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Category Archives: शरद

आगरा/1988 -89 (भाग-3 )-मुजफ्फरनगर यात्रा

दुकानों की नौकरी मे और तो कोई परेशानी नहीं थी परंतु वेतन अपर्याप्त था। अतः यदा-कदा बेहतर नौकरी के लिए प्रयास करते रहते थे। चूंकि होटल अकाउंट्स का साढ़े नौ वर्ष का अनुभव था  सहारनपुर के एक नए  होटल के लिए आवेदन कर दिया था। भूल भी चुके थे ,वहाँ से इनटरवीयू काल आ गया। निश्चित तिथि से एक दिन पहले मुजफ्फरनगर कुक्कू के यहाँ चले गए क्योंकि वह बेहद बुलाते रहते थे और रास्ते मे उनका शहर पड़ रहा था। हालांकि कूकू की माता जी नहीं चाहती थीं कि मै उनके घर जाऊ। यह भी एक कारण रहा उनके घर जरूर जाने का । लगभग ढाई-तीन बजे कूकू साहब के घर गांधी कालोनी पहुंचा था। उनका आफिस पास ही था अतः उनकी श्रीमती जी ने नेहा और शिवम को उनके दफ्तर भेजा ,वह वहाँ नहीं थे किसी साईट पर गए हुये थे, अतः दोबारा उन दोनों को भेज कर आफिस से उन्हें फोन कराने को कहा और उन्हें गर्म समौसे लाने को भी कह दिया।

औपचारिक हाल चाल पूछ कर कूकू साहब की श्रीमती जी (हमारे बहनोई कमलेश बाबू की भतीजी जैसा अब 2011 मे उनसे  पता चल पाया) ने अपनी सास साहिबा की करामात का बखान कर डाला क्योंकि वह जानती थी कि मै पहले ही उनसे नाखुश हूँ अतः उन्हें कोई भय नहीं था। उन्होने आप बीती जो घटना बताई वह हृदय विदारक है। उन्होने बताया कि उनकी सास जी ने उनके रेलवे वाले देवर शरद मोहन माथुर की मार्फत षड्यंत्र करके उन्हें दोनों बच्चों समेत मारने की हिमाकत की थी। उनके अनुसार टूंडला वाली बुढिया से उनके विरुद्ध टोटका करवाकर उनका दिमाग अस्त-व्यस्त कर दिया गया था जिससे वह बच्चों को लेकर विपरीत दिशा की ट्रेन मे बैठ कर चली गई। कूकू जब टिकट लेकर आए तो उन लोगों को नहीं पाया और चूंकि कूकू तथा उनकी पत्नी मधु दोनों के पिता रेलवे के थे वह तमाम नियमों आदि से परिचित थे। काफी दौड़-धूप के बाद उन्होने मधु को बच्चों समेत बरामद कर लिया। परंतु सारा सामान गायब हो गया जिसमे वह गहना भी था जिसे वह संगीता (मधु की देवरानी) की कस्टडी से ले कर आ रही थीं। उनका शक था शरद मोहन ने ही अपने रेलवे साथियों की मदद से सब सामान पार कर दिया है। (1982 मे कूकू ने अपनी माँ के साथ मुझ पर उसी टूँड़ला वाली बुढ़िया से कुछ करवाया था जो मै आगरा मे बस से उतरते समय गिर कर घायल हुआ था और डा राजेन्द्र कुमार टंडन ने इलाज के साथ पुलिस को फोन करना चाहा था किन्तु बाबूजी ने रोक दिया था ,इस का जिक्र पहले हो चुका है)। बड़ी जल्दी कूकू की पत्नी पर उन्ही के छोटे भाई द्वारा वही षड्यंत्र किया गया जैसा उन्होने अपनी माँ के इशारे पर मेरे साथ किया था। प्रकृति मे देर है पर अंधेर नहीं मैंने मन मे सोचा किन्तु मधु को दिये आश्वासन  के अनुसार किसी से इस घटना का जिक्र नहीं किया। 

अगले दिन कूकू साहब मेरे साथ बस से सहारनपुर भी गए उन्होने सहारनपुर साईट का टूर लगा लिया था। आने-जाने का बस का टिकट मेरा भी उन्ही ने लिया मुझे नहीं लेने दिया। होटल मे मेरा एपोइनमेंट रु 1300/- वेतन पर किया गया मैंने रु 1500/- मांगे थे अतः मैंने ज्वाइनिंग से इंकार कर दिया। लच होटल की तरफ से सभी उम्मीदवारों को कराया गया था। कूकू साहब मुझसे कह कर गए थे उन्ही के साथ लौटूँ अतः उनके इंतजार मे आस-पास ऐसे ही घूम लिया।

मै अपने साथ जो साबुन नहाने व कपड़ा धोने के तथा सिर मे डालने हेतु जो तेल ले गया था उन्हें मधु ने अपने पास रख कर अपने घर से नया साबुन इत्यादि दिया। लौटते मे मेरा सामान मेरे सुपुर्द कर दिया। अतिथि सत्कार मे वह अपनी सास के मुक़ाबले काफी चौकस रहीं जबकि उनकी सास उन्हें पगली कहती थीं। बातचीत मे यह बात मालूम होकर कि शरद की छोटी बेटी का पहला  जन्मदिन पहली मई को अर्थात पंद्रह दिन बाद पड़ रहा है। कूकू साहब ने रात के भोजन के बाद सबको घूमने ले चल कर क्राकरी वाले ,भोजन वाले इत्यादि को एडवांस दे दिया और अपने घर अपनी भतीजी का पहला जन्मदिन मनाने का निर्णय किया। मेरे सामने तो उनकी पत्नी मधु ने खुशी -खुशी उनका समर्थन और साथ दिया था बावजूद इसके कि उनके मन मे शरद और संगीता के प्रति घृणा भाव था। कूकू साहब ने मुझसे कहा था वह पत्र अपनी माता को डाक से भेज रहे हैं परंतु मै उनका निर्णय व्यक्तिगत रूप से दे दूँ। मुझे जाना तो उनके घर था ही क्योंकि यशवन्त और शालिनी उनके सिटी वाले क्वार्टर पर थे कारण कि हमारे बाबूजी व बउआ अजय के पास फरीदाबाद गए हुये थे और घर मे अकेले रहना शालिनी ने कबूल नहीं किया था।

मैंने जब लौट कर कूकू साहब की सूचना उनकी माता जी को दी तो उन्हें धक्का लगा। वह मधु से चिढ़ती थीं लेकिन कूकू से बेहद लगाव था। वह कहती थीं कि उन्हें केवल अपने पाँच बच्चों से ही लगाव है। अर्थात उन्हें अपने बच्चों के बच्चों से कोई लगाव नही था,  इसी कारण यशवन्त को भी उपेक्षा से देखती थीं और शायद इसीलिए अपने पोता – पोती को भी उनकी माँ मधु के कारण गायब कराना चाहती रही होंगी। उन्होने शालिनी को हिदायत दी कि वह कूकू के घर न जाएँ जबकि मै कूकू और उनकी पत्नी को वचन दे आया था कि उनकी बहन/नन्द को और भांजे को जरूर लेकर आऊँगा। काफी द्वंद और दबाव के बाद मै शालिनी को अपने बड़े भाई के यहाँ जाने को बाध्य कर सका ,उन्होने अपनी माँ के आदेश का पालन करना जरूरी समझा था बजाए अपने पति की बात और इज्जत रखने के। शालिनी की छोटी बहन सीमा ने अपनी माँ के आदेश का अक्षरशः पालन किया और वे लोग मुजफ्फरनगर नहीं पहुंचे जबकि रेलवे का होने के कारण योगेन्द्र को कुछ खास खर्चा नहीं पड़ता। शालिनी की बड़ी बहन रागिनी ने अपनी माँ के आदेश का आधा पालन किया ,वह खुद न आई न बच्चों को भेजा केवल उनके पति अनिल साहब अकेले पहुँच गए। मेरे कारण सिर्फ शालिनी द्वारा ही अपनी माता के उल्लंघन की घटना घटित हुई।

कूकू साहब का बंदोबस्त काफी अच्छा था उन्होने दिल खोल कर खर्च किया था। तमाम उनके आफिस के इंजीनियर और दूसरे स्टाफ की शिरकत रही। आस-पास के पड़ौसी और उनके कुछ रिश्तेदार भी शामिल हुये। लौट कर मैंने शालिनी से कारण जानना चाहा कि क्यों उनकी माता वहाँ जाने से रोकना चाह रही थीं और वह क्यों उनकी बात मानना चाह रही थी। शालिनी ने जो जवाब दिया वह हैरतअंगेज था- उनका कहना था भाभी जी (मधु)दोहरे स्वभाव की हैं ,सामने कुछ कहती हैं पीछे कुछ और ,और सबको कोसती हैं । तब मैंने मेरे पहले मुजफ्फरनगर जाने के दौरान मधु द्वारा बताया घटना -क्रम बता कर उसकी सच्चाई जानना चाहा और यह भी कि उन्होने मुझे इस बाबत क्यों नहीं बताया?शालिनी का जवाब न बताने के बारे मे उनकी माँ की कड़ी हिदायत थी। घटना छिपाना उनकी माँ और और दूसरे रेलवे वाले भाई की इज्जत बचाने हेतु था।

यही बात जब मैंने अपने माता-पिता के फरीदाबाद से लौटने पर   उन्हें बताई तो उनका कहना था वे इन बातों को जानते हैं । मेरे यह पूछने पर कि वे कैसे जानते हैं तो उन्होने बताया कि शोभा- कमलेश बिहारी ने उन्हें बताया था और मुझे बताने को मना किया था इसलिए वे छिपाए रहे। वाह क्या कमाल रहा मेरे पत्नी के रूप मे शालिनी ने इसलिए छिपाया कि उन्हें उनकी माँ ने ऐसा आदेश दिया था। और मेरे माता-पिता ने इसलिए छिपाया कि उनके बेटी-दामाद ऐसा चाहते थे। हमारे बहन-बहनोई शालिनी की माता के मंसूबे क्यों पूरे कर रहे थे ?क्या रहस्य था?हालांकि अब सब उजागर हो गया है उसका वर्णन अभी नहीं फिर कभी। 

हो सकता है शालिनी ने अपनी भाभी संगीता और माता को बताया हो कि उनकी मधु भाभी ने मुझसे भेद बता दिया है। एक बार अकेले मौका पड़ने पर संगीता उसी घटना को लक्ष्य करके सफाई दे रही थी कि भाभी जी (उनकी जेठानी मधु) का दिमाग सही काम नहीं करता है और वह उल्टी-सीधी बातें करती हैं। वह अपना गहना पार करने का शक उनके (संगीता)ऊपर रखती हैं। क्या उन्होने मुझसे कुछ कहा था?मैंने उन्हें स्पष्ट इंन्कार कर दिया क्योंकि मै अब तक सारा घटनाक्रम समझ चुका था और जतलाना नहीं चाहता था कि सब की सारी पोलें मुझे मालूम हैं। ऊपर-ऊपर से शरद और संगीता कुछ जतलाना नहीं चाहते थे परंतु उनकी माता के दृष्टिकोण से साफ था वह मेरे और विरुद्ध हो गई थीं ,उन्हें भय था कि कहीं मै कूकू की पत्नी मधु को सहयोग न कर दूँ । यदि ऐसा होता तो उन्हें बहौत भारी पड़ता कि उनकी बड़ी पुत्रवधू और बीच का दामाद भी उनके खिलाफ क्यों हैं?मेरा दृष्टिकोण साफ था/है कि मै किसी के घरेलू मामलों मे हस्तक्षेप नहीं करता हूँ चाहे मुझे खुद कितना भारी नुकसान होता रहे। मै किसी की घरेलू फूट से अपना फायदा नहीं चाहता वरना चुटकियों मे शालिनी की माता से अपने अपमान और नुकसान का बदला उन्ही की बड़ी पुत्रवधू को सहयोग देकर ले सकता था।वैसे मैंने मधु को भी सहानुभूति का पात्र नहीं समझा था क्योंकि उनके पति कुक्कू अपनी माता के कुचक्रों मे साझीदार रहे हैं। तब यदि वह अपने पति को गलत चाल चलने से रोक पाती तो दूसरी बात थी। फिर खुद उन्होने भी अपनी नन्द को यह कह कर गुमराह किया था कि तुम बड़ी हो अपनी चलाना। सास -श्वसुर को अपनी बात मनवाने के लिए बुद्धि की जरूरत होती है यों ही नहीं घुमाया जा सकता। लिहाजा तटस्थ रहना ही उचित था।

लौटते मे हम लोग फरीदाबाद अजय के घर बाबूजी -बउआ से मिलते हुये आए थे ,उसका वर्णन अगली बार……..

 

आगरा /1988-89 (भाग-1)

हींग की मंडी के जूता वाले सेठ जी जो और व्यापारियों की तरह और कर्मचारियों का वेतन छुट्टी का काट लेते थे परंतु मेरे चंडीगढ़ से लौटने पर 20 दिन की छुट्टी सवेतन रखी। इससे पूर्व भी और बाद भी कभी मेरे वेतन की  कटौती नहीं हुयी चाहे वह छुट्टी लखनऊ कम्यूनिस्ट पार्टी की रैली मे जाने के लिए ही क्यों न की हो। दिसंबर 1987 मे जूनियर डाक्टरों को  एस पी -सिटी  अरविंद जैन ने  (जो अब ए डी जी ,आर पी एफ हैं)मेडीकल कालेज की हड़ताल के सिलसिले मे जेल मे बंद करा दिया था। चूंकी डाक्टरों की यूनियन के प्रेसीडेंट का विनय आहूजा थे जिनके पिता जी का हरीश आहूजा एडवोकेट पार्टी के आड़ीटर थे। आगरा कम्यूनिस्ट पार्टी ने जूनियर डाक्टरों का खुल कर समर्थन किया और एक मशाल जुलूस निकाला। एस पी -सिटी ने ए डी एम सिटी से पहले से ब्लैंक वारंट साइन करा रखे थे उनका स्तेमाल करते हुये जुलूस मे शामिल सभी कम्यूनिस्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया था । का डा महेश चंद्र शर्मा जी और मै उस जुलूस मे होते हुये भी गिरफ्तार नहीं हो पाये थे। हम लोग रोजाना पार्टी दफ्तर जाकर कार्य करते रहे। 02 जनवरी 1988 को जेल मे अपने कम्यूनिस्ट साथियों से मै भी मिलने गया था और सेठ जी से दो घंटे की छुट्टी लेकर गया था।

जिला मंत्री का रमेश मिश्रा जी भी मेरे कार्य से संतुष्ट थे और अक्सर दूर जाने पर मुझे अपनी मोपेड़ पर पीछे बैठाल ले जाते थे। टूंडला से शरद मोहन को अप-डाउन करना पड़ता था उनकी मौसेरी बहन मिक्की तथा उनकी माता ने मुझ से कहा कि आगरा मे उन्हें किराये पर मकान दिला दूँ। मैंने इस निजी कार्य हेतु मिश्रा जी का सहयोग मांगा। जितना किराया वे लोग देना चाहते थे उतने मे किराये पर मकान मिलना संभव न था। मिश्रा जी ने कहा इतने कम मे कोई अपना मकान किराये पर नहीं देगा मुझे ही ऊपर से नीचे शिफ्ट होकर देना पड़ेगा। वह कोई किरायेदार नहीं रखते थे परंतु मेरी  रिश्तेदारी के कारण नीचे का हिस्सा मरम्मत करा कर खुद उसमे आ गए और ऊपर जिसमे खुद रह रहे थे शरद मोहन को कुल रु 400/-मे बिजली खर्च सहित दे दिया।

इन लोगों ने जिस दिन आने को तय किया था उससे एक दिन पहले जिसकी सूचना मुझे भी नहीं दी थी उनके घर ट्रक से सामान लेकर पहुँच गए। ऐसा रेलवे मे कार्यरत योगेन्द्र चंद्र  (सीमा के पति)की सलाह पर किया गया,मुझे शाम को पार्टी आफिस मे मिश्रा जी ने बताया कि आपके रिश्तेदार आज ही आ गए हैं। मुझे ताज्जुब भी हुआ कि मेरे मार्फत मेरे पार्टी लीडर के मकान मे आए और मुझे ही पूर्व सूचना देना मुनासिब न समझा। फिर भी शरद मोहन की छोटी बेटी के होने से पूर्व और उसके जन्म के बाद भी शालिनी अपनी माँ को मदद करने को जाती  रहीं। यशवन्त का वहाँ मन नहीं लगता था ,शरद की बड़ी बेटी उसे परेशान करती थी। कभी-कभी सुबह मै उसे ले आता था और रात को खाना खा कर वह शालिनी के पास चला जाता था। उसे नानी की अपेक्षा अपने बाबा-दादी के पास ही मन लगता था। जब यशवन्त दिन मे घर आता था तब मै शाम को पार्टी आफिस न जाकर सीधे घर आ जाता था और उसे शालिनी के पास पहुंचा देता था,एक दिन वह साइकिल के कैरियर पर ही सो गया। उसकी बोलते हुये चलने की आदत थी और कुछ देर से न बोला तो मैंने टोका तब भी जवाब नहीं दिया ,सड़क पार करते ही मैंने साइकिल रोक कर देखा और उसे सोते पाया तो खुद आगे पैदल ही साइकिल लेकर गया। इस दिन के बाद से मैंने उसे कैरियर पर बैठाना छोड़ दिया और डंडे पर बैठाने लगा जिससे सामने निगाह मे रहे।

शरद मोहन की यह बेटी भी सीजेरियन से ही हुयी थी। उस दिन नर्सिंग होम मे सब को एकट्ठा कर लिया ,चूंकि उनके रिश्तेदार डा का था इस लिए भीड़ पर एतराज नहीं हुआ। मुझे दुकान मे भी बेलेन्स शीट का आवश्यक कार्य था और शाम को मजदूर दिवस की रैली मे भी शामिल होना था। मेरी कतई इच्छा नहीं थे कि मै भी नर्सिंग होम पहुंचूँ परंतु शालिनी का आग्रह था कि जब गाजियाबाद से उनके जीजा अनिल भी आ गए और छोटे बहनोयी योगेन्द्र झांसी से आ गए तो शहर मे होते हुये भी मेरा शामिल न  होना अच्छा नहीं रहेगा,अतः शामिल होना ही चाहिए। हालांकि मेरे द्वारा मेरे परिचित के मकान मे आते समय भी मुझे जो दिन बताया था उससे एक दिन पूर्व आते समय और आकर भी उन लोगों ने सूचित नहीं किया तो वह कैसे अच्छा रहा?खैर बे मन से शामिल हुआ और शरद की पत्नी तथा नवागंतुक बेटी के कमरे पर पहुँचते ही मै वहाँ से रवाना हो गया।

चूंकि यशवन्त भी वहाँ पर था अतः मै अक्सर चला जाता था वरना उन लोगों को मदद करने के बाद उनके बेरूखे व्यवहार से वहाँ झाँकने को भी मन न करता था। एक बार तो नीचे मिश्रा जी के घर मीटिंग अटेण्ड कर के ही लौट भी आया और ऊपर चढ़ कर नहीं गया था। शरद के एक मौसेरे भाई जो काशीपुर से आकर वहाँ मेडिकल कालेज मे पढ़ रहे थे रोज आकर शरद की पत्नी की ड्रेसिंग कर जाते थे। एक दिन जब शरद की सलहज आई हुयी थीं तो रात मे फ्लश का नल खुला छोड़ दिया चाहे गलती से या जान-बूझ कर ,सारी रात पानी बहता रहा,पाईप मे गेंद भी फसी थी  और पड़ौस के मकान तक सीलन हो गई ,उन लोगों ने मिश्रा जी से कहा तब देख कर मिश्रा जी को क्रोध आया और मेरी निगाह मे वह वाजिब ही था। हो सकता है गुस्से मे मिश्रा जी ने उन लोगों को गालियां भी दी हों जैसा उन लोगों ने आरोप लगाया था। उन लोगों के बहौत कहने के बाद भी मैंने मिश्रा जी से कोई ऐतराज नहीं जताया क्योंकि वे लोग ही गलत थे ,मिश्रा जी का तो काफी नुकसान हुआ था। उनकी एक सार्वजनिक छवि थी जिसके चलते पड़ौसी के मकान की भी मरम्मत उन्होने ही करवाई। मिश्रा जी ने उन लोगों से मकान छोडने को कहा और मुझ से भी कहा कि उन्हें जल्दी छोडने को कहूँ । इत्तिफ़ाक से शरद को सिटी स्टेशन पर की पर्सोनेल वाले दो क्वार्टर मिलाकर एक रहने को एलाट हो गया और उसकी मेंटीनेंस मे जो समय लगा उस तक रुकने को मैंने मिश्रा जी से अनुमति दिला दी। ………. 

 

आगरा/1984-85(भाग-6 )

हालांकि 21 फरवरी 1985 को टर्मिनेशन लेटर मिलने और 01 अप्रैल 1985 को हींग की मंडी की जूते की दुकान मे नौकरी करने के मध्य खाली रहा। कभी किसी और कभी किसी काम से इधर-उधर जाना बढ़ गया क्योंकि समय पर्याप्त था। जब कभी टूंडला जाना हुआ तो शालिनी का आग्रह रहता था कि उनके घर भी मिल कर आऊँ और अक्सर वहाँ भी  हो आता था । घर पर उनकी माँ और छोटी भाभी ही अक्सर मिल  पाती थीं। उनके भाई तो राजा-की -मंडी स्टेशन पर रेलवे इंक्वायरी मे  रोज ड्यूटी देने आते थे परंतु अपनी छोटी बहन से मिलने आना उनकी कर्टसी मे नहीं था। इसलिए मै उनके घर टूंडला जाने का इच्छुक नहीं होता था लेकिन जब यशवंत के जन्म के बाद दोबारा आना-जाना शुरू हो गया था तो चला ही जाता था।

पहले 1982 मे जब यशवंत से बड़ा वाला लड़का वहाँ टूंडला मे हुआ और 12 घंटे बाद नहीं रहा तो वहाँ से आवा-गमन बंद कर दिया था।किन्तु जब शालिनी वहाँ थीं तो महीना-पंद्रह दिन पीछे जाता रहा था। उस समय भी शरद मोहन का व्यवहार अटपटा लगता था। कभी वह अपने भिलाई वाले ताऊ जी से मज़ाक मे कहते थे आप बैंक क्यों जा रहे हैं मम्मी के स्टेट बैंक (आशय ब्लाउज मे रखे पर्स से था) से रु ले लिया करें। कभी वह अपनी मौसेरी बहन चंचला (मिक्की) जो दो बच्चों की माँ थी को गोद मे उठा कर सीने से चिपटा कर डांस करने लगते थे और मिक्की सिर्फ मौसी-मौसी कहती रहती थीं और उनकी मौसी अर्थात शरद मोहन की माँ केवल हँसती रहती थीं।

अब 1985 मे उनकी श्रीमती जी -संगीता का व्यवहार भी अटपटा ही दीखा। वह अक्सर लेटी ही रहती थीं किन्तु उनकी भाव-भंगिमा ठीक नहीं लगती थी। शालिनी ने बताया था कि शुरू-शुरू मे जब वह आयीं थीं तो श्वसुर साहब के टूर से लौटने पर उनके सीने से चिपट जाती थीं जो उनकी सास को भी ठीक नहीं लगा,उन्होने खुद ही अपनी सास को बताया था कि जब वह अपने कालेज यूनियन की अलवर मे प्रेसीडेंट थीं तो सहपाठी लोग उनसे चिपटते रहे थे उसी आदत के कारण वह अपने श्वसुर से भी चिपट जाती थीं, अलवर की अपनी कालोनी मे वह ‘काली पप्पी’ के नाम से मशहूर थीं । हालांकि अब शालिनी जीवित नहीं हैं तो वे लोग अपनी बात से पलट भी सकते हैं। व्यक्ति हो या न हो बात उसकी याद मे  रह जाती है।

मई के आखिर मे उनकी पुत्री का जन्म हुआ तो कुछ समय के लिए शालिनी को बुलवा लिया था ,इस प्रकार यशवंत तब ही पहली बार वहाँ पहुंचा था।उस समय उसका वहाँ मन नहीं लगा था।

बिजली दुकान का पार्ट टाईम जाब ज्यादा नहीं चल सका। वकील साहब ने हमारी कालोनी मे ही स्थित एक जूता फेकटरी मे दूसरा पार्ट टाईम जाब दिला दिया। ये लोग मुस्लिम होने के बावजूद सौम्य व्यवहार के थे। लेकिन कुछ समय बाद इनहोने वहाँ से काम समेट लिया और कलकत्ता चले गए। फिर  सेठ जी ने अपने साढ़ू साहब की जूता फेकटरी मे पार्ट टाईम जाब दिला दिया। वह भी पास की कालोनी मे ही था। ……..

 

आगरा /1984-85 (भाग-2)

नवंबर 1983 मे यशवंत का जन्म हुआ और जनवरी 1984 मे शालिनी के रेलवे वाले भाई शरद मोहन का विवाह हुआ अतः हम लोगों के शामिल होने का सवाल ही नहीं था ,बउआ ने पहले ही उन लोगों से कह दिया था जाड़ों मे छोटे बच्चे को नहीं भेजेंगे यदि शामिल करना चाहें तो गर्मियों मे शादी करे। इसी प्रकार 1982 मे नवंबर मे यशवंत के बड़े भाई के होने और न रहने के तुरंत बाद उन लोगों ने दिसंबर मे शालिनी की छोटी बहन सीमा की शादी की  थी अतः उसमे भी वह शामिल न हो सकी थी। मुझे झांसी जाना पड़ा था। वहाँ बहनोयी साहब बड़ी भांजी को लेकर शामिल हुये थे उनकी सीधे रिश्तेदारी थी (कूकू की पत्नी मधु उनकी भतीजी जो हैं)।

अगले दिन मै बहन के घर गया था । बड़ी भांजी का हाथ पकड़ कर( और छोटी भांजी को गोद लेकर ) उसी से रास्ता पूंछ कर मिठाई की दुकान पर जाकर शुगन की मिठाई लेकर दे दी थी। इसी छोटी भांजी की देवरानी की भाभी है कूकू की वही बेटी जो दिसंबर 1983 मे  सीमा की शादी मे मेरे गोद मे आकार चुप हो जाती थी और और लोगों के पास रो रही थी।

मेरे सस्पेंशन पीरियड मे ही यूनियन के वार्षिक चुनाव हो रहे थे मुझ पर साथियों का दबाव था जब मेनेजमेंट ने वादा तोड़ा है तो तुम भी चुनाव लड़ कर सक्रिय हो जाओ। मैं केम्पस के भीतर तो प्रचार कर नहीं सकता था बाहर ही थोड़ी देर लोगों से मिल लेता था। वोटिंग 10 जनवरी को हुयी थी,मतगणना स्लो स्पीड से करने की मेनेजमेंट की हिदायत थी। साथियों का कहना था परिणाम की घोषणा के वक्त मौजूद रहो। अतः घर पर देर से आने की खबर करने गया  तो वहाँ शालिनी की माता और छोटी भाभी संगीता मौजूद थे जो यशवंत के जन्म के बाद वहाँ से आने वाले पहले लोग थे। मै तो सूचना देकर और चाय पीकर वापिस होटल मुगल जो हमारे घर से 9 K M की दूरी पर था के लिए चला तभी आगंतुक लोग भी वापिस टूंडला लौट गए।

रात 10 बजे परिणामों का खुलासा किया गया प्रेसीडेंट की टीम के 11 मे 10 तथा मेरे टीम के 11 मे 1 जो खुद मै था जीते थे। कुल पड़े मतो मे सेकेंड हाएस्ट वोट मुझे मिले थे। मेनेजमेंट समर्थकों का कहना था जैसे फरनाडीज़ को जेल मे रहते हुये सहानुभूति के वोट मिले थे उसी प्रकार मुझे सस्पेंशन के कारण इतने अधिक मत मिल गए। जबकि हकीकत यह थी कि अपने सेक्रेटरी जेनरल रहते मैंने निचले पोस्ट के लोगों को जो लाभ दिलाये थे उन्हे वे भूले नहीं थे और पुराने उपकार का प्रतिफल उन्होने वोट के रूप मे दिया था।

14 जनवरी 1985 को मकर संक्रांति  के दिन शरद मोहन और उनकी पत्नी संगीता अपनी शादी की वर्षगांठ 16 जनवरी का निमंत्रण लेकर आए और चूंकी यशवंत के जन्म के बाद वहाँ से पहली बार वह आए थे  तो उसके लिए खिलौने-कपड़े,मिठाई भी लाये थे। कड़ाके की सर्दी मे यशवंत और शालिनी तो नहीं गए मुझे ही औपचारिकता निबाहनी पड़ी।

चूंकि मै कार्यकारिणी का चुनाव जीत गया था और इस कार्यकारिणी के सेक्रेटरी और प्रेसीडेंट मेनेजमेंट का खिलौना थे अतः कोई बैठक तब तक नहीं बुलाई गई जब तक 19 फरवरी 1985 को मुझे टर्मिनेशन लेटर नहीं पोस्ट कर दिया गया। नौकरी खोने के बाद…………. 

 
 
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