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Category Archives: माईंजी

पुण्य तिथि पर मामा जी का स्मरण इस बार क्यों?

21 सितंबर 1977 को जिंनका निधन हुआ  डॉ कृपा शंकर माथुर साहब (तत्कालीन विभागाध्यक्ष -मानव शास्त्र,लखनऊ विश्वविद्यालय) की कुछ यादें-

न्यू हैदराबाद ,लखनऊ मे घर के सामने के पार्क मे लेखक को गोद मे लिए हुये

यों तो इसी ब्लाग मे मामा जी का ज़िक्र कई बार आया है और आगे भी होगा।  परंतु उनके निधन के 35 वर्ष बाद 36 वीं पुण्य तिथि पर सिर्फ उनसे संबन्धित खास-खास बातें लिखने का ख्याल 18 अगस्त 2012 को तब आया जब हमे उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान मे आयोजित डॉ राही मासूम रज़ा साहब के चित्र अनावरण मे भाग लेने का अवसर मिला। ‘डॉ राही मासूम रज़ा साहित्य एकेडमी’ के मंत्री और फारवर्ड ब्लाक , उत्तर प्रदेशके अध्यक्ष राम किशोर जी ने हमे भी समारोह मे आने को कहा था जहां डॉ रज़ा साहब के भांजे साहब जो इस वक्त लखनऊ विश्वविद्यालय मे मानव शास्त्र के विभाध्यक्ष हैं भी आए थे और उन्होने अपने मामाजी डॉ राही मासूम रज़ा साहब के संबंध मे व्यक्तिगत जानकारियों का विस्तृत वर्णन किया था। उन्हीं से प्रेरणा लेकर मैं भी अपने मामाजी डॉ कृपा शंकर माथुर साहब को आज उनकी पुण्य तिथि पर श्रद्धांजली अर्पित कर रहा हूँ। 

मामा जी हमारी माँ से पाँच वर्ष छोटे थे और उनको काफी प्रिय थे। मामाजी भी हम लोगों को काफी मानते थे हम लोगों के बचपन के सभी फोटो उनके ही खींचे हुये हैं सिवाए एक-दो फोटो के जिनमे वह मुझे गोद मे लिए हुये हैं। वह बचपन से ही काफी मेधावी थे और उनको शुरू से ही योग्यता के कारण ‘वजीफा’ मिलता रहा था। नाना जी एगरीकल्चर विभाग मे बरेली मे पोस्टेड थे जब मामा जी ने इंटर् मीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। मामाजी के घनिष्ठ मित्र आगे की पढ़ाई के लिए लखनऊ यूनिवर्सिटी मे दाखिला ले रहे थे अतः वह भी उनके साथ ही पढ़ना  चाहते थे। नाना जी ने व्यक्तिगत आधार पर कुछ नुकसान उठाते हुये लखनऊ ट्रान्सफर करवाया और मामा जी को लखनऊ यूनिवर्सिटी मे दाखिला लेने का अवसर प्रदान किया। जब मामा जी ने B.com.मे लखनऊ यूनिवर्सिटी को टाप किया  तो एङ्ग्थ्रोपालोजी के तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ आर सी माजूमदार साहब ने मामाँजी को बुला कर कहा कि M.A. मे एङ्ग्थ्रोपालोजी लो तुम्हें विभाग मे ही रख लेंगे। मामा जी ने उनकी बात को आदर दिया और उन्होने भी अपना वायदा निभाते हुये मामा जी के पुनः यूनिवर्सिटी मे टाप पर रहने के आधार पर नियुक्ति -पत्र दिलवा दिया। उस वक्त शायद उनका वेतन रु 300/-मासिक था। 

यूनिवर्सिटी मे मामाजी फोटोग्राफी एसोसिएशन के सेक्रेटरी भी रहे जबकि प्रो शेर सिंह साहब अध्यक्ष थे। डॉ माजूमदार साहब के बाद प्रो शेर सिंह जी विभाध्यक्ष बने थे किन्तु बाद मे वह नेहरू मंत्रिमंडल मे बतौर उप-मंत्री शामिल हो गए थे । अतः मामाजी उनके बाद से मृत्यु पर्यंत एङ्ग्थ्रोपालोजी के विभागाध्यक्ष रहे। शायद उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की स्थापना के समय मामाजी भी उससे सम्बद्ध रहे थे।

बरेली से आने के बाद नाना जी ठाकुर गंज मे अपनी फुफेरी बहन के मकान मे किराये पर रहे थे वहाँ से यूनिवर्सिटी दूर थी और मामाजी साइकिल से ही पढ़ने आते थे किन्तु जाब मिल जाने पर उन्होने न्यू हैदराबाद मे ‘खन्ना विला’ मे किराये पर एक हिस्सा ले लिया । यह मकान चौधरी वीरेंद्र वर्मा ने किराये पर लिया था और मामाजी उनके किरायेदार  थे। वीरेंद्र वर्मा जी उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल मे तब संसदीय सचिव थे(जो बाद मे हिमाचल के राज्यपाल बने और भाजपा मे शामिल हो गए थे) और उनके पास दो मंत्री- चंद्र भानु गुप्ता जी एवं चौधरी चरण सिंह जी अक्सर रिक्शा पर बैठ कर आते-जाते थे । उस वक्त तक ये मंत्री गण सादगी से और जनता से घुल-मिल कर रहते थे आज तो पार्षद भी खुद को VIP समझता है। उस समय मामाजी के पास फोन नहीं था आवश्यकता पड़ने पर वर्मा जी  के फोन का इस्तेमाल आठ आना के भुगतान पर कर लेते थे।

डॉ माजूमदार तो मामाजी का विवाह भी अपनी पुत्री से करने के इच्छुक थे परंतु हमारी एक दादी जी (बाबूजी की चाची )अपनी भांजी से उनका विवाह कराने मे सफल रहीं। माईंजी के भाई  वेद प्रकाश माथुर साहब सेंट्रल एकसाईज मे तब इंस्पेक्टर थे और न्यू हैदराबाद मे ही रहते थे। जब हमारी माँ नानाजी के पास आती थीं तो माईंजी विवाह पूर्व ही अपने छोटे भाई-बहनों से मुझे मँगवा लिया करती थीं और दिन भर अपने पास रखती थीं। मामाजी की बारात मे मैं भी बाबूजी और नानाजी की गोद मे रह कर शामिल हुआ था। अजय काफी छोटे होने के कारण माँ के साथ घर पर रहे,तब (58 वर्ष पूर्व)महिलाओं के बारात मे शामिल होने का चलन नहीं था।

जब माईंजी के भाई साहब का अन्यत्र ट्रांसफर हो गया तो मामाजी ने उसी मकान को किराये पर ले लिया और उसमे यूनिवर्सिटी मे बंगला मिलने तक रहे। ऊपर वाला चित्र उसी मकान के सामने के पार्क का है। जब बाबूजी ने एम ई एस की नौकरी ज्वाइन की तब मामाजी रिसर्च हेतु आस्ट्रेलिया गए हुये थे और नानाजी पूरे मकान मे अकेले रहते थे अतः उनके कहने पर बाबूजी कुछ समय वहाँ रहे। बाद मे हुसैन गंज मे नाले के निकट फख़रुद्दीन मंज़िल मे नीचे के एक हिस्से मे हम लोग रहते थे और अक्सर न्यू हैदराबाद मामाजी के यहाँ जाना होता रहता था। उन लोगों का भी हमारे यहाँ आना होता रहता था । एक बार दीवाली के रोज़ मामाजी अकेले ही थोड़ी देर को आए थे और कुछ आतिशबाज़ी दे गए थे। ‘अनार’ शायद शक्तिशाली था जिससे मेरा पैर झुलस गया था। दोज़ पर जब हम लोग उनके घर गए तब मामाजी ने कहा कि वह यह बताना भूल गए थे कि बड़ों की निगरानी मे ही हम लोगों को वह आतिशबाज़ी दी जाती। अब तो हम लोग आतिशबाज़ी के विरुद्ध हैं और मेरा पुत्र भी पटाखे नहीं छुड़ाता है।

1961 मे हम लोगों के बरेली जाने के बाद मामाजी का कोई आपरेशन हुआ था तब फिर लखनऊ आना हुआ था। बहन तो माँ के साथ मामाजी के घर रहीं और हम दोनों भाई बाबूजी के साथ भुआ के घर -6,सप्रू मार्ग पर। मेडिकल कालेज मे मामाजी को देखने बाबूजी के साथ जाते थे। तब मेडिकल कालेज यूनिवर्सिटी के ही अंडर था और इस कारण मामाजी का विशेष ध्यान वहाँ रखा जाता था।

1971 मे अजय डेंटल हाईजीन का कोर्स करने हेतु मामाजी के घर रहा था। जब बाढ़ आने पर RSS के लोग मामाजी के बंगले पर फोन करने आते थे तो मामाजी ने उन लोगों को निशुल्क सुविधा प्रदान की थी । माईंजी चूंकि तब शायद कांग्रेस मे सक्रिय थीं और उनके कोई भाई भी कांग्रेस मे थे(माईंजी के एक भतीजे प्रदीप माथुर साहब तो इस वक्त कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं)। इसलिए लोगों को कौतूहल हुआ। नाना जी ने हमे बताया था कि पढ़ाई के दौरान ठाकुर गंज मे निवास करते हुये मामाजी RSS मे सक्रिय रहे थे। पंडित दीन दयाल उपाध्याय मामाजी के घर किसी कार्यक्रम मे आए थे और नानाजी भी उनसे मिले थे। 1948 मे गांधी जी की हत्या के बाद से मामाजी ने RSS से अलगाव कर लिया था किन्तु बाढ़-सहायता हेतु उनके लोगों को फोन करने की सुविधा प्रदान कर दी थी।

1969 मे लता मौसी (माँ की चचेरी बहन) की शादी के बाद जब हम लोग मामा जी के घर आए थे तो मामजी ने मेरे विषय जानने के बाद माँ से कहा था कि जीजाजी से कह कर B.A.मे  विजय से ‘इतिहास’ विषय हटवा लेना क्योंकि इतिहास पढ़ कर दृष्टिकोण ‘सांप्रदायिक’ हो जाता है। इतिहास मेरा प्रिय विषय था किन्तु मामाजी के परामर्श के अनुसार उसे छोड़ कर ‘सोशियोलाजी’ ले लिया। मामाजी ने M.A.लखनऊ यूनिवर्सिटी से उनके एङ्ग्थ्रोपालोजी मे उनके पास रह कर करने को कहा था और आश्वासन दिया था कि वह यूनिवर्सिटी मे ही अपने विभाग मे जाब दिला देंगे। किन्तु मैंने एम ए ही नहीं किया और प्राईवेट जाब पकड़ लिया। यदि तब मामाजी की बात पूरी की होती तो शायद डॉ राही मासूम रज़ा साहब के भांजे साहब के साथ उनके विभाग मे होता। 

1977 की 21 सितंबर को जब मैं होटल मुगल से ड्यूटी करके घर पहुंचा था तब तक मामजी की मृत्यु  की सूचना टेलीग्राम द्वारा पहुँच चुकी थी और माँ-बाबूजी लखनऊ जाने को तैयार थे। बाबू जी माँ को वहाँ छोड़ कर लौट आए थे और चार-पाँच दिन बाद मुझे व अजय को माईंजी के पास जाने को कहा । हम दोनों भाई लखनऊ आए थे दो रोज़ रह कर अपने साथ माँ को लेते गए थे। मामाजी उस समय ‘नवजीवन’ के लिए एक लेखमाला चला रहे थे 22 सितंबर को जो उनका लेख छ्पा था उस अखबार की प्रति हमारे पास सुरक्षित है किसी और अवसर पर उसकी स्कैन कापी प्रकाशित करेंगे।

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आगरा/1994 -95 /भाग-13 (माईंजी के आने पर )

…. पिछले अंक से जारी ….

रात को माईंजी ने फिर कई बार PCO पर मुझे भेज कर विष्णू को फोन करने को कहा। जो नंबर उन्होने दिया उस पर कोई और उठाता था और विष्णू को जानने से इंकार करता था। दिन का तो भुगतान माईंजी ने सब कर दिया था,इस वक्त मेरे रुपए बर्बाद हो रहे थे। यशवन्त हर बार मेरे साथ जाता रहा। इस प्रकार अजय,उनकी श्रीमती जी और माईंजी को एकान्त गुफ्तगू का पर्याप्त समय मिलता रहा क्योंकि वह नंबर पहले तो मिलता ही बड़ी मुश्किल से था। अंततः माईंजी खुद PCO जाकर खुद विष्णू से बात करके आईं ,कहा तो यही कि उसी नंबर पर विष्णू ने उठाया परंतु मुझे शक है कि उन्होने मुझे गलत नंबर देकर ही हर बार भेजा था जो कोई दूसरा आदमी उठाता था।

माईंजी ने सोते समय मुझे बताया कि वह अगले दिन सुबह 05 बजे की बस पकड़ेंगी और मुझे बिजली घर बस स्टेंड पर मोपेड़ द्वारा उन्हें छोडने जाना था। सुबह चार बजे जाग कर अजय की श्रीमती जी ने भिंडी की सब्जी और पूरियाँ सेंक दी और यशवन्त के एक पुराने टिफिन बाक्स मे रख कर माईंजी को भोजन दे दिया। यशवन्त तो उतने तड़के सो ही रहा था,मै माईंजी को 05 बजे वाली बस पर बैठा आया और पहुँचने की सूचना देने का पत्र भेजने का अनुरोध किया। परंतु माईंजी ने फिर मुझसे कोई सम्पर्क नहीं रखा। 09 बजे अजय ने अपना फैसला सुनाया कि वह भी शाम को फरीदाबाद लौट रहे हैं। मैंने कहा परसों तो तुमने नरेंद्र मोहन जी (उनके साले )के कहने पर कार से जाने से भी इंकार कर दिया था अभी भी कमजोरी है,अचानक फैसला कैसे किया?वैसे वह फैसला अचानक नहीं था एक दिन पूर्व मुझे PCO पर अटका कर माईंजी द्वारा उनसे किए गए वार्तालाप का परिणाम था। अजय जिद्द पर अड़ गए कि वह आज ही जाएँगे। अपने साथ शाम का खाना भी न ले गए। उस दिन के बाद से आज तक कोई सम्पर्क भी नहीं रखा है। यही वजह है कि लखनऊ मे माईंजी के भी कहीं होने की सूचना पर मैंने 09 अक्तूबर 2009 को लखनऊ आने के बाद भी उनसे सम्पर्क करने का कोई प्रयास नहीं किया है। उनके  द्वारा मुझसे सम्पर्क करने का प्रश्न कहाँ है ?जबकि अजय का ही मुझसे सम्पर्क तुड़वा रखा है। उनके पुत्र विष्णू डॉ शोभा की छोटी और खोटी बेटी (जिसने फेक आई डी के जरिये कई ब्लागर्स को मेरे व यशवन्त के विरुद्ध गुमराह कर रखा है जिनमे वर्तमान  मे उसी के शहर पूना स्थित एक ब्लागर प्रमुख हैं)के विवाह मे कानपुर मे जूलाई 2006 मे मिले थे और एक ही बार बोले थे फिर दूर-दूर रहे।

अजय और उनकी श्रीमती जी ने पटना के सहाय साहब के पत्र का ज़िक्र माईंजी से किया होगा। माईंजी के इच्छा व्यक्त करने पर वह पत्र माईंजी को दिखा दिया था और मैंने क्या जवाब भेजा वह भी बता दिया था। उस पर माईंजी की प्रतिक्रिया थी कि इतनी पढ़ी-लिखी लड़की से शादी न करो। किसी गरीब और नीडी लड़की से शादी करो जो ज्यादा से ज्यादा हाई स्कूल पास हो। शायद अजय और कमलेश बाबू द्वारा उत्तर देने से मेरे द्वारा रोके जाने की यह प्रतिक्रिया थी।मैंने उनको स्पष्ट किया कि मै खुद पुनः विवाह के ही पक्ष मे न था। यशवन्त ने बाबूजी से एक पोस्ट कार्ड डलवा दिया था जिसके जवाब मे यह पत्र आया है और यदि यहाँ  बात नहीं बनती है तो मै विवाह नहीं करने जा रहा हूँ। चूंकि बात यहाँ बाबूजी चला गए हैं एवं बउआ -बाबूजी दोनों ने समर्थन किया था इसलिए उनके प्रति सम्मान भाव के कारण मैंने उत्तर भेज दिया था। माईंजी को समझ आ गया था कि उनकी दाल नहीं गलेगी । इसलिए खुद भी और अजय को  भी मुझसे  सम्पर्क न रखने का निर्णय किया होगा। 

 

आगरा/1992 -93 (भाग-4)-लखनऊ यात्रा

ऋषिराज की शादी 1992 मे दशहरा के रोज होना था । एक खानदानी परंपरा के अनुसार शादी के समय माँ को  लड़का या लड़की जिस की शादी हो उसके पीछे बैठना होता है। ताईजी का निधन होने के कारण चाची या बड़ी भाभी को बैठना था। चूंकि छोटी ताईजी का भी निधन हो चुका था और उन लोगों से इन लोगों के संबंध भी मधुर नहीं थे अतः अतः भाभी जी (सुरेश भाई साहब की पत्नी)से भी नहीं कहा और हमारी माँ कहीं आने-जाने की शारीरिक स्थिति मे नहीं थी ,इसलिए शालिनी को वह रस्म अदा करने हेतु अनुमति देने का अनरोध -पत्र महेंद्र जीजाजी ने बाबू जी के पास भेजा। जब बाबूजी ने अनुमति दे दी तब महेंद्र जीजाजी ने रु 11/- का money order भेज कर शालिनी के भाई को देने का अनुरोध किया । इसे ‘भात का न्यौता ‘कहा जाता है जिसका अर्थ है कि,पीहर से पीछे बैठने वाले के परिवार के लिए और उस लड़के( जिसकी शादी है )के लिए कपड़े आदि भेजे जाएँ। यह बात हम लोगों को अच्छी नहीं लगी और बाद मे माधुरी जीजी ने भी कहा कि,महेंद्र ने अपनी माँ के निर्देश पर वह पत्र चाचा को भेज दिया उन्हे खबर नहीं थी वरना वह उन लोगों(शरद मोहन) पर दबाव न डालने देतीं। बहरहाल शालिनी की माँ ने शालिनी,यशवन्त,मेरे तथा ऋषिराज के लिए वस्त्र भिजवाए। इसके बदले मे माधुरी जीजी ने शालिनी की भाभी संगीता के लिए साड़ी भिजवा दी थी (हालांकि रिवाज तो यह है कि यदि किसी विवाहिता को वस्त्र दिये जाते हैं तो साथ मे उसके पति के लिए भी शुगन का कुछ देना होता है जिसका पालन नहीं किया गया था)।

हम लोग आगरा से इस हिसाब से चले थे कि,रवीन्द्र पल्ली जाकार माइंजी से भी मिलेंगे। राजाजीपुरम से उनके यहाँ गए तो घर पर माइंजी और अंगद (शेष का पुत्र )ही मिले थे। शेष और उनकी पत्नी दिल्ली गए हुये थे। उनके घर काफी देर रहे थे,इस बार माइंजी का व्यवहार काफी अच्छा रहा था। उन्होने शेष की ‘आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस’की एक डिक्शनरी यशवन्त को भेंट की थी-

यह यादगार डिक्शनरी यशवन्त ने सम्हाल कर रखी हुई है जिससे वह काफी लाभान्वित भी हुआ है। खाने के वक्त तो माईंजी को शालिनी ने उनके साथ मदद की थी किन्तु शाम को जब हम लोग वापिस लौट रहे थे,माईंजी चाय बना रही थी शालिनी ने सोचा उन्हे कष्ट देने की बजाए खुद ही फ्रिज से पानी निकाल कर पी लें। पीने का पानी भभौने,जग आदि मे था, कोई बोतल न थी। माईंजी ने हँसते हुये पूछा कि पानी पीना है तो हमसे क्यों नहीं कहा?जिसका घर होता है उसे ही पता होता है कौन चीज कहाँ है? हम लोगों के घर की यह परंपरा न थी कि किसी के घर जाकर चीजें टटोल-खकोल की जाएँ-यह तो शालिनी के पीहर के संस्कार थे जो वह फ्रिज तलाश रही थीं। मैंने कहा भी था कि माईंजी से पूछ लो। माईंजी ने ग्लास मे पानी दे दिया। यह भी बताया कि लोग-बाग बोतल को मुंह से पीकर रख देते हैं इसलिए वह बोतल रखती ही नहीं हैं क्योंकि झूठा करने से इन्फेक्शन का भय रहता है। उनकी यह बात हमारे बाबूजी और बउआ के विचारों से मेल खाती है।

झांसी से कमलेश बाबू अपनी छोटी बेटी मुक्ता को लेकर आए थे। वह भी माईंजी से मिलना चाहते थे। बीच मे एक ही दिन निकला था अतः पुनः शालिनी नहीं गई। मै,यशवन्त,मुक्ता और कमलेश बाबू ही गए। जब पहुंचे तो वे लोग भोजन कर रहे थे। शेष की पत्नी ने उठ कर फिर से तहारी ही जो वे लोग खा रहे थे और बनाई। कमलेश बाबू ज्यादा नहीं रुके । खाकर चाय पीकर वापिस हो लिए। चूंकि वह माईंजी के लिए भांजा दामाद थे अतः उन्हें व मुक्ता को कुछ रुपए भी माईंजी ने दिये।मुक्ता ने नरेश से किन्ही केसेटो की फरमाईश की होगी सो उन्होने उसे लाकर भेंट कर दिये थे। उन लोगों से ये लोग खुले होंगे जो उनसे फरमाईश की ;मुझसे तो किसी ने कभी कोई फरमाईश नहीं की थी।

कमलेश बाबू की महेंद्र जीजाजी से काफी घुटन्त थी। रात मे सबसे ऊपरी छत पर ड्रिंक का कार्यक्रम था। मै शामिल नहीं हुआ तो कमलेश बाबू (जिन्होंने अजय की शादी मे 1988 मे ट्रेन मे शरद मोहन की मौजूदगी मे ढक्कन से मेरे मुंह मे शराब उंडेल दी थी और बाद मे चार की मेवा के साथ शराब की बोतल भी उनकी सुसराल मे भेज दी थी)बोले हम अजय की शादी मे (डॉ शोभा और कमलेश बाबू अजय और उनकी पत्नी का भी  नाम ही पुकारते हैं -भाई साहब या भाभी जी नहीं)खुद आपको ट्रेन मे पिला चुके हैं ,बच नहीं सकते। महेंद्र जीजाजी,कमलेश बाबू गठबंधन ने जबरिया मुझे भी ग्लास भर कर दिया मैंने उसे पानी की तरह पी कर उलट कर नीचे रख दिया उन लोगों की तरह चुसकियाँ लेकर नहीं। अगले दिन शाम को खाने से पूर्व भी ड्रिंक कार्यक्रम था और महेंद्र जीजाजी- कमलेश बाबू गठबंधन ने फिर उसी तरह दबाव बना कर मुझे ग्लास पकड़ाया तो वैसे ही पानी की तरह जल्दी से निगल कर मैंने ग्लास खाली कर दिया। उस वक्त तक न तो कमलेश बाबू शक के घेरे मे आ पाये थे न ही महेंद्र जीजाजी, और न ही रंग मे भंग करना मेरा स्वभाव था अतः उन लोगों का खेल चल गया।

राजाजीपुरम मे ही किसी पार्क मे ऋषिराज की बारात गई थी ,महेंद्र जीजाजी ने लड़की वालों के लिए  वहीं व्यवस्था करा दी थी। ऋषिराज की पत्नी के ताऊजी शालिनी के टेलर मास्टर वही फूफाजी थे जो हमारे फूफाजी के दोस्त थे।खाने का तीन प्रकार का बंदोबस्त था। नवरात्र के व्रतधारियों के लिए फलाहार,शाकाहार और मांसाहार। हम तो शाकाहारियों मे थे।

जिस दिन हम लोग माईंजी के घर गए थे ,लौटते मे अमीनाबाद होते हुये आए थे। कारण यह था कि पार्ट-टाईम वाले (रेकसन फुटवियर)सेठ जी ने अपने एक कस्टमर के यहाँ रिमाईंड करते आने को कहा था। मैंने उनका संदेश दे दिया था । उस दुकान के मालिक एक वृद्ध मुस्लिम सेठ जी थे जो आगरा अक्सर ब्रहस्पतिवार के दिन आते थे जिस दिन अमीनाबाद मे साप्ताहिक अवकाश रहता है। उन्होने 10 दिन मे आगरा आ कर उनका भुगतान करने का आश्वासन दिया और शिष्टाचार वश हम लोगों -शालिनी और यशवन्त समेत मुझे कोल्ड ड्रिंक पिलवाया।

मैंने बाजार से यशवन्त के लिए कुछ वस्त्र ले लिए ,शालिनी ने भी चिकन  का एक सलवार-सूट अपने लिए लिया था। उनकी इच्छा अपनी संगीता भाभी के लिए भी एक सलवार-सूट लेने की थी सो उन्होने उनकी पसंद के मुताबिक झीने गुलाबी  वस्त्र का लिया। उनकी बेटियों के लिए भी कुछ कपड़े लिए थे। अतः परंपरा निर्वाह हेतु मैंने संगीता के पति हेतु एक रूमाल भी रखवा दिया था। हम लोग चारबाग से गंगा-जमुना एक्स्प्रेस से चले थे और आगरा सिटी पर उतरे थे। उन लोगों के क्वार्टर पर ही पहले गए। शालिनी ने अपने लाये और माधुरी जीजी द्वारा भेजे वस्त्र  और पकवान वहाँ निकाल कर दे दिये। रास्ते मे यशवन्त को ओढ़ाने हेतु एक वह बढ़िया कंबल ले गए थे जो मुझे होटल मुगल से एक वर्ष दीपावली गिफ्ट मे मिला था। वह किस प्रकार सिटी क्वार्टर पर छूट  गया या उन लोगों ने छिपा कर रख लिया फिर उसका कोई अता-पता न चला।

दिन होने पर हम लोग अपने घर कमलानगर आ गए। उतनी ही देर मे वहाँ दो बार हम लोगों को चाय पिला दी गई थी। ………..

 
 
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