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Category Archives: शादी

आगरा/1988-89 (भाग-2)

मिश्रा जी के मकान मे ही शरद ने अपनी बेटी के होने की कथा कराई थी और हमारे माता-पिता को शामिल होने हेतु निमंत्रण देने को योगेंदर को भेजा था। बउआ तो नहीं गईं उन्होने बाद मे जाकर नई लड़की को हथौना के रु दिये। बाबूजी और मै गए थे। पहली बार बाबूजी को उनके यहाँ खाना खाने का न्यौता था किन्तु खाना-पूर्ती हेतु ही। यदि बाबूजी ने आने का वचन न दिया होता तो मेरा विचार उनके कथा और खाने का बहिष्कार करने का था। घर लौट कर मैंने उनसे कहा भी जाने की हामी भर कर खुद अपनी और मेरे दोनों की बेइज्जती करा ली। मिश्रा जी उनके मकान मालिक थे और उनके घर वालों को भी नहीं पूंछा था।

जैसे ही सिटी स्टेशन पर उनका क्वार्टर ठीक हुआ वे लोग उसमे रहने को भागे। जल्दबाज़ी मे शरद की पत्नी अपनी एक साड़ी और कपड़े धोने का तसला मिश्रा जी के घर भूल आयीं थीं। मिश्रा जी ने मुझ से उनका सामान उनके घर पहुंचाने को कहा और मुझे वैसा करना पड़ा। वे लोग चाहते थे कि मै मिश्रा जी को सहयोग करना बंद कर दूँ परंतु मै उनकी गलती के कारण मिश्रा जी द्वारा उन्हें बुरा-भला कहे जाने पर क्यों पार्टी का काम छोड़ देता?मैंने उनके सिटी के क्वार्टर पर उनसे संपर्क करना ही बंद कर दिया। जब शालिनी को माँ-भाभी से मिलना होता तो मै दुकान जाते मे साइकिल पर यशवंत के साथ बैठा कर दोनों को वहाँ छोड़ देता और लौटते मे वैसे ही वापिस हो लेता। न तो मुझे उनके यहाँ का भोजन पसंद आता था न ही उन लोगों का व्यवहार। अतः मै चाय के अलावा कुछ नहीं लेता था।

कुक्कू का ट्रांसफर नाभा से मुजफ्फर नगर हो चुका था। होली पर उन्होने अपनी माता को बुलाया था। छुट्टी के दिनों मे भी ड्यूटी करने वाले शरद मोहन अपनी माँ को लेकर मुजफ्फर नगर गए और उनकी पत्नी तथा बच्चों की रखवाली करने हेतु शालिनी को कहा गया और चूंकि क्वार्टर एकांत एरिया मे पड़ता था तो रात मे मुझे भी वहाँ रुकने का आग्रह किया। हालांकि इच्छा न होते हुये भी हमारे अपने माता-पिता द्वारा भी उन्हे सहयोग करने को कहने पर मुझे रात्रि चौकीदारी हेतु रुकना पड़ा। एक कमरे मे शरद की पत्नी और बेटियाँ तथा दूसरे कमरे मे शालिनी और यशवन्त सोये ,मै बारामदे मे था। गुसलखाना आदि थोड़ा नीचे स्थान पर बहौत आगे था। जब संगीता को उधर जाना होता तो शालिनी को जगा कर साथ ले जातीं और जब शालिनी को जाना होता तो वह कुछ दूर तक मुझे साथ ले लेतीं फिर नीचे खुद चली जातीं। एक बार सुबह के करीब शालिनी की आँख नहीं खुली तो संगीता मुझ से बोलीं शालिनी रानी तो जागी नहीं आप साथ चले चलिये। मै जहां तक शालिनी अपने साथ ले गई थीं वहाँ तक जा कर रुक गया तो संगीता नीचे तो उतरीं परंतु आगे उपयुक्त स्थान तक न जाकर वहीं बैठ गईं ,बात अटपटा लगने   की थी। मैंने उसी समय निश्चय किया कि अगले दिन चाहे जो हो मै यहाँ सोने नहीं आऊँगा। सुबह शालिनी के उठते ही मैंने इस हरकत का जिक्र किया तो उन्होने तपाक से कहा कि संगीता भाभी हैं ही आवारा शरद की तो किस्मत फूट गई। उन्होने बताया कि रात मे कई बार उन्हें चादर उढ़ा चुके हैं अब भी देख लो चादर अलग है ,भले ही सब कपड़े पहने थीं परंतु न पहनना ही उसे कहा जाएगा। जब मै अगले दिन नहीं गया तो बउआ ने पूछा यशवन्त और शालिनी भी तो वहाँ हैं क्वार्टर सन्नाटे मे है तुम क्यों नहीं  जा रहे हो?उन्हें क्या घटना बताते?वैसे ही बहाना कर दिया।

20 नवंबर 1988 को अजय की शादी ग्वालियर मे होना तय हुआ। यह भी कमलेश बाबू ने ही तय कराई थी। उनके एक माने हुये मामा जो उनके बी एच ई एल मे पर्चेज मेनेजर थे की बेटी की नन्द से उन्होने अजय की शादी तय करवाई थी।अजय के दोनों सालों से उनकी कुछ न कुछ रिश्तेदारी है। सुबह की ‘ताज एक्स्प्रेस’ से ग्वालियर गए थे और शाम की ‘ताज एक्स्प्रेस’से लौटना था। शादी दिन की थी। दरियाबाद से बाबूजी से बड़े भाई आए थे जिनसे भुआ की मुक़दमेबाज़ी चली थी अतः भुआ-फूफाजी नहीं आए थे। लाखेश भाई साहब बारात विदा हो जाने के बाद कानपुर से सीधे ग्वालियर पहुंचे थे और बैरंग लौट गए थे। कमलेश बाबू को शराब की धुन सवार थी। अजय ने उनके लिए बंदोबस्त कर दिया था। ट्रेन मे अजय के दोस्त अनिल गुप्ता, शरद मोहन से मिल कर कमलेश बाबू ने मेरे मुंह मे एक ढक्कन शराब उंडेल दी थी। चलने से पहले अजय मुझे फटकार चुके थे मै जाना नहीं चाहता था। बउआ ने कहा कि तुम्हारे न जाने से शालिनी भी नहीं जा रही हैं उनका एक ही देवर है और यशवन्त का एक ही चाचा अतः उनका ख्याल करके जाओ। उनकी बात रखने के कारण गया था।

एक रस्म ‘चार’ की होती है जिसमे लड़की वालों के यहाँ कुछ मेवा वगैरह भेजी जाती है कमलेश बाबू ने उसी ‘चार की थैली’मे एक बोतल शराब छिपा कर रख दी थी। इस कारण वहाँ खूब चो-चो हुयी होगी जो अजय ने सुनी होगी अतः रात को खाना निबटने के बाद अजय और कमलेश बाबू मे धुआँ-धार वाक-युद्ध हुआ। हम लोग तो ऊपर सोते थे शालिनी ने मुझ से बीच-बचाव करने को कहा लेकिन मैंने इंकार कर दिया मै पहले ही अजय से फटकार खा चुका था और गलती तो कमलेश बाबू की थी । शालिनी खुद मेरे मना करने पर भी चली गईं तब तक कमलेश बाबू और शोभा अपना सामान पैक करके रात मे ही झांसी लौटने की तैयारी मे थे। उन्होने जल्दी-जल्दी ऊपर आ कर मुझ से रोकने को कहा लेकिन मेरा तर्क था जब बाबूजी-बउआ वहीं हैं तो मै क्यों बीच मे पडू।पता नहीं कैसे फिर वे लोग रुक गए।

22 नवंबर को रिसेप्शन का खाना कुछ खास-खास रिशतेदारों का और मिलने वालों का था। शालिनी ने शरद की पत्नी संगीता से छोले-भटूरे बनवाने की बात कही थी परंतु वह तब आयीं जब काफी लोग खा कर जा चुके थे। सब कार्य खुद शालिनी ने ही किया। यशवन्त का जन्म दिन भी इसी दिन पहली बार मनाया गया। मिल्क केक भी संगीता के घर शालिनी ने जमवाया था वह भी तब पहुंचा जब वे लोग सिटी स्टेशन से हमारे घर पहुंचे।

हमारी दुकान के सेठ जी भी अपनी श्रीमती जी के साथ पधारे थे। उन्होने यशवन्त को जन्मदिन पर और अजय की पत्नी को मुंह दिखायी  के रु 50/-50/-दिये थे।  इसके अगले दिन शोभा और कमलेश बाबू अपने बच्चों को लेकर लौट गए। मेरे भी और अजय की भी शादी उन्होने तय करवाई थी परंतु फिर भी ऐसी ओछी हरकतें करते रहे तब इन बातों का अभीष्ट समझ नहीं आया था जिंनका खुलासा अब हमारे लखनऊ आने के बाद होता गया है इसी कारण वे लोग हमारे लखनऊ आने के विरोधी बने हुये थे क्योंकि उनका तिलस्म टूट गया। गफलत दूर हो गई और उनके चेहरे का नकाब उतर गया। उनकी छोटी बेटी ने अपने घर के  ‘सोनू’नाम से एक ऐसी आई डी बनाई जिसमे जन्म तिथि अपनी बड़ी बहन की डाल कर ब्लाग जगत के लोगों को गुमराह किया।मुक्ता का खास शगल है मेरे ब्लाग्स पर आई टिप्पणियों के माध्यम से प्रोफाईल खोल कर ब्लागर्स की ओवरहालिंग करना और अपने पिताजी कमलेश बिहारी माथुर को सूचित करना और दोनों मिल कर किसी को ब्लफ़ करके किसी को टोटका-टोने का सहारा लेकर मेरे विरुद्ध करने का प्रयास करते हैं जिसमे अभी तक पूर्ण सफल भी हैं।

 आज कमलेश बाबू और उनकी छोटी बेटी के प्रयास से मेरे ब्लाग्स पर विशेष कर इस ब्लाग पर विजिट कम हो गए हैं। वे नहीं समझ पा रहे हैं कि आज न सही आने वाली पीढ़ी के लोग तो पढ़ेंगे और सच को समझ ही जाएँगे।
अतीत मे वे इसलिए कामयाबी के साथ हमे क्षति पहुंचाते रहे कि हम उन पर शक नहीं रख रहे थे,अब वे सब शक के दायरे मे हैं और प्रत्येक क्षति हेतु मै उनको प्रथम उत्तरदाई मान रहा हूँ। मेरा लेखन अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं है अतः कुल मिला कर वे पाठकों की ही क्षति कर रहे हैं।यह ताज्जुब नहीं है कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं क्योंकि अब शीशे की तरह साफ है कि उनका स्वभाव ही ऐसा रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि इन्टरनेट के विद्वान इनके झांसे मे कैसे फंस जाते हैं उनकी अपनी बुद्धि कहाँ खो जाती है। इनमे वे लोग अधिक हैं जिनकी मैंने ब्लाग मे तारीफ लिख दी है और इन लोगों ने चुन कर उन्हीं को फाँसा है। जो लोग एक बार मुझ से अपने पुत्र-पुत्री हेतु ज्योतिषीय जानकारी भी प्राप्त कर चुके अब ब्लाग और फेस बुक पर मेरे विरुद्ध प्रचार मे संलग्न हैं। जो लोग दूसरे  रूप मे लाभ ले चुके वे अपने तरीके से विरोध कर रहे हैं। इससे उनके भी मानसिक स्तर का खुलासा हो गया कि कितने विद्वान और योग्य हैं वे और मै उनकी पोल देख कर सतर्क हो गया। अतः उन्हे भड़काने वाले अपने रिशतेदारों का आभारी ही हूँ।

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आगरा/१९८०-८१ -कारगिल से लौट कर

अगले दिन जब ड्यूटी पहुंचे तो ए.यूं.ऍफ़.सी.श्री विनोद चंदर ने मुझे मेरी चाबियें सौंप दीं,मेरी अटेंडेंस रजिस्टर में मुझ से लगवा ली और वाउचर्स मुझे वेरीफिकेशन के लिए सौंप दिए.यूं.ऍफ़.सी.रामादास साहब इसी बीच ट्रांसफर हो कर बंगलौर जा चुके थे ,उनके स्थान पर रत्नम पंचाक्ष्रम साहब आ गए थे जिन्हें हिन्दी नहीं आती थी या वह तमिल होने के नाते बोलना नहीं चाहते थे और मैं अंगरेजी बोलने में हिचकता था.हालांकि चंदर साहब भी तमिल थे और उनके द्वारा मेरा समर्थन करने से पंच्छू साहब नार्मल रहे.
ऍफ़.एंड बी .मेनेजर श्री जगमोहन माथुर ने एस.पी.सिंह को पर्सोनल मेनेजर हेमंत कुमार के इशारे पर ड्यूटी पर नहीं लिया.मैंने व्यक्तिगत रूप से माथुर साहब से भेंट कर एस.पी.को ड्यूटी पर लेने का आग्रह किया ,उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि वह एस.पी. का कोई नुक्सान नहीं होने देंगें परन्तु मेनेजमेंट की इन्टरनल पालिटिक्स में उन्हें जी.एम्.के विरुद्ध हेमंत कुमार की सपोर्ट चाहिए इसलिए थोडा खेल खेलने दो और मैंने एस.पी.को यह सीक्रेट देकर आश्वस्त कर दिया.हफ्ते भर बाद उसे ड्यूटी पर ले लिया गया और दोनों को टी.ए .भी रीइम्बर्स हो गया.
अगस्त १९८० में ही हम कारगिल से वापिस आ गए जबकि आना अक्टूबर में था और शादी ०८ नवम्बर को होना तय था.अब तक वाटर वर्क्स की सुप्लाई गड़बड़ा गयी थी अतः अगस्त में घर के आँगन में पश्चिम में हैण्ड पम्प लगवा लिया.तब ४५ फीट पर पानी मिल गया था और खुदाई ५० फीट करा ली थी.बाद में २००९ में छोड़ते वक्त तीसरी बार बोरिंग हो चुकी थी और वाटर लेवल ७५ फीट जा चूका था हमने १०० फीट खुदाई करा रखी थी. 
शादी दिन की रखी थी पंडित के रूप में मेरे परिचित आयुर्वेदिक डा.थे जिनके समर्थन पर मैं आयुर्वेद रत्न कर रहा था उन्हीं के साथ का अनुभव दिखाया था.बारात टूंडला गयी थी ५० लोग ले जाना तय था परन्तु सेन्ट्रल वेयर हाउस में सेक्शन आफीसर के रूप में कार्य रत जय शंकर साहब के बड़े बेटे (जो हमारे बहनोई के मित्र और भतीज दामाद भी थे जिसका खुलासा अब लखनऊ आने पर हुआ) बाबूजी से बीच में आ कर बोले थे ३०-३५ लोग मिनी बस में आ जायेंगे.हम पहले ही बड़ी बस बुक कर चुके थे.मेरे आफिस के दो लोग ही लिए ,बाबूजी ने अपने आफिस (वह रिटायरमेंट के बाद एक फर्म में काम कर रहे थे)से किसी को नहीं लिया,मोहल्ले से किसी को नहीं लिया कुल २० लोग ले गए.उस एस.ओ.ने अपने अब्बा जान को नहीं बताया कि वह हमारे बाबूजी से क्या कह गया था.उन लोगों ने ५० बारातियों का ही बंदोबस्त किया था.खाना वहां बेहद बच रहा था रात को लौटते में बस में रखवा दिया.सब्जियां सड़ गयीं और फेंकनी पडीं.पूरियां सुखा कर दही में भिगो-भिगो कर निबटाई गईंजैसा कि अलीगढ़ में बहन की सुसराल में होता था.
उन लोगों ने बैंड और घोडी भी थोप दिया था ,हमारे बाबूजी ने कोई एतराज नहीं किया जबकि तय प्रोग्राम उलटने का एकतरफा उनका कृत अपराध था.बाबूजी इन चीजों का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं थे लेकिन कर दिया अतः यह हम  लोगों की कमजोरी समझी गई .
यह शादी बहनोई साहब के पिताश्री ने तय कराई थी.जे.एस.एल.साहब उनके रेलवे के विभागीय साथी थे.इसके अलावा एस.ओ.कुक्कू की पत्नी उनकी रिश्ते की पोती है अर्थात हमारे बहनोई साहब की भतीजी.जब जे.एस.एल.साहब दो बोरा छोटी इलाईची के गबन में फंसे तो श्री सरदार बिहारी जी (बहन के श्वसुर साहब)ने ही अपने क्लेम इन्स्पेक्टर के ओहदे से उनकी नौकरी बचाई थी.
२५ -३१ दिसंबर हमारी आयुर्वेद रत्न की परीक्षाएं थीं अतः १६ त़ा.से मैं प्रिपरेशन लीव पर रहा.२८ नवम्बर को कुक्कू की शादी की सालगिरह थी वह अपनी बहन के साथ मुझे भी बुला ले गए थे.२९ त़ा.की दोपहर मैं वापिस लौट आया.उनके एन.आर.कालेज के प्रवक्ता (जो रिश्ते में मेरे भतीज दामाद भी लगते थे) साहब ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि उन लोगों ने दामाद को पूंछे बगैर आगंतुकों को भोजन कराना शुरू कर दिया था ,उन्होंने खुद मेरे साथ ही भोजन किया.
क्रमशः……..
 
 
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