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Category Archives: भुआ

आगरा/1986-87(भाग-6)

मेरे सामने नाभा मे जिक्र था कि वे लोग आर्य समाज से हवन जल्दी कराएंगे क्योंकि दोनों लोग को ड्यूटियाँ ज्वाइन करनी है। उस अनुसार हमारे बाबूजी उनके टूंडला निवास पर शोक प्रकट करने हेतु गए परंतु वहाँ कोई नहीं लौटा था ,पता चला कि 13 वी करके लौटेंगे। पोंगा-पंडितवाद लोगों के दिमाग मे बुरी तरह घुसा हुआ है और समाज को खोखला कर रहा है। पढे-लिखे लोग भी समझने को तैयार नहीं होते यही देश और समाज के पतन का कारण है।

जब वे लोग टूंडला लौटे तो उन्हीं के साथ  शालिनी भी यशवन्त को लेकर वहाँ पहुँच गईं। कुछ दिन माँ के साथ और रहने की इच्छा व्यक्त की थी अतः वहाँ रहने दिया। दिसंबर के आखिर तक मथुरा मे नरेंद्र चाचा (बाबूजी के चचेरे भाई जो वहाँ डेंटल सर्जन हैं) के यहाँ रह कर और वृन्दावन घूमते हुये भुआ -फूफा जी हमारे घर आए। उन लोगों की इच्छा शालिनी और यशवन्त से मिलने की थी। बउआ वैसे तो इन लोगों को मकर संक्रांति पर बुलाने का इरादा रखती थीं। परंतु भुआ का लिहाज करते हुये मै टूंडला जाकर बुला लाया। भुआ ने आते ही शालिनी को वृन्दावन का प्रशाद दे दिया और उनके पिता के निधन की बाबत कोई शोक नहीं व्यक्त किया जो शालिनी को तीखा चुभा। उन्होने प्रशाद छिपा कर रख दिया और खाया नहीं। भुआ से तो नहीं परंतु मुझ से कहा क्या भुआ जी ने उनके मरने के लिए प्रशाद बोला था? मैंने यह बात बउआ-बाबूजी तक पहुंचा दी किन्तु भुआ से किसी ने कुछ नहीं कहा।

भुआ की हद तो तब हुयी जब उन्होने हमारे सामने ही हमारे माता-पिता को भड़काते हुये कहा कि यह मकान विजय का कैसे हुआ?जब उन्हें उन लोगों ने बताया कि उसने (मैंने) अपने बचत के पैसों से सिक्यूरिटी जमा करके लिया और अब भी अपने ही पैसों से किश्तें जमा कर रहा है तो भुआ की गणित सामने आई कि तुमने (मेरे बाबूजी ने)पढ़ाई मे पैसा खर्च किया था अतः यह मकान तुम्हारा हुआ और इसमे तीनों बच्चो का हिस्सा लगाना चाहिए था;विजय को अपने नाम करने दे कर गलती की। बाबूजी ने बड़ी बहन की बातें चुप-चाप सुन ली और उन पर कान नहीं धरा। बाबूजी ने बहन से तो नहीं कहा परंतु हकीकत तो थी ही कि मैंने तो बी ए तक पढ़ कर छोड़ दिया,अजय ने 3 वर्षीय डिप्लोमा कोर्स को 6 साल मे पूर्ण किया उस पर भी तो खर्च हुआ था और 12 वी तक शोभा पर भी तब केवल विजय पर पढ़ाई का खर्च करने से उसके पैसे पर दूसरे बहन भाई का अधिकार कैसे हो सकता है?भुआ की भूमिका फूट डलावा, आग-लगावा की थी। भुआ ने अपने से बड़े  एक दूसरे भाई के खिलाफ दरियाबाद मे पैतृक संपत्ति का मुकदमा लंबे समय तक लड़ा और फूफा जी की तमाम तंख्वाह तबाह करा दी। पोस्टमैन को खरीद कर उनके सम्मन गायब करा कर एक्स पार्टी केस जीत लिया और लाखेश भाई साहब के डी आई जी दोस्त के मार्फत खेतों  पर कब्जा कर लिया।

हमारे घर से भुआ -फूफा जी कानपुर तूफान एक्स्प्रेस से लौटे पहुँचते-पहुँचते वहाँ अंधेरा हो गया था। गाड़ी मे भीड़ अधिक थी ,कुली आ नहीं पाया और वे दोनों उतर गए एवं उनका सामान आगे गाड़ी मे चला गया। दिल्ली तक लिखा-पढ़ी कर लिए कुछ भी वापिस न मिला। शालिनी को बेहद प्रसन्ता हुयी क्योंकि पिता के निधन के बाद आने पर उन्हे भुआ ने परशाद भेंट किया था और मकान को विवादित बनाने की कुचेष्टा की थी। भुआ को अपनी काली करतूतों की सजा परमात्मा से मिल गई थी किन्तु आदत नहीं बदली। पहले कभी बाबा जी के साथ रामेश्वरम गईं थीं ,फूफा जी नहीं गए थे। लौटते मे रात्री मे मैदान मे मूत्र विसर्जन हेतु गईं और खुले पड़े डी सी बिजली के तारों से छू गईं -करेंट ने उन्हें दूर फेंक दिया था और उनके दायें हाथ की हड्डी कोहनी से कलाई तक टूट गई थी। बकरे की हड्डी डलवाने के बावजूद वह हाथ निष्क्रिय रहा। फूफाजी और उनके बच्चे खाना बनाने तक का काम करते थे। खुद भुआ नहाने-धोने तक मोहताज थीं किन्तु हेंकड़ी आसमान पर थी।

हमारी छोटी बहन जी अपनी भुआ से हेंकड़ी मे टक्कर लेती हैं और लाखेश भाई साहब से उनके मधुर संबंध हैं नेल्लोर मे बैठ कर भी जबकि सवा कि मी दूर हमसे रह कर भी संबंध लाखेश भाई साहब ने  नहीं रखना पसंद किया। जैसे भुआ ठोकर खाकर भी नहीं सुधरती थीं वैसे ही डा शोभा भी सुधर नहीं सकतीं आखिर वह हिन्दी और संस्कृत मे एम ए ,संस्कृत मे पी एच डी ,बी एड जो सुसराल जाकर हो गई हैं। भुआ के तो नौ सगे भतीजे थे इसलिए जिन के खिलाफ थी उनमे मेरा नाम प्रमुख था क्योंकि मैंने छब्बीस वर्ष की उम्र मे अपना मकान हासिल कर लिया और फूफाजी रिटायरमेंट तक न बना सके। डा शोभा का तो संभवतः  एक ही भतीजा यशवन्त और शायद एक ही भतीजी अनुमिता (अजय की पुत्री) है परंतु वह उनके खिलाफ हैं। फूफा जी (नृत्य बिहारी लाल) की भांति ही बहनोयी साहब (कमलेश बिहारी) भी सुसराल की संपत्ति पर निगाह रखते हैं। 1975 मे शादी के बाद 1976 मे उन्होने (जैसा तब शोभा ने बउआ को बताया और उन्होने मुझे) शोभा से कहा था कि बाबूजी दरियाबाद मे अपना हिस्सा मांग लें ,शोभा के यह पूछने पर कि वे दोनों (मै और अजय) तो देखने जाएँगे नहीं तो कौन देखेगा?उन्होने बी एच ई एल  ,हरद्वार की अपनी मेषीनिस्ट की पोस्ट छोड़ कर हमारे बाबूजी के बिहाफ पर देखने की बात कही थी। परंतु बाबू जी ने उनकी बात पर गौर नहीं किया। मैं भी उनकी इस बात से सहमत नहीं था। अतः उन्होने मेरे विरुद्ध मन मे गांठ बांध ली और जब मौका पड़ा मुझे नीचा दिखाने और नुकसान पहुंचाने का कृत करते रहे जिसे मै तब तक न समझ सका जब तक उन्हीं की छोटी बिटिया ने यह खुलासा नहीं कर दिया कि,शालिनी के बड़े भाई कुक्कू की पत्नी मधु उनकी भतीजी हैं और कुक्कू उनके बहौत अच्छे दोस्त रहे हैं। जब इस बात का जिक्र अभी उनके अपनी भतीजी की शादी मे आने के अवसर   पर मेरे घर आने पर किया तो खीसे निपोरते रह गए । अब प्रतीत होता है कि कुक्कू को हमारे ज्योतिषीय सलाहकार का पता बता कर उन्हें खरीद कर हम लोगों को गुमराह करने का सुझाव कमलेश बाबू का ही रहा होगा। उन पंडित जी ने 14 गुण को 28 बता कर जन्म पत्री मिला दी थी और जब भेद खुलने पर मैंने उनसे सवाल उठाया तो उन्होने मेरे बाबूजी की इच्छा बता दिया जबकि बाबूजी कोई भी जन्म पत्री मिलवाने कभी नहीं गए मुझे ही भेजते थे। मुझसे फरेब मेरे अपने रिशतेदारों के सुझाव पर उन्होने किया था।

यह ब्लाग मेरे जीवन के संघर्षों की कहानी सार्वजनिक करने हेतु मैंने शुरू किया है परंतु एक  काबिल ब्लागर् का  मत है कि निजी बातों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। जबकि वही ब्लागर महोदय अपने परिवार तथा मित्रों से संबन्धित जांनकारी सचित्र अपने ब्लाग पर देते रहते हैं। ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ हमारे देश की पुरानी रीति है पैसे वालों  के लिए सब छूट किन्तु कोई निर्धन उनकी बराबरी मे कैसे आ सकता है? मैंने ब्लाग लेखन को ‘स्वांतः सुखाय,सर्वजन हिताय ‘घोषित किया है उसका भी उन्होने अपने ब्लाग पर उपहास किया है। प्रत्येक का लेखन उसके अपने हिसाब से होता है और उससे औरों का सहमत होना आवश्यक नहीं होता है। परंतु किसी एक को दूसरे को हिदायत देने का अधिकार भी नहीं बंनता है। किन्तु मेरे ब्लाग्स पर कुछ धनवान ब्लागर्स हिदायत यदा-कदा देते रहते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी ही छोटी भांजी  ने फेक आई डी से जो कुचक्र रचा है यह भी उसी का एक हिस्सा होगा।

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आगरा/1986-87 (भाग-4)/लखनऊ-कानपुर यात्रा

शायद 27 सितंबर 1987 को मामाजी के सबसे छोटे बेटे शेष की शादी थी। अपने स्वास्थ्य के कारण बउआ का और उनके कारण बाबूजी का जाना संभव न था,भुआ ने हम लोगों को कानपुर आने को कहा था और मै अपनी तरफ से सबसे मेल-जोल व रिश्ता रखना चाहता था/हूँ। अतः 26 ता की रात को अवध एक्स्प्रेस से चल कर 27 को लखनऊ पहुंचा। अब माईंजी न्यू हैदराबाद मे यूनिवर्सिटी बंगले से लौट कर रहने नहीं गईं थी,नई कालोनी रवीन्द्र पल्ली मे थीं। चारबाग से हजरतगंज आकर दूसरे टेम्पो से  रवीन्द्र पल्ली पहुंचे और उनके घर पहुँचने के लिए रिक्शा किया जैसा कि नई कालोनियों मे होता है कोई उनके घर के न . B-2,सविता सदन,गोखले विहार मार्ग की लोकेशन बताने की स्थिति मे न था। माई जी के छोटे भाई हरीश माथुर साहब कहीं से लौट रहे थे मैंने उन्हें पहचान कर आवाज दी -हरीश मामाजी ,देख कर वह पहचान गए और उनके साथ घर पहुँच गए। तब तक सब लोग नाश्ता कर चुके थे और शादी के लिए लिए गए कम्यूनिटी हाल(संस्कार,B-1/15,’E’पार्क ,मंदिर मार्ग,महानगर एक्सटेंशन) चलने की तैयारी मे थे। माई जी ने हम लोगों को नाश्ता देकर कहा तुम्हारा साथ कोई नहीं देगा सब कर चुके हैं। यों अकेले-अकेले गड़पने की आदत हमारी नहीं है,शुगन भर का चख लिया और उल्टे पैरों फिर चलने के लिए तैयार हो गए। वहाँ लोगों को पहुंचा दिया गया था और खाने-पीने का सब सामान घर से सबसे आखीर मे आया ,लिहाजा खाना बेहद देर से बना हलवाई खाली बैठा-बैठा शोर मचाता रहा वह बिना समान के करता क्या?माईजी बोलीं हमने कहा था तुमने वहाँ नाश्ता नहीं किया अब हम यहाँ क्या करें भूखे तो होगे?हम यशवन्त हेतु जो रस्क आदि आगरा से लाये थे वह उसे तथा दूसरे छोटे बच्चों को दे दिये गए और लाया गया सारा स्टाक तत्काल खत्म हो गया। खाना 3-4 बजे तक हुआ।

वहाँ राजन मामाजी , रंजना मौसी ,मंजु मौसी, (तीनों बउआ के छोटे चाचा के बच्चे) कमल मौसी(बउआ  के विश्वनाथ चाचा की बेटी) आदि भी मिले थे। गोपाल मामा जी  (बउआ के फुफेरे भाई) से भी काफी लंबे समय बाद मुलाक़ात हुयी।  शायद यह शेष की लव मैरेज थी ।

वहाँ माईं जी की एक बहन मनोरमा मौसी भी आयीं थी जो तब विधवा हो चुकी थीं और  उनकी आर्थिक स्थिति भी बदल चुकी थी उनके प्रति माईं जी का व्यवहार अब उपेक्षा भरा था। जबकि न्यू हैदराबाद मे 196 0 के लगभग जब वह आयीं थीं तो उनका तथा मौसा जी का मामा जी एवं माईं जी ने गरम जोशी से स्वागत किया था। तब वह मुरादाबाद मे बर्तनों के सफल व्यापारी थे। आर्थिक ,सामाजिक स्थिति बदलते ही पारिवारिक रिश्तों मे यह परिवर्तन लगा तो अटपटा ही परंतु अब सभी जगह ऐसा ही दिख रहा है। जहां माईं जी अपने अमीर रिशतेदारों को अपने प्रबंध से चारबाग से बुला और विदा के समय भेज रहीं थीं वहीं इन मनोरमा मौसी को  आना और जाना अपने माध्यम से रिक्शा द्वारा तय करना पड़ा।

माईं जी के बाद वाली उनकी बहन सरोज मौसी और राजेन्द्र बहादुर मौसा जी की आव-भगत ज्यादा थी। डा आर बी श्रीवास्तव साहब तब सोमैया आर्गेनिक ,बाराबंकी मे उच्च अधिकारी थे। उन्हीं ने बताया था कि,पद्मा शंकर पांडे को विनोद दीक्षित के स्थानांतरित होते ही हटा दिया गया था।

बउआ ने शेष के लिए थ्री पीस सूट भिजवाया था उसका जिक्र माईं जी ने किसी से नहीं किया जबकि उनके पीहर वाले जो लाये थे उनका खूब बखान सब से कर रही थीं। वैसे उनके यहाँ सुबह 09 बजे नाश्ता और दोपहर  एक बजे खाना ,04 बजे चाय,रात 09 बजे खाना समय से चला। सुबह नाश्ते के समय मामा जी के चित्र पर हलवा ,जलेबी आदि माईं जी रखवाती थीं ,अक्सर यशवन्त उनमे से कुछ न कुछ उठा लेता था और खा लेता था। वहाँ भी इस पर किसी को ऐतराज नहीं था और बउआ ने भी इसे उसकी अच्छी आदत ही माना ।

तीसरे दिन दोपहर  मे हम कानपुर भुआ के यहाँ जाने के लिए उनके यहाँ से चल दिये। सुबह का नाश्ता करके चले थे और चारबाग मे पेसेंजर गाड़ी काफी देर से मिली थी। गाड़ी मे भीड़ भी थी। वैसे हमने यशवन्त को प्लेटफार्म पर केले खिला दिये थे और किसी दूसरे से न लेने की उसकी आदत भी घर की परंपरा के अनुसार डाली हुयी थी। एक वृद्ध सज्जन जिनकी पत्नी बुर्का पहने थीं भी कानपुर जा रहे थे। उन्होने हमसे थोड़ी जगह उनके लिए एडजस्ट करने को कहा ,हमने यशवन्त को गोदी मे बैठा लिया और उन दोनों को जगह उपलब्ध करा दी। यशवन्त के यह पूछने पर कि ये कौन हैं,उनकी आयु को देखते हुये उसे बताया कि ये बाबाजी-अम्मा जी हैं। इस बात पर वे लोग खुश हुये। आगे एक जगह उन लोगों ने केले खरीदे तो यशवन्त को भी देने लगे और 04 वर्षीय बच्चे द्वारा लेने से इंकार करने पर उन्हें अटपटा लगा। वह बोले हम तो बाबा जी हैं हमसे क्यों नहीं ले रहे हो तब हम लोगों ने भी उससे लेने को कह दिया तभी उसने उनसे लेकर केला खाया। उन्हें हमने स्पष्ट किया कि यह उनके लिए नहीं कुल मिला कर इस लिए उसकी आदत हमारे माता-पिता ने डाली है कि आज के युग मे सब का भरोसा नहीं किया जा सकता। इस बात से उन्होने भी सहमति जतलायी।

शाम तक भुआ के घर कानपुर पहुंचे। खाना तो रात को ही हुआ। बउआ ने कहा था अगर माईं जी शादी का पकवान भेजें तो भुआ से कहना कि वह थोड़ा उसमे से ले लें ,मुझे अपने हाथ से देने को मना किया था । भुआ ने खुद न निकाल कर मंजु भाभी जी से निकालने को कह दिया जिनहोने सारा का सारा लेकर रख लिया। चलते समय थोड़ा सा भी घर ले जाने को नहीं दिया। बउआ को अपनी नीति के चलते अपने भतीजे की शादी का पकवान न खुद मिला न हम लोगों को चखनेको मिला।

1979 मे एक बार यूनियन के काम से कानपुर गए थे और एक दिन वहाँ रुके थे तब भुआ-फूफा जी भी नहीं थे,लाखेश भाई साहब भी दिल्ली गए हुये थे। अगले दिन मंजू भाभी जी छोटी बेटी स्वाती को डा के पास दिखाने ले गईं ,मुझे भी ले गईं थीं। दवा के रु 10/-देने थे बोलीं अपना पर्स भूल आए है क्या आपके पास रु 10/- हैं?जो सफर मे बाहर निकला हो वह बिलकुल खाली हाथ कैसे निकाल सकता है?मैंने तत्काल एक दस रु का नोट दे दिया। वह बोलीं घर पर मांग लीजिएगा, भला भतीजी की दवा के दस रु भी मांगने वाली बात थी?हमे ऐसे संस्कार हमारे माता-पिता से नहीं मिले थे। हम अपना बैग उठा कर यूनियन दफ्तर होते हुये कानपुर सेंट्रल पहुंचे और केले खाकर लच कर लिया। उस समय हम तो रात की अवध एक्स्प्रेस से जाने के इंतजार मे वेटिंग रूम मे बैठे थे। एक टी टी साहब  आए और उन्होने सुझाव दिया कि यदि वह पहले जाने की गाड़ी का बंदोबस्त कर दें तो क्या हम शाम तक घर नहीं पहुँच जाएंगे। भला स्टेशन के वेटिंग रूम मे बैठने का कोई तुक तो था नहीं। कोई सज्जन इलाहाबाद से कानपुर जाना चाहते थे और उन्हें मजबूरी मे टूंडला तक का टिकट लेना पड़ा था ऐसे ही टिकट को दूसरे अपने साथी से मँगवा कर उन्होने मुझे दे दिया और कुल रु 50/- लिए । टूंडला से बस पकड़ कर 05 बजे तक मै आगरा घर पहुँच गया था।

भुआ और लाखेश भाई साहब का चाय-दूध का बंदोबस्त अलग-अलग था ,खाना एक साथ था। वह नव-रात्र के दिन थे भुआ तो उपवास भी रखती थीं। लाखेश भाई साहब दफ्तर से लौटते मे कुछ अधिक टाफिया लाये और यशवन्त को सौंप कर कहा एक एक कर खाते रहना परंतु उससे मंजू भाभी जी ने वह पेकेट ले लिया एवं एक टाफी पकड़ा दी। उसके बाद उस पेकेट का क्या हुआ?चलने तक खबर न थी। यह भी सुनने मे आया था कि बाद मे जब लाखेश भाई साहब ने कार ले ली थी तो भाभी जी शराब के नशे मे चलते हुये टकरा बैठी थी और रीढ़ मे चोट खा ली थी। शायद सभी अमीर हमेशा ही नशे मे रहते हैं। अच्छा ही है उन लोगों ने रिश्ता नहीं माना वरना एक कि मी दूरी पर रह कर वे हमारा कितना नुसान करने की स्थिति मे होते?

भुआ के यहाँ दो रोज रुके थे। तीसरे दिन चल दिये थे । दूसरे दिन फूफा जी ने अपने दोस्त और शालिनी के फूफाजी के यहाँ मिलने जाने को कहा जो टेलर मास्टर थे। भुआ के यहाँ से नाश्ता करके ही चलना पड़ा और शालिनी के फूफा जी  की आर्थिक स्थिति टफ थी उनकी एक पुत्री रु 600/- की टीचरी करके गुजारा कर रही थीं। अतः उनके घर हम लोगों ने खाना खाना उचित नहीं समझा और भुआ के यहाँ हम लोगों के खाने का बंदोबस्त इसलिए नही हुआ कि शालिनी की भुआ खिलाएँगी। रात को ही खाना हुआ।

उस समय तक जेनरल कम्पार्टमेंट से जाना-आना मुश्किल न था यह जाफ़र शरीफ साहब की मेहरबानी से बहौत बाद मे मुश्किल हुआ है। लिहाजा हम लोग अवध एक्स्प्रेस से जाने के लिए रात का खाना खा कर सेंट्रल प्लेटफार्म पर आ गए। यशवन्त गोदी मे था और एक बेंच पर दो मोटे-मोटे लोग पसार कर आराम से बैठे थे। मैंने शालिनी से कहा उस बेंच पर बच्चे को लेकर बैठ जाओ परंतु उनकी हिम्मत उन लोगों से कहने की नहीं हुयी तो मुझे ही कहना पड़ा। बाद मे यह पता चलने पर कि हम लोग भी कमला नगर ,आगरा मे ही रहते हैं और उनका एवं हमारा घर आगे-पीछे की रो मे ही है तब उन लोगों ने मुझे भी बैठा लिया। वस्तुतः वहाँ उनके पुत्र रहते थे और यह साहब कहीं जज साहब के पी ए थे। बाद मे कल्याण सिंह की बिरादरी का होने के कारण तथा पूर्व मे ही वकालत पास होने के कारण यह खुद भी जज बन गए और जब रिटायरमेंट के बाद कालोनी मे रहने आए तो सब इन्हें जज साहब के रूप मे ही जानने लगे,किसी को पता ही नहीं है कि उनके प्रोमोशन का राज ?उन्हें तो संगम एक्स्प्रेस से टूंडला तक जाना था उनकी गाड़ी पहले आ गई और वह पहले चले गए। हमारी गाड़ी आने पर हम लोग भी चल दिये। हम तो आगरा फोर्ट पर उतरे उन्हें टूंडला से जीप से आना पड़ा होगा।

कुल मिला कर यह यात्रा खर्च करने के बाद भी खुश न करने वाली रही। ……..

 

आगरा /1986-87(भाग-3)-एपसो,कानपुर

आगरा से जो लोग चले थे उनमे एक बालेश्वर जी कांग्रेस के थे,एक शुक्ला जी भी हमारी पार्टी के नहीं थे। हम कम्यूनिस्ट पार्टी के लोगों मे डा महेश चंद्र शर्मा,डा जितेंद्र रघुवंशी (के एम मुंशी विद्यापीठ,आगरा के विदेशी भाषा विभाग के अध्यक्ष और रूसी भाषा के शिक्षक),का नेमीचन्द,का एम पी दीक्षित (यह कानपुर के ही थे),मै और शायद एक दो लोग और। दो-दो लोग एक-एक रिक्शा मे बैठ कर ठहराव स्थल पहुंचे। मेरे साथ का नेमिचन्द बैठे थे वह पेशे से जूता डिजाइनर थे ,मुझसे वह समृद्ध थे परंतु मैंने रिक्शा के पैसे दिये थे। पूरे प्रदेश के लोग वहाँ थे काफी भीड़ थी और नहाना संभव न था। जूलाई या अगस्त का महीना था और बिना नहाये ही कान्फरेंस मे शामिल होना पड़ा। नाश्ता वहाँ से कर् के चैंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के हाल पहुंचे।

अब उस कान्फरेंस की हू- ब -हू बातें याद नहीं हैं। का रमेश सिन्हा जो तब दूसरी कम्यूनिस्ट पार्टी मे थे इस संगठन के प्रधान के पद से मुक्त होना चाहते थे। का आर एन मिश्रा शायद महासचिव थे। लखनऊ से आने वालों मे उस समय के जिला मंत्री (जो बाद मे प्रदेश सचिव भी रहे और अब राष्ट्रीय परिषद के सदस्य हैं)का अशोक मिश्रा ,एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष का अतुल ‘अंजान'(जो बाद मे प्रादेशिक नेता रहे और अब राष्ट्रीय सचिव मण्डल के सदस्य हैं) का मुझे ध्यान है। एक वकील साहब मैनपुरी के थे जिनकी पत्नी का उर्मिला राजपूत शायद 6 0-70 महिलाओं का जत्था ले कर आयीं थीं शायद वह अब भाजपा मे हैं,कल्याण सिंह के जमाने मे जातिवाद के कारण चली गईं होंगी।

समारोह मे डा हेमलता स्वरूप (आचार्य नरेंद्र देव महाविद्यालय की तत्कालीन प्राचार्या और पूर्व कुलपति कानपुर विश्वविद्यालय) की भी शायद महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनके पुत्र का अरविंद राज स्वरूप भी काफी सक्रिय थे और का हरबंश सिंह को भी दौड़-धूप करते देखा गया था।

दिन-रात का भोजन ठहराव -स्थल पर ही था। अगले दिन चुनाव भी हुआ। का अशोक मिश्रा जी को किसी महत्वपूर्ण पद पर का सिन्हा ने प्रस्तावित किया था जिसे उन्होने स्वीकार कर लिया था परंतु का अतुल ‘अंजान’ ने पहले पद लेने से इंकार किया था। परंतु बड़े नेताओं के आग्रह पर बाद मे मान गए थे। इस दिन कान्फरेंस कुछ जल्दी समाप्त हो गई थी और लौटने की गाड़ी रात की थी। हालांकि चलते समय मै भुआ के घर का पता बाबूजी से लेना भूल गया था परंतु पहले घर का उनका पता मालूम था। डा शर्मा जी से अनुमति लेकर मै भुआ के घर के लिए चला उनके पहले वाले मकान मालिक शरीफ थे और उन्होने नया पता दे दिया -111/4,हर्ष नगर,इंजीनियर्स पेट्रोल पंप के सामने । भुआ-फूफाजी तो थे ही लाखेश भाई साहब -भाभी जी उनकी बेटियाँ-वर्षा,स्वाती सभी मिले। (यह वही लाखेश भाई साहब हैं जो अब हमारे घर से सवा किलो मीटर की दूरी पर हैं परंतु संपर्क नहीं रखना चाहते)। उस समय लाखेश भाई साहब ने खाना जबर्दस्ती खिलवाया और अपने स्कूटर से मुझे ठहराव-स्थल पर पहुंचा दिया। वहाँ साथी का ने मेरे खाने का भी प्रबंध रख छोड़ा था जब की उस दिन रात का खाना जल्दी दे दिया गया था। मै दोबारा तो खा नहीं सकता था परंतु साथियों की बात रखने के लिए मीठा ले लिया था।

भुआ-फूफा जी ने शालिनी और यशवन्त को भी लेकर आने को कहा था। और इत्तिफ़ाक से सितंबर मे मामा जी के छोटे बेटे शेष की शादी मे लखनऊ आना हुआ तब लौटते मे कानपुर भुआ के घर उन लोगों को लेकर गए थे। ब्यौरा अगली बार…..

 
 
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