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Category Archives: संगीता

आगरा/1994 -95 / (भाग-7)

गतांक से आगे ……

अजय को फरीदाबाद लौटना था वह भी प्राईवेट जाब तब छोड़ कर किसी के साझे मे अपना काम कर रहे थे,कितना नुकसान उठाते अतः आर्यसमाँजी पद्धति से हवन कराने का निर्णय बाबूजी ने लिया। कमला नगर आर्यसमाज मे उस समय कोई पुरोहित न था अतः वहाँ से पता करके उनके सेक्रेटरी के घर अजय गए जहां सेक्रेटरी साहब तो नहीं मिले किन्तु उनकी पत्नी ने सामग्री लिखवा दी और दिये समय पर पुरोहित भिजवाने का आश्वासन दे दिया। निर्धारित दिन और समय पर हवन कुंड और समिधा लेकर हींग -की -मंडी आर्यसमाज के पुरोहित अशोक शास्त्री जी पहुँच गए। विधानपूर्वक उन्होने शांति हवन करा दिया। जो दक्षिणा  बाबूजी  ने उन्हें दी बिना किसी हुज्जत के उन्होने स्वीकार कर ली। बल्कि जो साड़ी और बर्तन बाबूजी ने अजय से उन्हें देने के लिए मँगवाए थे वे भी लेने से उन्होने यह कह कर मना कर दिया कि न उसका कोई औचित्य है न ही आर्यसमाज मे चलता है। उनका कहना था आपको देना है तो किसी और पंडित को दे दें। बड़ी मुश्किल से बाबूजी और अजय ने उन्हें वे चीजें ले जाने को यह कह कर राजी किया कि आप ही जिसे चाहे दे दें।

अजय की बेटी अनुमिता तब पौने पाँच वर्ष की थी हवन के बाद बोली ताऊजी क्या आप हमे मोपेड़ पर नहीं घुमा सकते हैं?लिहाजा उसे बैठा कर थोड़ा आगे ही बढ़े थे कि उसने कह दिया बस घूमना हो गया अब वापिस चलिए। मुझे जानकारी नहीं थी किन्तु यशवन्त ने बताया कि मम्मी की इच्छा अनुमिता को एक फ़्राक देने की थी अब वह नहीं हैं इसलिए आप दिला दीजिये। तुरंत कुछ खरीदने-देने की मेरी इच्छा तो नहीं थी परंतु यशवन्त की इच्छा को देखते हुये उसी की पसंद की एक फ़्राक जिसे उस बच्ची ने भी पसंद किया ले दी जिसे यशवन्त ने ही अपनी चाची को सौंपा। फ़्राक को तो यशवन्त ने बताया था कि मम्मी देना चाहती थीं उनकी इच्छा को पूरा करने के लिए दी है उसे तो उन लोगों ने स्वीकार कर लिया। किन्तु यशवन्त अपनी तरफ से रु 4/- का हारलिक्स बिस्कुट का एक पैकेट और डेढ़ रुपया अपनी बहन को दे रहा था जिसे उस बच्ची ने ले भी लिया था। अजय ने पैसे उससे छीन कर उछाल दिये और बिस्कुट का पैकेट लौटा देने को कहा ,मन मसोस कर बच्ची ने रख दिया। यशवन्त को बहुत बुरा लगा और वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसे रोता छोड़ कर वे लोग रवाना हो गए। मुझे बेहद ताज्जुब हुआ और धक्का भी लगा परंतु कर क्या सकता था?यशवन्त को ही बेमन से डांट दिया। बउआ -बाबूजी अजय से कुछ नहीं बोले यह बात भी समझ से परे थी।

डॉ रामनाथ, विजय शर्मा (सप्तदीवा साप्ताहिक के सम्पादक) और आस-पास के लोग 13 वी न करके आर्यसमाज से हवन कराने पर बिदक गए। गोविंद बिहारी मौसा जी (रानी मौसी के पति एवं अलीगढ़ के रिश्ते से  कमलेश बाबू के चाचा ) ने अपने घर पर मुझसे कहा कि -“तेरवी न करके जीजाजी ने अपना मुंह काला करवाया है,वह कबसे आर्यसमाजी हो गए?”

मुझे तो उनकी बात तीखी चुभी ही थी और मैंने इस दिन के बाद  उनके घर जाना छोड़ दिया और मन मे सोचा कि आपके जीजाजी (साढू) भले ही आर्यसमजी न हुये पर मै होके दिखाऊँगा। बउआ को भी छोटे फुफेरे बहनोई द्वारा अपने पति की तौहीन बेहद बुरी लगी। उन्होने बताया कि उनके फूफा जी ने उनकी भुआ (अर्थात गोविंद बिहारी जी के श्वसुर साहब ने उनकी सास )  के न रहने पर 5 दिन भी नहीं केवल 3 दिन बाद ही आर्यसमाज से हवन कराया था।मैंने एक पत्र भेज कर उनसे पूछा कि हमारे बाबूजी के बारे मे तो आपने तपाक से कह दिया कि अपना मुंह काला करवाया जो तेरवी न की तो आप अपने श्वसुर साहब के लिए क्या कहना चाहेंगे? रानी मौसी भी इस विषय पर अपने पिता को गलत नहीं ठहरा सकती थीं जबकि उनके सामने ही उनके पति ने मेरे पिता को गलत ठहरा दिया था।

इससे पूर्व गोविंद बिहारी मौसा जी के ही कहने पर मै कई बार यशवन्त को लेकर राजा-की-मंडी क्वार्टर पर गया था। किन्तु वे लोग उपेक्षित व्यवहार उसके साथ भी कर रहे थे। गोविंद बिहारी मौसा जी ने कहा था कि उनके कहने से एक बार और ले जाऊँ उस दिन शरद मोहन का आफ था वह घर पर थे किन्तु तुरंत ड्रेस पहन कर स्टेशन रवाना हो गए उनकी माता जी सोने चली गई और उनकी पत्नी ने अपनी पुत्रियों को रंग – ड्राइंग कापियाँ दे कर अलग कमरे मे बैठा दिया। लिहाजा मै यशवन्त को लेकर फ़ौरन सीधे अर्जुन नगर रानी मौसी के घर यह तथ्य बताने गया। तभी उन्होने तेरवी न करके आर्यसमाजी हवन कराने पर आपत्ति जताई थी। उसी दिन के बाद से गोविंद बिहारी मौसा जी के साथ-साथ शरद मोहन के घर भी जाना बंद कर दिया। 

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आगरा/1994 -95 / (भाग-3 )

भाकपा छोड़ कर सपा मे शामिल होना हींग की मंडी के दुकानदारो को अच्छा नहीं लगा क्योंकि वे सभी भाजपा के समर्थक थे और सपा को मुस्लिम समर्थक मानते थे ,भाकपा से उन्हे दिक्कत न थी क्योंकि रूस से व्यापार करने के कारण कम्युनिस्टो के वे संपर्क मे थे। मेरा होटल मुगल का केस जो मै मिश्रा जी की सलाह पर कामरेड जगदीश को सौंप (कामरेड हरीश आहूजा के भाकपा छोडने के बाद ) चुका था। चूंकि शालिनी की तबीयत ठीक नहीं चल रही थी कभी फायदा दीखता था और कभी परेशानी हो जाती थी। मै दोबारा लखनऊ या बाराबंकी जाकर कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह अथवा कामरेड मित्र सेन यादव से न मिल सका अन्यथा उनके द्वारा मुख्यमंत्री मुलायम सिंह जी से लेबर कोर्ट मे कहला कर फैसला अपने पक्ष मे कराने को कहता। परंतु इसी भय से मिश्रा जी ने कामरेड जगदीश से कह कर लेबर कोर्ट के पीठासीन अधिकारी (जो रिटायर्ड IAS होते हैं )को कहला दिया कि वह मेरे श्रमिक प्रतिनिधि नही हैं। मुगल मेनेजमेंट से मिल कर इन लोगों ने यह जजमेंट लिखवा लिया कि “Petitioner is no more interested” और इस प्रकार होटल मुगल एक्स पार्टी केस जीत गया। थोड़े दिनो बाद  वह पीठासीन अधिकारी मेरठ स्थानांतरित हो गए उनके पुत्र को कोई गंभीर बीमारी भी ग्रस्त कर गई किन्तु मेरे केस को तो वह बिगाड़ ही गए। इन सब बातो का पता भी तुरंत न चल सका जो हाई कोर्ट मे अपील करता और न ही तब यह सोचने की फुर्सत थी। जैसे तैसे घर और दुकानों की नौकरी चलाना था। सपा मे पूर्ण सक्रिय भी न हो सका।

शायद बीमारी की वजह से ही शालिनी को इस वर्ष गर्मी ज्यादा सता रही थी। रसोई की खिड़की के शीशे तोड़ कर उनके स्थान पर जाली लगा दी थी 08 मई को । इससे पहले दिन सुबह शालिनी अपनी भाभी से मिलने गई थीं उनकी माँ और भाई को कहीं ज्यादा दिनो के लिए जाना था सीमा को छोडने को योगेन्द्र ने मना कर दिया था। शालिनी की माँ ने बड़ी ही बेशर्मी से मुझसे शालिनी को उनकी गैर हाजिरी मे छोडने को कहा जबकि वह एक बार भी शालिनी को देखने नहीं आई थी और न ही शरद आए थे। मैंने भी दो टूक कह दिया आप लोग शालिनी की बीमारी मे देखने भी नहीं आए,पहले मेरे द्वारा मदद करने पर मुझे आपने व आपके जेठ ने बेवकूफ करार दिया अतः  अब मै यहाँ शालिनी को  नही रहने दूंगा। तब बनवारी लाल भी कुछ दिनो के लिए प्रताप गढ़ गए थे शायद अपना सामान वहाँ से लाने को। खरी बात बुरी लाग्ने के कारण वह उठ कर बच्चो के साथ टी वी देखने चली गई। संगीता ने स्वीकार किया कि मेरा तर्क गलत नही था और अपनी मजबूरी शालिनी से बता कर कहा कि विजय बाबू को दूसरे-तीसरे दिन भेज कर हाल-चाल ले लें। अब मुझे भाकपा कार्यालय राजा-की-मंडी नही जाना होता था लिहाजा खास तौर पर वहीं आना होता। उनही के सामने शालिनी ने वायदा कर दिया और उनकी बीमारी के मद्दे नजर इस बात को अस्वीकार न कर सका। चूंकि अक्सर दुकानों से जल्दी उठ जाता था इसलिए काम अधिक होने पर कभी -कभी देर तक रुकना भी पड़ता था। जिस दिन शालिनी ने क्वार्टर होकर आने को कहा उसी दिन देर भी हो गई। पहले न जाने का विचार किया परंतु यह सोच कर कि शालिनी यह मतलब न निकाले कि मैंने वहाँ  जाने से बचने हेतु दुकानों पर ज्यादा समय लगा दिया,अंततः चला गया। दोनों लडकियाँ सो चुकी थीं।संगीता ने दरवाजा बाहर के कमरे की लाइट जलाए बगैर खोला था क्योंकि साड़ी के बगैर थीं। सीधे अंदर के बारामदे मे ले गई और चारपाई पर बैठा कर रसोई मे चाय बनाने लगीं यह कहने के बावजूद कि अब चाय का समय नही है।चाय लेकर जब आई तो सामने के वस्त्र भी खुल कर सिर्फ लटके थे तर्क था गर्मी बेहद है बिना कूलर के रहना मुश्किल है। मैंने कहा कि इसी कारण मै आपके यहाँ नहीं आना चाहता हूँ आपको सबके सामने गर्मी नहीं लगती सिर्फ अकेले मे लगती है। जवाब की जगह सिर्फ हँसती रहीं। चलने के समय बाहर के कमरे मे भी वैसे ही आई और बोलीं कि आप बाहर से बंद कर देंगे तब अंदर से सांकल कुंडी लगा लेंगे। घर पर जब शालिनी को बताया तो उन्होने सुन कर कोई प्रतिक्रिया न दी।इतवार के दिन दुकाने बंद रहती थीं अतः खुद शालिनी ने वहाँ चलने को कहा,मै पहुंचा कर घर वापिस लौट आया तो बउआ को भी आश्चर्य था कि तेज गर्मी मे क्यों भागा-दोड़ी की वहीं क्यों नही रुका,अब उनसे क्या कहता ?तीन बजे तक आने को शालिनी ने कहा था कि कम से कम शाम की चाय यहाँ पी लें अन्यथा उनकी भाभी को बुरा लगेगा। सवा तीन के करीब जब पहुंचे तो सब बच्चे अंदर सो रहे थे शालिनी ने दरवाजा खोला था वह और संगीता अंदर के बारामदे मे थे। संगीता पोशाक मे केवल पेटीकोट पहने थीं मैंने शालिनी से पूछा तुम्हारे लिए गर्मी नहीं है । उनका जवाब था गर्मी है लेकिन संगीता (उन्होने भाभी जी शब्द नहीं बोला )को पसंद है अकेले होने पर ऐसे रह लेती हैं सब के सामने तो मजबूरी है ।संगीता बोलीं जब योगेन्द्र बाबू झांसी (शायद किसी बच्चे के जन्म के समय जब सीमा अस्पताल मे थीं )ले गए थे तब वह तो ऐसे मौके तलाशते थे जब कपड़े बदलने हों और पूरा आनंद लेते थे,लेकिन आपको बुरा लगता है। नियम और मर्यादा के विरुद्ध हर बात मुझे बुरी ही लगती है,मैंने भी स्पष्ट कर दिया अतः  चाय के बाद संगीता ने वस्त्र धारण करके बच्चो को जगा कर नाश्ता कराया।

भाकपा से भले ही अलग हो गए थे और सपा मे सक्रिय भी ज्यादा न थे परंतु भाकपा जिला मंत्री के आग्रह पर उनकी फेकटरी मे उनसे मिलते रहते थे। उन्होने बताया कि मेरे हटने के बाद उन्हे ज्यादा परेशान किया जा रहा है और उनका पद पर टिके रहना असंभव होता जा रहा है। सरदार रणजीत सिंह जी के घर पर भी मिल लेते थे उन्होने भी भाकपा छोड़ दी थी वह बहुत खिन्न थे मिश्रा जी और जगदीश जी के व्यवहार से। वह भी मानते थे कि हरीश आहूजा साहब ने इनही दोनों के व्यवहार से खिन्न होकर भाकपा को अलविदा कहा था। सपा नेता रवी प्रकाश अग्रवाल जो शिव पाल सिंह जी के सहपाठी होने के कारण तब प्रभावशाली थे चाहते थे कि मै दो-तीन घंटे का पार्ट टाईम जाब तो बाहर कर लूँ लेकिन उनके यहाँ कुल रु 1200/- मे फूल टाईम ज्वाइन कर लूँ। यह बिलकुल असंभव था कि अपनी आमदनी को घटा लिया जाये हालांकि वह सपा मे कोई उच्च पद दिलाने बात कह रहे थे। उस उच्च पद से मुझे तो कमाई करनी नहीं थी सो मै पदों के लालच के फेर मे नहीं फंसा। 

 

आगरा/1994 -95 /भाग-1

डॉ विनय आहूजा को हाल बता कर दवा लिखवा लेते थे। 7-8 दिन पीछे वह शालिनी को भी बुलवा लेते थे। मै दवा सौंप कर दिन मे दुकानों पर थोड़ा-थोड़ा काम निबटाने चला जाता था। सभी दूकानदारों की तरफ से पूर्ण सहयोग रहा। एक दिन भाकपा,आगरा के  सहायक जिला मंत्री कामरेड दीवान सिंह भी घर पर शालिनी को देखने आए थे उनके सामने भी शालिनी ने दवा फेंक दी थी तो वह बोले थे कि भाभी जी आप ठीक क्यों नहीं होना चाहतीं?ठीक से दवा करें डॉ विनय एक्सपर्ट हैं और उनकी दवाएं काफी फायदा करती हैं आप दवा खाती नहीं इसी लिए अभी तक लाभ नही हुआ। शायद उनके कहने का कुछ असर हुआ और 4-5 रोज मे शालिनी को काफी लाभ भी हुआ । 07 जनवरी  1994 को यशवन्त को स्कूल छोड़ कर डॉ विनय के पास शालिनी को दिखाने ले गए थे वह भी इलाज से संतुष्ट हुये। लौटते मे शालिनी ने कहा कि अब हम दवा ठीक से ले रहे हैं जल्दी ही बिलकुल ठीक हो जाएँगे मम्मी के यहाँ से कोई देखने नहीं आया है हमे उनके पास ले चलो ताकि कहें कि एक बार तो देख जाओ सब कहते हैं पीहर वाले कैसे हैं?उस समय उनकी ख़्वाहिश को देखते हुये न चाहते हुये भी राजा-की -मंडी क्वार्टर पर ले गए।

शालिनी ने अपनी माँ से शिकवा किया कि देखने भी क्यों नहीं आई उन्होने झूठ कह दिया कि चिट्ठी भेजी थी। क्या एक माँ शहर मे मौजूद होते हुये अपनी बीमार बेटी को देखने न जाकर सिर्फ चिट्ठी भेज कर तसल्ली रख सकती है ?सरोजनी देवी माथुर का तो यही अजूबा था। संगीता ने फिर बचाव का रास्ता अख़्तियार करते हुये कहा कि मम्मी जी की तो वही बताएं किन्तु यदि विजय बाबू आकर ले जाएँ तो मै परसों आपको देखने आ जाऊँगी। अब प्रश्न यह था कि यदि मै बुलाकर लाता हूँ तो अपने आप देखने आने की बात कहाँ रहती है?शालिनी ने सुझाव दिया कि ड्यूटी जाते वक्त मै संगीता को क्वार्टर से साथ लेकर कमला नगर मार्केट मे छोड़ दूँ और फिर ड्यूटी निकल जाऊ इधर से वह रिक्शा करके लौट जाएंगी। 09 जनवरी को जब वहाँ पहुंचे तो संगीता को बुखार आ रहा है ऐसा कथन था उनकी सास साहिबा का । किन्तु संगीता ने कहा कि वह एकबार पहले अपना वचन पूरा नहीं कर पाई थीं ,बुखार कोई समस्या नहीं है शालिनी रानी को देखने जरूर जाएंगे। कपड़े बदल कर शाल ओढ़ कर और छोटी बेटी को साथ लेकर वह मोपेड़ पर कमला नगर आई परंतु मेन मार्केट तक न लाकर मैंने उन्हे कालोनी की शुरुआत  मे छोड़ दिया और खुद ड्यूटी चला गया।

मै जल्दी ही लौटता था फिर भी तब तक संगीता को मौजूद देख कर आश्चर्य  हुआ। क्योंकि जाहिरा तौर पर वह मेरे गैर हाजिरी मे आई थी और उन्हे लौट चूकना था, किन्तु  बउआ -बाबूजी ने कहा कि शाम को मुझ से मिल कर ही वह लौटें इसलिए रुकी रहीं । शाम को फिर शालिनी ने खुद ही पकौड़ी और चाय बनाई,ऊपर के अपने कमरे मे उन्हें सोफ़े पर बैठा कर पिलाई। दोनों के बच्चे नीचे खेलते खाते रहे। शालिनी ने इशारे से मुझे छत पर बुला कर कहा कि कुछ खास नोट किया। मुझे मतलब समझ नहीं आया तो उन्होने स्पष्ट किया कि जो ब्लाउज संगीता ने दुबे टेलर्स ,कमला नगर मे सिलवाया था वही पहन कर आई हैं जो उन लड़कियों ने बेहद टाइट सिल दिया है।केवल एक ही हुक लग पा रहा है और बाकी खुला है । शाल ओढ़ने से मुझे कैसे पता चलता?अतः शालिनी बोली अभी तमाशा दिखवाते हैं । वह नीचे से थोड़ी पकौड़ी  और सेंक लाई  और मुझसे कहा कि गरम-गरम अपने हाथ से भाभी जी को एक पकौड़ी तो खिला देते। वह नखरे दिखाती हुई पीछे झुकती गई जिससे कि सामने से शाल खिसकता रहा और अंततः शालिनी की कोहनी लगने  से लुढ़क गया। सामने तस्वीर साफ थी ब्लाउज तो टाइट था जिस कारण हुक नहीं लग पाये किन्तु ब्रा न पहनने का कारण क्या था यह स्पष्ट न था।सबसे बड़ी बात यह कि ऐसे कपड़े पहन कर आना ही क्यो हुआ ? शालिनी ने बताया कि वह उन्हे दुबे टेलर्स की लड़कियो की बेवकूफी दिखाना चाहती थी इसलिए पहन कर आई थी। लेकिन फिर शालिनी ने बाद मे केवल बता देने के बजाए मुझे सीन क्यो दिखाया ?शक-शुबहा होने की बाते थी।

तय प्रोग्राम से उन्हे रिक्शा से लौटना था अतः बाजार तक यशवन्त को रिक्शा पर बैठाने भेज दिया था। काफी देर तक वह नहीं लौटा तो शक हुआ कि कहीं बिना बताए उसे तो नहीं ले गई हैं। अतः बाजार मे देखने गया तीनों जन टहल रहे थे। यशवन्त ने कहा कि माइंजी को रिक्शा नहीं मिल रहा है। सबको फिर घर लौटा कर लाये और मोपेड़ से बैठा कर पहुंचाया। किन्तु इस वक्त मै क्वार्टर तक नहीं गया और संगीता तथा उनकी बिटिया को रेलवे ओवर ब्रिज पर सीढ़ियों के पास छोड़ दिया। जब वे लोग नीचे उतर गए तो पुल से ही मोपेड़ बैक करके मै वापिस आ गया । हालांकि संगीता घर तक चलने को कह रही थीं परंतु मैंने न जाना ही मुनासिब समझा। बउआ-बाबूजी को इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि संगीता कोई खुद शालिनी को देखने नहीं आई थी बल्कि शालिनी उनको न्यौत कर आई थी और मुझसे बुलवाया तथा पहुंचवाया था। कहने को संगीता 16 जनवरी अपनी शादी की सालगिरह का बुलावा भी दे गई थीं।

इत्तिफ़ाक से 16 तारीख को हमारी पार्टी की एक बैठक भी पड़ गई।लिहाजा यशवन्त और शालिनी को क्वार्टर पर छोडते हुये मै सीधे पार्टी कार्यालय निकल गया। बैठक की समाप्ती के बाद ही उधर आया। शरद तो सुबह से ही अपनी ड्यूटी पर थे। उनकी माता और सब बच्चे भोजन कर चुके थे। मैंने वहाँ भोजन न करने की बात कही थी परंतु शालिनी और संगीता ने मेरे इंतजार मे भोजन नहीं किया था। न चाहते हुये मजबूरी मे वहाँ भोजन करना ही पड़ा। बारामदे मे भोजन करते हुये शालिनी ने कहा कि आप भाभी जी से चिढ़ते हैं फिर भी आपके इंतजार मे वह अब तक भूखी रह गई। जवाब मे मैंने कहा मै कभी भी किसी से भी नहीं चिढ़ता हूँ लेकिन सही-गलत के आधार पर अलग-अलग बातों का समर्थन या विरोध करता हूँ। फैसलों मे व्यक्तिगत चाहत या नफरत से प्रभावित नहीं होता हूँ। प्रत्येक कदम एक निश्चित मर्यादा के तहत ही उठाता हूँ। संगीता ने कहा कि आज उनकी शादी की सालगिरह है और उनके पति आज भी डबल ड्यूटी करेंगे क्या मै उसका समर्थन करूंगा। किसी के घरेलू मामलों मे कोई भी प्रतिक्रिया देने से मैंने इंकार किया।

हालांकि डॉ विनय आहूजा के इलाज से काफी लाभ हुआ था परंतु शालिनी की माता ने कहा की एक बार राजा-की-मंडी स्थित डॉ रमेश चंद्र उप्रेती को भी दिखा लें। हमारे बउआ-बाबूजी ने कहा कि उन लोगों की तसल्ली के लिए दिखा दो। एक दिन यशवन्त के स्कूल जाने के बाद मोपेड़ से शालिनी को पहले क्वार्टर ले गए जहां से शालिनी की माता  ने उनकी छोटी भतीजी को साथ भेज दिया। डॉ उप्रेती ने चेक अप के बाद साफ बताया कि आँतें सूज कर लटक गई हैं। एक साल इलाज करना पड़ेगा यदि लाभ न हुआ तो आपरेशन कराना होगा। उन्होने दवाएं दी और कडा परहेज बताया कि चाय न पीये बहुत मन हो तो दिन मे केवल एक कप ही ले।  तली-भुनी चीजे न खाये ,मैदा के बने पदार्थ बिलकुल न ले। क्वार्टर पर शालिनी को पहुंचा कर मै थोड़ी देर के लिए पार्टी कार्यालय चला गया जब लौटा तो देखता हूँ कि शालिनी की माता  ने बाजार की बनी मैदा की मठरी उनके हाथ मे पकड़ा रखी थी और एक ग्लास चाय पीने को दी हुई थी। मैंने पूछा कि आप कैसी माँ हैं जो  आपके ही बताए डॉ ने परहेज कहा है उसके खिलाफ अपनी ही बेटी का बिगाड़ करने पर आमादा हैं?उनका जवाब था आप कडा परहेज कराएंगे इसलिए अभी दे दिया फिर कहाँ खा पाएगी? मैंने शालिनी के हाथ से वह मठरी लेकर उनकी भतीजी को दे दी जिसने बताया कि भुआ तो दो मठरी अभी-अभी खा भी चुकी हैं। चाय भी मैंने पूरी न पीने दी और तुरंत लेकर  घर लौट आया।

 

आगरा/1992-93/भाग-10

क्रमशः …..

बताने के बावजूद और इस बात के मालूम चलने के बाद भी कि भाई -दोज़ के दिन वहीं का खाना खाकर शालिनी बीमार हुई थीं वहाँ से किसी ने भी देखने आने की जरूरत महसूस नहीं की,जबकि मै शालिनी ही की वजह से उन लोगों का हाल-चाल लेने जाता और मदद करता था वर्ना उन लोगों का व्यवहार ऐसा न था कि उन पर तरस खाया जा सके। सभी दुकानों पर थोड़ा- थोड़ा काम निबटा कर जल्दी घर पहुँच जाता था और भाकपा कार्यालय जाना स्थगित कर रखा था। सुबह मै मदद कर देता था शाम को बाबूजी की मदद से बउआ खाना बना लेती थीं।

उपरोक्त पोस्ट कार्ड कामरेड डॉ  जितेंद्र रघुवंशी(विदेशी भाषा विभाग के अध्यक्ष और रूसी भाषा के विद्वान,आगरा विश्वविद्यालय ,आगरा IPTA के राष्ट्रीय महामंत्री हैं ) द्वारा मुझे मीटिंग मे शामिल होने हेतु भेजने का कारण ही यह था कि मै घरेलू कारणो से जिला मंत्री को सहयोग कर पाने मे असमर्थ था। ‘डंकल’प्रस्ताव देश की कृषि और अर्थ व्यवस्था को चौपट करने वाले थे उनके विरोध मे व्यापक जन-संघर्ष छेड़ना था। मै घरेलू संघर्ष मे उलझा हुआ था फिर भी 03 दिसंबर 1993 की बैठक मे शामिल हुआ। बीच मे जब डॉ रामनाथ का इलाज चल रहा था और उन्होने शालिनी को ग्लूकोज चढ़वाने का सुझाव दिया था और बउआ ने कहा कि ग्लूकोज चढ़वाने की देखभाल करने मे वह असमर्थ हैं कारण कि वह खुद ही अस्वस्थ थीं। मैंने राजा-की -मंडी क्वार्टर जाकर शालिनी की माँ से  कहा कि वह ग्लूकोज चढ़वाने भर तक देख लें तो वहाँ ले आयें। शालिनी की माता ने स्पष्ट इंकार कर दिया कि वह कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेंगी। मै मौके-बे-मौके उन लोगों की मदद करता रहा था उसके बावजूद शालिनी की माँ (जिनके हाथ का खाना खा कर ही वह बीमार हुई थीं)का इंकार चुभने वाली बात थी। मौके की नजाकत को भाँपते हुये संगीता ने कहा कि वह अपनी नन्द की देख-भाल कर लेंगी मै वहाँ पहुंचा दू। यह सोच कर कि वैसे भी भार तो उनही पर पड़ना था और वह खुद कह रही हैं मैंने शालिनी को शाम को वहाँ यशवंत के साथ पहुंचा दिया था और अगले दिन सुबह नौ बजे डॉ रामनाथ को लेकर वहाँ ग्लूकोज के साथ गया था। रात ही रात मे शालिनी की माँ, ताऊ और भाई मे कोई साठ-गांठ हुई होगी जिसका भान संगीता तक को न था। शालिनी की माँ और ताऊ (शरद तो ड्यूटी पर थे)ने अपने घर शालिनी को ग्लूकोज चढ़वाने से मना कर दिया। उन जेठ-भौजाई का कथन था हमने शादी कर दी अब हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है अपने घर ले जाकर ग्लूकोज चढ़वाओ । संगीता ने बीच मे हस्तक्षेप करते हुये कहा कि उन्होने ज़िम्मेदारी ली थी और वह उसे पूरा करेंगी। उनकी सास ने घुड़कते हुये कहा तुमने अपने पति से पूछे बगैर ज़िम्मेदारी ली थी जिसे तुम पूरा नहीं कर सकतीं। मैंने जब यह कहा कि तब आप लोग हमसे मदद क्यों लेते थे तो शालिनी की माँ और ताऊ समवेत स्वर मे बोले कि तुम (अर्थात मै विजय ) मूर्ख था जो उनकी मदद करता था। शालिनी ने अपने कानों से और अपनी आँखों के सामने जब अपनी माँ और ताऊ के प्रेम-वचन सुन लिए तो अवाक रह गई और उनको भी ठेस लगी कि वह नाहक ही मुझे अपने पीहरियों की मदद के लिए भेजती थीं।

शालिनी और यशवन्त को रिक्शा पर बैठा कर मै मोपेड़ से डॉ रामनाथ को लेकर चल रहा था ,मोपेड़ स्टार्ट हो चुकी थी शालिनी की माँ ने संगीता के कान मे कुछ फुसफुसाया और संगीता ने डॉ रामनाथ को आवाज दी -डॉ साहब। पल भर बात सुनने को कह कर डॉ रामनाथ उन लोगों से बात करने चले गए मै इंतजार करता रहा ,पेट्रोल फूंकता रहा रिक्शा वाला आगे बढ़ गया था अतः मैंने पीछे लौट कर डॉ रामनाथ को जल्दी चलने को कहा परंतु रिक्शा दीख नही रहा था। हरी पर्वत की तरफ बढ्ने के बावजूद हम पीछे लौट कर सेंट जोन्स कालेज वाले रूट पर आए तब बहुत आगे रिक्शा जाता दिखाई दिया। शालिनी के पास रुपए भी न थे ,यशवन्त उन्हे सम्हाल भी न सकता था। घर आकर ग्लूकोज चढ़वाया और मैंने ड्यूटी की छुट्टी कर दी।

डॉ रामनाथ ने संगीता का नाम लेकर कहा कि वह कह रही थीं कि शालिनी को टी बी हो गई है। मैंने उनसे पूछा आपकी मेडिकल राय क्या है? उनका जवाब था उन लोगों की संतुष्टि के लिए चेक करा लो। मैंने कामरेड डॉ विनय आहूजा (जो मुझे कम्युनिस्ट आंदोलन मे शामिल करने वाले कामरेड हरीश आहूजा,एडवोकेट के पुत्र थे),टी बी स्पेशलिस्ट को दिखाया। कंपाउंडर को फीस के रु 30/- मै जमा करके अपने नंबर का इंजार कर रहा था। डॉ विनय की निगाह मुझ पर पड़ गई और उन्होने तुरंत शालिनी को बुलवा लिया और मुझ से पूछा कि कंपाउंडर को फीस तो नही दी। मै चुप रहा तो कंपाउंडर को बुला कर पूछा। पहले मुझे रु 30/- वापिस दिलाये फिर हाल पूछ कर चेक किया और एक एक्सरे तथा कुछ चेक अप कराने को कहा।

इन रिपोर्टों तथा एक्सरे मे भी टी बी की पुष्टि नहीं हुई। डॉ विनय ने कुछ रिमार्क अपने प्रिस्क्रिप्शन पर दिया था जिस कारण मुझ से एक्सरे और लेबॉरेटरी वालों ने निर्धारित से कम रकम ली। डॉ वाला कमीशन डॉ विनय को न देकर मुझसे रुपए कम लिए गए। डॉ विनय जब 1988 मे सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज,आगरा मे हाउस जाब कर रहे थे और चिकित्सक नेता थे तब बउआ के इलाज मे भी मदद करते रहे थे। आर्थोपेडिक विभाग द्वारा प्रेसक्रिब्ड दवाएं देख कर अपने पास से सेंपिल की बाबूजी को दे जाते थे। 1992 मे जब ऋषिराज की शादी मे जाने से पहले अपने होटल के केस के सिलसिले मे कामरेड हरीश आहूजा साहब से मिलने उनके घर गए थे तो उनके बड़े पुत्र कामरेड विजय आहूजा,एडवोकेट ने डॉ विनय की पत्नी जो आई स्पेशलिस्ट हैं से यशवन्त को दिखवाकर दवाएं लिखवा दी थीं। आज तो डॉ विनय का ट्रांस यमुना कालोनी मे एक बड़ा टी बी नरसिंग  होम है तब रामबाग चौराहे पर उनका क्लीनिक था।

डॉ विनय ने थायराड का चेक अप कराने को कहा था जब टी बी न होने की पुष्टि हो चुकी थी। परंतु शालिनी उसके लिए तैयार न हुई। लंबी बीमारी मे भी शालिनी को देखने न  तो शरद मोहन न ही कोई दूसरा  उनके परिवार का  सदस्य देखने आया किन्तु उसी दौरान शरद मोहन अपनी मौसेरी बहन चंचला उर्फ मिक्की  (जिन्हे गोद मे उठा कर टूंडला मे नाचते थे )  को लेकर स्वामी बाग स्थित उनकी भाभी के भाई के घर गए थे और खाना खा कर आए थे । 

 

आगरा/1992-93/भाग-8

आना-जाना ,नौ घंटे जाब करना और फिर पार्टी आफिस मे जिला मंत्री जी को सहयोग करना इन सब मे काफी समय लगता था एवं शालिनी को भी साइकिल पर जाना-आना पड़ता था,अतः उनके अपने आठ हजार रुपए से एक मोपेड़ लेने का ज़ोर था। ये रुपए उनके बचपन मे उनके सबसे बड़े निसंतान ताउजी द्वारा पोस्ट आफिस मे जमा कराये एक हजार रुपए से बढ़ कर इतने हुये थे। रक्षा बंधन 02 अगस्त को मोपेड़ लेना तय हुआ। इत्तिफ़ाक से इसी दिन डॉ शोभा फरीदाबाद मे अजय को राखी बांध कर वहाँ से आगरा पहुंची। वह पी एच डी के बाद B Ed की परीक्षा देने फरीदाबाद गई थीं। अजय रोजाना परीक्षा केंद्र पर पहुंचाने -बुलाने अपने स्कूटर से जाते थे। उस सुबह 07 बजे ट्रेन पर बैठा गए थे जो राजा-की-मंडी पर 12 बजे पहुंची। मै,शालिनी और यशवन्त उन्हे स्टेशन पर रिसीव करने पहुंचे थे। कमलानगर से साइकिल पर गए थे ,क्वार्टर पर उन्होने शरद मोहन को राखी बांध दी थी लेकिन उनके घर उस रोज रुके नहीं। रेल से उतरते मे डॉ शोभा के हाथ मे टिकट था परंतु पता नहीं कैसे उसे प्लेटफार्म पर गिरा दिया और उसी पर पैर भी रख दिया और उसे खोजने लगीं। सारा पर्स ,अटेची सब चेक कर लिया टिकट पर नजर न पड़ी। शालिनी के यह कहने पर कि वह शरद का नाम लेकर बाहर निकलवा देंगी डॉ शोभा तमक गई कि वह पेनल्टी भी पे कर देंगी लेकिन एहसान न लेंगी। काफी कहने पर भी जगह से टस से मस न हो रही थीं। मैंने कहा कि उस जगह से हटो तो देखें कहीं वहीं न हो तब बड़ी मुश्किल से पैर हटाया जिसके नीचे टिकट दबा पड़ा था। तब कहीं जाकर हम लोग स्टेशन से बाहर निकले और घर पहुंचे। बउआ-बाबूजी इंतजार कर रहे थे।

अजय के सहपाठी के एक भाई जिसे होटल मुगल मे मैंने जाब दिलाया था जो अब लेम्को मे आडीटर था और कृष्णा आटोमोबाइल्स मे पार्ट टाइम भी करता था शाम को अपने स्कूटर से मुझे एजेंसी पर ले गया और मैंने एक हीरो मेजेस्टिक लगभग रु 9500/- मे खरीद ली । उसी पर बैठ कर घर पहुंचा तो डॉ शोभा का चेहरा फक पीला पड़ गया। हालांकि कमलेश बाबू के पास भी पहले से ही स्कूटर था और अजय के पास भी मैंने तो मोपेड़ ही ली थी और कभी भी छोटे बहन- भाई के पास होने पर मुझे बुरा नहीं लगा परंतु डॉ शोभा ने बउआ के कहने पर लाई गई बर्फी को छूआ  तक नहीं ,यह कह कर टाल दिया कि कल लेंगे। अगले दिन जब कहा अपनी मिठाई तो खा लो तो घुर्रा पड़ीं कि हम चलते वक्त मीठा नहीं खा सकते। यह मेरे द्वारा  गंभीर गलती रही कि मैने डॉ शोभा को छोटी बहन के नाते कभी गलत माना ही नहीं और ये लोग हमे सपरिवार छति पहुंचाते ही रहे।

अब मोपेड़ आ जाने के बाद शालिनी यशवन्त के स्कूल जाने के बाद बउआ-बाबूजी का खाना रख कर राजा-की -मंडी क्वार्टर पर यदा-कदा मिलने चली जाती थीं और घंटे-डेढ़ घंटे बैठ कर वापिस आ जाती थी उसके बाद मै हींग-कि-मंडी जाब करने चला जाता था। कभी-कभी यशवन्त की छुट्टी होने पर सुबह वहाँ उसके साथ रुक जाती थी और मै जाब के बाद पार्टी कार्यालय होते हुये रात को उन लोगों को अपने साथ लेता आता था। एक आध बार ऐसा भी हुआ कि जब स्कूल दिवस मे थोड़ी देर को मिलने गई तो उसी बीच उनकी छोटी भतीजी जिसे रोजाना रिक्शा से या पैदल लेने संगीता जाती थीं को मोपेड़ पर ले जाने को शालिनी ने कहा। जाते समय तो वन सीटर पर दिक्कत नहीं थी परंतु लौटते समय बस्ते के साथ उनकी भतीजी के बैठने से जगह तंग हो जाती थी और संगीता कस कर बैठती थीं जिससे चलाने मे मुझे दिक्कत होती थी। हालांकि यशवन्त और शालिनी के बैठने पर दिक्कत नहीं होती थी वे लोग ठीक से बैठते थे। एक बार जब शालिनी की माता उनके भाई के साथ मुज्जफर नगर गई हुई थीं सुबह हाल पता करते हुये जाने को शालिनी ने कहा था और मै ड्यूटी के लिए चलने लगा तो संगीता बोली कि अभी तो बाजार खुलने मे समय है आप आधा घंटा और रुक जाएँ तो नहा कर स्कूल तक आपके साथ चले चलती हूँ। वक्त तो वाकई था परंतु मै रुकना नहीं चाह रहा था फिर भी रुक गया। संगीता बाल्टी मे पानी लेकर कमरे के सामने बारामदे मे नहाने लगी जबकि आँगन के बाद सामने ही गुसलखाना था।तसल्ली से नहाना,बदन पोंछना,कपड़े बदलना और फिर बाल काढ़ने के बाद संगीता मोपेड़ से स्कूल गई। उनकी बेटी गेट पर ही अंदर खड़ी थी। संगीता के कहे मुताबिक मुझे छोड़ कर ड्यूटी चले जाना था किन्तु वह बच्ची बोली कि,फूफाजी घर तक छोड़ दीजिये। लिहाजा फिर उन दोनों को बैठा कर क्वार्टर पर छोडना ही पड़ा।

 

आगरा/1992-93/भाग-7

बढ़ती मंहगाई का मुक़ाबला करने का एक ही तरीका था कि और अतिरिक्त पार्ट टाईम जाब पकड़ा जाये और यही करना पड़ा। स्टेट बैंक के एक कर्मचारी से कुछ प्रगाढ़ता हो गई थी वह मुझसे ज्योतिषीय सलाह ले लेते थे। मैंने उनसे अपने परिचय के आधार पर किसी दुकान पर पार्ट टाईम दिलाने को कहा था। उन्होने ‘ईस्टर्न शूज’के मोहन लाल भागवानी जी से कहा जिनकी दुकान शंकर लाल जी की ‘मेक्सवेल ट्रेडर्स’ के सामने ही थी। उन्होने डेढ घंटे सुबह और डेढ़ घंटे शाम को कुल तीन घंटों के वास्ते रु 1200/- मजदूरी प्रदान की। अब कुल नौ घंटों का जाब था और राजा-कि-मंडी भाकपा कार्यालय भी जाता ही था। नए जिला मंत्री को पूरा सहयोग देना मेरे लिए जरूरी था। इन परिस्थितियों मे अब सिटी स्टेशन जाकर वहाँ का हाल-चाल पता करने जाना  मेरे लिए संभव न था।  अतः कभी कभार रविवार को शालिनी यशवन्त को लेकर मेरे साथ साईकिल पर वहाँ जाती थीं। ऐसे ही एक बार जाने पर पता चला कि शरद मोहन राजा-कि-मंडी पर ही क्वार्टर एलाट कराना चाहते हैं। वहाँ क्वार्टर मिलने पर बदलने मे मै उन लोगों की मदद करूँ ऐसी ख़्वाहिश जाहिर की गई।

हालांकि कभी भी उन लोगों से हमे किसी प्रकार की कोई मदद नहीं प्राप्त हुई थी और आगे भी किसी प्रकार की उम्मीद करना व्यर्थ था फिर भी निस्स्वार्थ मदद करने का हम लोगों का स्वभाव होने के कारण मदद कर देता था जिसे शायद और लोगों की तरह वे लोग भी हमारी कमजोरी के रूप मे ही लेते थे। अंदाज से जो तारीख बताई गई थी उस दिन शालिनी और यशवन्त को सिटी स्टेशन छोड़ कर मै दुकानों पर गया था और शाम के तीनों पार्ट टाईम छोड़ कर जल्दी लौट रहा था कि घटिया आजम खा चौराहे पर शालिनी अपनी भाभी संगीता और यशवन्त के साथ रिक्शा पर सिटी से राजा-कि-मंडी जाती हुई मिली। उन लोगों ने बताया कि मै राजा-कि-मंडी के क्वार्टर पर ही चलूँ। वहाँ शरद के बनवारी लाल ताऊ जी ही अकेले थे। शालिनी और यशवन्त तथा मै भी वहाँ रुक गए एवं संगीता फिर सिटी के क्वार्टर पर लौट गई। बाद मे ट्रक पर सामान के साथ संगीता,उनकी बेटियाँ और सास पोर्टरों के साथ पहुंचे। हमेशा की तरह शरद मोहन तो ड्यूटी मे मशगूल थे,ऊपरी धंधे का जो सवाल था,छुट्टी कैसे लेते?मौसम गर्मी का था फिर भी सब की थकान उतारने हेतु चाय और रस्क एक दुकान से मैंने ला दिये जिसका भुगतान मुझे शालिनी की माताजी दे रही थीं परंतु मैंने इस बार कोई भुगतान नहीं लिया। चंडीगढ़ मे पी जी आई की केंटीन के बाद यह दूसरा मौका था जब मैंने अपनी तरफ से खाना या चाय का भुगतान किया था वर्ना मुझे तुरंत पेमेंट दे दिया जाता था।

चूंकि मै रोजाना सुंदर होटल , राजा-कि-मंडी स्थित भाकपा कार्यालय  जाता था अतः क्वार्टर नजदीक होने के कारण मुझसे यह अनुरोध किया गया कि लौटते मे कभी-कभी हाल-चाल लेता जाऊँ। वस्तुतः उद्देश्य यह था कि जब कभी शरद मोहन अपनी माँ को लेकर मुज्जफर नगर जाएँ तो शालिनी एक -दो राउंड वहाँ के चक्कर लगा जाएँ ऐसी सूचना दी जा सके। इसी क्रम मे गर्मियों की छुट्टियों के दौरान वे लोग गए तब रविवार को शालिनी को लेकर वहाँ गए। यह क्वार्टर काफी बड़ा था और तीन कमरे थे। खाने के बाद दोपहर मे टी वी देख कर जब सब बच्चे एक कमरे मे सो गए तब दूसरे कमरे मे बाकी लोग बाते करते रहे।

 इनही बातों के बीच ऋषि राज की शादी की बात उठने पर (ऋषि की सुसराल के एक चचिया सुसर शरद के फूफाजी थे) शालिनी ने संगीता से  कहा तब आपको जो सलवार-सूट लखनऊ  से लाकर दिया था वह पहन कर इनको अभी तक दिखाया ही नहीं है,आज पहन कर दिखा दीजिये। शायद पहले से तय रहा हो या आदत के मुताबिक संगीता तुरंत अंदर के तीसरे कमरे मे जाकर वह झीना गुलाबी चिक़ेंन का सलवार-कुर्ता पहन कर आ गई। शालिनी के टोकने पर संगीता का जवाब था कि आपने इसके साथ दुपट्टा दिया ही नहीं था इसलिए नहीं डाला और शायद चूंकि बटन भी नहीं दिये थे इसी लिए नहीं लगे थे । शालिनी ने भी बिना चूके कह दिया कि ब्रा  भी तो नहीं दिया था तो वह क्यों पहना। पल भर भी गवाए बिना संगीता ने कुर्ता उतार कर ब्रा हटा दिया और पाँच-सात मिनट बाद  उसके बगैर ही पहन लिया। शाम की चाय के बाद शालिनी के कहने पर संगीता ने फिर सलवार-सूट के स्थान पर अपने कपड़े धारण करने हेतु वहीं लेकर आ गई जहां हम लोग बैठे थे और बड़े आराम से बिना किसी झिझक के बदलाव किया । नन्द -भौजाई का व्यवहार था तो चौंकाने वाला ही परंतु उस ओर गहराई से कभी न सोचा और जैसा शालिनी बताती रहीं कि संगीता को प्रदर्शन मे आनंद आता है और मौका कभी-कभी ही मिलता है इसलिए उनको कह देते हैं -शालिनी से भी गहराई से तर्क-वितर्क नहीं किया। 

 

आगरा/1990-91(भाग-10)

काफी दिनों बाद एक बार फिर शालिनी वहाँ सुबह गई क्योंकि फिर स्कूल खुलने वाले थे। लौटते मे मुझे बुलाने जाना ही था,सुबह सीधे ड्यूटी चला गया था। चाय के बाद आँगन मे बैठना हुआ क्योंकि दिन बड़े थे उजाला था अतः लौटने मे थोड़ी देर होने पर भी दिक्कत न थी। शालिनी की माता थी परंतु वह बच्चों के साथ टी वी ही देखती थी। संगीता ने बताया कि उन्हे नेटरम मूर से तीन दिनों मे ही लाभ हो गया था परंतु मेरे बताने के मुताबिक 10 दिनो तक खा और लगा ली थी। वह बची हुई दवा मुझे देना चाहती थी। मैंने कहा कि सम्हाल कर रखे किसी को भी किसी कीड़े-मकोड़े के काटने पर देने के साथ-साथ यह लू -sunstrok की भी अचूक दवा है। खैर फिर नेटरम मुर्यार्टिकम अपने पास ही रखी,दवा की कीमत तो तुरंत भुगतान कर चुकी थी। चूंकि संगीता ने ही फिर पुरानी बात उठाई थी तो शालिनी ने भी बिना चूके कह दिया कि इन्हें दवा आपसे  लगवाने मे आनंद आया और आपने फिर दोबारा आकर लगाई ही नहीं। संगीता क्यों चूकती फटाफट कह दिया आप भेजती तभी तो आते। काफी पुरानी बात जो ध्यान से भी हट चुकी थी संगीता ने याद दिलाते हुये कहा कि जब कविता ने ऊपर से ही इंनका हाथ मेरे सीने पर फिरवा दिया था तो आपने कविता से एतराज किया था अब खुद आपने ही फिरवा दिया फिर रोक दिया होगा। शालिनी ने कहा न रोका न भेजा ,आप चाहती थी तो भेजने को कहा होता।

कविता ,संगीता की बड़ी बहन थी और अपने पति राकेश के साथ सिटी के क्वार्टर पर आई थी तब हम लोग वहाँ पहले से मौजूद थे। राकेश को कोई काम होगा वह अपना हाथ मुझे दिखा कर चाय पीने के बाद चले गए थे। बाद मे कविता ने भी अपना हाथ दिखाया था और संगीता को भी हाथ दिखवाने को कहा था। आम तौर पर मै किसी का भी हाथ दूर से ही देखता हूँ। परंतु कविता ने अपने हाथ की कुछ लकीरों के बारे मे पूछते हुये मेरा हाथ जबर्दस्ती अपने हाथ पर रख कर बताया था और इस क्रम मे खुद ही मेरे हाथ को इस प्रकार घुमाया कि उनके सीने को छू गया तब संगीता ठठा कर हंस दी थी । इस हंसी के बदले मे ही कविता ने मेरा हाथ तुरंत संगीता के सीने पर फिरा दिया था ,उसी का जिक्र अब संगीता ने किया था।

कविता के दो पुत्रियाँ थी और वह बेटा चाहती थी ,मेरे यह कहने पर कि योग है तो बोली थी कि फिर प्रयास करेंगे और इसी बात की खुशी मे मेरा हाथ अपने सीने तक ले गई थी और संगीता के हंसने पर उसके सीने पर फिरा दिया था। शालिनी ने तब संगीता पर हाथ फिराने का कविता से विरोध किया था। बाद मे कविता के पुत्र भी उत्पन्न हुआ। कविता के एक जेठ विश्वपति माथुर आगरा मे ही ट्रांस यमुना कालोनी मे रहते थे। उनसे भी परिचय इनही लोगों के माध्यम से हुआ था। वह हाईडिल मे जूनियर इंजीनियर थे और उनका स्वभाव बेहद अच्छा था। वह हर एक की मदद करने को हमेशा तत्पर रहते थे। उनसे हमारा मेल हो गया था और हम उनके घर भी चले जाते थे। एक बार कविता उनके घर आई हुई थी ,राकेश नहीं आए थे। संगीता ने मुझे उनके घर जाकर कविता को संगीता के सिटी के क्वार्टर पर लाने को शालिनी से कहा था। वी पी माथुर साहब के घर जाने मे एतराज था ही नहीं। किसी कारण से कविता उस दिन नहीं आई लेकिन उनके सामने ही विश्वपति जी ने उनकी शादी का एक किस्सा सुनाया। उन्होने बताया था कि,राकेश की शादी मे उन्होने अपने एक-दो साथियों के साथ मिल कर मजाक करने की योजना बनाई थी और एन फेरों से पहले राकेश से कहला दिया था कि कलर्ड टी वी मिलने पर ही फेरे हो सकेंगे। वे लोग एकदम परेशान हो गए ,और हैरान भी क्योंकि माथुर कायस्थों मे दहेज का रिवाज-चलन है ही नहीं। कविता के घर के लोग समझा कर हार गए तो कविता के भाई बोले बारात लौटा दो। तब संगीता मैदान मे आई और विश्वपति जी तथा अपने होने वाले जीजा राकेश से सीधे बात करने पहुँच गई कि उनकी मांग संभव नहीं भाई साहब नाराज हैं और बारात लौटाने को कह रहे हैं। विश्वपति जी ने संगीता से कहा कि तुम आ गई हो तो बिना टी वी के शादी करवा देंगे वरना बारात लौटा ही ले जाते। उन्होने संगीता से डांस करने की शर्त रखी । संगीता ने फेरे पड़ने के बाद डांस दिखाना कबूल किया और सच मे वादा पूरा भी किया। विश्वपतिजी ने कहा कि संगीता ने कविता की शादी करा दी। कविता ने हंस कर उनकी बात का समर्थन कर दिया।

शालिनी को यह बात घर आकर बताई थी जो उन्हे याद भी थी। अपनी आदत पुरानी बातो  को याद कर समय पर दोहराने की न होने पर भी पता नहीं कैसे शालिनी ने कहा कि विश्वपति भाई साहब ने कविता की शादी की जो कहानी सुनाई थी वह भी जरा इन्हे सुना दीजिये। मैंने कहा खुद ही बता दो तो बोली आपने सीधे उनसे सुना है ज्यादा ठीक से बता सकते हैं इसलिए इसे आप ही बताएं। संगीता भी मुस्कराते हुये बोली हाँ क्या कहानी थी आप ही बता दीजिये। मैंने पूरा विवरण सुना दिया तो हँसते-हँसते ,लॉट-पोट होते हुये संगीता ने कहा क्या बुरा काम किया ,मजाक ही सही मम्मी और भाई साहब तो उस वक्त बहौत परेशान थे ,चुटकियों मे हल तो निकाल लिया। शालिनी ने पहले कभी टूंडला मे होली की रंग-पाशी पर संगीता द्वारा श्वसुर और जेठ के समक्ष किए गए ‘मै तो नाचूँगी,मै तो नाचूँगी’ गाना गाते हुये डांस का जिक्र भी सुना दिया और कहा आपको डांस वगैरह पसंद नहीं है ,नहीं तो कभी देखते। संगीता बोली पसंद न हो तो भी मै डांस दिखा दूँगी,जब कभी मम्मी जी अगली बार कहीं जाएँ तो आप (शालिनी से) इशारा कर दीजिएगा।

मुझे उस समय यह सब बड़ा अजीब लगा और बेहद खोज-बीन के बाद भी इस सबका रहस्य न समझ सका। तब से अब तक के तमाम घटनाक्रमों  को मई 2011 मे कमलेश बाबू द्वारा कुक्कू के श्वसुर को अपना कज़िन बताने के बाद तुलना करने पर सारा का सारा रहस्य एक पल मे उजागर हो गया और उनके  तथा उनकी  छोटी बेटी के द्वारा  फेसबुक मे फेक आई डी बना कर टटोल-खकोल करने से उसकी पुष्टि भी हो गई।  लेकिन  उसका जिक्र अपने समय पर ही।

1991 की गर्मियों मे ही बड़े ताउजी के निधन का ‘टेलीग्राम’ अचानक आया ,वह पूर्ण स्वस्थ थे। एकाएक बाबू जी का जाना संभव नहीं था। बिना रिज़र्वेशन के मै ‘गंगा-जमुना’ एक्स्प्रेस से गया , टिकट तो मैंने लिया ही था परंतु शरद मोहन ने जेनरल कोच मे  आसानी से  बैठवा दिया था । इत्तिफ़ाक से उस दिन फैजाबाद होकर जाने का टर्न था तो सीधे ‘दरियाबाद’ स्टेशन पर ही उतरा था। ताईजी समेत सभी ने परिचय देने पर पहचाना परंतु गाँव के एक सज्जन ने देखते ही उन लोगों से पूछा कि क्या यह ‘दुलारे भैया’ का बेटा है? मैंने पूछा बिना देखे आपने कैसे पहचाना तो उनका उत्तर था तुम्हारी शक्ल उनसे मिलती है न पहचानने का क्या सवाल?

ताउजी रात मे बिना लालटेन लिए उठ गए थे और अंदाज मे गलती होने से बाथरूम की तरफ जाने की बजाए कुएं मे गिर पड़े थे ,ब्रेन हेमरेज से तत्काल उनकी मौत हो गई थी। रात मे ही उन्हें कुएं से निकाल लिया गया था। मै तो औपचारिक रूप से शोक प्रगट करने गया था,दकियानूस वाद  मानता न था अतः तेरहवी  तक रुकने का प्रश्न ही नहीं था। दो दिन के लिए दुकानों से गैर-हाजिर था। रायपुर से सुरेश भाई साहब रोजाना वहाँ नहाने आते थे इन लोगों ने मुझे भी उन्हीं के साथ बाहर के कुएं पर नहाने भेजा और नहाते ही भुने चने खाने को दिये। अगले दिन भी यही प्रक्रिया रही।

मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ कि इस शोक के माहौल मे भी ताईजी ने 1988 मे बाबूजी के नाम भेजे इस पत्र का जिक्र किया (मुझे यह पत्र बाबूजी के कागजात से उनके निधन के बाद मिला है) जिसमे उन्होने बाबूजी से वहाँ आकर ‘चकबंदी’ के माध्यम से अपना खेती का हिस्सा लेने की बात कही थी। मैंने तो यह कह कर पल्ला झाड लिया कि ये सब आप बड़े लोगों के बीच की बातें हैं। मैं आप का संदेश बाबूजी को दे दूंगा।

अगले दिन ताईजी ने लखनऊ मे माधुरी जीजी से मिलते जाने को कहा हालांकि उनके एक बेटा और एक बेटी दरियाबाद मेरे पहुँचने के बाद ही आ गए थे। नरेश मेरे साथ लखनऊ आए ,वैसे तब वह लखनऊ ही रहते थे। रात को अवध एक्स्प्रेस से मै आगरा रवाना हो गया।

जिस प्रकार चंद्र शेखर जी ने भाजपा और कांग्रेस से मिल कर वी पी सिंह की सरकार गिरवा दी थी उसी प्रकार उनकी सरकार को राजीव गांधी के वक्तव्य-“हरियाणा पुलिस के दो कांस्टेबल मेरी जासूसी करते हैं” ने गिरवा दिया था और मध्यावधि चुनाव चल रहे थे कि इस प्रचार के दौरान ही राजीव गांधी की निर्मम हत्या भी लिट्टे विद्रोहियों ने कर दी जिन्हें खुद राजीव गांधी और उनकी माँ इंदिरा गांधी ने प्रश्रय दिया था। 

 
 
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