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Category Archives: शालिनी

आगरा/1994 -95 /(भाग-6 )

गतांक से आगे ……

मै नहीं समझ सका कि क्यों डॉ शोभा यशवन्त को हस्तगत करना चाहती थीं और क्यों अजय की श्रीमती जी ने बउआ को वैसा न करने का सुझाव दिया(वह तो कमलेश बाबू की ममेरी बहन की नन्द हैं और के बी साहब ने ही उनकी शादी करवाई थी ) कि क्या वह यशवन्त को अपने पास रखना चाहती थीं?मुझसे किसी ने भी तब कोई जिक्र क्यों नहीं किया ?क्या यशवन्त किसी के पास रह लेता ?जब बउआ ने ग्यारह माह बाद बताया तब क्या उन्हें अपने लोगों के जीवन न रहने का एहसास हो गया था?उस समय इन सब बातों पर विचार करने का समय न था और बाद मे ध्यान से निकल गया था। कल जब 25 मार्च को भाग-5 लिख रहे थे तब दिमाग मे 25 मार्च 1981 की वह घटना भी कौंध रही थी कि तब शालिनी से एंगेज्मेंट हो चुकने के तुरंत बाद उन लोगों ने शालिनी का हाथ देख कर बताने को कहा था मेरे माता-पिता ने भी उन लोगों का समर्थन कर दिया था।

(बाएँ से दायें-बउआ,सरोजनी देवी-शालिनी की माँ,मधू-कुक्कू की पत्नी और कमलेश बाबू की भतीजी,शालिनी,खुद,बाबूजी और उनकी गोद मे डॉ शोभा की ज्येष्ठ पुत्री,पीछे की पंक्ति मे -अजय,कुक्कू,डॉ शोभा,सीमा,जय शंकर लाल-शालिनी के पिता )

(सीमा,मधू,शालिनी )

शालिनी की दोनों हथेलियों का अवलोकन करने से स्पष्ट था कि उनकी उम्र कुल 35 वर्ष ही है। अर्थात वह शादी अधिक से अधिक 13 वर्ष ही चलनी थी। यदि उसी समय हकीकत बता देता तो तत्काल रिजेक्ट कर दिया जाता और वह विवाह न होता। हाथ एंगेज्मेंट के पहले देखने को कहा जाता तो हकीकत ही बताना था। असमंजस मे तब चुप रहना मेरे लिए काफी घातक रहा। फिर वह बात दिमाग से इस प्रकार निकल गई जिस प्रकार गधे के सिर से सींग। जब नवंबर 1993 मे लव लीन ने शालिनी को बताया कि भुआ आपकी उम्र 36 वर्ष ही है तब भी पुरानी बात याद न आई और मैंने शालिनी को समझा दिया कि भतीजी की बात को अन्यथा न लें। किन्तु उसी दिन से वह बीमार पड़ गई थीं और अंततः 36 वे वर्ष मे दुनिया छोड़ ही गई।

जैसा कि पहले ही उल्लेख कर चुका हूँ कि शालिनी से विवाह कमलेश बाबू के पिताजी ने तय कराया था। पहले जितने भी लोगों ने संपर्क किया था सब का जिक्र बउआ डॉ शोभा से करती थीं और कमलेश बाबू की माताजी किसी न किसी आधार पर सभी लड़कियों को रिजेक्ट करा देती थीं। मुझसे मेरे माता-पिता ने कोई राय लेना कभी मुनासिब नहीं समझा । नीचे उन पत्रों की स्कैन कापियाँ दे रहा हूँ जिनकी पुत्रियों के प्रपोज़ल डॉ शोभा ने अपनी सास के हवाले से रिजेक्ट करवाए थे-

यह पत्र बार्डर सिक्योरिटी फोर्स के रिटायर्ड सब इंस्पेक्टर अमर सिंह जी का है जिनकी राय मैंने मांगी थी किन्तु उनके ठीक बताने के बावजूद डॉ शोभा ने बउआ को सूचित किया था कि उनकी सास कहती हैं मात्र 10 माह का अंतर कम है और इसी ग्राउंड पर बाबूजी ने वहाँ मना कर दिया था।

इन सभी पत्रों और उनके साथ आई फ़ोटोज़ को पहले बाबूजी अलीगढ़ डॉ शोभा के पास डाक से भेजते थे और डॉ शोभा अपनी सास साहिबा के कमेन्ट के साथ लौटाती थीं। जयपुर से आए एक फोटो पर डॉ शोभा की सास अर्थात के बी माथुर साहब की माताजी का रिमार्क मुझे बेहद बेहूदा लगा था कि -‘लड़की के कूल्हे भारी हैं’। मेरे बोलने की कहीं कोई गुंजाईश न थी अपने बारे मे ही मेरी कोई भूमिका नहीं थी।

आखिरी पत्र अजय के एक्सीडेंट के समय सहयोग देने वाले परिवार की बेटी की नन्द की बाबत है। पटना के मशहूर दवा व्यवसायी थे (के जी मेडिकल हाल वाले कृष्ण  गोपाल माथुर साहब ) जिनके यहाँ कई बार डकैती भी पड़ी और अंततः वे लोग पूना शिफ्ट हो गए। डॉ शोभा की सास ने यह कह कर रिजेक्ट कराया कि पटना का पानी खराब है वहाँ की लडकिया बीमार रहती हैं। नामनेर ,आगरा के वह माथुर साहब भी अब पूना शिफ्ट हो गए हैं किन्तु उस लड़की की शादी आगरा मे ही सेंट्रल बैंक के एक क्लर्क से उन्होने करा दी थी जो अब अधिकारी हैं। ये दोनों पति-पत्नी अपनी पुत्रियों की जन्मपत्रियाँ बनवाने  कमला नगर मेरे घर पर कई बार आए हैं।बड़ी बेटी के  विवाह हेतु मुझसे ही कुंडलियाँ भी मिलवाई हैं। रांची स्थित कोल इंडिया के रिटायर्ड डिप्टी चीफ सेक्यूरिटी आफ़ीसर आर पी माथुर साहब,विनीश जी के चाचा थे और मुझ से मित्रवत व्यवहार रखते थे। शालिनी व मुझे विनीश जी की पत्नी -ज्योति से उन्होने ही अपने घर पर परिचय करवाया था।

25 मार्च 1981 को शालिनी से एंगेज्मेंट के बाद कुक्कू की पत्नी मधू  के गाना गाने पर कमलेश बाबू ने स्टूल को तबला बना कर अपनी भतीजी के साथ संगत की थी। तमाम कारणों से तमाम को रिजेक्ट करने के बावजूद अंजाम क्या रहा ?डॉ रामनाथ ने भी शालिनी से 28 गुण मिलते बताए थे जब कि हकीकत मे 14 थे अर्थात नहीं मिलते थे (1981 तक मै खुद नहीं मिलाता था)। अब एहसास होता है कि कमलेश बाबू ने कुक्कू के जरिये डॉ रामनाथ को खरीदवा दिया था। डॉ रामनाथ ने पैसों के लालच मे प्रोफेशन और मेरे साथ विश्वासघात किया था।डॉ शोभा दूसरे कारणों से रिजेक्ट कराती रहीं तो भी बाबू जी डॉ राम नाथ के पास ज्योतिषीय जानकारी लेने हेतु जन्मपत्रियाँ भेजते थे। शालिनी की जन्मपत्री को छोड़ कर सभी मे उन्होने गुण नहीं मिलते बताया था। चूंकि बउआ -बाबूजी अपनी पुत्री-दामाद पर विश्वास करते रहे इसीलिए उन्हें विश्वासघात करना आसान रहा।(सब बातों का खुलासा गत वर्ष उनके लखनऊ आने पर हुआ और इसी डर से वे हमारे लखनऊ शिफ्ट करने का विरोध करते रहे थे)।

क्रमशः …….. 

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आगरा/1994 -95 / (भाग-5 )

हमारी बउआ को बाँके बिहारी मंदिर,वृन्दावन पर अत्यधिक आस्था व विश्वास था। हालांकि 1962 मे उन्होने बाबूजी को अपने पास से (नानाजी -मामाजी से मिले पैसे) देकर वृन्दावन जाने को कहा था और एक हफ्ते मे वहाँ से लौटते मे घर के करीब पहुँचते -पहुँचते बाबू जी के दफ्तर के किसी साथी ने रिक्शा रुकवा कर  सूचना दी कि बाबूजी का ट्रांसफर सिलीगुड़ी हो गया है। आफिस पहुँचते ही उन्हें रिलीव कर दिया जाएगा। पाँच वर्ष वहाँ रहने के दौरान ही ईस्टर्न कमांड अलग बन गया और वापिस सेंट्रल कमांड मे ट्रांसफर मुश्किल था। कानपुर से निर्वाचित भाकपा समर्थित निर्दलीय सांसद कामरेड एस एम बेनर्जी के अथक प्रयासों से मूल रूप से सेंट्रल कमांड से गए लोग वापिस आ सके थे तब बाबूजी मेरठ आए थे।

1984 अप्रैल मे जब यशवन्त लगभग साढ़े चार माह का था बउआ की इच्छा पर हम लोग वृन्दावन -बाँके बिहारी मंदिर गए थे। वहाँ बाबूजी ने रु 10/- देकर यशवन्त को गोसाईञ्जी के माध्यम से मुख्य मूर्ती के द्वार पर मत्था टेकने भेज दिया था। लौट के आने के दो दिन के अंदर मुझे फर्जी इल्जाम लगा कर होटल मुगल से सस्पेंड कर दिया गया था -यूनियन प्रेसीडेंट को मेनेजमेंट ने पहले ही अपनी ओर मिला लिया होगा।

अतः जब बीमारी चलते के बीच ही शालिनी ने वृन्दावन-बाँके बिहारी मंदिर जाने की इच्छा व्यक्त की तो मै जाने का इच्छुक नहीं था। परंतु शालिनी ने बउआ से समर्थन करा दिया तो अनिच्छापूर्वक इतवार को जाने का फैसला करना पड़ा। इस खातिर शनिवार 11 जून को हेयर कटिंग भी कराना पड़ा। 12 जून इतवार को सुबह 08 बजे वाली पेसेंजर ट्रेन से मथुरा जाकर वहाँ से टेम्पो के माध्यम से वृन्दावन गए। अक्सर बस से लौट लेते थे किन्तु शालिनी ने इसलिए ट्रेन से लौटने पर ज़ोर दिया कि कुछ देर राजा-की-मंडी क्वार्टर पर अपनी माँ से मिल लेंगी और वह सुबह ही शरद मोहन को कह चुकी थीं। कोई एक्स्प्रेस ट्रेन पकड़ कर चले तो किन्तु जेनरल कोच मे जगह न थी। मै और यशवन्त तो खड़े-खड़े ही आए किन्तु शालिनी खड़े न रह पाने के कारण फर्श पर बैठ कर आईं ,किसी ने सीट पर थोड़ी भी जगह बैठने को न दी।

तीन बजे के करीब राजा -की -मंडी क्वार्टर पर पहुंचे। संगीता ने दाल-चावल बना कर रखे थे। मैंने और यशवन्त ने वह खाना नहीं खाया और केवल चाय ही पी। किन्तु शालिनी ने अपनी माँ के कहने पर वह रखा हुआ ठंडा  दाल-चावल खा लिया। वहाँ से चलते-चलते ही उन्हें बुखार चढ़ गया था। 13 और 14 तारीख को मै ड्यूटी नहीं गया किन्तु 15 तारीख को शालिनी ने कहा कि कब तक छुट्टी हो पाएगी अतः मै ड्यूटी चला जाऊ । 16 तारीख,गुरुवार  को फिर मै ड्यूटी नहीं गया। दोपहर मे यशवन्त ने ब्रेड खाने से मना कर दिया तो शालिनी ने कहा वह परांठा नहीं बनाएँगी मुझे बना कर देने को कहा। मैंने यशवन्त को पराँठे खिला दिये तो वह संतुष्ट थीं और उसके खाने के बीच ही सो गई। सोते ही सोते उनका प्राणान्त हो गया था एक परिचित डॉ को बुलवाया तो वह बोले अब दम है ही नहीं अस्पताल ले जाना बेकार है।

अगल-बगल के लोगों की भी यही राय थी। उन लोगों ने राजा-की -मंडी सूचना देने को कहा। यशवन्त भी मेरे साथ मोपेड़ पर गया और घर पर बाबूजी व बउआ अकेले ही रह गए। उनके यहाँ सूचना देने के बाद अजय और डॉ शोभा को टेलीग्राम किए। शरद मोहन उस दिन गाजियाबाद जाने हेतु दिल्ली की ट्रेन से जा रहे थे,उनके ताउजी-बनवारी लाल साहब ने स्टेशन मास्टर से कह कर अगले स्टेशन जहां गाड़ी का स्टापेज था उन्हें वापिस आगरा लौटने का एनाउंसमेंट करवा दिया था। दिल्ली से आती ट्रेन को वहाँ के स्टेशन मास्टर ने रुकवा रखा था और उनसे मिल कर वह वापिस लौट लिए। जब वह घर पहुंचे तब उनकी माँ और पत्नी उनके साथ काफी रात मे हमारे घर आए और थोड़ी देर रुक कर सुबह आने को कह कर चले गए।

17 तारीख ,शुक्रवार की सुबह अर्जुन नगर रानी मौसी के यहाँ कहने गए तो भी यशवन्त मेरे साथ ही गया। उन्होने अपने भांजे नवीन जो यूनीवर्सिटी मे जाब करता था से भी बताने को कहा बाद मे वह उसी के साथ स्कूटर से आई थीं।कमला नगर मे ही रहने वाले आर सी माथुर एवं आर पी माथुर साहब के घर भी सूचना देने यशवन्त मेरे साथ-साथ गया था। 17 तारीख को सुबह वह उनकी माँ,पत्नी,ताउजी और उनके स्टाफ के आठ-दस लोग भी आ गए थे। कालोनी के कुछ लोग ,डॉ रामनाथ भी घाट तक गए थे। यशवन्त तो हर पल मेरे ही साथ था वह भी घाट जाना चाह रहा था तो बाबूजी ने चलने को कह दिया और उसे भी ले चले। बउआ नहीं चाह रही थीं कि साढ़े दस वर्ष का बच्चा घाट जाकर सब देखे। घाट तक तो यशवन्त शांत शांत रहा परंतु फिर वहाँ फूट-फूट कर जो रोया सो कई दिनों तक रोता ही रहा।घर लौट कर शरद मोहन ने यशवन्त से कहा था कि हम कल फिर आएंगे और आते रहेंगे जबकि आए फिर 06 वर्ष बाद सन2000मे।  बउआ का दृष्टिकोण था कि रोने से सदमा नहीं लगेगा अतः रोना ठीक है। बहर हाल किसी प्रकार उसे उसे समझा कर सम्हाल लिया।

17 जून की शाम को मुज्जफर नगर से आए कृष्ण मोहन उर्फ ‘कूकू’उनकी पत्नी मधू अर्थात कमलेश बाबू की भतीजी और झांसी से आए सीमा और उनके पति योगेन्द्र हमारे घर आए। सब के बच्चे राजा-की-मंडी क्वार्टर पर थे। उन लोगों के सामने ही फरीदाबाद से अजय उनकी पत्नी और पुत्री अनुमिता भी पहुँच गए। सीमा लौटते समय यशवन्त को मौसी होने के नाते समझा रही थीं कि अब से पापा को ही मम्मी भी समझना और उनका व अपना ख्याल रखना । कुक्कू और मधू तो योगेन्द्र के साथ गेट से बाहर निकल चुके थे। योगेन्द्र बड़ी ज़ोर से  चिल्ला कर बोले सीमा जल्दी चलो देर हो रही है अतः हड्बड़ा कर सीमा को भागना पड़ा।

झांसी मे शायद कमलेश बाबू को टेलीग्राम नहीं मिला होगा। उनके पिताजी सरदार बिहारी माथुर साहब बाबूजी का पत्र मिलने के बाद जब आए तो उन्होने पूंछा कि विपिन नहीं आए क्या?विपिन उनका घर का नाम है। बाबूजी ने कहा छुट्टी नहीं मिली होगी इसलिए नहीं आ पाये होंगे। अलीगढ़ लौट कर उन्होने किसी प्रकार टेलीफोन पर उन्हें आगरा जाने को कहा। डॉ शोभा और उनके पति तब आए और दो दिन रुक कर लौट गए। डॉ शोभा ने शायद बउआ से यशवन्त को हस्तगत करने की बात की होगी। बउआ व बाबूजी ने मुझे कुछ नहीं बताया परंतु अजय को उनका दृष्टिकोण बताया होगा। अजय की श्रीमतीजी ने बउआ को मना किया कि वह डॉ शोभा के सुपुर्द बच्चे को न करें। मुझे इन सब बातों का पता बउआ ने जब दिया तब उसके हफ्ते भर के अंदर बाबूजी और उसके बारह दिन बाद बउआ भी न रहीं।

क्रमशः ….. 

 

आगरा/1990-91(भाग-10)

काफी दिनों बाद एक बार फिर शालिनी वहाँ सुबह गई क्योंकि फिर स्कूल खुलने वाले थे। लौटते मे मुझे बुलाने जाना ही था,सुबह सीधे ड्यूटी चला गया था। चाय के बाद आँगन मे बैठना हुआ क्योंकि दिन बड़े थे उजाला था अतः लौटने मे थोड़ी देर होने पर भी दिक्कत न थी। शालिनी की माता थी परंतु वह बच्चों के साथ टी वी ही देखती थी। संगीता ने बताया कि उन्हे नेटरम मूर से तीन दिनों मे ही लाभ हो गया था परंतु मेरे बताने के मुताबिक 10 दिनो तक खा और लगा ली थी। वह बची हुई दवा मुझे देना चाहती थी। मैंने कहा कि सम्हाल कर रखे किसी को भी किसी कीड़े-मकोड़े के काटने पर देने के साथ-साथ यह लू -sunstrok की भी अचूक दवा है। खैर फिर नेटरम मुर्यार्टिकम अपने पास ही रखी,दवा की कीमत तो तुरंत भुगतान कर चुकी थी। चूंकि संगीता ने ही फिर पुरानी बात उठाई थी तो शालिनी ने भी बिना चूके कह दिया कि इन्हें दवा आपसे  लगवाने मे आनंद आया और आपने फिर दोबारा आकर लगाई ही नहीं। संगीता क्यों चूकती फटाफट कह दिया आप भेजती तभी तो आते। काफी पुरानी बात जो ध्यान से भी हट चुकी थी संगीता ने याद दिलाते हुये कहा कि जब कविता ने ऊपर से ही इंनका हाथ मेरे सीने पर फिरवा दिया था तो आपने कविता से एतराज किया था अब खुद आपने ही फिरवा दिया फिर रोक दिया होगा। शालिनी ने कहा न रोका न भेजा ,आप चाहती थी तो भेजने को कहा होता।

कविता ,संगीता की बड़ी बहन थी और अपने पति राकेश के साथ सिटी के क्वार्टर पर आई थी तब हम लोग वहाँ पहले से मौजूद थे। राकेश को कोई काम होगा वह अपना हाथ मुझे दिखा कर चाय पीने के बाद चले गए थे। बाद मे कविता ने भी अपना हाथ दिखाया था और संगीता को भी हाथ दिखवाने को कहा था। आम तौर पर मै किसी का भी हाथ दूर से ही देखता हूँ। परंतु कविता ने अपने हाथ की कुछ लकीरों के बारे मे पूछते हुये मेरा हाथ जबर्दस्ती अपने हाथ पर रख कर बताया था और इस क्रम मे खुद ही मेरे हाथ को इस प्रकार घुमाया कि उनके सीने को छू गया तब संगीता ठठा कर हंस दी थी । इस हंसी के बदले मे ही कविता ने मेरा हाथ तुरंत संगीता के सीने पर फिरा दिया था ,उसी का जिक्र अब संगीता ने किया था।

कविता के दो पुत्रियाँ थी और वह बेटा चाहती थी ,मेरे यह कहने पर कि योग है तो बोली थी कि फिर प्रयास करेंगे और इसी बात की खुशी मे मेरा हाथ अपने सीने तक ले गई थी और संगीता के हंसने पर उसके सीने पर फिरा दिया था। शालिनी ने तब संगीता पर हाथ फिराने का कविता से विरोध किया था। बाद मे कविता के पुत्र भी उत्पन्न हुआ। कविता के एक जेठ विश्वपति माथुर आगरा मे ही ट्रांस यमुना कालोनी मे रहते थे। उनसे भी परिचय इनही लोगों के माध्यम से हुआ था। वह हाईडिल मे जूनियर इंजीनियर थे और उनका स्वभाव बेहद अच्छा था। वह हर एक की मदद करने को हमेशा तत्पर रहते थे। उनसे हमारा मेल हो गया था और हम उनके घर भी चले जाते थे। एक बार कविता उनके घर आई हुई थी ,राकेश नहीं आए थे। संगीता ने मुझे उनके घर जाकर कविता को संगीता के सिटी के क्वार्टर पर लाने को शालिनी से कहा था। वी पी माथुर साहब के घर जाने मे एतराज था ही नहीं। किसी कारण से कविता उस दिन नहीं आई लेकिन उनके सामने ही विश्वपति जी ने उनकी शादी का एक किस्सा सुनाया। उन्होने बताया था कि,राकेश की शादी मे उन्होने अपने एक-दो साथियों के साथ मिल कर मजाक करने की योजना बनाई थी और एन फेरों से पहले राकेश से कहला दिया था कि कलर्ड टी वी मिलने पर ही फेरे हो सकेंगे। वे लोग एकदम परेशान हो गए ,और हैरान भी क्योंकि माथुर कायस्थों मे दहेज का रिवाज-चलन है ही नहीं। कविता के घर के लोग समझा कर हार गए तो कविता के भाई बोले बारात लौटा दो। तब संगीता मैदान मे आई और विश्वपति जी तथा अपने होने वाले जीजा राकेश से सीधे बात करने पहुँच गई कि उनकी मांग संभव नहीं भाई साहब नाराज हैं और बारात लौटाने को कह रहे हैं। विश्वपति जी ने संगीता से कहा कि तुम आ गई हो तो बिना टी वी के शादी करवा देंगे वरना बारात लौटा ही ले जाते। उन्होने संगीता से डांस करने की शर्त रखी । संगीता ने फेरे पड़ने के बाद डांस दिखाना कबूल किया और सच मे वादा पूरा भी किया। विश्वपतिजी ने कहा कि संगीता ने कविता की शादी करा दी। कविता ने हंस कर उनकी बात का समर्थन कर दिया।

शालिनी को यह बात घर आकर बताई थी जो उन्हे याद भी थी। अपनी आदत पुरानी बातो  को याद कर समय पर दोहराने की न होने पर भी पता नहीं कैसे शालिनी ने कहा कि विश्वपति भाई साहब ने कविता की शादी की जो कहानी सुनाई थी वह भी जरा इन्हे सुना दीजिये। मैंने कहा खुद ही बता दो तो बोली आपने सीधे उनसे सुना है ज्यादा ठीक से बता सकते हैं इसलिए इसे आप ही बताएं। संगीता भी मुस्कराते हुये बोली हाँ क्या कहानी थी आप ही बता दीजिये। मैंने पूरा विवरण सुना दिया तो हँसते-हँसते ,लॉट-पोट होते हुये संगीता ने कहा क्या बुरा काम किया ,मजाक ही सही मम्मी और भाई साहब तो उस वक्त बहौत परेशान थे ,चुटकियों मे हल तो निकाल लिया। शालिनी ने पहले कभी टूंडला मे होली की रंग-पाशी पर संगीता द्वारा श्वसुर और जेठ के समक्ष किए गए ‘मै तो नाचूँगी,मै तो नाचूँगी’ गाना गाते हुये डांस का जिक्र भी सुना दिया और कहा आपको डांस वगैरह पसंद नहीं है ,नहीं तो कभी देखते। संगीता बोली पसंद न हो तो भी मै डांस दिखा दूँगी,जब कभी मम्मी जी अगली बार कहीं जाएँ तो आप (शालिनी से) इशारा कर दीजिएगा।

मुझे उस समय यह सब बड़ा अजीब लगा और बेहद खोज-बीन के बाद भी इस सबका रहस्य न समझ सका। तब से अब तक के तमाम घटनाक्रमों  को मई 2011 मे कमलेश बाबू द्वारा कुक्कू के श्वसुर को अपना कज़िन बताने के बाद तुलना करने पर सारा का सारा रहस्य एक पल मे उजागर हो गया और उनके  तथा उनकी  छोटी बेटी के द्वारा  फेसबुक मे फेक आई डी बना कर टटोल-खकोल करने से उसकी पुष्टि भी हो गई।  लेकिन  उसका जिक्र अपने समय पर ही।

1991 की गर्मियों मे ही बड़े ताउजी के निधन का ‘टेलीग्राम’ अचानक आया ,वह पूर्ण स्वस्थ थे। एकाएक बाबू जी का जाना संभव नहीं था। बिना रिज़र्वेशन के मै ‘गंगा-जमुना’ एक्स्प्रेस से गया , टिकट तो मैंने लिया ही था परंतु शरद मोहन ने जेनरल कोच मे  आसानी से  बैठवा दिया था । इत्तिफ़ाक से उस दिन फैजाबाद होकर जाने का टर्न था तो सीधे ‘दरियाबाद’ स्टेशन पर ही उतरा था। ताईजी समेत सभी ने परिचय देने पर पहचाना परंतु गाँव के एक सज्जन ने देखते ही उन लोगों से पूछा कि क्या यह ‘दुलारे भैया’ का बेटा है? मैंने पूछा बिना देखे आपने कैसे पहचाना तो उनका उत्तर था तुम्हारी शक्ल उनसे मिलती है न पहचानने का क्या सवाल?

ताउजी रात मे बिना लालटेन लिए उठ गए थे और अंदाज मे गलती होने से बाथरूम की तरफ जाने की बजाए कुएं मे गिर पड़े थे ,ब्रेन हेमरेज से तत्काल उनकी मौत हो गई थी। रात मे ही उन्हें कुएं से निकाल लिया गया था। मै तो औपचारिक रूप से शोक प्रगट करने गया था,दकियानूस वाद  मानता न था अतः तेरहवी  तक रुकने का प्रश्न ही नहीं था। दो दिन के लिए दुकानों से गैर-हाजिर था। रायपुर से सुरेश भाई साहब रोजाना वहाँ नहाने आते थे इन लोगों ने मुझे भी उन्हीं के साथ बाहर के कुएं पर नहाने भेजा और नहाते ही भुने चने खाने को दिये। अगले दिन भी यही प्रक्रिया रही।

मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ कि इस शोक के माहौल मे भी ताईजी ने 1988 मे बाबूजी के नाम भेजे इस पत्र का जिक्र किया (मुझे यह पत्र बाबूजी के कागजात से उनके निधन के बाद मिला है) जिसमे उन्होने बाबूजी से वहाँ आकर ‘चकबंदी’ के माध्यम से अपना खेती का हिस्सा लेने की बात कही थी। मैंने तो यह कह कर पल्ला झाड लिया कि ये सब आप बड़े लोगों के बीच की बातें हैं। मैं आप का संदेश बाबूजी को दे दूंगा।

अगले दिन ताईजी ने लखनऊ मे माधुरी जीजी से मिलते जाने को कहा हालांकि उनके एक बेटा और एक बेटी दरियाबाद मेरे पहुँचने के बाद ही आ गए थे। नरेश मेरे साथ लखनऊ आए ,वैसे तब वह लखनऊ ही रहते थे। रात को अवध एक्स्प्रेस से मै आगरा रवाना हो गया।

जिस प्रकार चंद्र शेखर जी ने भाजपा और कांग्रेस से मिल कर वी पी सिंह की सरकार गिरवा दी थी उसी प्रकार उनकी सरकार को राजीव गांधी के वक्तव्य-“हरियाणा पुलिस के दो कांस्टेबल मेरी जासूसी करते हैं” ने गिरवा दिया था और मध्यावधि चुनाव चल रहे थे कि इस प्रचार के दौरान ही राजीव गांधी की निर्मम हत्या भी लिट्टे विद्रोहियों ने कर दी जिन्हें खुद राजीव गांधी और उनकी माँ इंदिरा गांधी ने प्रश्रय दिया था। 

 

आगरा/1988 -89 (भाग-3 )-मुजफ्फरनगर यात्रा

दुकानों की नौकरी मे और तो कोई परेशानी नहीं थी परंतु वेतन अपर्याप्त था। अतः यदा-कदा बेहतर नौकरी के लिए प्रयास करते रहते थे। चूंकि होटल अकाउंट्स का साढ़े नौ वर्ष का अनुभव था  सहारनपुर के एक नए  होटल के लिए आवेदन कर दिया था। भूल भी चुके थे ,वहाँ से इनटरवीयू काल आ गया। निश्चित तिथि से एक दिन पहले मुजफ्फरनगर कुक्कू के यहाँ चले गए क्योंकि वह बेहद बुलाते रहते थे और रास्ते मे उनका शहर पड़ रहा था। हालांकि कूकू की माता जी नहीं चाहती थीं कि मै उनके घर जाऊ। यह भी एक कारण रहा उनके घर जरूर जाने का । लगभग ढाई-तीन बजे कूकू साहब के घर गांधी कालोनी पहुंचा था। उनका आफिस पास ही था अतः उनकी श्रीमती जी ने नेहा और शिवम को उनके दफ्तर भेजा ,वह वहाँ नहीं थे किसी साईट पर गए हुये थे, अतः दोबारा उन दोनों को भेज कर आफिस से उन्हें फोन कराने को कहा और उन्हें गर्म समौसे लाने को भी कह दिया।

औपचारिक हाल चाल पूछ कर कूकू साहब की श्रीमती जी (हमारे बहनोई कमलेश बाबू की भतीजी जैसा अब 2011 मे उनसे  पता चल पाया) ने अपनी सास साहिबा की करामात का बखान कर डाला क्योंकि वह जानती थी कि मै पहले ही उनसे नाखुश हूँ अतः उन्हें कोई भय नहीं था। उन्होने आप बीती जो घटना बताई वह हृदय विदारक है। उन्होने बताया कि उनकी सास जी ने उनके रेलवे वाले देवर शरद मोहन माथुर की मार्फत षड्यंत्र करके उन्हें दोनों बच्चों समेत मारने की हिमाकत की थी। उनके अनुसार टूंडला वाली बुढिया से उनके विरुद्ध टोटका करवाकर उनका दिमाग अस्त-व्यस्त कर दिया गया था जिससे वह बच्चों को लेकर विपरीत दिशा की ट्रेन मे बैठ कर चली गई। कूकू जब टिकट लेकर आए तो उन लोगों को नहीं पाया और चूंकि कूकू तथा उनकी पत्नी मधु दोनों के पिता रेलवे के थे वह तमाम नियमों आदि से परिचित थे। काफी दौड़-धूप के बाद उन्होने मधु को बच्चों समेत बरामद कर लिया। परंतु सारा सामान गायब हो गया जिसमे वह गहना भी था जिसे वह संगीता (मधु की देवरानी) की कस्टडी से ले कर आ रही थीं। उनका शक था शरद मोहन ने ही अपने रेलवे साथियों की मदद से सब सामान पार कर दिया है। (1982 मे कूकू ने अपनी माँ के साथ मुझ पर उसी टूँड़ला वाली बुढ़िया से कुछ करवाया था जो मै आगरा मे बस से उतरते समय गिर कर घायल हुआ था और डा राजेन्द्र कुमार टंडन ने इलाज के साथ पुलिस को फोन करना चाहा था किन्तु बाबूजी ने रोक दिया था ,इस का जिक्र पहले हो चुका है)। बड़ी जल्दी कूकू की पत्नी पर उन्ही के छोटे भाई द्वारा वही षड्यंत्र किया गया जैसा उन्होने अपनी माँ के इशारे पर मेरे साथ किया था। प्रकृति मे देर है पर अंधेर नहीं मैंने मन मे सोचा किन्तु मधु को दिये आश्वासन  के अनुसार किसी से इस घटना का जिक्र नहीं किया। 

अगले दिन कूकू साहब मेरे साथ बस से सहारनपुर भी गए उन्होने सहारनपुर साईट का टूर लगा लिया था। आने-जाने का बस का टिकट मेरा भी उन्ही ने लिया मुझे नहीं लेने दिया। होटल मे मेरा एपोइनमेंट रु 1300/- वेतन पर किया गया मैंने रु 1500/- मांगे थे अतः मैंने ज्वाइनिंग से इंकार कर दिया। लच होटल की तरफ से सभी उम्मीदवारों को कराया गया था। कूकू साहब मुझसे कह कर गए थे उन्ही के साथ लौटूँ अतः उनके इंतजार मे आस-पास ऐसे ही घूम लिया।

मै अपने साथ जो साबुन नहाने व कपड़ा धोने के तथा सिर मे डालने हेतु जो तेल ले गया था उन्हें मधु ने अपने पास रख कर अपने घर से नया साबुन इत्यादि दिया। लौटते मे मेरा सामान मेरे सुपुर्द कर दिया। अतिथि सत्कार मे वह अपनी सास के मुक़ाबले काफी चौकस रहीं जबकि उनकी सास उन्हें पगली कहती थीं। बातचीत मे यह बात मालूम होकर कि शरद की छोटी बेटी का पहला  जन्मदिन पहली मई को अर्थात पंद्रह दिन बाद पड़ रहा है। कूकू साहब ने रात के भोजन के बाद सबको घूमने ले चल कर क्राकरी वाले ,भोजन वाले इत्यादि को एडवांस दे दिया और अपने घर अपनी भतीजी का पहला जन्मदिन मनाने का निर्णय किया। मेरे सामने तो उनकी पत्नी मधु ने खुशी -खुशी उनका समर्थन और साथ दिया था बावजूद इसके कि उनके मन मे शरद और संगीता के प्रति घृणा भाव था। कूकू साहब ने मुझसे कहा था वह पत्र अपनी माता को डाक से भेज रहे हैं परंतु मै उनका निर्णय व्यक्तिगत रूप से दे दूँ। मुझे जाना तो उनके घर था ही क्योंकि यशवन्त और शालिनी उनके सिटी वाले क्वार्टर पर थे कारण कि हमारे बाबूजी व बउआ अजय के पास फरीदाबाद गए हुये थे और घर मे अकेले रहना शालिनी ने कबूल नहीं किया था।

मैंने जब लौट कर कूकू साहब की सूचना उनकी माता जी को दी तो उन्हें धक्का लगा। वह मधु से चिढ़ती थीं लेकिन कूकू से बेहद लगाव था। वह कहती थीं कि उन्हें केवल अपने पाँच बच्चों से ही लगाव है। अर्थात उन्हें अपने बच्चों के बच्चों से कोई लगाव नही था,  इसी कारण यशवन्त को भी उपेक्षा से देखती थीं और शायद इसीलिए अपने पोता – पोती को भी उनकी माँ मधु के कारण गायब कराना चाहती रही होंगी। उन्होने शालिनी को हिदायत दी कि वह कूकू के घर न जाएँ जबकि मै कूकू और उनकी पत्नी को वचन दे आया था कि उनकी बहन/नन्द को और भांजे को जरूर लेकर आऊँगा। काफी द्वंद और दबाव के बाद मै शालिनी को अपने बड़े भाई के यहाँ जाने को बाध्य कर सका ,उन्होने अपनी माँ के आदेश का पालन करना जरूरी समझा था बजाए अपने पति की बात और इज्जत रखने के। शालिनी की छोटी बहन सीमा ने अपनी माँ के आदेश का अक्षरशः पालन किया और वे लोग मुजफ्फरनगर नहीं पहुंचे जबकि रेलवे का होने के कारण योगेन्द्र को कुछ खास खर्चा नहीं पड़ता। शालिनी की बड़ी बहन रागिनी ने अपनी माँ के आदेश का आधा पालन किया ,वह खुद न आई न बच्चों को भेजा केवल उनके पति अनिल साहब अकेले पहुँच गए। मेरे कारण सिर्फ शालिनी द्वारा ही अपनी माता के उल्लंघन की घटना घटित हुई।

कूकू साहब का बंदोबस्त काफी अच्छा था उन्होने दिल खोल कर खर्च किया था। तमाम उनके आफिस के इंजीनियर और दूसरे स्टाफ की शिरकत रही। आस-पास के पड़ौसी और उनके कुछ रिश्तेदार भी शामिल हुये। लौट कर मैंने शालिनी से कारण जानना चाहा कि क्यों उनकी माता वहाँ जाने से रोकना चाह रही थीं और वह क्यों उनकी बात मानना चाह रही थी। शालिनी ने जो जवाब दिया वह हैरतअंगेज था- उनका कहना था भाभी जी (मधु)दोहरे स्वभाव की हैं ,सामने कुछ कहती हैं पीछे कुछ और ,और सबको कोसती हैं । तब मैंने मेरे पहले मुजफ्फरनगर जाने के दौरान मधु द्वारा बताया घटना -क्रम बता कर उसकी सच्चाई जानना चाहा और यह भी कि उन्होने मुझे इस बाबत क्यों नहीं बताया?शालिनी का जवाब न बताने के बारे मे उनकी माँ की कड़ी हिदायत थी। घटना छिपाना उनकी माँ और और दूसरे रेलवे वाले भाई की इज्जत बचाने हेतु था।

यही बात जब मैंने अपने माता-पिता के फरीदाबाद से लौटने पर   उन्हें बताई तो उनका कहना था वे इन बातों को जानते हैं । मेरे यह पूछने पर कि वे कैसे जानते हैं तो उन्होने बताया कि शोभा- कमलेश बिहारी ने उन्हें बताया था और मुझे बताने को मना किया था इसलिए वे छिपाए रहे। वाह क्या कमाल रहा मेरे पत्नी के रूप मे शालिनी ने इसलिए छिपाया कि उन्हें उनकी माँ ने ऐसा आदेश दिया था। और मेरे माता-पिता ने इसलिए छिपाया कि उनके बेटी-दामाद ऐसा चाहते थे। हमारे बहन-बहनोई शालिनी की माता के मंसूबे क्यों पूरे कर रहे थे ?क्या रहस्य था?हालांकि अब सब उजागर हो गया है उसका वर्णन अभी नहीं फिर कभी। 

हो सकता है शालिनी ने अपनी भाभी संगीता और माता को बताया हो कि उनकी मधु भाभी ने मुझसे भेद बता दिया है। एक बार अकेले मौका पड़ने पर संगीता उसी घटना को लक्ष्य करके सफाई दे रही थी कि भाभी जी (उनकी जेठानी मधु) का दिमाग सही काम नहीं करता है और वह उल्टी-सीधी बातें करती हैं। वह अपना गहना पार करने का शक उनके (संगीता)ऊपर रखती हैं। क्या उन्होने मुझसे कुछ कहा था?मैंने उन्हें स्पष्ट इंन्कार कर दिया क्योंकि मै अब तक सारा घटनाक्रम समझ चुका था और जतलाना नहीं चाहता था कि सब की सारी पोलें मुझे मालूम हैं। ऊपर-ऊपर से शरद और संगीता कुछ जतलाना नहीं चाहते थे परंतु उनकी माता के दृष्टिकोण से साफ था वह मेरे और विरुद्ध हो गई थीं ,उन्हें भय था कि कहीं मै कूकू की पत्नी मधु को सहयोग न कर दूँ । यदि ऐसा होता तो उन्हें बहौत भारी पड़ता कि उनकी बड़ी पुत्रवधू और बीच का दामाद भी उनके खिलाफ क्यों हैं?मेरा दृष्टिकोण साफ था/है कि मै किसी के घरेलू मामलों मे हस्तक्षेप नहीं करता हूँ चाहे मुझे खुद कितना भारी नुकसान होता रहे। मै किसी की घरेलू फूट से अपना फायदा नहीं चाहता वरना चुटकियों मे शालिनी की माता से अपने अपमान और नुकसान का बदला उन्ही की बड़ी पुत्रवधू को सहयोग देकर ले सकता था।वैसे मैंने मधु को भी सहानुभूति का पात्र नहीं समझा था क्योंकि उनके पति कुक्कू अपनी माता के कुचक्रों मे साझीदार रहे हैं। तब यदि वह अपने पति को गलत चाल चलने से रोक पाती तो दूसरी बात थी। फिर खुद उन्होने भी अपनी नन्द को यह कह कर गुमराह किया था कि तुम बड़ी हो अपनी चलाना। सास -श्वसुर को अपनी बात मनवाने के लिए बुद्धि की जरूरत होती है यों ही नहीं घुमाया जा सकता। लिहाजा तटस्थ रहना ही उचित था।

लौटते मे हम लोग फरीदाबाद अजय के घर बाबूजी -बउआ से मिलते हुये आए थे ,उसका वर्णन अगली बार……..

 
 
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