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Category Archives: भाकपा

आगरा/1994 -95 / (भाग-2 )

मार्च के महीने मे दुकानों मे अकाउंट्स का काम ज्यादा होता था अतः मै काफी समय से इसी बहाने राजा-की-मंडी क्वार्टर पर नही गया हालांकि पार्टी आफिस बराबर जाता रहा था। होली पर भी नही गया था बावजूद शालिनी के कहने के।तब  संगीता ने चिट्ठी भेज कर अपनी सास की तरफ से शालिनी से मिलने आने को कहा था। लिहाजा एक रोज सुबह छोड़ गया था और शाम को लेने गया था और उस रोज पार्टी आफिस की छुट्टी करनी पड़ी। चाय के बाद संगीता और शालिनी अंदर के बारामदे मे बाते कर रही थी मुझे भी वहाँ बुलवा लिया। संगीता ने अक्तूबर की बात अब शालिनी को बताई होगी अतः शालिनी बोली कि भाभी जी आपसे होली खेलना चाहती थी आप आए नहीं। अब आज उन्हे पावडर लगा कर होली मना दे।संगीता ने पावडर का डिब्बा शालिनी को पकड़ा कर अपना सीना खोल लिया और शालिनी ने पावडर छिड़क कर मुझसे रगड़ देने को कहा। मेरे यह कहने पर कि जरूरत पर दवा लगाने और पावडर लगाने मे फर्क है – शालिनी ने खुद ही उनके पावडर छिड़क दिया। शालिनी ने बताया कि नौ जनवरी को संगीता जान-बूझ कर वैसा ब्लाउज पहन कर आई थी अगर आप ड्यूटी न चले गए होते तो ऊपर आनंद लेती।

हालांकि पार्टी आफिस जाकर जिला मंत्री कामरेड नेमीचन्द को मै पूर्ण सहायता करता था किन्तु रमेश मिश्रा जी उन्हे परेशान करने का कोई मौका नही चूकते थे। किशन बाबू श्रीवास्तव और एस कुमार के साथ हादसे हो चुके थे। कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह,MLC का एक पोस्ट कार्ड मिला जिसमे उन्होने 11 अप्रैल 1994 को रविन्द्रालय,लखनऊ मे ‘उत्तर  प्रदेश भाकपा के समाजवादी पार्टी मे विलय सम्मेलन’ मे शामिल होने को बुलाया था। मै नौ तारीख को चल कर 10 तारीख को लखनऊ आ गया और मीरा जीजी के घर पहुंचा क्योंकि माधुरी जीजी तब तक आफिस जा चुकी थी। दोनों के घर देने के लिए मिठाई लेने हलवाई की दुकान पर जैसे ही बढ़ा एकदम से मधु मक्खियों का एक झुंड आकर सिर पर चिपक गया जैसे -तैसे एक-एक मधु मक्खी को हटाया ,पूरा सिर और मुंह सूज गया था। माधुरी जीजी के एक बेटे को लेकर एक होम्योपैथी डॉ को दिखाया जिनहोने दवा दी और उससे लाभ हुआ। दिन मे सो गया जबकि सोने की आदत न थी। शाम को A-15,दारुल शफा मे कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह जी से मिलने गया वह बेहद खुश हुये कि आगरा से मै पहुंचा था। मेरे साथ महेंद्र जीजाजी भी गए थे उनको उनकी मदद चाहिए थी। रु 100/- के गबन के इल्जाम मे वह सस्पेंड हो चुके थे और बहाल होने के बाद भी अब उनका प्रमोशन प्रभावित हो रहा था। कामरेड रामचन्द्र जी ने न केवल आश्वासन दिया बल्कि अपनी ओर से उनकी पूरी पूरी मदद भी की जैसा कि खुद उन्होने स्वीकार किया था इस पत्र द्वारा-
(हालांकि तीन वर्ष बाद उन्होने रिश्ता भी तोड़ लिया था )

अगले दिन 11 अप्रैल को मै मय सामान के रविन्दरालय के लिए बस से जा रहा था परंतु महेंद्र जीजाजी बोले आफिस जाते मे तुम्हें रास्ते मे छोड़ देंगे और उन्होने रविन्दरालय के गेट पर मुझे छोड़ दिया। कामरेड मित्रसेन यादव जी ने मुझसे कहा जिस प्रकार भाकपा मे काम कर रहे थे उसी प्रकार अब सपा मे करना। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह जी ने भाकपा से आए प्रत्येक पदाधिकारी को मंच पर बुला कर सम्मानित किया था जबकि पदाधिकारियों ने उन्हे । आगरा भाकपा के कोषाध्यक्ष की हैसियत से मंच पर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह जी ने मुझ से भी हाथ मिलाया था।

‘अमर उजाला’,आगरा के प्रथम पृष्ठ पर छपी खबरों मे मेरा भी नाम था। तब शरद मोहन ने व्यंग्योक्ति भी की थी कि अभी तक मिश्रा जी का नाम प्रथम पृष्ठ पर नही छपा  था जबकि विजय बाबू का आ गया है। जलने-चिढ़ने वालो की कमी कभी नही होती है। जब नजीर बसंत मेला 1990 मे दूरदर्शन पर मिश्रा जी के साथ मेरा फोटो प्रदर्शित हो गया था तब भी ज़्यादातर लोग चिढ़ गए थे। पुराने कामरेड्स ने मिश्रा जी से आपत्ति भी की थी कि कामरेड माथुर को टी वी पर दिखा दिया उन्हे क्यों छोड़ दिया। वस्तुतः मिश्रा जी को खुद पता न था कि हम लोग टी वी पर प्रदर्शित हो जाएँगे चूंकि वह आगे अकेले बैठे थे उन्होने मुझे आगे बुला लिया था जबकि बाकी लोग पीछे ही बैठे रहे थे और टी वी पर न आ सके। 

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सठिया गये


(विजय,पूनम एवं यशवन्त माथुर)



अक्सर लोगों को कहते सुना है कि वह या यह सठिया गया है। वैसे लोग किस संदर्भ मे कहते हैं वे ही जानें। परंतु मै समझता हूँ कि जब कोई जीवन के साठ वर्ष पूर्ण कर ले तो उसे सठियाया कहते होंगे। यदि ऐसा ही है तब अब मै भी सठिया गया। मेरा ब्लाग का प्रारम्भिक लेख था-‘आठ और साठ  घर मे नहीं’। 02 जून 2010 को ब्लाग मे प्रकाशन से पूर्व यह लेख लखनऊ के एक स्थानीय अखबार मे प्रकाशित हो चुका था। इसके मुताबिक मुझे अब घर छोड़ कर ‘वानप्रस्थ’ग्रहण कर लेना चाहिए। परंतु समाज मे व्यावहारिक रूप से आज ऐसी व्यवस्था नहीं है। अतः आज 61वे वर्ष मे प्रवेश के बावजूद घर मे ही मेरी उपस्थिती बरकरार रह गई है। हालांकि मै चाहता हूँ कि घर मे न उलझा रह कर ‘राजनीति’ एवं लेखन  के माध्यम से समाज सेवा/जन सेवा मे अधिकाधिक अपना समय लगाऊ । यों तो राजनीति मे मै किसी न किसी रूप मे युवावस्था से ही हूँ। 22 वर्ष की अवस्था मे मै ‘सारू मजदूर संघ’,मेरठ की कार्यकारिणी मे था और कुछ समय कार्यवाहक कोषाध्यक्ष  भी रहा था। न चाहते हुये भी 26 वर्ष की अवस्था मे ‘होटल मुगल कर्मचारी संघ’,आगरा का महामंत्री (SECRETARY GENERAL)बनना पड़ा था। 25 वर्ष की अवस्था मे ‘जनता पार्टी'(चंद्रशेखर की अध्यक्षता वाली) का साधारण सदस्य और 28-29 वर्ष की अवस्था मे ए बी बाजपाई की अध्यक्षता वाली ‘भाजपा’ का सक्रिय सदस्य था। 34 वर्ष की आयु से ‘भाकपा’ मे आया (42 वर्ष आयु से 54 वर्ष आयु तक मुलायम सिंह की अद्यक्षता वाली ‘समाजवादी पार्टी’ मे -पूर्वी विधान सभा क्षेत्र ,आगरा का महामंत्री फिर बाद मे डॉ डी.सी .गोयल के महानगर अध्यक्ष बनने पर उनकी नगर कार्यकारिणी मे भी रहा और राज बब्बर से भी पहले ‘सपा’छोड़ कर खाली बैठा था कि आगरा-भाकपा के मंत्री के आग्रह पर वापिस ‘भकपा’मे लौट आया)और आज ‘सठियाते समय’ लखनऊ -भाकपा की जिला काउंसिल मे हूँ।


जहां अधिकांश लोगों को कहते सुना जाता है कि राजनीति भले लोगों के लिए नहीं है वहीं इसके ठीक विपरीत मेरा सुदृढ़ अभिमत है कि ‘राजनीति’ है ही भले लोगों के लिए और राजनीति को ‘गंदा’ करने के लिए जिम्मेदार हैं तथाकथित ‘भद्र जन’जो छुद्र स्वार्थों के कारण राजनीति से दूर रहते है और इसे गंदे लोगों के लिए खाली छोड़ देते हैं। MAN IS A POLITICAL BEING -यह कथन है सुकरात (प्लूटो)का जो अरस्तू (एरिस्टाटल )का गुरु था। अर्थात Man is a social animal -मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है-कहने वाले के गुरु का कहना है कि ‘ मनुष्य जन्म से ही एक राजनीतिक प्राणी है’। समाँज मे तो मनुष्य जन्म के बाद ही आता है तब जब वह सक्रिय होता है किन्तु राजनीति मे तो वह जन्मते ही शामिल हो जाता है। फिर कैसे ‘राजनीति’ गंदे लोगों के लिए है?दरअसल ऐसा कहने वाले लोग ही गंदे होते हैं जो समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन नही करना चाहते-उनका मूल मंत्र होता है-मेरा पेट हाऊ मै न जानूँ काऊ ।

आज सठियाते समय मै तो सामान्य से अधिक सक्रिय हूँ अपने शौक(Hobby)-राजनीति मे और लेखन मे भी  क्योंकि अभी हमारे उत्तर प्रदेश मे विधान सभा चुनाव चल रहे हैं। आज से दो सप्ताह बाद हमारे नगर लखनऊ मे मतदान होना है। इस बार हमारी भाकपा ने पूरे प्रदेश मे अपने 55 और सम्पूर्ण बामपंथ ने 115 प्रत्याशी चुनाव मे उतारे हैं एक मजबूत विपक्ष विधानसभा मे बनाने हेतु जो दबे-कुचले,शोषित-उपेक्षित ,किसानों-मजदूरों की समस्याओं पर सदन के भीतर ही सशक्त आवाज बुलंद करेगा। एक मजबूत विपक्ष के आभाव मे सरकारें निरंकुश और भ्रष्ट होती रही हैं। भ्रष्टाचार मुक्त पार्टी-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस बार के चुनावों के माध्यम से सरकार को अंकुश मे रखने का प्रयास कर रही है। सभी भद्र जनों को हमारे इस प्रयास मे सहयोग करना चाहिए। ‘एकला चलो रे’ सिद्धान्त के अनुसार मै तो इस अभियान मे संलिप्त हूँ ही और इस सठियाने के बाद और अधिक सक्रिय रहने का प्रयास करूंगा।

11 माह की नौकरी करने के बाद स्तीफ़ा मांगे जाने का विरोध करके डटे रहने के कारण ‘सारू मजदूर संघ ‘,मेरठ के कोषाध्यक्ष ने मुझ से कहा था जब अपने लिए संघर्ष कर सकते हो तो सब के भले के लिए यूनियन मे शामिल हो जाओ और पिछ्ले समय से सदस्यता देकर मुझे कार्यकारिणी मे शामिल कर लिया गया था। आगरा मे भी मुझ पर दबाव था कि मै आगे आ कर यूनियन के गठन मे सहयोग दूँ परंतु पहले मै दूर ही रहा। किन्तु ‘होटल मुगल कर्मचारी संघ’,आगरा का रेजिस्ट्रेशन होने से पूर्व ही महामंत्री का चयन बैंक आफ बरोदा मे DRO के रूप मे हो गया। मँझधार मे छूटी यूनियन का मुझे सीधे महामंत्री घोषित कर दिया गया और फिर बाद मे मुझे पिछले समय से सदस्यता ग्रहण करनी पड़ी थी। जनता पार्टी सरकार बनने के बाद मुगल होटल मे सहयोगी केरल वासी विजय नायर साहब ने एक रुपया लेकर जबर्दस्ती ‘जनता पार्टी’ की सदस्यता दे दी थी। क्योंकि ‘होटल मुगल कर्मचारी संघ’,आगरा के रेजिस्ट्रेशन के वक्त बी एम एस नेताओं ने मदद की थी अतः उनके प्रस्ताव को नजरंदाज न कर पाने के कारण ‘भाजपा’ का सक्रिय सदस्य बनना मजबूरी का सबब था। 25 लोगों से एक-एक रुपया लेकर रसीद बुक जमा कर देने के कारण ‘सक्रिय सदस्यता’ प्रदान कर दी गई थी। जब किसी से एक पान भी  खाये बगैर ही सबका कार्य सम्पन्न कराया हो तब सीट पर बैठे-बैठे एक-एक रु.की रसीद तो सम्पूर्ण 450 लोगों की काटी जा सकती थी 25 की क्या  कोई बात थी?एक-आध बार बैठकों मे भाग लिया तो समझ आया कि यह-भाजपा  तो व्यापारियों और पोंगापंथियों की पोषक पार्टी है  ,आम जनता के हितों से इसका कोई सरोकार नहीं है । अंदरूनी बैठकों मे इसके नेता और कार्यकर्ता कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ते हैं। अतः गुप-चुप तरीके से अलग हो गया।

होटल मुगल से बर्खास्तगी के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने के वक्त बने संपर्कों के आधार पर 1986 मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मे शामिल कर लिया गया और बाद मे कोषाध्यक्ष भी रहा। 1994 से 2004 तक समाजवादी पार्टी ,आगरा मे रहा, दो वर्ष निष्क्रिय रहने के बाद वापिस सी पी आई  मे आ गया और 2006 से पुनः भाकपा मे सक्रिय हूँ। 45 वर्ष से 52 वर्ष की आयु तक ‘बल्केश्वर-कमला नगर आर्यसमाज’,आगरा मे भी सक्रिय रहा और इसकी कार्यकारिणी मे भी शामिल किया गया जिससे एक माह मे ही हट गया था। स्वामी दयानन्द सरस्वती से शुरू से ही प्रभावित था 11 वर्ष की उम्र मे उनका ‘सत्यार्थ प्रकाश’ काफी अच्छा लगा था। 17 से 19 वर्ष की आयु के मध्य मेरठ कालेज ,मेरठ के पुस्तकालय मे उनके प्रवचनों का संग्रह-‘धर्म और विज्ञान’ भी पढ़ा-समझा था और आज भी उनके विचार सर्वोत्कृष्ट लगते हैं। किन्तु महर्षि द्वारा स्थापित संगठन ‘आर्यसमाज’ अधिकांशतः उनके विचारों के विरोधी संगठन आर एस एस से प्रभावित लोगों के चंगुल मे फंस गया है अतः गुप-चुप तरीके से संगठन से प्रथक्क हो गया। 49  वर्ष से 53 वर्ष की आयु तक ‘कायस्थ सभा’,आगरा मे भी सक्रिय रहा और इसकी कार्यकारिणी मे तथा कई सचिवों मे से एक सचिव भी रहा। इसका तथा ‘अखिल भारतीय कायस्थ महासभा’,आगरा का आजीवन सदस्य होते हुये भी इन संगठनों से निष्क्रिय इसलिए हो गया क्योंकि ये संगठन इनको चलाने वाले नेताओं के व्यापारिक हितों का संरक्षण करते हैं न कि आम लोगों का कल्याण। 

कुछ क्या अधिकांश लोगों को यह हास्यास्पद प्रतीत होता है कि मै कम्युनिस्ट पार्टी मे होते हुये भी ‘वैदिक’मत का समर्थक कैसे हूँ?कारण यह है कि लोग भी समझते हैं और कम्युनिस्ट खुद भी अपने को धर्म विरोधी कहते हैं। वस्तुतः ‘धर्म’ को न समझने के कारण ही ऐसा भ्रम बना हुआ है। साधारणतः लोग ढोंग और पाखंड को धर्म कहते हैं और कम्यूनिज़्म इसी का विरोध करता है और स्वामी दयानन्द ने भी इसी का विरोध किया है। यही कारण है कि ठोस आर्यसमाजी को भी कम्युनिस्टों की भांति ही संशय की दृष्टि से देखा जाता है। जबकि वास्तव मे ‘मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध’ बनाने हेतु दोनों के विचार समान हैं । ‘साम्यवाद’ जिसे कम्यूनिज़्म कहा जाता है मूल रूप से भारतीय अवधारणा ही है जिसे मैक्स मूलर साहब अपने साथ यहाँ की मूल पांडु लिपियाँ लेकर जर्मनी पहुंचे और वहाँ उनके जर्मन अनुवाद से प्रभावित हो कर कार्ल मार्क्स ने जो निष्कर्ष निकाले वे ही कम्यूनिज़्म के नाम से जाने जाते हैं। सारा का सारा भ्रम साम्राज्यवाद के हितचिंतक संप्रदाय वादी आर एस एस का फैलाया हुआ है। इसी भ्रम को तोड़ना मेरा लक्ष्य है। अधिकाधिक लोगों का कल्याण हो और वे भटकें नहीं इसी विचार को लेकर मै ‘हवन विज्ञान’ संस्था बनवाना चाहता था और लोगों का हकीकत -सत्य से साक्षात्कार करवाना चाहता था। अपने निकटतम रिशतेदारों ( जो मेरे लखनऊ आने के प्रबल विरोधी रहे और अब संबंध तोड़ लिए )के फैलाये कुचक्र के कारण इस विचार को फिलहाल स्थगित रखा है परंतु उम्मीद है कि भविष्य मे सफल हो सकूँगा।

दूसरे शौक लेखन मे 19 वर्ष की आयु मे ‘मेरठ कालेज पत्रिका’,मे एक लेख ‘रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना’ के प्रकाशन के साथ ही शामिल हूँ।21 वर्ष की अवस्था मे आगरा जहां अजय इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे घूमने गया था और उनके परिचय से फारवर्ड ब्लाक के एक नेता के अखबार ‘युग का चमत्कार’ मे पहला लेख-‘अंधेरे उजाले’ जो महर्षि स्वामी दयानन्द ‘सरस्वती’पर था प्रकाशित  हुआ था। आगरा के ही एक अखबार ‘पैडलर टाइम्स’ मे पहली कविता’यह महाभारत क्यों होता?’ प्रकाशित हुई थी।  सारू स्मेल्टिंग,मेरठ मे अकौण्ट्स विभाग मे होने के कारण पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों से भी वास्ता पड़ता रहता था। ‘पी  सी टाइम्स’ के संपादक प्रकाश चंद जी मेरे सभी लेख छापने लगे उस वक्त उम्र 22  वर्ष थी। लेखों के आधार पर पत्र के प्रबन्धक मिश्रा जी ने एक बार मुझसे पूछा था कि आपने एम ए ‘राजनीति शास्त्र’ मे किया है अथवा ‘हिन्दी साहित्य’ मे? विनम्रता पूर्वक उन्हे समझाना पड़ा कि ,साहब मैंने तो एम ए ही नहीं किया है मात्र बी ए किया है। उन्होने प्रसन्नतापूर्वक कहा था जब भी इधर आना मुझसे मिले बगैर न जाना। उनके निर्देश का मैंने सहर्ष पालन सदैव किया।

आगरा मे 29 वर्ष की अवस्था से ‘सप्त दिवा’साप्ताहिक मे नियमित लेख प्रकाशित होते रहे बाद मे सहायक संपादक तथा उसके बाद उप संपादक के रूप मे भी इससे संबद्ध रहा। ‘ब्रह्मपुत्र समाचार’ ,आगरा मे 50 वर्ष की आयु से नियमित लेख आदि छपते रहे। ‘माथुर सभा’,’कायस्थ सभा’ की मेगजीन्स मे तो लेख छ्पे ही वैश्य समुदाय की ‘अग्रमंत्र’ त्रैमासिक पत्रिका मे भी उप-संपादक के तौर पर संबद्ध रहकर नियमित लिखता रहा। 58 वर्ष की उम्र मे लखनऊ के एक स्थानीय अखबार मे भी लेख छपे किन्तु जून 2010 से ‘क्रांतिस्वर’ ब्लाग बन जाने के बाद केवल ब्लाग्स और फेसबुक मे ही लिख रहा हूँ और आगे भी यह शौक बदस्तूर जारी ही रहने की संभावना है।

 

आगरा /1992 -93 ( विशेष राजनीतिक भाग- 5 )

गतांक से आगे—
लगातार नौ वर्षों तक आगरा भाकपा के जिला मंत्री रह चुकने के बाद मिश्रा जी ने अपने हटाये जाने को अपनी करारी हार माना और बदले की कारवाइयों पर अमल करने लगे। उन्हें लगा कि यह उनके विरोधियों की उनके विरुद्ध साजिश है। उन्हें अपना अतीत याद आ रहा था जैसा पुराने कामरेड्स ने बताया था और कभी-कभी मौज मे होने पर वह खुद भी बताते रहते थे। आगरा भाकपा के संस्थापक मंत्री कामरेड महादेव नारायण टंडन के विरुद्ध डॉ जवाहर सिंह धाकरे से मिल कर मिश्रा जी ने खूब गुट-बाजी की थी और उन्हें हटने पर मजबूर किया था । टंडन जी ने भी अपने समर्थक डॉ महेश चंद्र शर्मा के पक्ष मे ही पद छोड़ा था। शर्मा जी को बीच कार्यकाल मे पद छोडने पर डॉ धाकरे और मिश्रा जी ने मजबूर कर दिया था। डॉ धाकरे जिला मंत्री और मिश्रा जी सहायक जिला मंत्री बने थे। डॉ धाकरे के 06 माह हेतु सोवियत रूस पार्टी स्कूल मे जाने की वजह से मिश्रा जी कार्यवाहक जिला मंत्री बने तो जमे ही रहे वापस चार्ज डॉ धाकरे को नहीं दिया तब से ही दोनों मे मन-मुटाव चला आ रहा था। मिश्रा जी को लगा कि यह डॉ धाकरे का खेल है। परंतु डॉ धाकरे तो पिछड़ा वर्ग के ओमप्रकाश जी को भले ही कुबूल कर रहे थे अनुसूचित वर्ग के कारेड नेमी चंद उनकी पसंद के नहीं थे। डॉ धाकरे के भांजा दामाद कामरेड भानु प्रताप सिंह ने मुझ से साफ कहा था कि,माथुर साहब कहने -सुनने मे तो बातें अच्छी लगती हैं -नेमीचन्द से तो मिश्रा जी ही भले थे। हालांकि नेमीचन्द बनेंगे मुझे खुद सम्मेलन के दूसरे दिन ही पता चला था हमारी त्तरफ से तो ओमप्रकाश जी उम्मीदवार थे। परंतु चुने जाने के बाद जैसा दूसरे लोग चाहते थे मै नेमीचन्द जी को हटाये जाने के सख्त खिलाफ था। हालांकि नेमीचन्द जी लिखत-पढ़त कुछ भी नहीं करते थे और यह भार मुझ पर अतिरिक्त था लेकिन मै चट्टान की तरह उनके समर्थन मे डटा रहा। नेमीचन्द जी भी जानते थे कि उनका पद पर कायम रहना केवल मेरे कारण ही संभव हो रहा है। लोगों ने उनके दिमाग मे खलल डालने के लिए उन्हें नेमीचन्द माथुर कहना शुरू कर दिया। परंतु वह विचलित नहीं हुये।

मिश्रा जी के समक्ष स्पष्ट था कि जब तक मै नेमीचन्द जी के साथ हूँ तब तक उनकी दाल नहीं गल पाएगी। मुझे झुका-दबा या खरीद लेने की फितरत उनके पास नहीं थी। इसलिए उन्होने षड्यंत्र का सहारा लिया। एक बार अचानक कार्यकारिणी बैठक मे मिश्रा जी ने मुझे पार्टी से निकालने का प्रस्ताव रख दिया। शायद वह पहले से लामबंदी कर चुके थे। नेमीचन्द जी भी कुछ न बोले। उस समय बाहर बारिश हो रही थी मैंने अपना छाता उठाया और बैठक से उठ कर घर चल दिया। कामरेड जितेंद्र रघुवंशी ने कहा कि बारिश बंद होने के बाद चले जाना तेज बारिश मे छाता भी बेकार है। मैंने कहा जब आप लोगों ने पार्टी से अकारण मुझे निकाल ही दिया तो चिंता क्यों?यह अवैधानिक फैसला है और मै इसे चुनौती दूंगा।

मैंने जिला मंत्री कामरेड नेमीचन्द से  बाद मे मिल कर कहा कि उनके समर्थन न देने के बावजूद मै कार्यकारिणी के इस अवैध्य फैसले को संवैधानिक चुनौती दे रहा हूँ और इस आशय का लिखित पत्र उनको सौंप दिया। उन्होने मुझे आश्वासन दिया कि वह जिला काउंसिल मे इस विषय पर मेरे साथ रहेंगे। कार्यकारिणी चूंकि मिश्रा जी द्वारा तोड़ ली गई थी वह चुप रहे थे। राज्य-केंद्र पर भी मैंने इस फैसले को चुनौती की सूचना भेज दी थी। मलपुरा शाखा के कामरेड्स जिंनका बहुमत था मेरे साथ थे ,उन्होने तो यहाँ तक कह दिया था कि यदि मिश्रा जी पीछे नहीं हटे तो वे सब भी पार्टी छोड़ देंगे। जिस दिन जिला काउंसिल की बैठक हुई मिश्रा जी ने कामरेड राजवीर सिंह चौहान को बैठक का सभापति घोषित करा दिया जिन्हें वह पहले ही सेट कर चुके थे। उन्होने सभापति बनते ही मुझे बैठक से बाहर कर दिया। अंदर धुआंधार बहस होती रही और मै इतमीनान से छत पर मौजूद रहा। डॉ जवाहर सिंह धाकरे ने आते ही मुझसे सवाल किया कि बैठक से बाहर क्यों हो ?मैंने कहा सभापति चौहान साहब का यही निर्णय है।

डॉ धाकरे से मेरे द्वारा पहले ही पार्टी संविधान पर चर्चा हो चुकी थी। उन्होने बैठक मे पहुँचते ही सभापति जी से संविधान की धाराओं पर चर्चा की और उन्हें बताया कि उनका फैसला एक और असंवैधानिक कारवाई है। कार्यकारिणी समिति का गठन जिला काउंसिल ने किया था और जिला काउंसिल का गठन सम्मेलन ने अतः कार्यकारिणी समिति जिला काउंसिल के सदस्य को हटा ही नहीं सकती थी। सभापति अगर अपना फैसला नहीं बदलेंगे तो उनके विरुद्ध भी संविधान-विरोधी कारवाई करने का प्रस्ताव पारित किया जाएगा। चौहान साहब की ठाकुर ब्रादरी के धाकरे साहब ने जब उन्हें चुनौती दी तो उन्होने अपना फैसला पलटते हुये दो-तीन वरिष्ठ कामरेड्स भेज कर मुझे बैठक के भीतर बुलवाया। उन्होने यह भी सूचित किया कि जिला काउंसिल ने कार्यकारिणी का फैसला रद्द कर दिया है अतः मै न केवल पार्टी मे बल्कि अपने सभी पदों पर पूर्ववत कार्य करता रहूँ। संवैधानिक जीत तो हासिल हो गई ,किन्तु एक बारगी इज्जत पर  तो नाहक  हमला हुआ ही इसलिए मन ही मन मौका मिलते ही पार्टी से खुद ही अलग हो जाने का निश्चय कर लिया और किसी से इस संबंध मे कुछ न कहा तथा कार्य पहले की भांति ही करता रहा।

एक बार जिला कचहरी पर कोई धरना  प्रदर्शन था मै वहाँ भी (उस घटना के बाद मैंने मिश्रा जी से बोलना बंद कर दिया था) मिश्रा जी से न बोला। मिश्रा जी मेरे पास आए और बोले माथुर साहब यह सब तो चलता ही रहता है,हम लोग एक ही पार्टी मे हैं ,उद्देश्य एक ही हैं ,काम एक साथ कर रहे हैं तो बोल-चाल बंद करने का क्या लाभ। मजबूरन उनका अभिवादन करना ही पड़ा वह वरिष्ठ थे और खुद मेरे पास चल कर आए थे । हम लोग उनके हित मे थे वह हमें गलत समझ रहे थे। कटारा ने तांत्रिक प्रक्रिया से उनके सोचने की शक्ति कुंन्द कर दी थी।

मिश्रा जी ने शायद यह भी मान लिया था कि वह मुझे हरा न पाएंगे। इसलिए उन्होने और गंभीर चाल चली जो अपने समय पर ही लिखित स्थान प्राप्त करेगी।

 

आगरा /1992 -93 (राजनीतिक विशेष -भाग- 2 )

गतांक से आगे….
पूर्व-पश्चिम के कार्यकर्ताओं मे वैभिन्य था और कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह को पश्चिम के कामरेड्स का समर्थन न मिल सका अतः उन्होने कामरेड मित्रसेन यादव का समर्थन किया जिनहे सर्व-सम्मति से राज्य-सचिव चुन लिया गया। आगरा से जो 5 कामरेड्स राज्य-काउंसिल हेतु चुने गए उनमे मिश्रा जी अपने परम-प्रिय कटारा को स्थान न दिला सके। केंद्रीय कंट्रोल कमीशन के चेयरमेन कामरेड काली शंकर शुक्ला जी से व्यक्तिगत सम्बन्धों के आधार पर मिश्रा जी ने कटारा को उत्तर-प्रदेश कंट्रोल कमीशन का सदस्य नामित करवा लिया। कोई कुछ बोल तो न सका परंतु मिश्रा जी ने ऐसा करके अपने सभी हितैषियों को अपने विरुद्ध कर लिया।

राज्य-सम्मेलन समाप्ती के बाद आगरा के जिला सम्मेलन की तैयारी होना था। मिश्रा जी ने मुझ से कहा कि,अपने ज्योतिष से गणना करके जून के महीने मे दो तारीखें बताओ जिससे सम्मेलन शांतिपूर्ण हो जाये ,राज्य सम्मेलन मे तो काफी तनाव रहा। मैंने पत्रा देख कर उन्हे मध्य जून की दो तारीखें बता दी उन्हीं मे उन्होने जिला सम्मेलन करने की घोषणा की। राज्य-सम्मेलन के आय-व्यय का विवरण तैयार होने पर मिश्रा जी भड़क गए क्योंकि लगभग रु 6000/-अधिक (EXCESS ) निकल रहे थे। अकाउंट्स का थोड़ा भी जानकार समझ सकता है कि धन का बच जाना (एक्सेस) क्राईम है जबकि कम पड़ना (शारटेज) होना आम बात है।

मिश्रा जी का भारी दबाव था कि मै अपने अकाउंट्स ज्ञान का प्रयोग करके इस विवरण को इस प्रकार एडजस्ट कर दूँ कि EXCESS न रहे। ईमानदारी और पार्टी के प्रति वफादारी का तकाजा था कि विवरण को जैसे का तैसा रखा जाये और वही मैंने किया भी,चर्चा करने पर मिश्रा जी के सहयोगी और विरोधी सभी मुझसे सहमत थे। इस विवरण को मुद्दा बना कर मिश्रा जी ने मुझे परेशान करने की तिक्ड़मे की तो मैंने उनकी हिदायत की अवहेलना करते हुये राज्य-सम्मेलन के विवरण पर बची रकम को बैंक मे जमा करा दिया उसी अकाउंट मे जिसमे जिले का धन रहता था। अब तो मिश्रा जी एक प्रकार से मेरे शत्रु ही हो गए। कामरेड सरदार रणजीत सिंह काफी पुराने थे और सबके सब हाल जानते थे और उनकी उपेक्षा थी ,मुझसे बोले इस विषय पर पूरी तरह अड़े रहो इस बार मिश्रा एक ईमानदार आदमी से टकरा रहा है उसकी करारी हार हो जाएगी। वह मुझे सुबह 7 बजे मलपुरा ले चलने हेतु मेरे घर पर 6 बजे दयालबाग से आ गए। दोनों अपनी-अपनी साइकिलों से 16 km चले,उनके लिए 72-73 वर्ष की आयु मे इतनी दूर साइकिल से आना-जाना मुश्किल था किन्तु पार्टी-हित मे उन्होने यह कष्ट भी सहा। मलपुरा शाखा पार्टी की सबसे ज्यादा संख्या वाली शाखा थी और पार्टी मे उनका बहुमत भी था। उस शाखा के वरिष्ठ नेताओं से उन्होने संपर्क किया और वस्तु-स्थिति बताई ,सभी ने इस विषय मे मिश्रा जी का विरोध करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें जिला सम्मेलन मे हटा देने की बात कही। उन लोगों का कहना था वे सब मिश्रा जी के समर्थक माने जाते हैं इसलिए उनके प्रस्तावों का कामरेड जवाहर सिंह धाकरे विरोध करते हैं अतः उनका भी समर्थन हम लोग प्राप्त कर लें। कामरेड किशन बाबू श्रीवास्तव बाह के थे और वहीं के कटारा साहब भी थे बल्कि वही उन्हें पार्टी मे लाये थे किन्तु उन्होने श्रीवास्तव साहब को उनकी शाखा के मंत्री पद से हटवा दिया था क्योंकि उनकी छवी धाकरे साहब के पिछलग्गू की थी। लिहाजा हम लोगों ने उनसे संपर्क कर के धाकरे साहब से बात करने की जरूरत बताई। डॉ धाकरे तब R.B.S.कालेज के प्रिंसिपल थे उनके कार्यालय मे सरदारजी ,श्रीवास्तव साहब और मै मिले और उन्होने सहर्ष अपना समर्थन दे दिया। कभी भी अपने कालेज -निवास पर मिलने आने की बात भी उन्होने कही जहां ठीक से बात कर सकें।

मिश्रा जी के साथ ज़मीनों का धंधा करने वाले कामरेड पूरन खाँ जो उनके घर मे भी गहरे घुसे हुये थे और उनके सम्पूर्ण परिवार से सहानुभूति रखते थे,मुझसे लगातार कह रहे थे कि मिश्रा जी के परिवार को बचाओ कटारा उनके परिवार को तबाह करना चाहता है और वह कटारा प्रेम मे डूबे हुये हैं। कामरेड दीवान सिंह भी मिश्रा जी के एहसानमंद थे और वह भी उनके परिवार को कटारा से बचाना चाहते थे। मिश्रा जी के साथ जूते की फेकटरी खोलने वाले कामरेड नेमीचन्द भी उनके खैरख्वाह थे और भलीभाँति जानते थे कि उस फेकटरी को फेल करने मे कटारा और उनके बेटे का पूरा-पूरा हाथ था। इन लोगों का कहना था कि कटारा ने किसी तांत्रिक प्रक्रिया से मिश्रा जी को वशीभूत कर लिया है,पार्टी तो सम्हाल ली जाएगी और मिश्रा जी के बगैर भी चलती रहेगी किन्तु उनका परिवार बुरी तरह बिखर जाएगा। लिहाजा कटारा को काबू करने के लिए मिश्रा जी को हटाना जरूरी हो गया था। मलपुरा के कामरेड्स को भी मिश्रा जी से व्यक्तिगत सहानुभूति थी और वे भी कटारा से मुक्ति की मुहिम मे मिश्रा जी को पदच्युत करने के हामी थे। …… 

 

आगरा/1992 -93 (भाग-1)

सेठ जी के मित्र और ‘शू चैंबर’ के प्रेसीडेंट शंकर लाल मुरजानी साहब अक्सर उनकी दुकान मे आकर सो जाते थे। वह रश्मि एन्क्लेव,कमला नगर मे रहते थे। एक दिन मुझ से बोले माथुर साहब क्या बात है बेहद कमजोर हो गए हो। मैंने कहा साहब जीवन  चलाने हेतु कमजोर होना जरूरी है,तो फिर वह बोले और कमजोर कर दें?मैंने कहा यदि आप उचित समझते हैं तो कर दें। उन्होने कहा कल सुबह मुझे घर पर मिलो। जब अगले दिन मै उनके घर गया तो उन्होने कहा तुम्हारा सेठ बड़ा मतलबी है जब फँसता है मेरे पास आता है,मैंने उससे कहा था कि,माथुर साहब को पूछो मेरे यहाँ पार्ट-टाईम करेंगे? एक साल हो गया कहता है पूछने का टाईम नहीं मिला। इसलिए मैंने तुमसे सीधे बात की। मेरे घर पर आकर डेढ़ घंटा गर्मियों मे 7-30 से 9 और जाड़ों मे 9 से 10-30 सुबह सेल्स टैक्स-इन्कम टैक्स का काम कर देना शुरू मे रु 600/- दूंगा। घर के नजदीक होने तथा उनके व्यापारी नेता होने के कारण उनसे व्यवहार रखना घाटे का सौदा नहीं था,मैंने स्वीकार कर लिया। वह ‘शू फेक्टर्स फ़ेडेरेशन ‘ के वाईस प्रेसिडेंट थे और राज कुमार सामा जी प्रेसिडेंट जो भाजपा के बड़े नेता थे। हालांकि वह जानते थे कि मै भाकपा मे सक्रिय हूँ फिर भी उन्हे स्पष्ट कर दिया। वह बोले हमारा -तुम्हारा संपर्क सिर्फ जाब तक है हम अपनी राजनीति मे तुम्हें नहीं शामिल करेंगे और न तुम्हारी राजनीति मे दखल देंगे।

पता नहीं क्यों सेठ जी उनके घर मेरे काम स्वीकारने से खुश नहीं थे?वह खिचे-खिचे रहने लगे। मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता था लेकिन मै और सतर्क हो गया। इससे पूर्व वह खुद मुझे तीन अलग-अलग पार्ट-टाईम जाब दिला चुके थे परंतु उन्हें अपने मित्र के यहाँ मेरा जाब करना अखर गया था। मैंने अपने भाकपा ,जिला मंत्री मिश्रा जी से भी चर्चा की थी। उन्होने बताया कि ये जूता व्यापारी भाजपा के होते हुये भी कम्यूनिस्ट पार्टी से दबते हैं क्योंकि तमाम लोग ‘सोवियत यूनियन’ को जूता सप्लाई करते हैं। रूस से पेमेंट मिलना निश्चित रहता है। कभी कोई दिक्कत होती है तो पार्टी के बड़े नेताओं से संपर्क साधते हैं। इसी लिए आपका कम्यूनिस्ट होना उन्हे नागवार नहीं लगता है,और वह सेठ भी आपको अपनी तरफ से हटाने की पहल नहीं करेगा।

जब रमेशकान्त लवानिया मेयर थे तब मिश्रा जी ने अपने घर के आस-पास सीवर की समस्या को उनके दफ्तर मे जाकर बताया तो उन्होने कहा था -अरे मिश्रा जी आपने आने की तकलीफ बेकार की फोन कर देते तब भी काम हो जाता। जो काम भाजपा का क्षेत्रीय पार्षद न करा सका वह भाकपा के जिलामंत्री की पहल पर चुटकियों मे हो गया। इस उदाहरण से मिश्रा जी ने मुझे समझाया था कि ये व्यापारी बड़े डरपोक होते हैं जब तक उनकी नब्ज आपकी पकड़ मे है वे आपको हटा नहीं सकते।

राजनीति और आजीविका के क्षेत्र मे सभी कुछ बदस्तूर चलता रहा। सिर्फ घरेलू क्षेत्र मे शालिनी का अपनी भाभी संगीता के प्रति बदला हुआ व्यवहार आश्चर्यजनक रहा। इस वर्ष की गर्मियों मे भी उनकी माँ जब 7-8 रोज के लिए बाहर गई तो शालिनी जल्दी-जल्दी सिटी के क्वार्टर पर जाती थीं। चूंकि तब तक स्कूल बंद नहीं हुये थे और उनकी माँ जल्दी गई थीं। यशवन्त को स्कूल छोडते हये मै शंकर लाल जी के घर चला जाता था। उनके घर से लौटने पर शालिनी साईकिल पर मेरे साथ सिटी क्वार्टर की परिक्रमा करके उसकी छुट्टी से पहले लौट आती थीं। वहाँ दिन भर रुकने की बजाए दो ढाई घंटे मे लौट लेना होता था। मै सेठ जी के यहाँ 6 घंटों की बजाए सिर्फ 3 घंटे काम तब कर पाता था ,खैर वह कहते कुछ नहीं थे। इसी क्रम मे एक बार शालिनी ने संगीता को कुछ इशारा किया और उन्होने मुस्करा कर जवाब दिया हाँ वायदा याद है आप बताइये किस गाने पर डांस करना है। शालिनी ने उन्हें कान मे कुछ कहा और उन्होने कहा ठीक है मौन डांस ही करेंगे गाएँगे नहीं। मै नहीं कह सकता कि कोई गाना भी था या नहीं। डांस मेरे समझ से परे था। मै तो सिर्फ इतना ही समझ सका कि डांस के नाम पर वह शरीर को मटकाना भर था। ऐसी हरकत ने केवल संगीता के शरीर मे उत्तेजना ही व्याप्त की और पूर्व की भांति जब स्वतः वस्त्र न खुले तो संगीता ने भाव-प्रदर्शन के सहारे उन्हे खोला ,नारा ढीला करने के नाम पर नीचे के वस्त्र हटाने से साफ हो गया कि बार-बार एक ही प्रक्रिया का दोहराया जाना किसी खास मकसद की छोटी कड़ी है। डी एस पी इंटेलीजेंस (जो मुगल होटल मे सेक्यूरिटी आफ़ीसर थे जब मैंने 1975 मे ज्वाईन किया था) के साथ बैठकें-चर्चाए व्यर्थ नहीं थीं उनसे कुछ न कुछ सीखा ही था। अच्छी या बुरी किसी प्रकार की प्रतिक्रिया मैंने कभी भी न दी। मैंने घर पर शालिनी से पूछना भी बंद कर दिया कि ऐसा करने का कारण क्या?

1990-91  मे आडवाणी की रथ-यात्रा और रामजन्म भूमि आंदोलन  द्वारा होने वाले अनिष्ट से जनता को आगाह करने हेतु यू पी मे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ने तब की सातों कमिशनरियों के मुख्यालयों पर ‘सांप्रदायिकता विरोधी रैली ‘ के आयोजन का फैसला किया था ।  मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सभी जिलों मे रैली करने का प्रस्ताव किया ,उसी क्रम मे मथुरा मे भी एक रैली हुई थी। मै अपने भाकपा साथियों के साथ ट्रेन से मथुरा गया था। शालिनी का कहना था कि उनकी छोटी बहन सीमा के घर भी हाल-चाल लेता आऊ;  क्योंकि योगेन्द्र चंद्र का क्वार्टर मथुरा जंक्शन पर ही था मैंने साथियों से सीधे रैली स्थल पर मिलने का वादा करके प्लेटफार्म से ही क्वार्टर का रास्ता पकड़ा। तभी थोड़ी देर पहले योगेन्द्र दिल्ली की गाड़ी पकड़ने हेतु गए होंगे और सीमा ने समझा था कि उनकी गाड़ी छूट गई होगी जिससे वह घर लौट आए होंगे । उन लोगों को मेरे पहुँचने की सूचना नहीं थी। सीमा ने दरवाजे खोले तो अस्त-व्यस्त और पुराने-फटे कपड़ों मे थी ,सफाई करते -करते बेल बजने पर यह सोच कर दरवाजा खोला था कि योगेन्द्र ही उल्टे -पैरों लौटे होंगे। उस दशा मे पहले कभी सीमा को नहीं देखा था। सीमा ने सोफ़े पर बैठाने के बाद अपनी बेटी (जो जब 6-7 वर्ष की रही होगी )से पानी भिजवा दिया और खुद कपड़े बदलने के बाद ही आई। यह अंतर था शरद मोहन और उनकी पत्नी संगीता के चरित्र और शरद की छोटी बहन सीमा के चरित्र का ,गफलत की बात और थी जो सीमा ने दरवाजा खोला था तब की दशा मे और फिर बैठ कर बात-चीत करते समय की दशा मे। मुझे ताज्जुब भी था कि आवारा माँ, भाइयों,भाभी का असर सीमा पर भी अपनी और  बहनों की ही तरह  बिलकुल नहीं पड़ा था।बेटियाँ  अपनी माँ के चरित्र से प्रभावित नहीं थीं जबकि बेटे माँ के चरित्र से प्रभावित थे। कमलेश बाबू के जिगरी दोस्त और भतीज दामाद कुक्कू(जिनकी बेटी की नन्द कमलेश बाबू की छोटी बेटी की देवरानी है) तो अश्लील पुस्तकें ला कर बिस्तर के नीचे छिपा कर रखते थे ताकि उनकी बहनें भी पढे और प्रभावित हों परंतु उनकी बहनें अपने आवारा भाई से प्रभावित नहीं हुई। यह एक अच्छी बात रही।


 

आगरा /1990-91 (भाग-8 )

इन दिनों विहिप आदि का रामजन्मभूमि आंदोलन भी ज़ोरों पर था। शिला पूजन आदि के नाम पर धन बटोरा जा रहा था विद्वेष भड़काया जा रहा था। ‘मंटोला’ क्षेत्र मे पी ए सी के माध्यम से तत्कालीन एस एस पी कर्मजीत सिंह घरों से निवासियों को खदेड़ने मे कामयाब रहे थे। वह कल्याण सिंह के चहेते थे बाद मे मायावती के चहेते बन कर डी जी पी बने। हमारी पार्टी भाकपा ‘सांप्रदायिकता विरोधी’ अभियान चलाती रहती थी ,अक्सर जिला मंत्री मिश्रा जी मुझ से भी विचार व्यक्त करने को कहते थे। मै संत कबीर के दोहों के माध्यम से अपनी बात सिद्ध करता था जो उन्हें तब पसंद आता था और वह भी कभी-कभी ऐसा ही करते थे।

इन्ही वर्षों के लगभग ‘पनवारी’ नामक गाँव मे एक दलित को घोड़ी पर चढ़ कर बारात निकालने से रोकने हेतु जातीय संघर्ष भी हुआ था। (सन ठीक से याद नहीं है)। कमलानगर मे भी कर्फ़्यू लागू था। बउआ -बाबूजी उस समय फरीदाबाद मे अजय के पास थे। एक दिन शरद की बड़ी बेटी मेरे साथ साइकिल पर बैठ कर आ गई थी। सुबह शालिनी ने ही सिटी पर मिलते आने को कहा था। दिन मे उन्हें बुखार चढ़ गया था ,शाम को खाना बनाने का विचार नहीं था परंतु भतीजी के अचानक आ जाने पर बनाना पड़ा हालांकि वह 4या 5 वर्ष की ही रही होगी। जब कर्फ़्यू लगा उस समय वह हमारे घर थी। दो दिन के बाद पहुंचाने का वादा कर्फ़्यू ने पूरा नहीं होने दिया। शरद के एक मौसेरे भाई आशुतोष मेडिकल कालेज मे शायद तब हाउस जाब कर रहे थे ,एक दोपहर आकर अपने स्कूटर से शरद की बेटी को ले गए । डॉ होने के नाते वह बिना पास के आ-जा सकते थे। अपने हास्टल से सिटी क्वार्टर पहुंचे उन लोगों का हाल-चाल लेने तो उनकी भाभी संगीता ने अपनी बेटी को ले आने को उनसे कहा था।

कर्फ़्यू समाप्त होने के काफी बाद एक दिन राज कुमार शर्मा जी (सप्तदिवा वाले विजय जी के बड़े भाई) एक और सज्जन के साथ यों ही मिलने चले आए थे। वह हमारी विचार -धारा से परिचित थे फिर भी बोले कि परंपरा तोड़ कर दलितों को बारात नहीं निकालनी चाहिए थी। पढे-लिखे सहायक अभियंता जी साईन्स साईड के थे फिर भी अवैज्ञानिक बातों के जरिये पोंगावाद का समर्थन कर रहे थे। वस्तुतः अमीर लोग गरीबों को ऊपर उठते नहीं देख सकते बल्कि उन्हें कुचले रखना चाहते हैं इसीलिए जातिवाद का समर्थन करते हैं।

लगभग यही धारणा शरद और उनकी माँ की भी थी। घर मे भी उनके यहाँ दकियानूस वाद  ही हावी था। संगीता को फिर रेलवे अस्पताल मे इलाज नहीं कराया जबकि फ्री होता। मेडीकल कालेज मे फेफड़ों की टी बी बताया गया और फेफड़ों से इंजेक्शन के जरिये पानी निकाला जाता था। एक दिन शालिनी सुबह मेरे साथ ड्यूटी जाने के समय यशवन्त को लेकर चलीं और सिटी क्वार्टर पर रुक गई। शाम को उन्हे लेने गया तो पता चला कि शरद टाईम न होने के नाम पर अपनी पत्नी को मेडीकल कालेज ड्यू टाईम पर नही ले गए थे। अतः उन लोगों ने शालिनी से कहा था कि अगले दिन ड्यूटी जाने से पहले मै संगीता को उनकी सास के साथ मेडीकल कालेज ले चलूँ और फेफड़ों से पानी निकाले  जाने के बाद अपनी ड्यूटी चला जाऊ और वे लोग अपने घर लौट आएंगे। मन  मे बुरा तो यह लगा कि जब संगीता के कहने पर डॉ रामनाथ को बुला लाया था तो झांसी से योगेन्द्र को बुला कर रेलवे अस्पताल भेज दिया था और मेरा समय बेवजह खराब करा दिया था तो अब मै साथ चलने से इंकार कर दूँ ।फेफड़ों मे भरा पानी पीठ की किसी नस से सीरिञ्ज द्वारा खींच कर निकाला जाता था।

 परंतु सब को मदद करने की आदत के कारण हामी भर दी और वादा भी निभाया।अतीत मे अजय की शादी और यशवन्त के जन्मदिन कार्यक्रम मे छोले -भटूरे बनाने का  शालिनी से  वायदा करके भी संगीता ने पूरा नहीं किया था। तब भी शालिनी की तमन्ना रहती थी कि मै उनकी भाभी को मदद कर दूँ। कभी तो शालिनी संगीता के असंगत व्यवहार पर उनमे बचपना होने की बात कह देती थीं जबकि उस समय खुद संगीता दो बच्चियों की माँ थीं। कभी -कभी खुद शालिनी को ही संगीता का व्यवहार पीड़ा पहुंचाता था। यो ही एक बार दिन मे यशवन्त को लेकर वह सिटी के क्वार्टर पर रुक गई थीं। शाम को दुकान से लौटते मे मै बुलाने गया था।चाय देने के बाद संगीता ने पूछा कि आपने मजेदार खबर सुनी है?उन लोगों के यहाँ ‘अमर उजाला’ आता था जो क्रिमिनल खबरें ज्यादा छापता था। दुकान पर ‘पंजाब केसरी’ आता था वहीं पढ़ लेता था ,घर पर नहीं लेता था। बाकी अखबार पार्टी (भाकपा)आफिस पर पढ़ लेता था। उस दिन पार्टी आफिस न जाकर वहाँ मौजूद था लिहाजा मै उस समाचार से बेखबर था। फिर खुद ही संगीता ने अखबार से वह खबर पढ़ कर सुनाई -दिल्ली मे आमने -सामने रहने वाले दो दम्पतियों के रोमांस की खबर को चटक ढंग से छापा गया था। एक परिवार का पुरुष दूसरे परिवार की महिला को लेकर नैनीताल मे गुलछर्रे उड़ाने गया था ,वह महिला अपने पति को झूठ बोल कर पीहर जाने के नाम पर पडौसी के संग गई थी। उसके पति ने सोचा कि पड़ौसन अकेली है उसका पति भी नहीं है वह उसे लेकर नैनीताल पहुँच गया। दोनों अलग-अलग होटलों मे ठहर कर एक -दूसरे की बीबियों के साथ मौज-मस्ती करते रहे। एक शाम दोनों अपनी-अपनी पड़ौसनो के साथ  विपरीत दिशा से घूमते हुये आमने-सामने आ गए और एक-दूसरे का कालर पकड़ कर मार-धाड़ करने लगे। भीड़ मे लोगो  ने उन्हें छुड़ा कर अपनी-अपनी बीबियों के साथ चुप-चाप चले जाने को कहा और चेतावनी दी कि यदि लड़े तो पुलिस को सौंप दिया जाएगा। इस खबर को जिस खुशी और मस्ती से संगीता ने पढ़ा था शालिनी को बुरा लगा होगा ,वहाँ तो चुप रहीं घर आकर मुझसे बोलीं दिन मे उन्हें बताया तो ठीक था परंतु उस खबर को मुझे इस अंदाज मे क्यों सुना रहीं थीं क्या वह मेरी पत्नी थीं। मैंने उन्हें जवाब दिया तुम्ही  समझो अपनी भाभी की बड़ी तरफदारी करती हो वह क्या हैं?उनमे बचपना है?या आवारगी?

‘पनवारी कांड ‘के कर्फ़्यू के दौरान ही गुरुशरण भाई साहब की बेटी की शादी भी पड़ी। लड़के वालों के बारात लाने से इंकार करने के कारण उन्होने दिल्ली जाकर शादी की  थी। शामिल न हो सके थे। अतः जब उनकी बेटी पीहर आई तो उन्होने सूचित किया कि शैली आई है। हम लोगों ने उनके घर जाकर अपनी हैसियत के अनुसार शैली को रु 21/- भेंट कर दिये।

हमने कभी बदले की आकांक्षा नहीं रखी और अपनी तरफ से सदा संबंध मधुर बनाए रखने का प्रयास किया जिसे मेरी कमजोरी समझा गया।

 

आगरा/ 1990-91 ( विशेष राजनीतिक)

इसी काल मे भाकपा के जिला मंत्री रमेश मिश्रा जी के रमेश कटारा (जो अब पार्टी से बाहर हैं) के नियंत्रण मे आने की बात सामने आई। उनके निकटतम और घनिश्ठ्तम साथी आ -आ कर मुझ से कहते थे कि पार्टी और मिश्रा जी के परिवार को बचाओ। मैंने एक बार सीधे-सीधे मिश्रा जी से बात की तो पाया कि कटारा सहाब का जादू उनके सिर चढ़ कर बोल रहा था और कुछ फायदा कटारा के खिलाफ बोलने का नहीं होने वाला था। कटारा के मुद्दे पर ही मिश्रा जी को बड़ा भाई मानने वाले आनंद स्वरूप  शर्मा जी पहले ‘लँगड़े की चौकी के शाखा मंत्री का पद’ फिर बाद मे पार्टी ही छोड़ गए। एक एक कर लोग निष्क्रिय होते गए या पार्टी छोडते गए परंतु मिश्रा जी का कटारा प्रेम बढ़ता गया। अंदर ही अंदर एक काफी बड़ा वर्ग मिश्रा जी का विरोधी होता चला जा रहा था लेकिन मिश्रा जी इन सभी को पार्टी विरोधी घोषित करते जा रहे थे।

नानक चंद भारतीय भाकपा और नौ जवान सभा छोड़ कर बसपा मे चले गए। पार्षद शिव नारायण सिंह कुशवाहा भी भाकपा तथा नौ जवान सभा छोड़ कर समाजवादी पार्टी मे शामिल हो गए। पार्टी की शक्ति निरंतर कमजोर होती जा रही थी और रमेश मिश्रा जी कटारा के प्रेम मे मस्त थे। मेरी सहानुभूति कटारा विरोधियों के साथ थी परंतु कार्य मिश्रा जी के अनुसार करने की मजबूरी भी थी। कोशाध्यक्ष पद पार्टी का था मिश्रा जी की निजी फेकटरी का नहीं। कटारा साहब मुझे दबाने या धमकाने के फेर मे नहीं पड़े जबकि दूसरे लोगों के साथ ऐसी ज़ोर-आजमाईश करते रहते थे। डॉ  राम गोपाल सिंह चौहान और हफीज साहब भी कटारा से खुश नहीं थे यदि वे दबाव बनाते तो शायद मिश्रा जी उनकी बात मान सकते थे या शायद नहीं मानते तो इसी भय से उन लोगों ने कुछ कहा नहीं।

कटारा के प्रभाव मे मिश्रा जी के आने के बाद और अपनी बीमारी से पहले डॉ चौहान को प्रेक्टिल अनुभव हो चुका था कि कटारा को शिकस्त केवल मै ही दे सकता था। डॉ जवाहर सिंह धाकरे की पत्नी जो बहौत दिनों से महिला शाखा की मंत्री थीं अपने स्थान पर अपनी भतीजी श्रीमती मंजू सिंह को बनाने पर राजी थीं। कटारा की यह चाल थी कि अपनी भतीजी के पक्ष मे श्रीमती कमला धाकरे को हट जाने दो फिर वरिष्ठ शिक्षक नेता की हैसियत से कनिष्ठ शिक्षिका मंजू सिंह को अपने अनुकूल चलवाते रहेंगे। मिश्रा जी तो ब्लाईंड सपोर्ट कटारा की कर रहे थे उन्होने डॉ चौहान को महिला शाखा मे पर्यवेक्षक के रूप मे भेज कर श्रीमती मंजू सिंह को शाखा मंत्री चुनवाने का दायित्व सौंपा था। मिश्रा जी के भक्त किन्तु कटारा के प्रबल विरोधी कामरेड्स ने मुझसे अपेक्षा की कि कटारा की योजना को ध्वस्त कर दूँ। विकट स्थिति थी न तो मै मिश्रा जी को नाराज करना चाहता था न ही डॉ चौहान को  और न ही कटारा की योजना को सफल होने देना चाहता था और न ही डॉ धाकरे को यह एहसास होने देना चाहता था कि उनकी पत्नी की भतीजी को मैंने शाखा मंत्री नहीं बनने दिया।

हालांकि शालिनी भाकपा की महिला शाखा की सदस्य थीं किन्तु मैंने उन्हें सलाह दी थी कि वह बैठकों मे तटस्थ रुख ही रखें। सबसे पहले उस शाखा की सहायक मंत्री श्रीमती मंजू श्रीवास्तव (जो किशन बाबू श्रीवास्तव साहब की पत्नी थीं )को राजी किया कि वह सरला जी के स्थान पर उनकी भतीजी श्रीमती मंजू सिंह के विरुद्ध अपना नाम प्रस्तावित होने पर पीछे न हटें और मुक़ाबले मे डटी रहें। उसके बाद मिश्रा जी की सबसे विश्वस्त कामरेड को सारी परिस्थिति समझा कर उनसे महिला शाखा का मंत्री बनने का निवेदन किया और उनके इंकार करने पर   मंजू श्रीवास्तव जी का नाम प्रस्तावित करने का अनुरोध किया जिसे उन्होने न केवल स्वीकार कर लिया बल्कि रिक्शा से बाकी महिलाओं के घर-घर जाकर उन्हें कमला जी द्वारा प्रस्तावित मंजू सिंह के विरुद्ध मंजू श्रीवास्तव का समर्थन करने पर राज़ी किया।

बैठक मे कामरेड कमला  धाकरे ने खुद हटने और अपने स्थान पर अपनी भतीजी कामरेड मंजू सिंह का नाम प्रस्तावित किया जिसका किसी ने भी समर्थन नहीं किया और मिश्रा जी की विश्वस्त  कामरेड ने कामरेड मंजू श्रीवास्तव का नाम प्रस्तावित कर दिया जिसका (कमला  जी और मंजू सिंह के अतिरिक्त ) सभी ने ताली बजा कर स्वागत किया । बाद मे कमला  जी ने भी अपनी स्वीकृति दे दी और इस प्रकार अपने पहले ही शक्ति परीक्षण मे कटारा साहब मुंह की खा गए। डॉ चौहान की उपस्थिती मे हुये इस चुनाव की औपचारिक पर्यवेक्षक रिपोर्ट के अतिरिक्त मौखिक रूप से सारा विवरण उन्होने मिश्रा जी को दिया तो मिश्रा जी हैरान रह गए कि डॉ चौहान की मौजूदगी के बावजूद एक ठाकुर कामरेड को रिजेक्ट कर दिया गया। मिश्रा जी ने डॉ चौहान से पूछा कि आपने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया तो वह बोले वहाँ मतभेद होता तभी तो हस्तक्षेप की नौबत आती ,कमला  जी ने भी तो खुद ही मंजू सिंह के स्थान पर मंजू श्रीवास्तव को स्वीकार कर लिया था तो बतौर पर्यवेक्षक वह क्या कर सकते थे?मिश्रा जी ने कहा डॉ साहब यह आपकी पहली हार है,पड़ताल कीजिये कि क्यों आप मिशन मे कामयाब नहीं हुये?उन्होने कहा जांच तो करेंगे ही और उन्होने अपने तरीके से जांच मे सच्चाई का पता भी निकाल लिया ,किन्तु मिश्रा जी को कहते रहे कुछ पता नहीं चल पा रहा है,उन्होने तभी मन मे तय कर लिया था कि मिश्रा जी को कटारा के चंगुल से यह (विजय माथुर)ही निकाल पाएगा और इसी लिए अपनी बीमारी के दौरान ही उन्होने अपना चार्ज मुझे दिलवाकर अपने स्थान पर कोशाध्यक्ष बनवा दिया था और निश्चिंत हो गए थे। जैसा कि मिश्रा जी ने बताया था कि उन्हें अपना नाम तक लिखना नहीं आता था यह डॉ चौहान ही थे जिनहोने उन्हें पार्टी मे भी बढ़ाया और पढ़ाया उनको खुद का नाम लिखना भी सिखाया। शायद इसी गुरु धर्म के निर्वाह मे वह मिश्रा जी का खुल कर विरोध या आलोचना नहीं करना चाहते होंगे और असंतुष्ट होने के कारण उन्हें खुशी ही हुई होगी कि मैंने डिप्लोमेटिक तरीके से कटारा का तिलस्म तोड़ दिया और मिश्रा जी पर आंच भी न आने दी ।हकीकत पता चलने पर डॉ धाकरे और उनकी पत्नी कमला  जी भी खुश थीं कि मैंने उनकी भतीजी श्रीमती मंजू सिंह को एक गलत आदमी के चंगुल मे फँसने से बचाने हेतु उनका विरोध करवाया था। धाकरे दंपति का मुझे आशीर्वाद भी इस घटना के बाद हासिल हो गया और आगे उन दोनों ने मुझे ब्लाईंड सपोर्ट भी किया जिसका वर्णन अपने उपयुक्त समय पर होगा ।  

 
 
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