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Category Archives: मिश्रा जी

आगरा/1992-93/विशेष राजनीतिक (भाग-7 )

गतांक से आगे…..
शाखा लँगड़े की चौकी के मंत्री कामरेड एस कुमार (जिसे कभी मिश्रा जी बड़ा प्यारा कामरेड कहते थे) को कटारा के बेटे ने पार्टी कार्यालय मे ही पीट दिया। अब तो आगरा के कामरेड्स मे मिश्रा जी और कटारा के विरुद्ध उबाल ही आ गया था। एस कुमार जी भी अनुसूचित वर्ग से संबन्धित थे अतः यह माना गया कि मिश्रा जी का गुट कामरेड नेमीचन्द को हतोत्साहित करने हेतु ऐसी ओछी हरकतें जान-बूझ कर कर रहा है। एक बार पुनः राज्य-केंद्र पर अधिकृत तौर पर मिश्रा जी और कटारा साहब के विरुद्ध कारवाई करने का निवेदन किया गया। कामरेड काली शंकर शुक्ला जी का वरद हस्त मिश्रा जी का रक्षा कवच था। कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह ने खुद आगरा आकर सब की सुन कर कोई ठोस निर्णय लेने का आश्वासन दिया। मिश्रा जी ने दिलली  की भाग-दौड़ करके कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह के स्थान पर राज्य सचिव कामरेड मित्रसेन यादव का आना सुनिश्चित करवाया।

दिन मे आगरा की भाकपा जिला काउंसिल की बैठक भी राज्य सचिव के समक्ष हुई । लिखित और मौखिक शिकायतें उनको सौंपी गई। मिश्रा जी बैठक से अलग ले जाकर मित्रसेन यादव जी से मिले और उन्हें कुछ घुट्टी पिला दी। मिश्रा जी और कटारा साहब को पार्टी से हटाने का जो प्रस्ताव था उसे मित्रसेन यादव जी के कहने पर पास नहीं किया गया। उन्होने इन दोनों के सुधर जाने का आश्वासन अपनी तरफ से दिया। उनकी बात न माने जाने का प्रश्न ही न था। रात को राजा-की-मंडी स्टेशन पर ‘गंगा-जमुना एक्स्प्रेस’ मे मित्रसेन जी को बैठाने जिला मंत्री नेमीचन्द जी ,मै और किशन बाबू श्रीवास्तव साहब तो गए ही कटारा साहब भी मिश्रा जी के सुझाव पर पहुँच गए थे। स्टेशन पर मित्रसेन जी ने कटारा साहब से कहा मिश्रा जी का ख्याल रखो।

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आगरा /1992-93(राजनीतिक विशेष-भाग-4 )

गतांक से आगे…..
हम लोगों ने मलपुरा के ग्राम प्रधान कामरेड ओमप्रकाश को मिश्रा जी के विरुद्ध जिला मंत्री पद पर खड़े होने को राजी कर लिया था। किन्तु मिश्रा जी ने अपना चक्र चला कर उन्हे पीछे हटने को राजी कर लिया ,मुझे इन बातों की खबर न थी। लेकिन मिश्रा जी के पारिवारिक हितैषी कामरेड्स ज्यादा चतुर थे,उन्होने मिश्रा जी के ही घनिष्ठ साथी नेमिचन्द को तैयार कर लिया था,ओम प्रकाश जी ने भी उन्हें समर्थन देना स्वीकार कर लिया था । इस कहानी की खबर न मुझे थी न मिश्रा जी को। राज्य-पर्यवेक्षक के रूप मे कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह के स्थान पर राज्य सचिव का मित्रसेन यादव द्वारा पूर्व राज्य-सचिव का जगदीश त्रिपाठी(जिंनका 17 दिसंबर 2011को लखनऊ मे निधन हुआ है) ,पूर्व सह-सचिव का अशोक मिश्रा(जो बाद मे राज्य  सचिव भी रहे) और आगरा क्षेत्र के इंचार्ज का डॉ गिरीश(वर्तमान राज्य सचिव) को संयुक्त रूप से भेजा गया था। मिश्रा जी खुश थे कि इन लोगों की मौजूदगी मे वह अपनी कलाकारी दिखा लेंगे।

पहले दिन की सम्मेलन कारवाई के बाद बाह मे ही एक जनसभा भी रखी गई थी। दिन मे सचिव की रिपोर्ट के बाद प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे थे और कहीं से भी मिश्रा जी को यह आभास नहीं मिला था कि कोई भी उन्हें हटाने की कारवाई कर सकता है ,मुझे भी यही लगा था कि मिश्रा जी ही पुनः पदारूढ़ होने जा रहे हैं। डॉ रामनाथ शर्मा और एडवोकेट सुरेश बाबू शर्मा तो खिन्न होकर आगरा वापस लौट भी गए थे। वे मुझे भी लौट चलने का दबाव बना रहे थे परंतु मै साधारण प्रतिनिधि के साथ-साथ तब तक कोशाध्यक्ष के पद पर था और इस तरह सम्मेलन का बहिष्कार करना भी मुझे पसंद नहीं था लिहाजा मै उनके साथ न जाकर अगले दिन के लिए वहीं रुका रहा था । परंतु मै सभा-मंच पर न बैठ कर सामने मैदान मे दरी पर दूसरे प्रतिनिधियों ,स्थानीय कार्यकर्ताओं एवं आम जनता के साथ बैठा था। संचालन कर रहे का हर विलास दीक्षित से मिश्रा जी ने अनाउंस करवाया कि समस्त कार्यकारिणी सदस्य मंच पर आ जाएँ ,मुझे छोड़ कर सभी पहले से ही मंच पर मौजूद थे। मै दरी पर ही बैठा रहा किन्तु सभा प्रारम्भ करने से पूर्व मिश्रा जी के इशारे पर का दीक्षित ने नाम लेकर कहा कि,का  विजय राज बली माथुर से आग्रह है कि तुरंत मंच पर अपना स्थान ग्रहण कर लें। मुझे आखिरकार मंच पर जाना ही पड़ा ,मिश्रा जी ने कहा भई आज तक तो आप कार्यकारिणी मे हैं ही नीचे क्यों बैठ गए थे?मैंने मौन रहना ही मुनासिब समझा।

बोलने के लिए पुकारे जाने पर भी मैंने अति सूक्ष्म भाषण ही दिया। रात्रि  भोजन के बाद वहीं ठहरने का प्रबंध था। गर्मी का मौसम था अतः मै दो एक लोगों के साथ खुली छत  पर ही रहा कमरों मे पंखों की हवा से बाहर की खुली हवा अच्छी थी। देखा-देखी काफी कामरेड्स छत  पर ही आ गए। अगले दिन खुली छत पर ही नहाना हुआ ,कौन कितनी देर तक गुसलखाना खाली होने का इंतजार करे। अधिकांश लोगों ने इसी प्रक्रिया का अनुसरण किया और शायद महिला कामरेड्स ने ही बाथरूम का प्रयोग किया। नाश्ते के बाद सम्मेलन की कारवाई प्रारम्भ हो गई ,बचे हुये लोगों ने अपनी-अपनी बात रखी। मै खुद भी नहीं बोलना चाहता था और शायद मिश्रा जी भी यही चाहते थे कि मै न बोलूँ। मुझे सम्मेलन के मिनिट्स लिखने का दायित्व सौंप दिया गया था।
दिन के भोजन के बाद मिश्रा जी ने नई जिला काउंसिल का पेनल पेश किया जो सर्व-सम्मति से स्वीकार कर लिया गया। इससे मिश्रा जी बिलकुल निश्चिंत हो गए कि वह पुनः निर्विरोध जिला मंत्री बनने जा रहे हैं।

चाय पान के बाद नई जिला काउंसिल की बैठक हुई जिसमे मिश्रा जी ने बतौर ड्रामा कहा कि वह काफी थक गए हैं और पद छोडना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद थी कि पूर्व की भांति कामरेड्स उनसे विनती करेंगे कि उनका कोई विकल्प नहीं है(जैसा कामरेड सी राजेश्वर राव की उपस्थिती मे भी  हुआ था) अतः वही जिला मंत्री बने रहें। उनकी आशा के विपरीत किसी ने उनसे ही दूसरा नाम सुझाने का अनुरोध कर दिया। अब तो मिश्रा जी को काटो तो खून नहीं। मजबूरन उन्होने अपने विश्वस्त साथी और आड़ीटर कामरेड जगदीश प्रसाद का नाम ले दिया किन्तु उन्होने तत्काल कह दिया कि वह बलि का बकरा नहीं बनेंगे। मुझसे सम्मेलन मे मिश्रा जी द्वारा नया पेनल पेश करने के दौरान कान मे आकर उनके ज़मीनों के धंधे के साथी कामरेड पूरन खाँ ने कहा था कि पेनल का विरोध न करवाना का ओमप्रकाश पीछे हट गए हैं उनके स्थान पर नेमीचनाद का नाम आ रहा है ,आप समर्थन कर देना। मिश्रा जी के ही दूसरे विश्वस्त का दीवान सिंह ने का नेमीचन्द का नाम प्रस्तावित कर दिया जिसका तालियों की गड़गड़ाहट ने समर्थन कर दिया । अब तो मिश्रा जी की जमीन छिन चुकी थी। उन्होने तत्काल सहायक जिलामंत्री पद हेतु का दीवान सिंह का नाम ले दिया यह कहते हुये कि आपने का नेमीचन्द को जिला मंत्री बनवाया है उन्हें कामयाब बनाना आप ही की ज़िम्मेदारी है अतः आप उनके सहायक जिला मंत्री होंगे। सबने समर्थन कर दिया। मिश्रा जी ने का नेमीचन्द को सुझाव दिया कि एक पदाधिकारी पुराना भी होना चाहिए अतः का माथुर को कोशाध्यक्ष बनाए रखें। ऐसा ही हुआ भी । राज्य-केंद्र के तीनों पर्यवेक्षकों के लिए हस्तक्षेप का प्रश्न ही नहीं था कहीं कोई विरोध हुआ ही नहीं और मिश्रा जी अपनी ही बिछाई बिसात पर मुंह की खा गए।मुझे  मक्खी की तरह मसल डालने और हरा देने के उनके  दावे धरे के धरे रह गए। कटारा का कुसंग उन्हें ले डूबा।सबसे बड़ी बात यह थी कि यह मिश्रा जी के विरोधियों की जीत नहीं थी बल्कि उन्हीं के पारिवारिक हितैषियों ने उनके ही परिवार को बिखरने से बचाने हेतु उन्हें पदच्युत किया था। किन्तु मिश्रा जी अभी भी जागे नहीं थे……… 

 

आगरा /1992 -93 (राजनीतिक विशेष -भाग- 2 )

गतांक से आगे….
पूर्व-पश्चिम के कार्यकर्ताओं मे वैभिन्य था और कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह को पश्चिम के कामरेड्स का समर्थन न मिल सका अतः उन्होने कामरेड मित्रसेन यादव का समर्थन किया जिनहे सर्व-सम्मति से राज्य-सचिव चुन लिया गया। आगरा से जो 5 कामरेड्स राज्य-काउंसिल हेतु चुने गए उनमे मिश्रा जी अपने परम-प्रिय कटारा को स्थान न दिला सके। केंद्रीय कंट्रोल कमीशन के चेयरमेन कामरेड काली शंकर शुक्ला जी से व्यक्तिगत सम्बन्धों के आधार पर मिश्रा जी ने कटारा को उत्तर-प्रदेश कंट्रोल कमीशन का सदस्य नामित करवा लिया। कोई कुछ बोल तो न सका परंतु मिश्रा जी ने ऐसा करके अपने सभी हितैषियों को अपने विरुद्ध कर लिया।

राज्य-सम्मेलन समाप्ती के बाद आगरा के जिला सम्मेलन की तैयारी होना था। मिश्रा जी ने मुझ से कहा कि,अपने ज्योतिष से गणना करके जून के महीने मे दो तारीखें बताओ जिससे सम्मेलन शांतिपूर्ण हो जाये ,राज्य सम्मेलन मे तो काफी तनाव रहा। मैंने पत्रा देख कर उन्हे मध्य जून की दो तारीखें बता दी उन्हीं मे उन्होने जिला सम्मेलन करने की घोषणा की। राज्य-सम्मेलन के आय-व्यय का विवरण तैयार होने पर मिश्रा जी भड़क गए क्योंकि लगभग रु 6000/-अधिक (EXCESS ) निकल रहे थे। अकाउंट्स का थोड़ा भी जानकार समझ सकता है कि धन का बच जाना (एक्सेस) क्राईम है जबकि कम पड़ना (शारटेज) होना आम बात है।

मिश्रा जी का भारी दबाव था कि मै अपने अकाउंट्स ज्ञान का प्रयोग करके इस विवरण को इस प्रकार एडजस्ट कर दूँ कि EXCESS न रहे। ईमानदारी और पार्टी के प्रति वफादारी का तकाजा था कि विवरण को जैसे का तैसा रखा जाये और वही मैंने किया भी,चर्चा करने पर मिश्रा जी के सहयोगी और विरोधी सभी मुझसे सहमत थे। इस विवरण को मुद्दा बना कर मिश्रा जी ने मुझे परेशान करने की तिक्ड़मे की तो मैंने उनकी हिदायत की अवहेलना करते हुये राज्य-सम्मेलन के विवरण पर बची रकम को बैंक मे जमा करा दिया उसी अकाउंट मे जिसमे जिले का धन रहता था। अब तो मिश्रा जी एक प्रकार से मेरे शत्रु ही हो गए। कामरेड सरदार रणजीत सिंह काफी पुराने थे और सबके सब हाल जानते थे और उनकी उपेक्षा थी ,मुझसे बोले इस विषय पर पूरी तरह अड़े रहो इस बार मिश्रा एक ईमानदार आदमी से टकरा रहा है उसकी करारी हार हो जाएगी। वह मुझे सुबह 7 बजे मलपुरा ले चलने हेतु मेरे घर पर 6 बजे दयालबाग से आ गए। दोनों अपनी-अपनी साइकिलों से 16 km चले,उनके लिए 72-73 वर्ष की आयु मे इतनी दूर साइकिल से आना-जाना मुश्किल था किन्तु पार्टी-हित मे उन्होने यह कष्ट भी सहा। मलपुरा शाखा पार्टी की सबसे ज्यादा संख्या वाली शाखा थी और पार्टी मे उनका बहुमत भी था। उस शाखा के वरिष्ठ नेताओं से उन्होने संपर्क किया और वस्तु-स्थिति बताई ,सभी ने इस विषय मे मिश्रा जी का विरोध करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें जिला सम्मेलन मे हटा देने की बात कही। उन लोगों का कहना था वे सब मिश्रा जी के समर्थक माने जाते हैं इसलिए उनके प्रस्तावों का कामरेड जवाहर सिंह धाकरे विरोध करते हैं अतः उनका भी समर्थन हम लोग प्राप्त कर लें। कामरेड किशन बाबू श्रीवास्तव बाह के थे और वहीं के कटारा साहब भी थे बल्कि वही उन्हें पार्टी मे लाये थे किन्तु उन्होने श्रीवास्तव साहब को उनकी शाखा के मंत्री पद से हटवा दिया था क्योंकि उनकी छवी धाकरे साहब के पिछलग्गू की थी। लिहाजा हम लोगों ने उनसे संपर्क कर के धाकरे साहब से बात करने की जरूरत बताई। डॉ धाकरे तब R.B.S.कालेज के प्रिंसिपल थे उनके कार्यालय मे सरदारजी ,श्रीवास्तव साहब और मै मिले और उन्होने सहर्ष अपना समर्थन दे दिया। कभी भी अपने कालेज -निवास पर मिलने आने की बात भी उन्होने कही जहां ठीक से बात कर सकें।

मिश्रा जी के साथ ज़मीनों का धंधा करने वाले कामरेड पूरन खाँ जो उनके घर मे भी गहरे घुसे हुये थे और उनके सम्पूर्ण परिवार से सहानुभूति रखते थे,मुझसे लगातार कह रहे थे कि मिश्रा जी के परिवार को बचाओ कटारा उनके परिवार को तबाह करना चाहता है और वह कटारा प्रेम मे डूबे हुये हैं। कामरेड दीवान सिंह भी मिश्रा जी के एहसानमंद थे और वह भी उनके परिवार को कटारा से बचाना चाहते थे। मिश्रा जी के साथ जूते की फेकटरी खोलने वाले कामरेड नेमीचन्द भी उनके खैरख्वाह थे और भलीभाँति जानते थे कि उस फेकटरी को फेल करने मे कटारा और उनके बेटे का पूरा-पूरा हाथ था। इन लोगों का कहना था कि कटारा ने किसी तांत्रिक प्रक्रिया से मिश्रा जी को वशीभूत कर लिया है,पार्टी तो सम्हाल ली जाएगी और मिश्रा जी के बगैर भी चलती रहेगी किन्तु उनका परिवार बुरी तरह बिखर जाएगा। लिहाजा कटारा को काबू करने के लिए मिश्रा जी को हटाना जरूरी हो गया था। मलपुरा के कामरेड्स को भी मिश्रा जी से व्यक्तिगत सहानुभूति थी और वे भी कटारा से मुक्ति की मुहिम मे मिश्रा जी को पदच्युत करने के हामी थे। …… 

 

आगरा/1992 -93 (भाग-1)

सेठ जी के मित्र और ‘शू चैंबर’ के प्रेसीडेंट शंकर लाल मुरजानी साहब अक्सर उनकी दुकान मे आकर सो जाते थे। वह रश्मि एन्क्लेव,कमला नगर मे रहते थे। एक दिन मुझ से बोले माथुर साहब क्या बात है बेहद कमजोर हो गए हो। मैंने कहा साहब जीवन  चलाने हेतु कमजोर होना जरूरी है,तो फिर वह बोले और कमजोर कर दें?मैंने कहा यदि आप उचित समझते हैं तो कर दें। उन्होने कहा कल सुबह मुझे घर पर मिलो। जब अगले दिन मै उनके घर गया तो उन्होने कहा तुम्हारा सेठ बड़ा मतलबी है जब फँसता है मेरे पास आता है,मैंने उससे कहा था कि,माथुर साहब को पूछो मेरे यहाँ पार्ट-टाईम करेंगे? एक साल हो गया कहता है पूछने का टाईम नहीं मिला। इसलिए मैंने तुमसे सीधे बात की। मेरे घर पर आकर डेढ़ घंटा गर्मियों मे 7-30 से 9 और जाड़ों मे 9 से 10-30 सुबह सेल्स टैक्स-इन्कम टैक्स का काम कर देना शुरू मे रु 600/- दूंगा। घर के नजदीक होने तथा उनके व्यापारी नेता होने के कारण उनसे व्यवहार रखना घाटे का सौदा नहीं था,मैंने स्वीकार कर लिया। वह ‘शू फेक्टर्स फ़ेडेरेशन ‘ के वाईस प्रेसिडेंट थे और राज कुमार सामा जी प्रेसिडेंट जो भाजपा के बड़े नेता थे। हालांकि वह जानते थे कि मै भाकपा मे सक्रिय हूँ फिर भी उन्हे स्पष्ट कर दिया। वह बोले हमारा -तुम्हारा संपर्क सिर्फ जाब तक है हम अपनी राजनीति मे तुम्हें नहीं शामिल करेंगे और न तुम्हारी राजनीति मे दखल देंगे।

पता नहीं क्यों सेठ जी उनके घर मेरे काम स्वीकारने से खुश नहीं थे?वह खिचे-खिचे रहने लगे। मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता था लेकिन मै और सतर्क हो गया। इससे पूर्व वह खुद मुझे तीन अलग-अलग पार्ट-टाईम जाब दिला चुके थे परंतु उन्हें अपने मित्र के यहाँ मेरा जाब करना अखर गया था। मैंने अपने भाकपा ,जिला मंत्री मिश्रा जी से भी चर्चा की थी। उन्होने बताया कि ये जूता व्यापारी भाजपा के होते हुये भी कम्यूनिस्ट पार्टी से दबते हैं क्योंकि तमाम लोग ‘सोवियत यूनियन’ को जूता सप्लाई करते हैं। रूस से पेमेंट मिलना निश्चित रहता है। कभी कोई दिक्कत होती है तो पार्टी के बड़े नेताओं से संपर्क साधते हैं। इसी लिए आपका कम्यूनिस्ट होना उन्हे नागवार नहीं लगता है,और वह सेठ भी आपको अपनी तरफ से हटाने की पहल नहीं करेगा।

जब रमेशकान्त लवानिया मेयर थे तब मिश्रा जी ने अपने घर के आस-पास सीवर की समस्या को उनके दफ्तर मे जाकर बताया तो उन्होने कहा था -अरे मिश्रा जी आपने आने की तकलीफ बेकार की फोन कर देते तब भी काम हो जाता। जो काम भाजपा का क्षेत्रीय पार्षद न करा सका वह भाकपा के जिलामंत्री की पहल पर चुटकियों मे हो गया। इस उदाहरण से मिश्रा जी ने मुझे समझाया था कि ये व्यापारी बड़े डरपोक होते हैं जब तक उनकी नब्ज आपकी पकड़ मे है वे आपको हटा नहीं सकते।

राजनीति और आजीविका के क्षेत्र मे सभी कुछ बदस्तूर चलता रहा। सिर्फ घरेलू क्षेत्र मे शालिनी का अपनी भाभी संगीता के प्रति बदला हुआ व्यवहार आश्चर्यजनक रहा। इस वर्ष की गर्मियों मे भी उनकी माँ जब 7-8 रोज के लिए बाहर गई तो शालिनी जल्दी-जल्दी सिटी के क्वार्टर पर जाती थीं। चूंकि तब तक स्कूल बंद नहीं हुये थे और उनकी माँ जल्दी गई थीं। यशवन्त को स्कूल छोडते हये मै शंकर लाल जी के घर चला जाता था। उनके घर से लौटने पर शालिनी साईकिल पर मेरे साथ सिटी क्वार्टर की परिक्रमा करके उसकी छुट्टी से पहले लौट आती थीं। वहाँ दिन भर रुकने की बजाए दो ढाई घंटे मे लौट लेना होता था। मै सेठ जी के यहाँ 6 घंटों की बजाए सिर्फ 3 घंटे काम तब कर पाता था ,खैर वह कहते कुछ नहीं थे। इसी क्रम मे एक बार शालिनी ने संगीता को कुछ इशारा किया और उन्होने मुस्करा कर जवाब दिया हाँ वायदा याद है आप बताइये किस गाने पर डांस करना है। शालिनी ने उन्हें कान मे कुछ कहा और उन्होने कहा ठीक है मौन डांस ही करेंगे गाएँगे नहीं। मै नहीं कह सकता कि कोई गाना भी था या नहीं। डांस मेरे समझ से परे था। मै तो सिर्फ इतना ही समझ सका कि डांस के नाम पर वह शरीर को मटकाना भर था। ऐसी हरकत ने केवल संगीता के शरीर मे उत्तेजना ही व्याप्त की और पूर्व की भांति जब स्वतः वस्त्र न खुले तो संगीता ने भाव-प्रदर्शन के सहारे उन्हे खोला ,नारा ढीला करने के नाम पर नीचे के वस्त्र हटाने से साफ हो गया कि बार-बार एक ही प्रक्रिया का दोहराया जाना किसी खास मकसद की छोटी कड़ी है। डी एस पी इंटेलीजेंस (जो मुगल होटल मे सेक्यूरिटी आफ़ीसर थे जब मैंने 1975 मे ज्वाईन किया था) के साथ बैठकें-चर्चाए व्यर्थ नहीं थीं उनसे कुछ न कुछ सीखा ही था। अच्छी या बुरी किसी प्रकार की प्रतिक्रिया मैंने कभी भी न दी। मैंने घर पर शालिनी से पूछना भी बंद कर दिया कि ऐसा करने का कारण क्या?

1990-91  मे आडवाणी की रथ-यात्रा और रामजन्म भूमि आंदोलन  द्वारा होने वाले अनिष्ट से जनता को आगाह करने हेतु यू पी मे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ने तब की सातों कमिशनरियों के मुख्यालयों पर ‘सांप्रदायिकता विरोधी रैली ‘ के आयोजन का फैसला किया था ।  मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सभी जिलों मे रैली करने का प्रस्ताव किया ,उसी क्रम मे मथुरा मे भी एक रैली हुई थी। मै अपने भाकपा साथियों के साथ ट्रेन से मथुरा गया था। शालिनी का कहना था कि उनकी छोटी बहन सीमा के घर भी हाल-चाल लेता आऊ;  क्योंकि योगेन्द्र चंद्र का क्वार्टर मथुरा जंक्शन पर ही था मैंने साथियों से सीधे रैली स्थल पर मिलने का वादा करके प्लेटफार्म से ही क्वार्टर का रास्ता पकड़ा। तभी थोड़ी देर पहले योगेन्द्र दिल्ली की गाड़ी पकड़ने हेतु गए होंगे और सीमा ने समझा था कि उनकी गाड़ी छूट गई होगी जिससे वह घर लौट आए होंगे । उन लोगों को मेरे पहुँचने की सूचना नहीं थी। सीमा ने दरवाजे खोले तो अस्त-व्यस्त और पुराने-फटे कपड़ों मे थी ,सफाई करते -करते बेल बजने पर यह सोच कर दरवाजा खोला था कि योगेन्द्र ही उल्टे -पैरों लौटे होंगे। उस दशा मे पहले कभी सीमा को नहीं देखा था। सीमा ने सोफ़े पर बैठाने के बाद अपनी बेटी (जो जब 6-7 वर्ष की रही होगी )से पानी भिजवा दिया और खुद कपड़े बदलने के बाद ही आई। यह अंतर था शरद मोहन और उनकी पत्नी संगीता के चरित्र और शरद की छोटी बहन सीमा के चरित्र का ,गफलत की बात और थी जो सीमा ने दरवाजा खोला था तब की दशा मे और फिर बैठ कर बात-चीत करते समय की दशा मे। मुझे ताज्जुब भी था कि आवारा माँ, भाइयों,भाभी का असर सीमा पर भी अपनी और  बहनों की ही तरह  बिलकुल नहीं पड़ा था।बेटियाँ  अपनी माँ के चरित्र से प्रभावित नहीं थीं जबकि बेटे माँ के चरित्र से प्रभावित थे। कमलेश बाबू के जिगरी दोस्त और भतीज दामाद कुक्कू(जिनकी बेटी की नन्द कमलेश बाबू की छोटी बेटी की देवरानी है) तो अश्लील पुस्तकें ला कर बिस्तर के नीचे छिपा कर रखते थे ताकि उनकी बहनें भी पढे और प्रभावित हों परंतु उनकी बहनें अपने आवारा भाई से प्रभावित नहीं हुई। यह एक अच्छी बात रही।


 

आगरा /1988-89 (भाग-1)

हींग की मंडी के जूता वाले सेठ जी जो और व्यापारियों की तरह और कर्मचारियों का वेतन छुट्टी का काट लेते थे परंतु मेरे चंडीगढ़ से लौटने पर 20 दिन की छुट्टी सवेतन रखी। इससे पूर्व भी और बाद भी कभी मेरे वेतन की  कटौती नहीं हुयी चाहे वह छुट्टी लखनऊ कम्यूनिस्ट पार्टी की रैली मे जाने के लिए ही क्यों न की हो। दिसंबर 1987 मे जूनियर डाक्टरों को  एस पी -सिटी  अरविंद जैन ने  (जो अब ए डी जी ,आर पी एफ हैं)मेडीकल कालेज की हड़ताल के सिलसिले मे जेल मे बंद करा दिया था। चूंकी डाक्टरों की यूनियन के प्रेसीडेंट का विनय आहूजा थे जिनके पिता जी का हरीश आहूजा एडवोकेट पार्टी के आड़ीटर थे। आगरा कम्यूनिस्ट पार्टी ने जूनियर डाक्टरों का खुल कर समर्थन किया और एक मशाल जुलूस निकाला। एस पी -सिटी ने ए डी एम सिटी से पहले से ब्लैंक वारंट साइन करा रखे थे उनका स्तेमाल करते हुये जुलूस मे शामिल सभी कम्यूनिस्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया था । का डा महेश चंद्र शर्मा जी और मै उस जुलूस मे होते हुये भी गिरफ्तार नहीं हो पाये थे। हम लोग रोजाना पार्टी दफ्तर जाकर कार्य करते रहे। 02 जनवरी 1988 को जेल मे अपने कम्यूनिस्ट साथियों से मै भी मिलने गया था और सेठ जी से दो घंटे की छुट्टी लेकर गया था।

जिला मंत्री का रमेश मिश्रा जी भी मेरे कार्य से संतुष्ट थे और अक्सर दूर जाने पर मुझे अपनी मोपेड़ पर पीछे बैठाल ले जाते थे। टूंडला से शरद मोहन को अप-डाउन करना पड़ता था उनकी मौसेरी बहन मिक्की तथा उनकी माता ने मुझ से कहा कि आगरा मे उन्हें किराये पर मकान दिला दूँ। मैंने इस निजी कार्य हेतु मिश्रा जी का सहयोग मांगा। जितना किराया वे लोग देना चाहते थे उतने मे किराये पर मकान मिलना संभव न था। मिश्रा जी ने कहा इतने कम मे कोई अपना मकान किराये पर नहीं देगा मुझे ही ऊपर से नीचे शिफ्ट होकर देना पड़ेगा। वह कोई किरायेदार नहीं रखते थे परंतु मेरी  रिश्तेदारी के कारण नीचे का हिस्सा मरम्मत करा कर खुद उसमे आ गए और ऊपर जिसमे खुद रह रहे थे शरद मोहन को कुल रु 400/-मे बिजली खर्च सहित दे दिया।

इन लोगों ने जिस दिन आने को तय किया था उससे एक दिन पहले जिसकी सूचना मुझे भी नहीं दी थी उनके घर ट्रक से सामान लेकर पहुँच गए। ऐसा रेलवे मे कार्यरत योगेन्द्र चंद्र  (सीमा के पति)की सलाह पर किया गया,मुझे शाम को पार्टी आफिस मे मिश्रा जी ने बताया कि आपके रिश्तेदार आज ही आ गए हैं। मुझे ताज्जुब भी हुआ कि मेरे मार्फत मेरे पार्टी लीडर के मकान मे आए और मुझे ही पूर्व सूचना देना मुनासिब न समझा। फिर भी शरद मोहन की छोटी बेटी के होने से पूर्व और उसके जन्म के बाद भी शालिनी अपनी माँ को मदद करने को जाती  रहीं। यशवन्त का वहाँ मन नहीं लगता था ,शरद की बड़ी बेटी उसे परेशान करती थी। कभी-कभी सुबह मै उसे ले आता था और रात को खाना खा कर वह शालिनी के पास चला जाता था। उसे नानी की अपेक्षा अपने बाबा-दादी के पास ही मन लगता था। जब यशवन्त दिन मे घर आता था तब मै शाम को पार्टी आफिस न जाकर सीधे घर आ जाता था और उसे शालिनी के पास पहुंचा देता था,एक दिन वह साइकिल के कैरियर पर ही सो गया। उसकी बोलते हुये चलने की आदत थी और कुछ देर से न बोला तो मैंने टोका तब भी जवाब नहीं दिया ,सड़क पार करते ही मैंने साइकिल रोक कर देखा और उसे सोते पाया तो खुद आगे पैदल ही साइकिल लेकर गया। इस दिन के बाद से मैंने उसे कैरियर पर बैठाना छोड़ दिया और डंडे पर बैठाने लगा जिससे सामने निगाह मे रहे।

शरद मोहन की यह बेटी भी सीजेरियन से ही हुयी थी। उस दिन नर्सिंग होम मे सब को एकट्ठा कर लिया ,चूंकि उनके रिश्तेदार डा का था इस लिए भीड़ पर एतराज नहीं हुआ। मुझे दुकान मे भी बेलेन्स शीट का आवश्यक कार्य था और शाम को मजदूर दिवस की रैली मे भी शामिल होना था। मेरी कतई इच्छा नहीं थे कि मै भी नर्सिंग होम पहुंचूँ परंतु शालिनी का आग्रह था कि जब गाजियाबाद से उनके जीजा अनिल भी आ गए और छोटे बहनोयी योगेन्द्र झांसी से आ गए तो शहर मे होते हुये भी मेरा शामिल न  होना अच्छा नहीं रहेगा,अतः शामिल होना ही चाहिए। हालांकि मेरे द्वारा मेरे परिचित के मकान मे आते समय भी मुझे जो दिन बताया था उससे एक दिन पूर्व आते समय और आकर भी उन लोगों ने सूचित नहीं किया तो वह कैसे अच्छा रहा?खैर बे मन से शामिल हुआ और शरद की पत्नी तथा नवागंतुक बेटी के कमरे पर पहुँचते ही मै वहाँ से रवाना हो गया।

चूंकि यशवन्त भी वहाँ पर था अतः मै अक्सर चला जाता था वरना उन लोगों को मदद करने के बाद उनके बेरूखे व्यवहार से वहाँ झाँकने को भी मन न करता था। एक बार तो नीचे मिश्रा जी के घर मीटिंग अटेण्ड कर के ही लौट भी आया और ऊपर चढ़ कर नहीं गया था। शरद के एक मौसेरे भाई जो काशीपुर से आकर वहाँ मेडिकल कालेज मे पढ़ रहे थे रोज आकर शरद की पत्नी की ड्रेसिंग कर जाते थे। एक दिन जब शरद की सलहज आई हुयी थीं तो रात मे फ्लश का नल खुला छोड़ दिया चाहे गलती से या जान-बूझ कर ,सारी रात पानी बहता रहा,पाईप मे गेंद भी फसी थी  और पड़ौस के मकान तक सीलन हो गई ,उन लोगों ने मिश्रा जी से कहा तब देख कर मिश्रा जी को क्रोध आया और मेरी निगाह मे वह वाजिब ही था। हो सकता है गुस्से मे मिश्रा जी ने उन लोगों को गालियां भी दी हों जैसा उन लोगों ने आरोप लगाया था। उन लोगों के बहौत कहने के बाद भी मैंने मिश्रा जी से कोई ऐतराज नहीं जताया क्योंकि वे लोग ही गलत थे ,मिश्रा जी का तो काफी नुकसान हुआ था। उनकी एक सार्वजनिक छवि थी जिसके चलते पड़ौसी के मकान की भी मरम्मत उन्होने ही करवाई। मिश्रा जी ने उन लोगों से मकान छोडने को कहा और मुझ से भी कहा कि उन्हें जल्दी छोडने को कहूँ । इत्तिफ़ाक से शरद को सिटी स्टेशन पर की पर्सोनेल वाले दो क्वार्टर मिलाकर एक रहने को एलाट हो गया और उसकी मेंटीनेंस मे जो समय लगा उस तक रुकने को मैंने मिश्रा जी से अनुमति दिला दी। ………. 

 

आगरा/1986-87(भाग-1)मुगल के विरुद्ध संराधन केस

सेठ जी ने अपने पार्ट टाईम अकाउंटेंट जो उनके सहपाठी भी रहे थे उनके स्वास्थ्य की आड़ लेकर उन्हें अपने यहाँ से हटा दिया और सम्पूर्ण कार्य मेरे ही पास आ गया परंतु वेतन बढ़ोतरी नहीं हुयी ,प्रतिवर्ष मात्र रु 100/-ही बढ़ाने की बात कही। किन्तु दो माह बाद ही मेरी  बात मान कर उन्होने अतिरिक्त रु 200/- बढ़ा दिये। फिर भी समस्या तो थी ही क्योंकि रु 290/- की किश्त तो हाउसिंग बोर्ड की ही जमा करनी होती थी। जिन लोगों का हाथ मुगल से नौकरी खत्म कराने का था उनकी सोच थी कि ,जाबलेस होकर यह मकान बेचने पर मजबूर हो जाएगा। परंतु कम ही सही कुछ तो अरनिंग हो ही रही थी झेल लिया और इसलिए भी कि पिताजी मेरे ही पास थे वह अंत तक आटा अपने खर्च पर मुहैया कराते रहे। मना करने पर उनका जवाब होता हम तुम्हें किराया नहीं दे रहे हैं -खाना खुद खाएँगे और तुम लोग भी उसी मे खा सकते हो।

हरीश छाबड़ा के चिकित्सक मित्र के एक दूसरे मित्र ने मुझे मुगल के विरुद्ध केस हेतु का अब्दुल हफीज से संपर्क करने को कहा। आगरा मे उस समय भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की पहचान हफीज साहब की पार्टी या चचे की पार्टी के रूप मे थी। का हफीज ईमानदार ट्रेड यूनियन नेता थे और काफी वृद्ध हो  चुके थे वह सज्जन उनके पूर्व परिचित थे ,वही मुझे लेकर गए थे अतः उन्होने यह कह कर कि अब खुद नए केस नहीं ले रहे है का हरीश चंद्र आहूजा के घर भेज दिया। पहले तो वकील आहूजा साहब मुगल का नाम सुन कर भड़क गए क्योंकि झा साहब के परसोनल मेनेजर रहते उनके विरुद्ध इजेक्शन  नोटिस पारित कराया गया था। लेकिन बाद मे इस शर्त पर केस लड़ने पर राजी हो गए कि किसी भी सूरत मे कभी भी मुगल मेनेजमेंट से कोई सम्झौता नहीं करोगे।

आहूजा साहब ने संराधान अधिकारी,आगरा के समक्ष केस दायर कर दिया। इसके जवाब मे मुगल मेनेजमेंट ने एक माह की नोटिस पे का ड्राफ्ट बना कर भेज दिया और कहा सरप्लस होने के कारण छटनी की है। सरकारी श्रम विभाग मे जिस कछुआ गति से केस चलते हैं उसी प्रकार मेरा भी केस शुरू हो गया। आहूजा साहब ने प्रत्येक गुरुवार को श्रमिक प्रशिक्षण कार्यक्रम मे भाग लेने हेतु राम बाग स्थित ‘मजदूर भवन’ पर मुझे बुलाना शुरू किया जिसमे भाग लेने हेतु हींग की मंडी से सीधे पहले रामबाग जाता था फिर वहाँ से लौट कर घर पहुंचता था। इस स्कूल मे ट्रेनिंग देने हेतु प्रो डा जवाहर सिंह धाकरे,प्रो डा महेश चंद्र शर्मा,और का रमेश मिश्रा,जिला मंत्री भाकपा टर्न -बाई -टर्न आते रहते थे। जैसा मेरा मिजाज है मे मूक श्रोता न था। मैंने शंका होने पर सवाल उठाए जिंनका उत्तर प्रशिक्षक लोग बड़ी सौम्यता से समझा कर देते थे।

कुछ माह बाद आहूजा साहब ने कहा केस अपनी रफ्तार से चलता रहेगा लेकिन हम चाहते हैं कि जिस आंदोलन से हम जुड़े हैं आप भी जुड़ें। उन्होने ‘माँ’ उपन्यास पढ़ने को दिया। अक्तूबर 1986 मे उन्होने मुझे भाकपा का सदस्य बना लिया। का रमेश चंद्र मिश्रा जी ने मुझे अपने घर बुला कर कुछ और किताबें पढ़ने को दी। हमारी लँगड़े  की चौकी शाखा की पार्टी मीटिंगें मिश्रा जी के निवास पर ही होती थीं। 8-10 माह बाद आहूजा साहब ने मुझे ‘मजदूर भवन’ बुलाना बंद कर दिया और कहा कि आप राजा की मंडी आफिस मे चौहान साहब और शर्मा जी के साथ काम करो वे आप को वहाँ चाहते हैं। इनमे से चौहान साहब से मे मिला तक नहीं था अतः आश्चर्य भी हुआ । डा राम गोपाल सिंह चौहान ,आगरा कालेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष से सेवा निवृत थे और भाकपा के जिला कोषाध्यक्ष थे । डा शर्मा जी आर बी एस कालेज ,आगरा मे बी एड के विभागाध्यक्ष थे और सहायक जिला मंत्री थे । वैसे दोनों ही पूर्व मे जिला मंत्री भी रह चुके थे। ये दोनों मुझे पार्टी आफिस मे अपनी सहायता के लिए चाहते थे क्योंकि जिला मंत्री मिश्रा जी भाग-दौड़ ,मजदूर व किसान  समस्याओं आदि मे व्यस्त रहते थे।

शुरू-शुरू मे चौहान साहब मुझे इमला बोल कर पत्रोत्तर लिखाते थे। बाद मे उन्हें कुछ लगा कि मे तो खुद लिख सकता हूँ तो कहने लगे रफ लिख कर रखना मुझे दिखाना। मे उनके आने से पहले प्रदेश और केंद्र से आए पत्रों के उत्तर लिख कर रखने लगा तो कुछ दिन बाद बोले बेकार दो बार लिखते हो सीधे पार्टी लेटर हेड पर लिख लो। अब उन्हें केवल हस्ताक्षर ही करने रहते थे। मुझे पार्टी की जिला काउंसिल मे भी सदस्यता प्रदान कर दी गई।………. 

 
 
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