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Category Archives: शोभा

आगरा/1994 -95 /भाग-11 (बउआ का निधन )

(बउआ )

शोभा-कमलेश बाबू तथा अजय के परिवार के सब लोग आगरा से चले गए थे और बउआ की तबीयत निरंतर बिगड़ रही थी। कंपाउंडर दोनों वक्त आकर इंजेक्शन  -ग्लूकोज देख जाते थे ,उनको तो प्रत्येक ट्रिप पर रु 10/-मिल जाते थे। डॉ गर्ग को अब कुछ प्राप्ति न हो रही थी अतः कंपाउंडर से कहलवाया कि ग्लूकोज हटवा दो ऐसे कितने दिन चलेंगी। लेकिन मैंने ग्लूकोज चलने दिया और कंपाउंडर आते रहे। दरअसल अजय से डॉ गर्ग ने कहा था ग्लूकोज देने की बजाए पेट मे आपरेशन के जरिये नलिए फिट करा दो जिसके जरिये तरल भोजन भेजा जाये। लेकिन आपरेशन द्वारा मौत भी हो सकती है जिसकी ज़िम्मेदारी डॉ गर्ग की नहीं होगी। अजय इस आपरेशन के लिए तैयार थे परंतु मैंने सहमति नहीं दी थी।

रविवार 25 जून की सुबह से ही बउआ की तबीयत ज्यादा गड़बड़ हो गई ,सांस तेज चलने लगी, दोपहर को ही कंपाउंडर ने कह दिया था आज बड़ा मुश्किल है। खराब समय का यही आखिरी दिन था यदि निकल जाता तो अगले दिन से तबीयत सुधर सकती थी। काम मे मन लग नहीं रहा था परंतु निबटाना तो था ही। शाम को खाना जल्दी बना दिया था और यशवन्त से खाने को कहा परंतु उसने भूख नहीं है कह कर मना कर दिया अतः मैंने भी नहीं खाया जबकि मुझे भूख ज़ोर से लगी थी।

साँय 07-40  बजे कंपाउंडर आए ,उनके ग्लूकोज की बोतल  लगाते-लगाते07 -45 हो गया   और  तभी उन्हीं के सामने बउआ का सांस चलना भी रुक गया। वह सब नलियाँ ,ग्लूकोज आदि हटा गए और पैसे लेने से मना कर दिया उनमे डॉ गर्ग की अपेक्षा मानवीयता का माद्दा था।

बाबूजी के निधन के समय तो बउआ थीं तब मेरे साथ-साथ यशवन्त हर जगह गया था और वह घर पर अकेली रही थीं। किन्तु अब?बगल वाले घर के सतीश शर्मा साहब ने कहा कहीं मत जाओ वह अपने बेटे को भेज कर अजय व शोभा को टेलीग्राम करवा देंगे। हालांकि उनका बेटा व पत्नी मथुरा जाने के लिए अपने घर से निकले ही थे परंतु रुक गए। बर्फ भी वे पिता-पुत्र ही ले आए और तत्काल पैसे देने को भी मना कर दिया। उन्हीं के पुत्र ने मुझ से पता लेकर टेलीग्राम कर दिये,वही लड़का हींग-की-मंडी के शंकर लाल जी के घर भी बता आया।

बाबूजी के वक्त बउआ, मै और यशवन्त रात मे अकेले थे तब बउआ ने दरवाजा खुला रखवाया था। लेकिन अब शर्मा जी ने मुझसे कहा सिर्फ दो लोग हो दरवाजा रात को खुला न रखो,उन्होने बंद करवा दिया तब गए। पानी बरस गया था अतः गर्मी भी कम हो गई थी। बर्फ की सिल्ली अंदर रखवाते मे मेरे मध्यमा उंगली के कुचल जाने से काफी सूजन भी हो गई थी। इस बार बर्फ सस्ती मिली थी। बाबूजी के वक्त तेज गर्मी के कारण बर्फ काफी मंहगी मिली थी। तब भी शर्मा जी और उनके पुत्र ने ही बर्फ 13 तारीख की  आधी रात को ला दी थी।  तब सुबह होने मे तीन घंटे ही रह गए थे अब सारी की सारी रात बाकी थी। नींद तो न यशवन्त को आनी थी न मुझे।

वैसे शर्मा जी काफी पियक्कड़ थे और उन्हें अपना हाल मालूम होगा। इस समय से डेढ़ वर्ष बाद उनका भी निधन हो गया था। अंदरूनी एहसास के कारण वह दूसरी जगह (हमारे माता-पिता)अपने बेटे से अंतिम समय की परिस्थितियों से रू-ब -रू करा रहे होंगे। बाबूजी को भी चारपाई से उतार कर फर्श पर लाने मे उनके बेटे ने मेरा पूरा साथ दिया था और इस बार बउआ के समय भी उन्हें उतरवाने मे वही साथ-साथ लगा। इतनी मदद करवाने के बावजूद रात ही रात मे शर्मा जी को क्या हुआ या कि किसी रण-नीति के तहत उन्होने अगले दिन 26 जून को सुबह से हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि जल्दी घाट ले जाओ। वह अजय और शोभा के पहुँचने से पूर्व क्यों अंतिम संस्कार करने का दबाव डाल रहे थे समझ से परे था। बड़ी मुश्किल से यशवन्त को समझा कर बउआ के पार्थिव शरीर के पास अकेला छोड़ कर गधा पाड़ा स्थित कामरेड एस .कुमार को कह आया था कि वह कामरेड अनंत राम राठौर को लेकर घर 12 बजे के करीब आ जाएँ। मिनी ट्रक तो शर्मा जी का लड़का पहले तय कर आया था फिर वह अपनी माँ के साथ मथुरा चला गया था। उन लोगों के जाने के बाद शर्मा जी ने हल्ला बोला था। अतः एहतियातन मैंने दो कामरेड्स से संपर्क किया था हालांकि एक वर्ष पूर्व भाकपा छोड़ चुका था किन्तु सपा मे सक्रिय ज्यादा न हो पाया था। शर्मा जी ने धम्की दी थी कि कालोनी का कोई आदमी तुम्हारे साथ मदद नहीं कर सकता ।शर्मा जी एक ही डायलाग सड़क पर चिल्ला रहे थे कि जब उन बहन -भाई को माँ की चिंता न थी बीमारी गंभीर होने पर भी छोड़ कर भाग गए थे उनका यह बेवकूफ इंतज़ार क्यों कर रहा है?

शोभा-कमलेश बाबू के पहुँचने पर वही शर्मा जी बड़बड़ाने लगे -देखो बेटी को माँ की चिंता होती है वह तो आ गई ,बेटा भागा तो अभी तक आया ही नहीं। कमलेश बाबू को मोपेड़ पर साथ लेकर मै रावत पाड़ा सब सामान लेने गया। आने पर शर्मा जी बोले धूप बढ़ रही है भाई का इंतज़ार न करो ,शोभा बोलीं कि वह,कमलेश बाबू,मै और यशवन्त चार लोग हैं ले चलो ,अजय का इंतज़ार छोड़ो। मै इन लोगों की तिकड़म समझ रहा था अतः अजय के इंतज़ार मे रुका रहा।  जब ट्रेन पहुंची तब अजय भी पहुंचे और उनकी श्रीमती जी ने ही बउआ के अंतिम संस्कार हेतु रसमे भी निभाईं वही तो उस वक्त एकमात्र पुत्र-वधू थीं। जब घाट ले जाने लगे तो यशवन्त जो दो बार पहले भी जा चुका था (17 जून 1994 एवं 14 जून 1995 को ) चल ही रहा था उसके साथ ही चलने को पौने पाँच वर्षीय अजय की पुत्री भी अड़ गई।अजय ले चलने और उनकी श्रीमती जी भेजने को तैयार थीं अतः मै भी चुप ही रहा। मैंने शोभा से कहा तुमने घाट चलने की बात कही तो तुम्हारी भतीजी सच मे ही चल रही है।

ट्रक चलने से पूर्व ही कामरेड एस कुमार और कामरेड अनंत राम राठौर भी आ गए थे ,वे भी साथ चले। फिर शर्मा जी ने हमारे दूसरे साईड वाले सिन्धी महोदय को स्कूटर पर यह देखने के लिए भेज दिया कि कालोनी के लोगों को उनके द्वारा रोके जाने से इतने कम लोगों के साथ हम कैसे,क्या करते हैं?पता नहीं कुछ लोग खुद को खुदा क्यों समझने लगते हैं? हम लोग जब घाट पर टाल से लकड़ियाँ ढो रहे थे तब तक कुछ दूसरे लोग दाह संस्कार करके लौट रहे थे। उनके बुजुर्गवार एक सदस्य ने उन युवकों से कहा कि देखो इनके छोटी-छोटे बच्चे भी लगे हुये हैं तुम लोग इनकी मदद करो। फिर तो देखते-देखते आनन-फानन मे हम लोगों की कई क्वितल लकड़ियाँ मौके पर पहुँच गईं। हम उन लोगों को सिर्फ ‘धन्यवाद’ ही दे सकते थे। कालोनी के पढे-लिखे ,सभ्य ?सुसंस्कृत ?लोगों के व्यवहार और इन अनपढ़ तथा-कथित गवार ,अंनजाने लोगों के व्यवहार का यही तो अंतर था।शर्मा जी तथा दूसरे लोगों को उन सिन्धी महोदय से ज्ञात हो गया होगा कि उन लोगों द्वारा पीछे हटने के बावजूद अजनबी और गरीब लोगों द्वारा किस प्रकार अचानक हमारी सहायता की गई।

शाम को कहीं जाते समय वह शर्मा जी डॉ शोभा को अपने घर की चाभी दे गए और शोभा ने रख दी। मेरे यह पूछने पर उनके घर की चाभी क्यों ले ली तो शोभा का जवाब था तुम लड़ते रहना हम क्यों बुरा बनें?अपने बड़े भाई के अपमान से ज्यादा था बहन जी के लिए दूसरों के सामने  खुद को अच्छा साबित करना !शायद अगले ही दिन वे लोग झांसी चले गए।

क्रमशः …..

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आगरा/1994 -95 /भाग-10 (बउआ की बीमारी )

…. पिछले अंक से जारी ….

15 जून को अजय ने कमला नगर के ही डॉ अशोक गर्ग को घर बुला कर बउआ को दिखाया। डॉ गर्ग भाजपा का था उसने घर आने का उस समय रु 500/- लिया था एक विजिट के हिसाब से। पास के एक नरसिग  होम मे उसने एडमिट करवा दिया जिसका चार्ज भी काफी था। उसमे भी मोटा कमीशन डॉ गर्ग को मिला होगा। अजय और कमलेश बाबू नरसिंग   होम मे बउआ के साथ रहे। लगातार ग्लूकोज चढ़ता रहा। अजय शायद रु 5000/- लेकर फरीदाबाद से आए थे वे आनन-फानन मे खत्म हो गए। उसके बाद उन्होने हाथ खड़े कर दिये हमारे पास पैसे नहीं हैं हम इलाज नहीं करा सकते हैं। मैंने उनसे कहा मै सेल्फ का चेक साईंन करके देता हूँ पास के बैंक जा कर रुपए निकाल लाओ। उनका जवाब था हम तुम्हारे नौकर नहीं हैं जो तुम्हारे लिए रुपए निकाल कर दें। तब तक शुद्धि हवन नहीं हुआ था और मुझे घर से निकलना भी नहीं था अतः मैंने कमलेश बाबू से निवेदन किया कि आप से कहने का कोई हक तो नहीं है परंतु इतनी मदद कर दे तो मेहरबानी है। कमलेश बाबू की मेहरबानी से रुपए मेरे अकाउंट से निकल सके और बउआ का इलाज जारी रह सका। 16 जून को शालिनी को दिवंगत हुये एक वर्ष पूर्ण हुआ तब तक बाबू जी भी दिवंगत हो चुके थे और बउआ मरणासन चल रही थीं।

18 जून को बाबू जी का शुद्धि हवन होना था। शोभा और कमलेश बाबू एक बैग मे थोड़ा सामान लेकर नरसिंग होम चले गए। परंपरानुसार बेटी-दामाद को इस हवन मे शामिल भी नहीं होना था और यह भी कि हवन के बाद उनका पुनः आगमन रहे इसलिए भी। अजय और उनकी श्रीमती जी ने हवन की तैयारी की। इस बार अजय को आर्यसमाज के मंत्री जी की श्रीमती जी ने बलकेशवर निवासी एक शिक्षक महोदय का पता दे दिया था उन्हे ही वह कह आए थे। यह पुरोहित जी, जो अजय ने दिलवाया वह सब ले गए। बउआ की तबीयत की जान कर उनसे यह भी कह गए जरूरत हो तो घर आ जाना।

हवन के बाद अजय और उनकी श्रीमती जी ने तय किया कि वे दोनो अब घर पर रहेंगे,हवन हो चुका लिहाजा मुझे नरसिंग होम मे रहना चाहिए। यशवन्त भी मेरे साथ ही जाने पर अड़ गया। शोभा ने कहा कि बिना माँ के बच्चे के साथ यह अन्याय है कि वह बाप के साथ-साथ रात को नरसिंग होम मे गुजारे। अतः शोभा और कमलेश बाबू दोनों मिल कर रात भर नरसिंग होम मे रहने लगे। अजय ने बाबू जी के सन्दूक को चेक किया था उनके जो डिपोजिट्स आदि थे उसमे वह बहन को हिस्सा नहीं देना चाहते थे और वो लोग लेना चाहते थे। मैंने कहा मेरा हिस्सा न लगाओ तुम दोनों आपस मे बाँट लो। अजय किसी भी कीमत पर शोभा को कुछ भी देने को राजी न थे। इसी के बाद उन लोगो ने नरसिंग होम मे रात को रुकना बंद कर दिया था। शोभा की दोनों बेटियाँ तब छोटी थी और झांसी मे दूसरों के आसरे थीं। अजय का निर्णय तो न्यायोचित नहीं ही था उनकी श्रीमती जी और शोभा मे खूब वाक-युद्ध हुआ जबकि उस समय अजय और कमलेश बाबू दोनों ही अस्पताल मे थे। मुझे हस्तक्षेप करना मजबूरी बन गया क्योंकि अजय की श्रीमती जी ने तर्जनी उंगली घुमाते हुये शोभा से कहा कि एक मिनट के अंदर घर से निकाल देंगे। मुझे अजय की श्रीमती जी को संबोधित करके कहना पड़ा कि अभी बउआ   बीमार हैं और बाबू जी नहीं हैं अगर होते और वह भी इस प्रकार शोभा को यहाँ से निकालना चाहते तो नहीं निकाल सकते थे क्योंकि घर और मकान मेरा है। मै इस प्रकार बे इज्जत करके किसी को भी बहन को निकालने नहीं दूंगा। खैर फिर अजय की श्रीमती जी चुप हो गईं उन्होने मुझे कोई जवाब नहीं दिया।

एक रोज फिर अजय और कमलेश बाबू अस्पताल मे थे तब पोस्टमेन एक लिफाफा दे गया जो पटना से बी पी सहाय सहाब का बाबूजी के नाम था और उसमे उन्होने अपने पत्र का उत्तर न मिलने का जिक्र किया था। मुझे शोभा और अजय की श्रीमती जी किसी ने भी  इस बाबत कुछ नहीं बताया और पत्र पढ़ कर दोनों आपस मे इस बात पर उलझ गईं कि उनका जवाब कमलेश बाबू देंगे/अजय देंगे। बाहर खुले मे झगड़ने की आवाज पर मुझे पूछना पड़ा कि मामला क्या है?तब मजबूरन मुझे पत्र दिखाया गया। मैंने दोनों से कहा कि अब बाबू जी हैं नहीं और बउआ भी होश मे नहीं हैं। कमलेश बाबू और अजय दोनों मुझसे छोटे हैं मेरे बारे मे फैसला कैसे कर सकते हैं ?उत्तर देना होगा तो खुद मै ही दूँगा मेरे अलावा और कोई नहीं देगा। यह कह कर मैंने पत्र अपने कब्जे मे ले लिया। पोस्ट कार्ड पर मैंने उन्हें सूचित कर दिया कि 13 जून को बाबूजी नहीं रहे हैं और माँ गंभीर बीमार हैं अभी मै कुछ भी नहीं कह सकता वह कहीं और आगे बात चला सकते हैं।

इसके बाद शोभा और कमलेश बाबू झांसी लौट गए। उन्हें बुरा लगा कि मैंने पत्र का जवाब उन्हें क्यों नहीं देने दिया। मै दो -तीन घंटे के लिए हींग-की-मंडी जाकर कुछ काम निबटा देता था । शुक्रवार 23 जून को अचानक अजय ने कहा कि शाम को वे लोग भी फरीदाबाद लौट रहे हैं। उन्हें भी पटना पत्र का उत्तर न देने का बुरा लगा था। मेरी गणना के मुताबिक रविवार तक का समय बउआ का कष्टप्रद था उसके बाद समय ठीक होना था। मैंने अजय से इतवार तक रुकने को कहा परंतु वह नहीं माने। अतः हींग-की-मंडी जाकर मुझे सभी दूकानदारों से अगले दिन से न आने की सूचना देनी पड़ी। घर पर बीमार माँ ,मै और यशवन्त रह गए।

क्रमशः … 

 
 
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