मेरा विचार उनके कथा और खाने का बहिष्कार करने का था। घर लौट कर मैंने उनसे कहा भी जाने की हामी भर कर खुद अपनी और मेरे दोनों की बेइज्जती करा ली। मिश्रा जी उनके मकान मालिक थे और उनके घर वालों को भी नहीं पूंछा था।

जैसे ही सिटी स्टेशन पर उनका क्वार्टर ठीक हुआ वे लोग उसमे रहने को भागे। जल्दबाज़ी मे शरद की पत्नी अपनी एक साड़ी और कपड़े धोने का तसला मिश्रा जी के घर भूल आयीं थीं। मिश्रा जी ने मुझ से उनका सामान उनके घर पहुंचाने को कहा और मुझे वैसा करना पड़ा। वे लोग चाहते थे कि मै मिश्रा जी को सहयोग करना बंद कर दूँ परंतु मै उनकी गलती के कारण मिश्रा जी द्वारा उन्हें बुरा-भला कहे जाने पर क्यों पार्टी का काम छोड़ देता?मैंने उनके सिटी के क्वार्टर पर उनसे संपर्क करना ही बंद कर दिया। जब शालिनी को माँ-भाभी से मिलना होता तो मै दुकान जाते मे साइकिल पर यशवंत के साथ बैठा कर दोनों को वहाँ छोड़ देता और लौटते मे वैसे ही वापिस हो लेता। न तो मुझे उनके यहाँ का भोजन पसंद आता था न ही उन लोगों का व्यवहार। अतः मै चाय के अलावा कुछ नहीं लेता था।

कुक्कू का ट्रांसफर नाभा से मुजफ्फर नगर हो चुका था। होली पर उन्होने अपनी माता को बुलाया था। छुट्टी के दिनों मे भी ड्यूटी करने वाले शरद मोहन अपनी माँ को लेकर मुजफ्फर नगर गए और उनकी पत्नी तथा बच्चों की रखवाली करने हेतु शालिनी को कहा गया और चूंकि क्वार्टर एकांत एरिया मे पड़ता था तो रात मे मुझे भी वहाँ रुकने का आग्रह किया। हालांकि इच्छा न होते हुये भी हमारे अपने माता-पिता द्वारा भी उन्हे सहयोग करने को कहने पर मुझे रात्रि चौकीदारी हेतु रुकना पड़ा। एक कमरे मे शरद की पत्नी और बेटियाँ तथा दूसरे कमरे मे शालिनी और यशवन्त सोये ,मै बारामदे मे था। गुसलखाना आदि थोड़ा नीचे स्थान पर बहौत आगे था। जब संगीता को उधर जाना होता तो शालिनी को जगा कर साथ ले जातीं और जब शालिनी को जाना होता तो वह कुछ दूर तक मुझे साथ ले लेतीं फिर नीचे खुद चली जातीं। एक बार सुबह के करीब शालिनी की आँख नहीं खुली तो संगीता मुझ से बोलीं शालिनी रानी तो जागी नहीं आप साथ चले चलिये। मै जहां तक शालिनी अपने साथ ले गई थीं वहाँ तक जा कर रुक गया तो संगीता नीचे तो उतरीं परंतु आगे उपयुक्त स्थान तक न जाकर वहीं बैठ गईं ,बात अटपटा लगने   की थी। मैंने उसी समय निश्चय किया कि अगले दिन चाहे जो हो मै यहाँ सोने नहीं आऊँगा। सुबह शालिनी के उठते ही मैंने इस हरकत का जिक्र किया तो उन्होने तपाक से कहा कि संगीता भाभी हैं ही आवारा शरद की तो किस्मत फूट गई। उन्होने बताया कि रात मे कई बार उन्हें चादर उढ़ा चुके हैं अब भी देख लो चादर अलग है ,भले ही सब कपड़े पहने थीं परंतु न पहनना ही उसे कहा जाएगा। जब मै अगले दिन नहीं गया तो बउआ ने पूछा यशवन्त और शालिनी भी तो वहाँ हैं क्वार्टर सन्नाटे मे है तुम क्यों नहीं  जा रहे हो?उन्हें क्या घटना बताते?वैसे ही बहाना कर दिया।

20 नवंबर 1988 को अजय की शादी ग्वालियर मे होना तय हुआ। यह भी कमलेश बाबू ने ही तय कराई थी। उनके एक माने हुये मामा जो उनके बी एच ई एल मे पर्चेज मेनेजर थे की बेटी की नन्द से उन्होने अजय की शादी तय करवाई थी।अजय के दोनों सालों से उनकी कुछ न कुछ रिश्तेदारी है। सुबह की ‘ताज एक्स्प्रेस’ से ग्वालियर गए थे और शाम की ‘ताज एक्स्प्रेस’से लौटना था। शादी दिन की थी। दरियाबाद से बाबूजी से बड़े भाई आए थे जिनसे भुआ की मुक़दमेबाज़ी चली थी अतः भुआ-फूफाजी नहीं आए थे। लाखेश भाई साहब बारात विदा हो जाने के बाद कानपुर से सीधे ग्वालियर पहुंचे थे और बैरंग लौट गए थे। कमलेश बाबू को शराब की धुन सवार थी। अजय ने उनके लिए बंदोबस्त कर दिया था। ट्रेन मे अजय के दोस्त अनिल गुप्ता, शरद मोहन से मिल कर कमलेश बाबू ने मेरे मुंह मे एक ढक्कन शराब उंडेल दी थी। चलने से पहले अजय मुझे फटकार चुके थे मै जाना नहीं चाहता था। बउआ ने कहा कि तुम्हारे न जाने से शालिनी भी नहीं जा रही हैं उनका एक ही देवर है और यशवन्त का एक ही चाचा अतः उनका ख्याल करके जाओ। उनकी बात रखने के कारण गया था।

एक रस्म ‘चार’ की होती है जिसमे लड़की वालों के यहाँ कुछ मेवा वगैरह भेजी जाती है कमलेश बाबू ने उसी ‘चार की थैली’मे एक बोतल शराब छिपा कर रख दी थी। इस कारण वहाँ खूब चो-चो हुयी होगी जो अजय ने सुनी होगी अतः रात को खाना निबटने के बाद अजय और कमलेश बाबू मे धुआँ-धार वाक-युद्ध हुआ। हम लोग तो ऊपर सोते थे शालिनी ने मुझ से बीच-बचाव करने को कहा लेकिन मैंने इंकार कर दिया मै पहले ही अजय से फटकार खा चुका था और गलती तो कमलेश बाबू की थी । शालिनी खुद मेरे मना करने पर भी चली गईं तब तक कमलेश बाबू और शोभा अपना सामान पैक करके रात मे ही झांसी लौटने की तैयारी मे थे। उन्होने जल्दी-जल्दी ऊपर आ कर मुझ से रोकने को कहा लेकिन मेरा तर्क था जब बाबूजी-बउआ वहीं हैं तो मै क्यों बीच मे पडू।पता नहीं कैसे फिर वे लोग रुक गए।

22 नवंबर को रिसेप्शन का खाना कुछ खास-खास रिशतेदारों का और मिलने वालों का था। शालिनी ने शरद की पत्नी संगीता से छोले-भटूरे बनवाने की बात कही थी परंतु वह तब आयीं जब काफी लोग खा कर जा चुके थे। सब कार्य खुद शालिनी ने ही किया। यशवन्त का जन्म दिन भी इसी दिन पहली बार मनाया गया। मिल्क केक भी संगीता के घर शालिनी ने जमवाया था वह भी तब पहुंचा जब वे लोग सिटी स्टेशन से हमारे घर पहुंचे।

हमारी दुकान के सेठ जी भी अपनी श्रीमती जी के साथ पधारे थे। उन्होने यशवन्त को जन्मदिन पर और अजय की पत्नी को मुंह दिखायी  के रु 50/-50/-दिये थे।  इसके अगले दिन शोभा और कमलेश बाबू अपने बच्चों को लेकर लौट गए। मेरे भी और अजय की भी शादी उन्होने तय करवाई थी परंतु फिर भी ऐसी ओछी हरकतें करते रहे तब इन बातों का अभीष्ट समझ नहीं आया था जिंनका खुलासा अब हमारे लखनऊ आने के बाद होता गया है इसी कारण वे लोग हमारे लखनऊ आने के विरोधी बने हुये थे क्योंकि उनका तिलस्म टूट गया। गफलत दूर हो गई और उनके चेहरे का नकाब उतर गया। उनकी छोटी बेटी ने अपने घर के  ‘सोनू’नाम से एक ऐसी आई डी बनाई जिसमे जन्म तिथि अपनी बड़ी बहन की डाल कर ब्लाग जगत के लोगों को गुमराह किया।मुक्ता का खास शगल है मेरे ब्लाग्स पर आई टिप्पणियों के माध्यम से प्रोफाईल खोल कर ब्लागर्स की ओवरहालिंग करना और अपने पिताजी कमलेश बिहारी माथुर को सूचित करना और दोनों मिल कर किसी को ब्लफ़ करके किसी को टोटका-टोने का सहारा लेकर मेरे विरुद्ध करने का प्रयास करते हैं जिसमे अभी तक पूर्ण सफल भी हैं।

 आज कमलेश बाबू और उनकी छोटी बेटी के प्रयास से मेरे ब्लाग्स पर विशेष कर इस ब्लाग पर विजिट कम हो गए हैं। वे नहीं समझ पा रहे हैं कि आज न सही आने वाली पीढ़ी के लोग तो पढ़ेंगे और सच को समझ ही जाएँगे।
अतीत मे वे इसलिए कामयाबी के साथ हमे क्षति पहुंचाते रहे कि हम उन पर शक नहीं रख रहे थे,अब वे सब शक के दायरे मे हैं और प्रत्येक क्षति हेतु मै उनको प्रथम उत्तरदाई मान रहा हूँ। मेरा लेखन अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं है अतः कुल मिला कर वे पाठकों की ही क्षति कर रहे हैं।यह ताज्जुब नहीं है कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं क्योंकि अब शीशे की तरह साफ है कि उनका स्वभाव ही ऐसा रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि इन्टरनेट के विद्वान इनके झांसे मे कैसे फंस जाते हैं उनकी अपनी बुद्धि कहाँ खो जाती है। इनमे वे लोग अधिक हैं जिनकी मैंने ब्लाग मे तारीफ लिख दी है और इन लोगों ने चुन कर उन्हीं को फाँसा है। जो लोग एक बार मुझ से अपने पुत्र-पुत्री हेतु ज्योतिषीय जानकारी भी प्राप्त कर चुके अब ब्लाग और फेस बुक पर मेरे विरुद्ध प्रचार मे संलग्न हैं। जो लोग दूसरे  रूप मे लाभ ले चुके वे अपने तरीके से विरोध कर रहे हैं। इससे उनके भी मानसिक स्तर का खुलासा हो गया कि कितने विद्वान और योग्य हैं वे और मै उनकी पोल देख कर सतर्क हो गया। अतः उन्हे भड़काने वाले अपने रिशतेदारों का आभारी ही हूँ।

 
 
%d bloggers like this: