RSS

Category Archives: षड्यंत्र

आगरा 1994-95/भाग-8

इस हादसे के बाद मेरी तबीयत भी खराब हो गई ,किसी भी प्रकार की डाक्टरी दवा बेअसर जा रही थी। तेज बुखार के साथ -साथ बेहद कमजोरी हो गई थी। चम्मच तक पकड़ना मुश्किल हो गया था। बाबूजी चम्मच से तरल पदार्थ -दाल,सूजी का पेय आदि पिला देते थे। किन्तु यह अच्छा नहीं लगता था। न पानी अच्छा लग रहा था न पिया जा रहा था। अतः मैंने बाबू जी से कहा कि डाक्टर की दी दवाएं बंद करके केवल सूखा ग्लूकोज पावडर मुझे दें । उन्होने यही किया जिससे प्यास भी लगने  लगी और पेशाब भी सही होने लगा। दो तीन दिन मे कमजोरी दूर हो गई। बुखार भी इसी से ठीक हो गया और थोड़ा-थोड़ा भोजन भी अच्छा लगने लगा। कुछ दिनो बाद ड्यूटी जा सका। सभी दूकानदारों ने पूरा सहयोग दिया। मेक्सवेल के शंकर लाल जी,रेकसन के मुरलीधर जी और ईस्टर्न ट्रेडर्स के मोहन लाल जी के ज्येष्ठ पुत्र अपने टाईपिस्ट के साथ तथा वाकमेक्स के सुंदर लाल जी के साले और ज्येष्ठ पुत्र तो घर पर शोक प्रकट करने भी आए थे।

जूलाई मे स्कूल खुलने पर यशवन्त को भी भेजा। बउआ ,बाबूजी की मदद से खाना बना रही थीं किन्तु वह खुद अस्वस्थ थीं । कई बार रोटी सेंकते-सेंकते पीछे फर्श पर गिर गईं और  गैस चूल्हा जलता रह गया। मैंने फिर बाबू जी से सख्ती के साथ उन्हें व बउआ को खाना बनाने को मना किया। मै खुद खाना बनाने लगा और ईस्टर्न के मोहन लाल जी से मिन्नत करके उनका पार्ट टाईम छोड़ दिया। वह मुझे छोडना नहीं चाह रहे थे समय घटाने को तैयार थे वही वेतन देते हुये भी। सुबह और शाम खाना बनाने के साथ मुश्किल होती अतः उनका जाब छोड़ ही दिया। फिर भी यशवन्त को भूख लगने का बहाना करके शाम को मेरे आने से पहले ही बउआ और बाबूजी खाना बना लेते थे। तब मैंने दोनों वक्त की सब्जी सुबह ही बना कर रखना शुरू कर दिया ताकि बउआ-बाबूजी पर ज्यादा भार न पड़े।

एक तरफ बुढ़ापे मे माँ-पिताजी को भी मानसिक आघात,शारीरिक कष्ट और यशवन्त की भी चिन्ता थी तो दूसरी तरफ ‘चिता मे भी रोटी सेंकने ‘ वालों की भी कमी न थी। पर्दे के पीछे षड्यंत्र रचा गया और रिश्ते दारों तथा कालोनी के लोगों के बीच यह अफवाह फैलाई गई कि शालिनी को जहर दिया गया है। ‘कोना शूज’ वाले निरंजन आहूजा( जो श्रीमती आरती साहनी ,इन्कम टैक्स अपीलेट कमिश्नर द्वारा बुक्स आफ अकाउंट्स जब्त किए जाने से परेशान थे और जिंनका केस वकील की सलाह पर मेरे परिश्रम के बल पर सुलझा था) जिनकी बात अपमानजनक लगने पर मैंने उनका जाब छोड़ दिया था। इस मौके पर हींग-की-मंडी मे इस अफवाह के सृजक थे। उन्होने( जिनको मैंने वकील साहब द्वारा कानून पढ़वाकर जेल जाने से बचाया था) रेकसन वाले नारायण दास जी के समक्ष शंकर लाल जी से कहा था नया अकाउंटेंट ढूंढ लो तुम्हारा अकाउंटेंट जेल जाने वाला है। शंकर लाल जी हमारी ही कालोनी मे रहते थे और सब परिवार को   अच्छी तरह जानते थे और शू चेम्बर के प्रेसीडेंट थे अतः उन्होने निरंजन आहूजा को डांट कर चुप रहने को कहा कि झूठी अफवाहें न उड़ाएं । किन्तु लोगों को कानाफूसी करने और नाहक बदनाम करने का मसाला तो मिल ही गया था।

कमलनगर के ही एफ ब्लाक मे रहने वाले आर पी माथुर साहब से हमने जिक्र किया जो LLB भी थे। उन्होने कहा अफवाहों से चिंतित न हो जरूरी समझो तो जवाब देना वरना चुप रहना। उनकी श्रीमती जी ने बताया कि शालिनी की माँ भी अफवाहें फैलाने वालों मे हैं। भरतपुर पोस्टिंग के दौरान दैनिक यात्री रहे आर सी माथुर साहब शरद मोहन के मित्र बन गए थे वह भी आग मे घी डालने वालों मे थे ,अब उनकी पुत्री कमलेश बाबू के मौसेरे भाई की पत्नी भी हो गई है।*

इन सब परिस्थितियों मे राजनीति से विश्राम रहा। ……….

————————————————————————————————————————————————————————————————————————–

*कमलेश बाबू की एक बहन के पति कुक्कू के रिश्तेदार हैं और उनकी शादी मे कुक्कू बाराती बन कर अलीगढ़ पहुंचे थे। आर सी माथुर की पुत्री कमलेश बाबू के मौसेरे भाई की पत्नी होने के साथ-साथ उनकी बड़ी बेटी की सुसराल मे भी रिश्तेदार है। उनकी छोटी बेटी के पति कुक्कू की भुआ के सुसराल के रिश्तेदार हैं। कमलेश बाबू ने अपनी  एक बहन और दोनों बेटियों की शादिया कुक्कू की रिश्तेदारी मे की हैं उनकी छोटी बेटी की देवरानी तो कुक्कू की बेटी की नन्द है। अतः कमलेश बाबू और डॉ शोभा उन लोगो से मिल कर हमारे साथ भीतरघात करते रहे जिसका खुलासा लखनऊ आते ही हो गया। इसीलिए डॉ शोभा ने मुझसे फोन पर  28 जनवरी 2010 को कहा था कि वे लोग मेरे लखनऊ आने के पक्ष मे नही थे। लखनऊ मे बिल्डर लुटेरिया के माध्यम से हम लोगो को हर तरह से परेशान करना उनका खास शगल बन गया है। यशवन्त को बिग बाजार की नौकरी छुड़वाकर लुटेरिया की नौकरी करवाने का उनका  प्रस्ताव मैंने आगरा  मे रहते ही ठुकरा दिया था।

कुछ ब्लागर्स को भी इन लोगो ने भड़का कर मुझे व यशवन्त को परेशान करने का उपक्रम कर रखा है जिनमे कुछ उनकी छोटी बेटी के शहर पूना मे हैं। एक प्रवासी ब्लागर ने 06 अक्तूबर 2010 को यशवन्त पर एक पोस्ट लिख कर उसका भविष्य चौपट करने का प्रयास इनही लोगो के इशारे पर किया था। के बी साहब की छोटी बेटी ने मुझसे फोन पर कहा था “मै…. को जानती हूँ,मैंने उनका प्रोफाईल देखा है। “सीधा अर्थ है कि वे लोग यशवन्त और मेरे ब्लाग्स पर प्राप्त टिप्पणियों के माध्यम से पहुँच बना कर ब्लागर्स को गुमराह करते रहते हैं। ताज्जुब तो पढे लिखे लोगों का इन लोगो के कुचक्र मे फँसने का है। कुक्कू उसकी पत्नी मधू ( के बी साहब की भतीजी ) बहने,बहनोई,भांजे-भांजी,भाई-भाई की पत्नी और भतीजिया तथा कुक्कू के पुत्र-पुत्री और उसके मित्र के बी साहब की पुत्रियाँ हमे सपरिवार नष्ट करने के अभियान मे संलग्न हैं। परंतु किसी के आगे झुक कर हकीकत लिखने से पीछे नहीं हट सकता। 

Advertisements
 

आगरा /1992 -93 ( विशेष राजनीतिक भाग- 5 )

गतांक से आगे—
लगातार नौ वर्षों तक आगरा भाकपा के जिला मंत्री रह चुकने के बाद मिश्रा जी ने अपने हटाये जाने को अपनी करारी हार माना और बदले की कारवाइयों पर अमल करने लगे। उन्हें लगा कि यह उनके विरोधियों की उनके विरुद्ध साजिश है। उन्हें अपना अतीत याद आ रहा था जैसा पुराने कामरेड्स ने बताया था और कभी-कभी मौज मे होने पर वह खुद भी बताते रहते थे। आगरा भाकपा के संस्थापक मंत्री कामरेड महादेव नारायण टंडन के विरुद्ध डॉ जवाहर सिंह धाकरे से मिल कर मिश्रा जी ने खूब गुट-बाजी की थी और उन्हें हटने पर मजबूर किया था । टंडन जी ने भी अपने समर्थक डॉ महेश चंद्र शर्मा के पक्ष मे ही पद छोड़ा था। शर्मा जी को बीच कार्यकाल मे पद छोडने पर डॉ धाकरे और मिश्रा जी ने मजबूर कर दिया था। डॉ धाकरे जिला मंत्री और मिश्रा जी सहायक जिला मंत्री बने थे। डॉ धाकरे के 06 माह हेतु सोवियत रूस पार्टी स्कूल मे जाने की वजह से मिश्रा जी कार्यवाहक जिला मंत्री बने तो जमे ही रहे वापस चार्ज डॉ धाकरे को नहीं दिया तब से ही दोनों मे मन-मुटाव चला आ रहा था। मिश्रा जी को लगा कि यह डॉ धाकरे का खेल है। परंतु डॉ धाकरे तो पिछड़ा वर्ग के ओमप्रकाश जी को भले ही कुबूल कर रहे थे अनुसूचित वर्ग के कारेड नेमी चंद उनकी पसंद के नहीं थे। डॉ धाकरे के भांजा दामाद कामरेड भानु प्रताप सिंह ने मुझ से साफ कहा था कि,माथुर साहब कहने -सुनने मे तो बातें अच्छी लगती हैं -नेमीचन्द से तो मिश्रा जी ही भले थे। हालांकि नेमीचन्द बनेंगे मुझे खुद सम्मेलन के दूसरे दिन ही पता चला था हमारी त्तरफ से तो ओमप्रकाश जी उम्मीदवार थे। परंतु चुने जाने के बाद जैसा दूसरे लोग चाहते थे मै नेमीचन्द जी को हटाये जाने के सख्त खिलाफ था। हालांकि नेमीचन्द जी लिखत-पढ़त कुछ भी नहीं करते थे और यह भार मुझ पर अतिरिक्त था लेकिन मै चट्टान की तरह उनके समर्थन मे डटा रहा। नेमीचन्द जी भी जानते थे कि उनका पद पर कायम रहना केवल मेरे कारण ही संभव हो रहा है। लोगों ने उनके दिमाग मे खलल डालने के लिए उन्हें नेमीचन्द माथुर कहना शुरू कर दिया। परंतु वह विचलित नहीं हुये।

मिश्रा जी के समक्ष स्पष्ट था कि जब तक मै नेमीचन्द जी के साथ हूँ तब तक उनकी दाल नहीं गल पाएगी। मुझे झुका-दबा या खरीद लेने की फितरत उनके पास नहीं थी। इसलिए उन्होने षड्यंत्र का सहारा लिया। एक बार अचानक कार्यकारिणी बैठक मे मिश्रा जी ने मुझे पार्टी से निकालने का प्रस्ताव रख दिया। शायद वह पहले से लामबंदी कर चुके थे। नेमीचन्द जी भी कुछ न बोले। उस समय बाहर बारिश हो रही थी मैंने अपना छाता उठाया और बैठक से उठ कर घर चल दिया। कामरेड जितेंद्र रघुवंशी ने कहा कि बारिश बंद होने के बाद चले जाना तेज बारिश मे छाता भी बेकार है। मैंने कहा जब आप लोगों ने पार्टी से अकारण मुझे निकाल ही दिया तो चिंता क्यों?यह अवैधानिक फैसला है और मै इसे चुनौती दूंगा।

मैंने जिला मंत्री कामरेड नेमीचन्द से  बाद मे मिल कर कहा कि उनके समर्थन न देने के बावजूद मै कार्यकारिणी के इस अवैध्य फैसले को संवैधानिक चुनौती दे रहा हूँ और इस आशय का लिखित पत्र उनको सौंप दिया। उन्होने मुझे आश्वासन दिया कि वह जिला काउंसिल मे इस विषय पर मेरे साथ रहेंगे। कार्यकारिणी चूंकि मिश्रा जी द्वारा तोड़ ली गई थी वह चुप रहे थे। राज्य-केंद्र पर भी मैंने इस फैसले को चुनौती की सूचना भेज दी थी। मलपुरा शाखा के कामरेड्स जिंनका बहुमत था मेरे साथ थे ,उन्होने तो यहाँ तक कह दिया था कि यदि मिश्रा जी पीछे नहीं हटे तो वे सब भी पार्टी छोड़ देंगे। जिस दिन जिला काउंसिल की बैठक हुई मिश्रा जी ने कामरेड राजवीर सिंह चौहान को बैठक का सभापति घोषित करा दिया जिन्हें वह पहले ही सेट कर चुके थे। उन्होने सभापति बनते ही मुझे बैठक से बाहर कर दिया। अंदर धुआंधार बहस होती रही और मै इतमीनान से छत पर मौजूद रहा। डॉ जवाहर सिंह धाकरे ने आते ही मुझसे सवाल किया कि बैठक से बाहर क्यों हो ?मैंने कहा सभापति चौहान साहब का यही निर्णय है।

डॉ धाकरे से मेरे द्वारा पहले ही पार्टी संविधान पर चर्चा हो चुकी थी। उन्होने बैठक मे पहुँचते ही सभापति जी से संविधान की धाराओं पर चर्चा की और उन्हें बताया कि उनका फैसला एक और असंवैधानिक कारवाई है। कार्यकारिणी समिति का गठन जिला काउंसिल ने किया था और जिला काउंसिल का गठन सम्मेलन ने अतः कार्यकारिणी समिति जिला काउंसिल के सदस्य को हटा ही नहीं सकती थी। सभापति अगर अपना फैसला नहीं बदलेंगे तो उनके विरुद्ध भी संविधान-विरोधी कारवाई करने का प्रस्ताव पारित किया जाएगा। चौहान साहब की ठाकुर ब्रादरी के धाकरे साहब ने जब उन्हें चुनौती दी तो उन्होने अपना फैसला पलटते हुये दो-तीन वरिष्ठ कामरेड्स भेज कर मुझे बैठक के भीतर बुलवाया। उन्होने यह भी सूचित किया कि जिला काउंसिल ने कार्यकारिणी का फैसला रद्द कर दिया है अतः मै न केवल पार्टी मे बल्कि अपने सभी पदों पर पूर्ववत कार्य करता रहूँ। संवैधानिक जीत तो हासिल हो गई ,किन्तु एक बारगी इज्जत पर  तो नाहक  हमला हुआ ही इसलिए मन ही मन मौका मिलते ही पार्टी से खुद ही अलग हो जाने का निश्चय कर लिया और किसी से इस संबंध मे कुछ न कहा तथा कार्य पहले की भांति ही करता रहा।

एक बार जिला कचहरी पर कोई धरना  प्रदर्शन था मै वहाँ भी (उस घटना के बाद मैंने मिश्रा जी से बोलना बंद कर दिया था) मिश्रा जी से न बोला। मिश्रा जी मेरे पास आए और बोले माथुर साहब यह सब तो चलता ही रहता है,हम लोग एक ही पार्टी मे हैं ,उद्देश्य एक ही हैं ,काम एक साथ कर रहे हैं तो बोल-चाल बंद करने का क्या लाभ। मजबूरन उनका अभिवादन करना ही पड़ा वह वरिष्ठ थे और खुद मेरे पास चल कर आए थे । हम लोग उनके हित मे थे वह हमें गलत समझ रहे थे। कटारा ने तांत्रिक प्रक्रिया से उनके सोचने की शक्ति कुंन्द कर दी थी।

मिश्रा जी ने शायद यह भी मान लिया था कि वह मुझे हरा न पाएंगे। इसलिए उन्होने और गंभीर चाल चली जो अपने समय पर ही लिखित स्थान प्राप्त करेगी।

 
 
%d bloggers like this: