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Category Archives: दरियाबाद

विशेष स्मृति-माधुरी जीजी

20जनवरी की रात मे नरेश का अचानक फोन आया कि 19 जनवरी 2012 की दोपहर दो बजे माधुरी जीजी इस दुनिया को छोड़ गई हैं। 21 ता .की शाम को उनके निवास पर शान्ति हवन होगा और उसमे मुझे शामिल होने को उन्होने कहा। जहां तक माधुरी जीजी का प्रश्न था उनका व्यवहार सभी के साथ मधुर था मेरे प्रति भी। अतः उनके इस कार्यक्रम मे शामिल होने मे हर्ज नहीं था। पूनम को भी वही एकमात्र ऐसी नन्द लगीं जिन्हें उनसे लगाव रहा। इसीलिए उनके निधन के समाचार से पूनम को रुदन आ गया जबकि अपने माता-पिता के निधन के समय भी पूनम संयम बनाए रहीं। इच्छा उनकी भी थी माधुरी जीजी के घर चलने की किन्तु कुछ उनकी तबीयत और कुछ मेरे अपने राजनीतिक कार्यक्रमों के कारण उन्हें साथ ले चलना संभव नहीं हुआ। मुझे घर से 11 बजे निकालना था क्योंकि 12 बजे पार्टी कार्यालय मे हमारी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चुनाव घोषणा पत्र जारी करने की प्रेस वार्ता थी एवं उसके बाद जिला काउंसिल की बैठक भी। लिहाजा ढाई बजे मै बैठक समाप्त होते ही वरिष्ठ नेताओं को बता कर राजीपुरम के लिए चला। अमीनाबाद से टेम्पो पकड़ कर उनके घर तीन बज कर 53 मिनट पर पहुँच गया। हवन मेरे सामने ही प्रारम्भ हुआ और 04-45 पर समाप्त भी हो गया। आर्यसमाजी पुरोहित थे परंतु उन्होने विधान के अनुसार हवन नही कराया था क्योंकि उन्हें कहीं दूसरी जगह भी जाना था।

                                                      (1996  मे लिया गया माधुरी जीजी का चित्र)

हवन के बाद मैंने जीजी के बड़े पुत्र शरद से पूछा कि उनकी बीमारी के समय क्यों नहीं सूचित किया?शरद ने मौन रखा और अपने ऋषि मामा की ओर मुखातिब हो लिए। उमेश जो यहीं अशरफाबाद मे रहते हैं उनसे पूछा तो जवाब था तब जल्दी इलाज की थी। नरेश का जवाब था आपका फोन नंबर गायब हो गया था फिर गुड़िया (माधुरी जीजी की बेटी) से लेकर सूचित किया था। वस्तुतः 2009 मे लखनऊ आने के बाद हम सबसे पहले माधुरी जीजी के ही घर जाना चाहते थे किन्तु दरियाबाद से नरेश ने सूचित किया उनकी बेटी हमारी ही कालोनी मे है उससे मिल लूँ। गुड़िया ने तब बताया था कि जीजी को डायलिसिस कराना पड़ रहा है जब हम 20जनवरी 2010 को गुड़िया के घर गए थे। अतः 27 जनवरी 2010 को हम माधुरी जीजी के घर गए वह तो काफी उल्लास के साथ मिली थी। शरद को ही हमारा जाना शायद अच्छा न लगा था। वह अपने मौसा महेंद्र (कमलेश बिहारी के अजीज -ओ-अजीज हम प्याला  साढ़ू) के यहाँ भी मुझे जाने का दबाव बना रहे थे जिसे मैंने अस्वीकार कर दिया था। शरद की पत्नी ने हम लोगों से उमेश के घर जाने को कह कर बीच का रास्ता निकाला था। उमेश ने भी  अपने घर अन्यमनसकता ही प्रदर्शित की थी। गुड़िया के घर अभय जी की जन्मपत्री देने गए थे तो वह भी अन्यमनसक ही दिखे। यही कारण था कि फिर मै किसी के भी घर नहीं गया। एक-ही दो दिन पहले पूनम ने कहा था कि माधुरी जीजी के घर चलना चाहिए उनका व्यवहार अच्छा है बच्चों के व्यवहार पर मै ध्यान न दूँ। मैंने कहा भी था कि किसी दिन चलेंगे किन्तु उसकी नौबत न आ पाई और जीजी दुनिया ही छोड़ गई ।

बउआ बताया करती थीं कि माधुरी जीजी जो मुझसे 10 वर्ष बड़ी थीं दरियाबाद मे मुझसे  06 माह छोटी अपनी बहन को छोड़ कर मुझे ही गोद मे लेकर खेला करती थी। ताईजी इस बात पर उनसे नाराज भी होती थीं कि अपनी बहन को छोड़ कर वह चचेरे भाई को क्यों प्यार करती हैं। माधुरी जीजी से बड़े हैं गिरिराज भाई साहब जो आजकल अलीगंज के नए मंदिर मे अपनी इंडिका गाड़ी के साथ रहते हैं वह पहले हेमवती नन्दन बहुगुड़ा आदि नेताओं के प्रिय थे और अब IAS अधिकारियों के प्रिय हैं। गुड़िया की शादी मे इन्होने अपनी भांजी हेतु रु 100/- भेंट किए थे तब माधुरी जीजी ने मुझे व पूनम को शिकायती लहजे मे नोट दिखते हुये  बताया था कि दादा ने गुड़िया के लिए यह दिया है। बड़े ताऊ जी के निधन पर भी मै आगरा से दरियाबाद होकर लौट गया तब तक वह वहाँ लखनऊ से नहीं पहुंचे थे। हवन/भोजन के बाद नरेश  ने मुझे उनकी गाड़ी मे बैठा कर उनसे कपूरथला पर छोड़ देने को कहा था। चूंकि वह चौक होते हुये लौटे अतः मै नींबू पार्क पर उतर कर टेम्पो द्वारा घर आ गया।

माधुरी जीजी के बाद वाली अंजली जीजी दरियाबाद मे थीं वह न मिलीं। जब उमेश के घर 27-01-2010 को गए थे तो वह दूर बरामदे मे अलग-थलग बैठाई गई थीं हमारे पूछने पर उन्हे मिलने को उमेश की पत्नी ने बुलाया था। उनके बाद वाली रीता जीजी का निधन पहले कभी हो गया था ,हमे लखनऊ आने पर पता चला। उनके बाद वाली मीरा जीजी और महेंद्र जीजाजी डॉ शोभा एवं कमलेश बाबू के सलाहकार हैं,इस वक्त शहर से बाहर थे ,अच्छा हुआ जो नहीं मिले ।उनके बाद वाली बीना ही मुझसे 06 माह छोटी है वह और हरी मोहन जी मिले थे। मै उमेश ,शरदआदि के व्यवहार को देखते हुये उनसे पहले  नहीं मिला था। उनके बाद वाले ऋषिराज,नरेश और उमेश मिले थे और दरियाबाद आने को कह रहे थे। दरअसल दिसंबर 2011 मे सुरेश भाई साहब के निधन के बाद से मै दरियाबाद (रायपुर) नहीं पहुंचा हूँ और मथुरा नगर इन लोगों के यहाँ जाने का मतलब उन लोगों के विरुद्ध इन लोगों के साथ होना है अतः फिलहाल कोई प्रश्न नहीं उठता है। कमलेश बाबू/उमेश चैनल ने हमारी पार्टी के एक वकील कामरेड को मिला कर उनसे यह शोशा उठवाया था कि मुझे पुश्तैनी जायदाद मे अपना हिस्सा मांगना चाहिए वह वकील साहब स्वेच्छा से मदद करेंगे। एक बार वही वकील साहब मुझसे कह रहे थे कि,”माथुर साहब बिना स्वार्थ  के  आजकल पानी पीने को भी  कोई नहीं पूछता है” , फिर यह मेहरबानी क्यों? उनसे मैंने जवाब मे कहा था कि ,”हमारे अपने कजिंस से संबंध मधुर नहीं हैं फिर भी हम टकराव नहीं चाहते हैं”। फिर भी आज दिन मे उन्होने फोन करके किसी कर्मचारी से यह कह कर बात करवाई कि वह हमारे पिताजी के मित्र के पुत्र  हैं। हमे  दरियाबाद के केवल भवानी शंकर तिवारी जी का उनके मित्र होने का पता है और उनसे 1992 तथा 1996 मे मुलाक़ात भी हुई थी उनके पुत्र भी उस दिन जीजी के घर मिले थे किन्तु किन्ही चतुर्वेदी जी की हमे कोई जानकारी नहीं है। उन्नाव के कामरेड भीका लाल जी भी बाबूजी के सहपाठी और रूम मैट थे उनसे भी कामरेड सरजू पांडे जी के जमाने मे एक रैली के दौरान लखनऊ मे मुलाक़ात हो चुकी थी।

27-01-2010 को हमे माधुरी जीजी ने बताया था कि,कमलेश बाबू और उनके दूसरे भाई अपने सबसे छोटे भाई योगेश से अपनी पुश्तैनी जमीन मे हक मांग रहे हैं जबकि सभी सेटिल हैं और योगेश केवल खेती पर निर्भर हैं। माधुरी जीजी योगेश की पत्नी की माईंजी होने के नाते उनके प्रति सहानुभूति रखती थीं। डॉ शोभा ने माधुरी जीजी की यह कह कर कड़ी आलोचना की थी कि वह हमारी बउआ की उनसे बुराई करती हैं। डॉ शोभा के मुक़ाबले मै अधिक बार माधुरी जीजी से मिला किन्तु उन्होने अपने चाचा- चाची (हमारे माता-पिता) की कभी मुझसे बुराई नहीं की ,अप्रैल 2011 मे यहाँ आने पर डॉ शोभा ने माधुरी जीजी की बुराई की थी जबकि आगरा मे डॉ शोभा खुद ही अपनी माँ से अभिवादन किए बगैर ही झांसी लौटी हैं। अब चूंकि योगेश की आपरेशन बिगड़ने से दोनों आँखों की रोशनी चली गई थी उनसे जमीन मे हिस्सा मांगना कमलेश बाबू को मंहगा पड़ता उन्होने दरियाबाद मे सुसराल की जमीन मे हिस्सा मांगने का उपक्रम तैयार किया है जिस जमीन की खातिर वह 1976 मे BHEL,हरद्वार से स्तीफ़ा देने तक को उद्यत थे। हमने ऐसा सुना है कि दरियाबाद मे बाबूजी के नाम के हिस्से को उन लोगों ने अजय तथा मेरे नाम मे कागजों पर करा रखा है। तब तक लड़कियों को खेती मे हिस्सा नहीं मिलता था,वह कानून बाद मे बना है जिसका लाभ लेने हेतु कमलेश बाबू डॉ शोभा से उम्मीद लगाए हैं। इन लोगों की चाल है कि यदि हम वकील साहब के जाल मे फंस जाएँ तो आज के कानून के हिसाब से अजय और मेरे साथ डॉ शोभा का क्लेम भी बीच मे लगाया जा सके।

ऋषि,नरेश और उमेश सब डॉ शोभा से छोटे हैं,सुरेश भाई साहब के सभी बहन-भाई अब जीवित नहीं हैं। अजय और मेरे अलावा गिरिराज भाई साहब ही डॉ शोभा से बड़े हैं। मंदिर के पुजारी गिरिराज भाई साहब अपने तीनों भाइयों का साथ देंगे। अजय और मुझसे कमलेश बाबू ने डॉ शोभा का झगड़ा करा रखा है। अब यशवन्त समेत हम लोगों का अनिष्ट करना ही कमलेश बाबू और डॉ शोभा का अभीष्ट रह गया है। लेकिन बड़े होने के नाते हम बहन-बहनोई और भाँजियों का अनिष्ट नहीं सोच सकते। माधुरी जीजी अपने भाइयों समेत सभी चचेरे भाइयों की एकता की पक्षधर थीं। हालांकि जीजाजी (स्व.दर्श बिहारी माथुर )से मै कभी नहीं मिला लेकिन अजय ने उनकी काफी तारीफ की है। उस दिन जीजी के यहाँ उनके एक मित्र पांडे जी बता रहे थे कि जीजाजी ने अपने पी एफ से लोन ब्याज पर लेकर बिना ब्याज के अपने साथियों को उधर दिया था जिसकी जानकारी जीजी को न थी किन्तु जीजा  जी की मृत्यु के बाद उनके मुस्लिम साथी कहीं और से बंदोबस्त करके पूरी रकम जीजी को दे गए तभी उन्हें पता चला जबकि हिन्दू साथी  रकम डकार गए , जीजी ने पता चलने पर भी कोई तकाजा नहीं किया था।

मुझे और विशेषकर पूनम को माधुरी जीजी के निधन का वाकई मे काफी दुख हुआ है। हम परम पिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि माधुरी जीजी और दर्श बिहारी जीजाजी की आत्माओं को शांति प्रदान करें। 

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2011 को अच्छा मानें या बुरा?

आज 2011 वर्ष का समापन होने जा रहा है। पूरे वर्ष की गतिविधियों और उनके परिणाम पर दृष्टिपात करके इस वर्ष को अच्छा या बुरा नहीं कह सकते। इस वर्ष ब्लाग-लेखन द्वारा कई ब्लागर्स से जो संपर्क था वह व्यक्तिगत मुलाकातों के रूप मे भी सामने आया। कई गोष्ठियों मे श्रोता के रूप मे  भाग लिया और अनुभव प्राप्त किए। राजनीतिक रूप से जहां अपनी कम्युनिस्ट पार्टी के धरना  व प्रदर्शनों मे भाग लिया वहीं AISF  तथा प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रमों मे भी उपस्थित रहा। पार्टी की कई बैठकों मे भी भाग लेने का अवसर मिला। कई ब्लागर्स की व्यक्तिगत समस्याओं हेतु ज्योतिषीय समाधान देने के भी अवसर मिले। एकमात्र मनोज कुमार जी ही ऐसे ब्लागर रहे जिनहोने अपने कार्य-संपन्नता की औपचारिक सूचना ई-मेल द्वारा दी। एक और ब्लागर ने पूछने पर स्वीकार किया कि उन्हें पहले से अब लाभ है। परंतु अधिकांश ने लाभ होने अथवा न होने की कोई सूचना देना मुनासिब नहीं समझा। एक ब्लागर की इच्छा का आदर करते हुये ‘जन हित मे’ स्तुतियाँ देना प्रारम्भ की ,परंतु उन ब्लागर ने ही उन्हे देखने की जरूरत नहीं समझी।

इसी वर्ष मार्च माह मे एक परिचित बैंक अधिकारी के पुत्र की तबीयत होली खेलने के बाद ऐसी खराब हुई कि डाक्टरों ने बचने के बारे मे ही संदेह व्यक्त कर दिया और बचने पर ‘दिमाग’ विकृत होने की बात कह दी। उन्होने चिकत्सा विश्वविद्यालय के ICU मे भरती अपने पुत्र के पास बुला कर ज्योतिषीय समाधान मांगा। मेरे द्वारा बताए मंत्रों के प्रयोग से उनका पुत्र सकुशल स्वस्थ होकर आया और परीक्षा परिणाम भी उसका अनुकूल ही आया। इस जानकारी से मन काफी संतुष्ट हुआ।

एक ब्लागर साहब और एक परिचित के पुत्र को पूर्ण लाभ होना मेरे ज्योतिषीय सिद्धांतों की वैज्ञानिकता को ही पुष्ट करता है। जबकि फेसबुक तथा ब्लाग्स मे कई लोग मेरी पद्धति का मखौल उड़ाते हैं,उन्हे प्रचलित दक़ियानूसी  पोंगा-पंथ ही भाता है।

इसी वर्ष हमारी बहन डॉ शोभा और बहनोई श्री कमलेश बिहारी माथुर S/O स्व.सरदार बिहारी माथुर,रेलवे अधिकारी (अलीगढ़),द्वारा हमारे विरुद्ध संलिप्त रहने का पर्दाफाश भी हो गया। हम तो छोटी बहन-बहनोई समझ कर उन पर विश्वास करते रहे और वे हमारे विरुद्ध लोगों को उकसाते व भड़काते रहे। 5 वर्ष से उनकी गतिविधियां संदिग्ध लग रही  थीं परंतु पूनम और यशवन्त मिलकर मुझे चुप करा देते थे। इस बार अप्रैल मे जब वे अपने भाई दिनेश की बेटी की शादी मे लखनऊ आ रहे थे तो फोन पर कई ऐसी बातें बहन जी द्वारा कही गई कि मैंने पूनम से कह दिया था कि इस बार तो अपने माता-पिता की पुत्री-दामाद होने के नाते अपने घ्रर  आने पर उनका स्वागत कर लेंगे परंतु भविष्य मे उन लोगों का स्वागत करना मेरे लिए संभव नहीं है।

यशवन्त को कमलेश बाबू चौराहे तक ले जाने की बात कह कर अपने साथ ले गए फिर हजरतगंज होते हुये अमीनाबाद तक जाकर लौटे बिफर कर यह कहते हुये कि यह न तो आलू की टिक्की खाता है न कुल्फी हम इसे अपने साथ नहीं ले जाया करेंगे। अगले दिन उन्हे फ्लाईट पकडनी थी लिहाजा मै खामोश रहा वरना पूछता कि क्या मैंने उसे आपके साथ लगाया था?उसे साथ ले जाने से  उसका साइबर ही ठप्प रहा। रास्ते मे उससे पूछते हैं ‘मोपेड़’ कितने मे बेची? आगरा छोडते समय काफी सामान काफी घाटे मे बेचना पड़ा खराब हो गई मोपेड़ भी घाटे मे ही बेची थी। उसकी खरीद मे जो रूपये लगे थे उनमे से आठ हजार शालिनी के थे शायद इसी लिए कमलेश बाबू को उसकी बिक्री के पैसों की फिक्र थी,जबकि जिस दिन मोपेड़ खरीद कर लाये थे उस दिन डॉ शोभा उपस्थित थीं और भौंचक रह गई थीं। डॉ शोभा ने मोपेड़ लाने की खुशी मे अपनी माँ द्वारा दी मिठाई का एक टुकड़ा भी न चखा था और उनके पति को उसकी बिक्री के पैसों की व्यापक चिंता थी।

आगरा का मकान मैंने मेरठ मे अपनी नौकरी के बचे पैसों से सिक्योरिटी जमा करके तथा 15 वर्षों तक मासिक ‘किश्तें’ जमा करके खरीदा था जिसे बेच कर लखनऊ मे घाटे मे आए थे। 1976 मे कमलेश बाबू ने हमारे बाबूजी द्वारा तीन मकान खरीदने की बात हमारी माँ से कही थी। बाबूजी की हैसियत एक भी मकान खरीदने की न थी क्योंकि दो वर्ष बाद ही उनका रिटायरमेंट था।बाद मे बहन जी ने माँ को सूचित किया था कि कमलेश बाबू अपनी बी एच ई एल,हरिद्वार की नौकरी छोड़ कर दरियाबाद की खेती सम्हाल लेंगे -बस बाबूजी अपना हिस्सा ले लें। ऐसा न होने के कारण ही मेरे लखनऊ आने पर मथुरानगर,दरियाबाद के ऋषिराज,नरेश ,उमेश को डॉ शोभा और कमलेश बाबू ने मेरे खिलाफ कुछ गलत-सलत भड़का दिया। निवाजगंज,लखनऊ मे कमल दादा ने फरवरी मे बताया था कि शोभा बचपन से ही टेढ़ी है। उनके निधन के बाद हवन के समय शैल जीजी ने भी कहा था कि शोभा चिढ़ोकारी है। अगस्त मे उनका भी निधन हो गया। मै संदेह के बावजूद चुप इसलिए रहता था कि ये लोग तिकड़म से पहले ही अजय को भी भड़का कर अलग-थलग कर चुके थे और इसका शक माईंजी पर डाल दिया था। ब्लाग जगत मे उनकी छोटी  पुत्री-मुक्ता(जिसके पति साफ्टवेयर इंजीनियर तथा कुक्कू के रिश्तेदार के रिश्तेदार हैं) जो सोनू नाम की फेक आई डी से यशवन्त और मेरे विरुद्ध अनर्गल प्रचार करके शक एक बार फिर माईंजी पर डाल चुकी थी।

अतः 1978 मे मेरा मकान एलाट होते ही कमलेश बाबू मेरे विरुद्ध साज़िशों मे लग गए जिंनका पता अब  लखनऊ आने पर ही चल सका और पुष्टि उनके 2011 मे हमारे घर आने पर हो सकी कि ‘मधू’ पत्नी कुक्कू तो कमलेश बाबू की भतीजी थीं। कमलेश बाबू ने हमारे तब के ज्योतिषीय सलाहकार डॉ रामनाथ को कुक्कू द्वारा खरीद कर शालिनी से 14 गुणों को 28 बता कर विवाह तय करवाया था। होटल मुगल से बरखास्तगी और राजनीतिक उठा- पटक मे भी कमलेश बाबू-कुक्कू-शरद मोहन(तीनों के पिता रेलवे के साथी रहे) गठजोड़ का ही हाथ था। इसी लिए वे लोग हमारे लखनऊ आने का शुरू से विरोध कर रहे थे। यह पता लगने  पर कि यशवन्त की ख़्वाहिश पर हमने घाटे मे भी लखनऊ आने का निर्णय किया था तो वे लोग उसके भी विरुद्ध मशगूल हो गए। अंततः मुझे उससे ‘बिग बाजार’ का जाब छुड़वाकर घर पर साइबर खुलवाना पड़ा जबकि डॉ शोभा-कमलेश बाबू अपने परिचित ‘लुटेरिया’ बिल्डर के यहाँ उसे जाब पर रखवाना चाहते थे। उसी लुटेरिया के माध्यम से उन्होने हमे यहाँ परेशान रखने का उपक्रम किया हुआ है।

इतना ही नहीं बी एच ई एल ,हरद्वार मे ‘सीटू’ से सम्बद्ध यूनियन मे सेक्रेटरी रह चुके कमलेश बाबू ने अपने पुराने संपर्कों के आधार पर सी पी एम से संबन्धित लोगों को पहले मुझ पर सी पी आई छोड़ कर सी पी एम मे शामिल होने का सुझाव भिजवाया। 17 जून 2011 को मेरे घर सी पी एम,मेरठ के कामरेड जो ब्लागर भी हैं आए और इस प्रकार की राय व्यक्त किए,कम से कम जलेस मे लेखन का ही उनका वैकल्पिक सुझाव था। चूंकि मैंने इन सुझावों को स्वीकार नहीं किया तो उन्हीं ब्लागर सी पी एम के कामरेड ने भाकपा के प्रदेश नेता द्वारा संचालित ब्लाग को फालों करके मेरे विरुद्ध अभियान चला दिया। इस अभियान का परिणाम मेरे विरुद्ध देखने के इच्छुक लोग संतुष्ट हो पाते हैं अथवा नहीं इसका पता 2012 मे ही चलेगा।

कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के ‘एकला चलो रे’ का मै अनुगामी हूँ और सदैव प्रत्येक के भले के लिए प्रस्तुत रहता हूँ ,इसलिए मुझे नहीं लगता कि कितनी भी बड़ी ताकत बटोर कर मुझे परास्त करने मे किसी को भी सफलता आगे भी मिल सकेगी जैसे अभी तक नहीं मिल सकी है । सन 2012 मे सभी को सद्बुद्धि मिले और सभी समृद्धि कर सकें 2011 के समापन पर यही हमारी मंगल कामनाएं हैं।

 

आगरा/1992 -93 (भाग-2 )

1992 मे ही पहले भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की राज्य काउंसिल हेतु 15 वी कांग्रेस मे चुनाव हुआ। अपने जिला मंत्री मिश्रा जी के कहने पर मैंने पार्सल बाबू शरद मोहन से चन्दा जमा करने और डेलीगेट्स के वापसी टिकट लेने मे सहयोग को कहा जो मिश्रा जी के नाम पर उन्होने सहर्ष दिया। हालांकि यह ताज्जुब वाली बात थी जो व्यक्ति अपनी बहन से मिलने नहीं आता और जिसे अपनी पत्नी के इलाज के लिए वक्त नहीं मिलता और जिन मिश्रा जी ने कथित रूप से गालियों की बौछार करके उन लोगों को अपने किरायेदार के रूप मे हटाया था उन्हीं मिश्रा जी पर इतनी मेहरबानी क्यों?

सम्मेलन और फिर अपने जिला सम्मेलन का विवरण अलग से ‘विशेष राजनीतिक’ गतिविधियों के अंतर्गत दे रहे हैं जो कुछ अंतराल के बाद  क्रमवार प्रकाशित होता रहेगा। जिला सम्मेलन से पूर्व हम लोग दरियाबाद भी गए थे जैसा कि बड़ी ताईजी से  तब वायदा किया था जब बड़े ताउजी के निधन के बाद मै वहाँ गया था। हालांकि उसके 06 माह बाद ताईजी का भी निधन हो गया था। रिज़र्वेशन गंगा-जमुना से आगरा सिटी से दरियाबाद का कराया था। गाड़ी रात को जाती थी लेकिन हम लोग मय सामान के शाम को ही शरद मोहन के क्वार्टर पर आ गए थे। खाना घर से ही खा कर चले थे परंतु शालिनी ने अपनी माता के कहने पर थोड़ा कुछ खा लिया था,यशवन्त ने भी चखा होगा ,मैंने तो सिर्फ चाय ही ली। गाड़ी आने से पहले शरद साहब ने किसी को भेज कर सामान उठाने मे मदद की थी वह स्टेशन पर ड्यूटी मे थे। अगले दिन हमने गाड़ी को लखनऊ स्टेशन पर छोड़ दिया क्योंकि उस दिन गाड़ी को सुल्तानपुर होकर जाना था।  ‘देहरा एक्स्प्रेस’ पकड़ कर हम लोग दरियाबाद पहुंचे। स्टेशन से मथुरा नगर के घर पहुँच कर घोर ताज्जुब हुआ जब ‘ताला’ लगा देखा। बारामदे मे पड़े तख्त पर बैठ गए। मै डाक से वहाँ  पहुँचने का पत्र ऋषिराज के नाम भेज चुका था। शालिनी का व्यंग्य था कि,क्या आपके घर की रस्म  है बहुओं का स्वागत  घर पहुँचने पर  ‘ताला बंद ‘ करके चले जाने से होता है? मैंने थोड़ी देर इन्तजार करने के बाद भी किसी के न आने पर ‘रायपुर’ सुरेश भाई साहब के घर जाने का निश्चय करा।

कुछ देर मे ऋषिराज आ गए ,वहाँ तब ऋषिराज और उमेश रहते थे तथा नरेश लखनऊ मे माधुरी जीजी के पास राजाजीपुरम मे।

क्रमशः…… 

 
 
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