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Category Archives: पटना

आगरा/1994 -95 /भाग-15

उन्हीं दिनो फीरोजाबाद मे ट्रेन एक्सीडेंट हो चुका था जिसके बाद पुलिस,पी ए सी और अराजक तत्वों ने मृत तथा घायल लोगों को लूटा था और सेना के गोली चलाने की धमकी पर ही यह लूट थमी थी। सोनिया गांधी के आशीर्वाद से गठित तिवारी कांग्रेस के अध्यक्ष पंडित नारायण दत्त तिवारी दुर्घटना स्थल का मुयाना कर गए थे । अतः प्रधानमंत्री नरसिंघा राओ साहब को भी23 जूलाई 1995 को  आना पड़ा। सड़कों पर आवागमन कुछ समय के लिए प्रतिबंधित था। अतः हींग-की-मंडी न जाकर, मथुरा गया और  रंग बिहारी माथुर साहब से शर्मा जी द्वारा बताई दास्तान की जानकारी लेने हेतु  संपर्क किया। वह तो बुला रहे ही थे। उनकी उस बेटी की बेटी से यशवन्त को मिल कर खुशी हुई कि बहन है परंतु माँ तो पटना वाली ही को मानना था अपने बाबा जी से वहाँ पत्र जो भिजवाया था। शर्मा जी की बातें बेदम और झूठ हैं उन्हें समझा दिया और आग्रह किया कि वह इस बाबत बिमला जीजी से ही सही जानकारी हासिल कर लें। उनकी पुत्री की बाबत कह दिया कि पटना मे सहाय साहब से चल रही बात तोड़ कर तो कोई विचार नहीं हो सकता क्योंकि वह वार्ता पिताजी शुरू करके गए हैं। लेकिन अगर सहाय साहब खुद ही पीछे हट जाते हैं तब उनके प्रस्ताव पर विचार कर सकते हैं।

मथुरा से लौटते-लौटते अंधेरा हो चुका था और सहाय साहब के ज्येष्ठ पुत्र कमला नगर/हींग-की-मंडी /कमलानगर के चक्कर काटते -काटते थक कर  परेशान होकर घर के बाहर के हिस्से मे नींबू के पेड़ के नीचे खड़े हुये थे। उन्होने कोई सूचना हमे नहीं दी थी। हम बेखबर थे तो परेशानी भी उन्हीं को हुई। उन्होने मुझसे पूछा कि शादी कब करना है तारीख दे दूँ। मैंने उन्हें पहले जन्मपत्री दिखाने को कहा उसके बाद गुण मिलने पर ही मुहूर्त का सवाल उठने की बात कही।वह अपनी बहन की जन्मपत्री लाये तो थे किन्तु दिखा नहीं रहे थे । उनके जन्मपत्री दिखाने के बाद भी मैंने कहा कि आप खुद  अकेले नहीं बल्कि अपनी बहन और माता-पिता की उपस्थिती  मे मुहूर्त की बात रखें। चाय यशवन्त ने बना दी थी और उसने मीठा बहुत तेज डाला था। बिस्कुट उन्होने मीठा होने के कारण नहीं लिया था अतः मैंने फीकी चाय अलग से बना दी। सुबह के आलू के पराँठे बचे रखे थे और कुछ ताजे सेंक कर मैंने उनसे भोजन करने को कहा। उनके पास यशवन्त को छोड़ कर पीछे बाजार से दही ले आया था। उन्होने वही  हम लोगों के साथ खा लिया था। उनकी थकान को देखते हुये मैंने उनसे रात को घर पर रुक जाने को कहा तो बोले कि सामान दयाल लाज मे है वहाँ से लेकर टूंडला से ट्रेन पकड़ कर निकलेंगे। लेकिन बाद मे पता चला कि वह तबियत गड़बड़ाने के कारण रात को लाज मे ही रुक कर अगले दिन सुबह की ट्रेन से गए।

वस्तुतः जिन दिनों हमारे बाबूजी नहीं रहे थे उधर उसी समय सहाय साहब की वयोवृद्ध माताजी को गिरने से कूल्हे मे फ्रेक्चर हो गया था। उनके कुछ ठीक होने तक उन्हें पत्राचार के लिए रुकना था और हम भी फिर बउआ के न रहने तथा उसके बाद लोगों द्वारा उठाए ऊताचाल से त्रस्त थे। उनके घर मे फोन था लेकिन हमे दूसरों के घर से अटेण्ड और खुद  PCO से करना होता था अतः जल्दी-जल्दी संपर्क न हो पाता था। इसी वजह से उस दिन ‘पूनम’के भाई साहब को हमारे न मिलने से परेशानी उठानी पड़ी। उनके पटना पहुँच कर सब बातें बताने के बाद सहाय साहब ने रेजिस्टर्ड पत्र भेज कर उन लोगों के आगरा हमसे मिलने आने का समय पूछा। उनकी हिदायत थी कि उन्हें पत्र मै भी रेजिस्टर्ड डाक से ही भेजूँ। मैंने उन्हें नवरात्र की दोज 26 सितंबर को पटना से चल कर 27 सितंबर को मुझसे संपर्क करने को लिख भेजा था। उन्होने पत्र द्वारा मुझे स्वीकृति भी भेज दी थी।

उनके देहरादून निवासी एक  छोटे भाई ने बीच मे हस्तक्षेप करके इस स्टेज पर हमारे बाबत अपने एक जासूस से एंक्वायरी कराने की बात उठा दी। उन्होने अपने पुत्र के आकर मिल जाने और खुद अपने आने की सूचना देने के बाद अपने छोटे भाई को एंक्वायरी की इजाजत दे दी। कमलनगर मे ही हमारे बी- ब्लाक के बगल वाले ई -ब्लाक निवासी डॉ एस सी अस्थाना साहब एक दिन देहरादून से अङ्ग्रेज़ी मे उनके नाम  भेजा गया गया एक पत्र लेकर आए और मुझे दिखा कर पूंछा कि इसका क्या जवाब दे दें?मैंने उन्हें उत्तर दिया कि वह मेरे बारे मे जो कुछ जानते हों सब सूचित कर दें। डॉ अस्थाना बोले वह मुझे बिलकुल नहीं जानते इसलिए मै जो बता दूँगा वही वह लिख देंगे। तब मैंने कहा कि जब वह मुझे नहीं जानते तो यही लिख कर भेज दें कि वह मेरे बारे मे कुछ नहीं जानते। बाद मे ज्ञात हुआ कि उन्होने यही लिख भेजा था कि वह विजय माथुर के बारे मे कुछ नहीं जानते। उनका संदेश देहरादून की मार्फत पटना सहाय साहब को मिल गया।

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आगरा/1994 -95 /भाग-14

अजय के भी वापिस लौट जाने के बाद यशवन्त और मै दो ही लोग रह गए थे। वह सुबह साढ़े सात बजे के स्कूल के लिए घर छोडता था फिर साढ़े बारह बजे लौट कर खाना खा कर मेरे साथ ही हींग-की-मंडी दुकानों पर चलता था। कुछ किताबें साथ रख लेता था और दिन मे बाजार से ही होम वर्क कर आता था। सभी दूकानदारों ने उसे अपने साथ लाने की छूट मुझे दे दी थी। सिन्धी दुकानदार कर्मचारियों को चाय देते थे अतः कभी-कभी यशवन्त के लिए भी भिजवा देते थे। साधी आठ बजे तक घर वापिस आ पाते थे ,सुबह ही सब्जी अधिक बना लेते थे रात को रोटी सेंक लेते थे। खाते-खाते यशवन्त को गहराकर नींद आने लगती थी,उसे फिर सुबह सवासात बजे घर छोडना होता था। उसे सब 12 -साढ़े बारह घंटे का दबाव पड़ता था। मै तो मेक्सवेल पर 4 घंटे +रेकसन पर 1 घंटा +वाकमेक्स पर 1 घंटा काम कुल 6 घंटे का जाब करता था लेकिन यशवन्त को यह सारा समय मेरे साथ बिताना पड़ता था। उसे घर पर अकेला कैसे छोड़ा जा सकता था। मैंने डॉ शोभा को टटोलने हेतु पूछा था कि पिछले साल तुमने बउआ से यशवन्त को ले जाने की बात काही थी अब ले जाओ। लेकिन उन्होने अब उसे ले जाने से यह कह कर इंकार कर दिया था कि तुम अकेले रह जाओगे,इसलिए अब नहीं ले जाएँगे।

कभी-कभी न्यू आगरा स्थित शिव नारायण कुशवाहा की सब्जी की दुकान पर (जो उन्होने सपा पूर्वी विधान सभा क्षेत्र का अध्यक्ष होने के नाते पार्टी कार्यालय बना रखी  थी ) चला जाता था। शिव नारायण मुझसे पहले भाकपा छोड़ आए थे। एक बार एक मीटिंग के बाद उन्होने कमलानगर मे ही रहने वाले अशोक सिंह चंदेल साहब से मुलाक़ात करा दी जो उनके साथ महामंत्री थे। चंदेल साहब ने कहा कि लड़के को बाजार साथ क्यों ले जाते हो उनके घर छोड़ दें उनकी बेटियाँ बड़ी हैं उसे भी पढ़ा देंगी। लेकिन वह कहीं किसी दूसरी जगह मुझे छोड़ कर रुकता ही नहीं था। मेरे साथ ही उनके घर जाता और लौटता था। आस-पास के तथाकथित सवर्ण लोगों के मुक़ाबले बेकवर्ड चंदेल साहब और कुशवाहा साहब का व्यवहार बहुत अच्छा था। आस-पास के लोगों ने तो कुछ लोगों को उकसा कर तमाम दलाल और ग्राहक भेजे जो मेरा मकान खरीदना चाहते थे। दलील यह थी कि दो लोग इतने बड़े मकान का क्या करेंगे?इन कुराफातियों से भी निपटना होता था, घर का सारा काम भी करना होता था और बाजार मे तीन दूकानदारों की 5 बेलेन्स शीट भी बनानी  थी।अपने ही रिशतेदारों से शह प्राप्त आस-पास के लोगों ने उस अफवाह को खूब तेजी से उड़ाया और फैलाया ताकि मै भयभीत होकर मकान बेच जाऊ।  न कायर था न डरपोक, न किसी के आगे झुकता था। सब से अकेले दम पर ‘ईंट का जवाब पत्थर से’ की तर्ज पर मुक़ाबला किया और हर बार करारा जवाब दिया।

बिमला जीजी (जो रिश्ते मे बाबूजी की भांजी थीं एवं बउआ की सहेली भी क्योंकि लखनऊ-ठाकुर गंज मे नाना जी उनके पिता श्री के मकान मे किरायेदार रहे थे )ने मुझे सूचित किए बगैर अपने किसी देवर जो मथुरा मे थे को अपनी विधवा बेटी का पुनर्विवाह मुझसे करने का सुझाव दिया जो आए तो घर मे ताला देख कर बगल वाले शर्मा जी के घर पहुँच गए। शर्मा जी की मिसेज भी मथुरा की थीं उन लोगों को चाय नाश्ता कराया। शर्मा जी ने उन्हें झूठा बहकाया कि मकान दोनों भाइयों का है पता नहीं ऊपर नीचे बंटवारा होगा या एक-एक कमरा ऊपर व नीचे का बटेगा। उनसे मिलने के बाद उन्होने मुझे पत्र भेजा और यह सब बातें सूचित कीं।

इस दौरान पटना से सहाय साहब( जिन्हें मैंने बउआ के निधन की सूचना भी प्रेषित कर दी थी )ने मेरे माता-पिता के निधन पर खेद व्यक्त करते हुये अपना घर का फोन नंबर लिख भेजा था और फोन पर संपर्क बनाए रखने को कहा था। मेरे पास फोन था नहीं अतः वह दुकान पर मुझे करते थे। हींग-की -मंडी के ही एक दुकानदार (जिनके यहाँ मै जाब नहीं करता था एक मकान छोड़ कर किराये पर रहते थे और जिनहोने बउआ की बीमारी के दौरान अजय व शोभा से संपर्क करने हेतु अपने घर का नंबर प्रयोग कर लेने को कह दिया था )से मैंने सहाय साहब का फोन आने पर बात कराने की सुविधा प्रदान करने का अनुरोध किया और उन्होने सहर्ष स्वीकृति दे दी थी । एक बार जब घर पर उनके पास फोन आया मै हींग -की -मंडी मे ही था उनकी श्रीमतीजी ने अपनी दुकान का नंबर दे दिया। पटना से फोन आने पर उन्होने मुझे अपनी दुकान पर बुलवा कर बात करा दी। वह पटना मुझे बुलवाकर बात करना चाहते थे मैंने घर और शहर छोड़ कर जाने मे असमर्थता स्पष्ट कर दी जिस पर उन्होने कहा कि हम अपना आदमी भेजेंगे और पंजाबी जी को सूचना दे देंगे। 

 
 
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