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विद्रोही स्व-स्वर में डाक्टर्स डे पर कु छ चिकित्सकों का ज़िक्र —— विजय राजबली माथुर

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यों तो समय समय पर अनेक चिकित्सक संपर्क में आते ही रहते हैं किन्तु जिनसे कुछ व्यक्तिगत आधार पर निजत्व रहा उनमें से ही जिनकी कुछ खास बातें याद हैं उनका ही उल्लेख हो सकेगा।
डॉ रामनाथ :
सबसे पहले डॉ रामनाथ का ज़िक्र करना चाहूँगा जो होटल मुगल,आगरा में हमारे एक साथी के सहपाठी थे। उनसे मित्रवत ही मुलाक़ात हुई थी। माता जी के इलाज के लिए उनसे सलाह व दवा भी लेने लगे थे। :उनके परामर्श और सहयोग पर ही मैंने आयुर्वेद रत्न किया तथा वैद्य के रूप में RMP रेजिस्ट्रेशन भी करवाया। हालांकि वह तो इसी रेजिस्ट्रेशन पर एलोपैथी की ही ज़्यादा प्रेक्टिस करते थे। एलोपैथी व आयुर्वेदिक औषद्धियों दोनों का ही अध्यन कोर्स में किया भी था। किन्तु मेरी दिलचस्पी व जानकारी होम्योपैथी औषद्धियों की अधिक थी/है। अतः मैंने प्रेक्टिस तो नहीं की किन्तु आयुर्वेदिक व होम्योपैथी उपचार परिचितों को बताता रहा।
सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज,आगरा के एक पूर्व चिकित्सक जिनका नर्सिंग होम हमारी कालोनी में ही था चाहते थे कि, मैं घर पर क्लीनिक खोल लूँ और क्रटिकल केस उनको रेफर करता रहूँ औरों की भांति मुझे कमीशन मिलता रहेगा। परंतु इस प्रकार धनार्जन मैं कर ही नहीं सकता था अतः उनके प्रस्ताव पर अमल नहीं किया।
इन्ही रामनाथ जी के पिताजी (कालीचरण वैद्य जी ) से एक बार माँ की दवा लेकर उनको पैसे दे आया था। अगले दिन फिर जाने पर पहले तो उन्होने वे पैसे लौटाए और फिर कहा कि तुम मेरे बेटे के मित्र हो तुमने हिम्मत कैसे की पैसे देने की और हिदायत दी कि आगे से दवा ले जाओ पैसे न दो। ज़्यादा पुरानी बात नहीं है सिर्फ 36 वर्ष पूर्व 1980 की बात है यह। लेकिन अब तो अपनी तीन-तीन जन्म पत्रियों का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त करने वाले डॉ ज़रूरत पर सलाह मांगने पर चुप्पी साध लेते है। 36 वर्षों में चरित्र इतने बदल गए हैं।
डॉ डी मिश्रा :
इन डॉ रामनाथ जी के क्लीनिक के सामने ही डॉ डी मिश्रा साहब ने अपना होम्योपैथी का क्लीनिक खोला था और उनसे परिचय रामनाथ जी की मार्फत ही हुआ था। डॉ मिश्रा सिर्फ डॉ रामनाथ का मित्र होने के नाते मुझे जानते थे उनको मेरी होम्योपैथी में दिलचस्पी और आयुर्वेद रत्न होने की जानकारी नहीं थी। एक बार उनके कंपाउंडर जो डॉ रामनाथ के ही सहपाठी भी थे अपने पिता जी के निधन के कारण बंगलौर गए तब उनके स्थान पर उनके आने तक डॉ मिश्रा ने मेरा सहयोग लिया था। इस दौरान उनकी कलाकारियों से परिचित होने के कई अवसर प्राप्त हुये। वैसे डॉ मिश्रा पाईलट आफ़ीसर थे और होटल क्लार्क शीराज, आगरा के पूर्व जेनरल मेनेजर के पुत्र थे। लंदन की उड़ानों के दौरान वहाँ की किसी होम्योपैथिक संस्था से रेजिस्ट्रेशन करवाकर वह होम्योपैथ चिकित्सक बन गए थे। अपने पिताजी के लकवाग्रस्त होने पर इंडियन एयर लाईन्स की सेवा जल्दी ही छोड़ दी थी । प्रारम्भ में वह सुबह हाथरस में और शाम को आगरा में प्रेक्टिस करते थे। फिर हाथरस जाना बंद कर दिया था।
एक दिन किसी बच्चे के पेट में तीव्र दर्द होने के कारण उन्होने रेक्टीफ़ाईड स्प्रिट में मिला कर एलोपैथी की पिप्टाल के ड्राप्स देकर शीघ्र राहत प्रदान की थी। बाद में मेरे पूछने पर बोले बिजनेस में थोड़ा-बहुत इम मोरेल होना पड़ता है। अर्थात चिकित्सक का पेशा वह बतौर बिजनेस कर रहे थे।
एक दिन मेहरा आफ़सेट प्रेस के श्याम मेहरा साहब जो उनके क्लब के साथी थे अपनी श्रीमती जी के साथ उन की दवा लेने आए हुये थे अपनी कुछ समस्या भी बताने लगे। डॉ मिश्रा ने मुझसे कहा माथुर साहब श्याम बाबू को BG की एक डोज़ दे दो। मैंने सादी गोलियों की पुड़िया दे दी। थोड़ी देर में उन्होने श्याम बाबू से पूछा कुछ राहत है? वह बोले हाँ थोड़ा ठीक है, डॉ मिश्रा ने उनको थोड़ी देर और रुकने को कहा उसके बाद ही कार ड्राइव करना ठीक रहेगा। जब वह चले गए तब मैंने डॉ मिश्रा से पूछा कि, BG(ब्लैंक ग्लोबल्स ) अर्थात सादी गोलियों से मेहरा साहब को फायदा कैसे हो गया? तब डॉ मिश्रा का जवाब था कि, उनको हुआ ही क्या था? वह तो अपनी मिसेज को यह जतलाना चाहते थे कि, वह भी बीमार हैं जिससे वह अपनी बीमारी का गम भूल जाएँ। तो यह था डॉ मिश्रा का साइक्लोजिकल ट्रीटमेंट।
डॉ खेमचंद खत्री :
डॉ के सी खत्री, होम्योपैथ से व्यक्तिगत परिचय उन साथी की मार्फत ही हुआ था जिनके मार्फत डॉ रामनाथ से परिचय हुआ था। वैसे डॉ खत्री को मैं इसलिए जानता था कि, वह पहले डॉ पारीक के स्टोर्स में कार्यरत थे और मैं वहाँ से होम्योपैथी दवाएं खरीदता था। फिर डॉ खत्री के स्टोर्स से लेने लगा। हालांकि डॉ खत्री खुद दयालबाग के राधास्वामी सत्संग के सेक्रेटरी थे और उनको मेरे कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध होने की जानकारी थी किन्तु व्यक्तिगत स्तर पर मधुर संबंध रहे। जब उनके दामाद साहब का स्टोर दयालबाग में खुल गया तब नजदीक होने के कारण उनसे दवाएं खरीदने लगे। वहाँ डॉ खत्री आते रहते थे और उनसे मुलाक़ात होती रहती थी। उनके दामाद डॉ डी डी पाराशर तो मुझे गुरु जी कहते थे और काफी सम्मान देते थे। आगरा छोडने तक इन दोनों से संपर्क बना रहा था।

 

विद्रोही स्व-स्वर में बउआ को 22 वीं पुण्य तिथि पर श्रद्धांजली ——– विजय राजबली माथुर

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(स्व.कृष्णा माथुर : जन्म- 20 अप्रैल 1924 मृत्यु – 25 जून 1995 )

जिस समय रात्रि पौने आठ बजे बउआ (माँ ) ने अंतिम सांस ली मैं और यशवंत ही पारिवारिक सदस्य वहाँ थे। इत्तिफ़ाक से कंपाउंडर महोदय ग्लूकोज चढ़ाने आए हुये थे। 16 जून 1994 को शालिनी व 13 जून 1995 को बाबूजी के निधन के बाद आगरा में मैं और यशवंत ही थे। अजय अपने परिवार के साथ फरीदाबाद में कार्यरत होने के कारण थे। दो दिन पूर्व 23 जून को ही आगरा से गए थे ड्यूटी ज्वाइन करने। शालिनी के निधन के बाद शोभा (बहन ) ने यशवंत को माँ से अपने साथ ले जाने को मांगा था, किन्तु अजय की श्रीमती जी ने ऐसा न करने की उनको सलाह दी थी। यदि माँ ने मेरी सलाह के बगैर अपनी बेटी को अपना पौत्र सौंप दिया होता तो उस समय मैं ही अकेला वहाँ होता।
यशवंत की निष्क्रिय फेसबुक आई डी पर यह सूचना थी जिसे उसने 18 जून 2016 को अचानक देखा —
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एकदम से धक्का लगा छोटे बहनोई साहब के अचानक निधन समाचार से। जब इस बाबत बहन से ज़िक्र किया तो यह उत्तर मिला जिससे और भी धक्का लगा —

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भले ही हमें साढ़े तीन माह बाद ही पता चला लेकिन जब चल गया तो छोटी बहन को इस समय कोई भी उत्तर देना नैतिकता के विरुद्ध होगा और फिर वह महिला होने के नाते भी तमाम सहानुभूतियाँ बटोर ही लेंगी।दिल तो कोई भी चीर कर नहीं दिखा सकता लेकिन दिल पर हाथ रख कर ईमानदारी से सोचने पर सच का एहसास तो हो ही जाता है। फिर भी इतना तो कहना ही होगा कि, मेरे घर के पते के विजिटिंग कार्ड शोभा, कमलेश बाबू और उनके बड़े बेटी-दामाद को मैंने खुद अपने हाथ से दिये थे जब वे लोग 2011 में लखनऊ कमलेश बाबू की भतीजी की शादी में आए थे। वहाँ जाकर खुद मैंने कमलेश बाबू व उनके बड़े दामाद को घर पर आने का आग्रह किया था । शोभा – कमलेश बाबू तो दो दिन हमारे घर पर रुके भी थे जबकि उनके बेटी – दामाद व धेवती मिल कर चले गए थे ।कमलेश बाबू के भाई दिनेश हमारे घर दो बार आ चुके थे और फोन पर उनकी पत्नी ने बताया था कि शादी का कार्ड डाक से भेज चुके हैं। पता उनके पास भी था । उनके जरिये भी सूचित किया जा सकता था। यहाँ के प्रवास और फिर लौटने के बाद उन लोगों के किस कदम के कारण तब से टेलीफोनिक संपर्क टूटा यह तो अपने दिल पर हाथ रख कर सोचने की बात थी। ई -मेल एड्रेस भी कमलेश बाबू तथा उनके दोनों दामादों व छोटी बेटी के पास थे। खैर बड़े होने के नाते इल्जाम तो हमें ही सहने ही होंगे।
माँ और कमलेश बाबू दोनों के जन्मदिन एक ही थे 20 अप्रैल। इस बार किसी की पुण्यतिथि पर हवन नहीं कर सका हूँ। मौका मिलते ही कमलेश बाबू की आत्मा की शांति हेतु भी कर लेंगे।

 

विद्रोही स्व-स्वर में स्मृति के झरोखों से —— विजय राजबली माथुर

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जितेंद्र जी ने यह फोटो 20 मई 2016 को गांधी प्रतिमा,जी पी ओ पार्क, लखनऊ में अपने फोन में किसी के माध्यम से लिया था जिस समय किसान जागरण यात्रा की धरना – सभा चल रही थी। उनकी ख़्वाहिश है कि, इस चित्र को आधार बना कर कोई पोस्ट सार्वजनिक रूप से दी जाये। किसानसभा की रैली से संबन्धित पोस्ट्स पहले ही ‘कलम और कुदाल ‘ ब्लाग पर दी जा चुकी हैं। अतः इस निजी चित्र द्वारा निजी स्मृतियों का वर्णन करना अधिक उपयुक्त रहेगा।
बात कुछ उल्टी लग सकती है किन्तु जितेंद्र जी के चित्र के माध्यम से उनके पिता जी कामरेड हरमिंदर पांडे जी का ज़िक्र पहले करना उचित प्रतीत होता है जिनसे अभी तक सिर्फ एक ही बार 08 जून 2011 को भेंट हुई है जबकि जितेंद्र जी से यह दूसरी मुलाक़ात थी।
कामरेड हरमिंदर पांडे जी ने 22, क़ैसर बाग भाकपा के प्रदेश कार्यालय पर अपनी टीचर्स यूनियन की एक बैठक बुलाई थी । डॉ गिरीश जी ने उसमें भाग लेने हेतु मुझे भी sms भेज दिया था, अतः मैं पहुँच गया था। परिचय होने पर जब हरमिंदर पांडे जी को यह पता चला कि, मुझे लेखन का शौक है और आगरा में मेरे लेख साप्ताहिक व त्रैमासिक पत्रों में छप चुके हैं। मीटिंग शुरू होने से पूर्व जो समय था उसमें उन्होने कुछ लेखों की जानकारी प्राप्त की थी। ‘रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना ‘ में मैंने जो विश्लेषण किया है उससे वह अत्यधिक प्रभावित हुये थे। उन्होने गिरीश जी से कहा था कि, इनके लेख ‘पार्टी जीवन ‘ में छाप दिया करें जिससे कामरेड्स को असलियत का पता चल सके एवं वे जनता के बीच चर्चा कर सकें तथा सांप्रदायिक शक्तियों की पोल खोली जा सके। उनसे हाँ-हूँ तो कर दी गई लेकिन आज तक उनकी बात पर अमल नहीं किया गया । क्यों? क्योंकि जैसा मैंने अनुभव किया ‘कथनी’ और ‘करनी ‘ में अन्तर है जबकि शायद पांडे जी ने इसे न समझा हो। मीटिंग समापन के बाद उनके प्रस्थान करने पर उनके विरुद्ध चर्चा भी कानों तक पहुंची जिससे साफ हो गया कि, भला फिर कैसे उनकी सिफ़ारिश मानी जा सकती थी ?
पार्टी जीवन में मेरे लेख न छ्पें तो भी मैं अपने ब्लाग्स के माध्यम से बराबर लेखन में सक्रिय हूँ। और ज़्यादा लोगों तक मेरी बात पहुँच रही है और उसी को दबाने हेतु बाजारवादी कामरेड्स ओछे हथकंडे अपनाने से भी नहीं चूक रहे हैं। पार्टी जीवन के एक संपादक जो प्रदेश पार्टी के सीता राम केसरी भी हैं खुद को ‘एथीस्ट ‘ होने का भी ऐलान करते हैं और पार्टी दफ्तर में ही चमेली के तेल की खुशबू वाली धूप बत्ती जला कर तांत्रिक प्रक्रियाएं भी करते हैं।
संभवतः हरमिंदर पांडे जी इन सब गतिविधियों से अनभिज्ञ होंगे तभी उन्होने मेरे लेख छापने की सिफ़ारिश कर दी थी। पार्टी कार्यालय में जब जितेंद्र जी से पहली बार मुलाक़ात हुई थी और उन्होने अपने पिताजी का नाम लेकर परिचय दिया था तो वास्तव में हमें भी उनसे मिल कर बहुत अच्छा लगा था। फेसबुक के माध्यम से उनसे निरंतर संपर्क है फिर भी किसानसभा की रैली में मिलने पर उन्होने उत्साहित होकर यह चित्र खिंचवा कर स्मृति पटल पर इस मुलाक़ात को चिरस्थाई कर दिया है। किसानसभा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड अतुल अंजान साहब से मेरा परिचय कराते हुये (वैसे मैं अंजान साहब से आगरा से ही परिचित था ) जितेंद्र जी ने मेरे ब्लाग- लेखन का ज़िक्र बतौर तारीफ किया था।
कामरेड जितेंद्र पांडे और उनके पिताजी कामरेड हरमिंदर पांडे साहब सैद्धान्तिक रूप से साम्यवाद के प्रति समर्पित हैं तभी ढोंग-पाखंड-आडंबर विरोधी मेरे विचारों का समर्थन कर देते हैं। वरना तो बाजारवादी/कार्पोरेटी/मोदीईस्ट कामरेड्स तो मुझे हर तरह तबाह करने की किसी भी तिकड़म से नहीं चूकते हैं। मुझे उम्मीद है कि, इन दोनों से मुझे आगे भी समर्थन मिलता रहेगा।

 

विद्रोही स्व-स्वर में देश की जनता भूखी है या कारपोरेट ने जनता लूटी है ? —— विजय राजबली माथुर

हमारी पार्टी के एक साथी की तबीयत खराब होने की सूचना आज फोन पर प्राप्त हुई तो शाम को चार बजे उनको देखने उनके घर गया । उनके स्वास्थ्य की कुशल क्षेम हमने पूछी तो उन्होने हम से यह सवाल किया कि, आप आज आए कैसे ? आज तो आपको रास्ते में काफी दिक्कत हुई होगी क्योंकि आज ‘बड़ा मंगल ‘ है। अब से 59 वर्ष पूर्व जब हम लोग लखनऊ में ही थे तब तो जेठ महीने का दूसरा मंगल ही बड़ा मंगल होता था। 1961 में बाबूजी के स्थानांतरण के बाद हम लोग लखनऊ से बाहर रहे फिर जब 48 वर्ष बाद पुनः यहीं आए तब यहाँ जेठ माह के चारों मंगल को बड़ा मंगल की संज्ञा दे कर जगह-जगह पूरी – सब्जी , पकौड़ी – छोले आदि – आदि बांटते और लपकते लोगों को पाया। यह मुफ्त वितरण सड़कों पर जगह – जगह जाम का कारण बंनता है। अपने घर से एक किलो मीटर दूर ज़रूर ऐसा जाम पाया किन्तु रिंग रोड पर भारी वाहन आज रोके जाने से रास्ता साफ – सुथरा मिल गया था क्योंकि हाई – वे के किनारे – काफी दूर ऐसे कैंप लगे थे जिन पर गरीब ही नहीं कार, जीप वाले भी लाईन लगाए खड़े देखे थे।
पहले जब हम यहाँ थे तब लोग मीठा शर्बत, बूंदी या अंगूरदाना ही बांटते थे । अब नमकीन भोजन बांटा जाने लगा है। सपा से संबन्धित एक अल्पसंख्यक नेता के
परिवार में तो एक वक्त का पूरे परिवार का भोजन ही ऐसे कैंप में बंटतेभोजन से जुटालिया जाता है।
अल्पसंख्यक मजहब से संबन्धित जिन वरिष्ठ साथी को मैं देखने गया था ऐसे नज़ारों पर उनकी टिप्पणी थी कि दरअसल देश की जनता भूखी है इसलिए जहां भी मुफ्त खाना मिलता है भीड़ जुट जाती है। उन्होने एक पुराने किस्से काज़िक्र करते हुये बताया कि एक बहुत गरीब मजदूर जो एक ढाबे पर काम करता था और जिसका कोई संबंधी न था जब नहीं रहा तो उन लोगों ने चंदा जूटा कर उसका अंतिम संस्कार करा दिया था। उस चंदे की रकम में से उस वक्त तीन हज़ार रुपए बच गए थे। उन लोगों ने उन तीन हज़ार बचे रुपयों से पूरी – सब्जी बनवा कर फैजाबाद रोड पर बँटवा दी। उस दिन न तो मंगल था न नौरात्र की अष्टमी – नवमी तब भी उसे पाने की होड में कार सवार भी जुट गए थे और किसी ने भी न पूछा कि आज यह भोजन किस लिए बांटा जा रहा है, बस सबको लपकने की होड थी। इसलिए वह तब से यही कहते हैं कि, देश की जनता भूखी है।
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जहां तक ज्योतिष विज्ञान का संबंध है भोजन आदि ‘दान ‘ करना किसी – किसी के लिए कितना घातक हो सकता है इसे लखनऊ के गोंमती नगर क्षेत्र में रहने वाले UPSIDC के एक एक्ज़ीक्यूटिव इंजीनियर साहब भुक्त – भोगी के रूप में सही से बता सकते हैं। लगभग दस वर्ष पूर्व जब यह इंजीनियर साहब आगरा में पोस्टेड थे वहाँ मेरे संपर्क में आए थे तब मुझे उनको लिखित में ‘दान ‘ का निषेद्ध करना पड़ा था। वह लोगों को खूब खाना दान में खिलाते थे और खूब
लुटते थे क्योंकि उनको ‘अन्न दान ‘ नहीं करना चाहिए था। उन्होने मुझसे दान निषेद्ध की बात इसलिए लिखित में ली थी क्योंकि मुझसे पूर्व वह जिन भी पोंगा – पंडितों के फेर में थे वे उनसे खूब दान करवाते थे जो उनके लिए परेशानी का सबब था। जब मंदिर के पुजारियों को ज्योतिषी मानते हुये उनसे सलाह ली जाती है तब ऐसे ही दुष्परिणाम मिलते हैं जो ज्योतिष को बदनाम भी करते हैं और हतोत्साहित भी।
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दो सप्ताह पूर्व टाटा डोकोमो ने sms के जरिये सूचित किया कि, वे 15 मई 2016 से CDMA सर्विस बंद कर रहे हैं जब उनसे कहा कि, GSM सर्विस में इसे ट्रांसफर कर दें तो तमाम अड़ंगे खड़े कर दिये। अखबार से पता लगा कि, रिलायंस ने अपने ग्राहकों को GSM की सिम CDMA के बदले खुद ही दे दी थीं। लेकिन फिर भी तमाम लोगों को हैंड सेट तो नए खरीदने ही पड़े। भले ही हमने दूसरे आपरेटर पर mnp करा लिया और अपना पुराना नंबर सुरक्षित बचा लिया लेकिन दस दिन झंझट तो रहा ही बेवजह नया हैंड सेट व सिम खरीदने में अतिरिक्त व्यय हुआ ही।
इस तरह ये कारपोरेट घराने जब तब जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते रहते हैं। बाजारवाद व्यापार जगत पर ही नहीं राजनीति पर भी हावी है। अब विधानसभाओं व संसद में प्रतिनिधि कारपोरेट घरानों के चहेते ही आसानी से चुन जाते हैं और जन पक्षधरता वाले लोग बड़ी कठिनाई से वहाँ पहुँच पा रहे हैं। फिर भला जनता के हितार्थ काम कैसे हो? श्रम कानूनों को उदारीकरण के आवरण में कारपोरेट हितैषी एवं श्रमिक विरोधी बनाया जा रहा है।
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विद्रोही स्व-स्वर में ‘ज्ञान ‘ से शत्रुत ा रख कर जीत – विक्टरी कैसे हासिल होगी ? —— विजय राजबली माथुर

ब्रह्म समाज के माध्यम से राजा राम मोहन राय ने विलियम बेनटिक से भारत में ‘अङ्ग्रेज़ी’ शिक्षा लागू करवाईथी। उनका दृष्टिकोण था कि, अङ्ग्रेज़ी साहित्य द्वारा उनके स्वतन्त्रता संघर्षों का इतिहास भी हमारे नौजवान सीखेंगे और फिर भारत की आज़ादी के लिए मांग बुलंद करेंगे और हुआ भी यही। मोहनदास करमचंद गांधी,सुभाष चंद्र बोस,जवाहर लाल नेहरू,भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद सभी अङ्ग्रेज़ी साहित्य से भलीभाँति परिचित थे और आज़ादी के बड़े योद्धा बने।
हालांकि वर्तमान केंद्र सरकार का उद्देश्य ‘संस्कृत’ को बढ़ाने के पीछे कुछ और है जैसे कि, तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने सस्ते भारतीय क्लर्क पाने के उद्देश्य से ‘अङ्ग्रेज़ी’ को लागू किया था लेकिन वह आज़ादी के आंदोलन का एक बड़ा हथियार भी बनी। उसी प्रकार राजा राम मोहन राय सरीखा व्यापक दृष्टिकोण अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है। जब आप संस्कृत जानेंगे तब आप ब्राह्मण वाद की लूट की चालाकी को भी समझेंगे और उसका प्रतिकारकर सकेंगे।
उदाहरणार्थ आपको स्तुतियों में एक शब्द मिलेगा- ‘सर्वोपद्रव्य नाशनम ‘ अब ब्राह्मण यजमान से ऐसे ही वाचन करवाता है जिसका आशय हुआ कि, सारा द्रव्य नष्ट कर दो। जब आपकी प्रार्थन्नुसार सब द्रव्य नष्ट होगा तब आप ब्राह्मणों के मकड़ जाल में – दान दक्षिणा देने के फेर में फसेंगे।
लेकिन अगर आप ‘संस्कृत’ के ज्ञाता बन जाते हैं तब आप जानेंगे कि, इस शब्द का पहले संधि-विच्छेद करना फिर वाचन करना है।
अर्थात जानकारी होने पर वह शब्द ‘सर्व’ + उपद्रव ‘ + नाशनम पढ़ा जाएगा जिसका अर्थ है सारे उपद्रव अर्थात पीड़ाओं को नष्ट कर दो। अब आप दान-दक्षिणा के फेर में नहीं फंस सकते।
चतुराई इसी में है कि, अधिकाधिक लोग ‘संस्कृत’ की जानकारी हासिल करके वेदों के माध्यम से सारे विश्व की मानवता की एकता की बात को बुलंद करें और ब्रहमनवाद की लूट को ध्वस्त करें।
कुछ ब्राह्मण वादी नहीं चाहते कि संस्कृत पर उनका एकाधिकार समाप्त हो वे उसको सार्वजनिक करने का विरोध कर रहे हैं उनके जाल में नहीं फंसना चाहिए और ज्ञान का विस्तार करना चाहिए जिससे मानव कल्याण संभव हो।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1070815762980399

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लेकिन क्या करेंगे जब अति विद्वजन घोंगावादी प्रवृति को त्यागने को ही राज़ी न हों। कभी एथीज़्म/नास्तिकता के नाम पर तो कभी मूल निवासी के नाम पर संस्कृत का विरोध करने वाले वस्तुतः पोंगापंथी ब्राह्मण वाद के उस सिद्धान्त को ही लागू रखने के पक्ष धर हैं जिसके अनुसार ‘वेद’ पढ़ने का अधिकार शूद्रों को न था और गलती से वेद वचन सुन लेने वाले शूद्र के कान मे सीसा (lead ) डाल कर उसे बहरा बना दिया जाता था। आज के उदारीकरण के युग का सीसा- lead एथीज़्म और मूल निवासी में रूपांतरित हो गया है। यह वर्ग संस्कृत पर ब्राह्मणों के एकाधिकार वादी वर्चस्व को टूटने न देने के लिए और बहुसंख्यक जनता को मूर्ख बनाए रख कर उल्टे उस्तरे से मूढ़ने हेतु संस्कृत के विरोध में डट कर आवाज़ बुलंद कर रहा है।
जिसका एक और उदाहरण ‘दुर्गा -सप्त शती’ से प्रस्तुत है जिसमें एक स्तुति के बीच शब्द ‘ चाभयदा ‘ आता है इसका वाचन पोंगा-पंडित ऐसे ही कराते हैं जिसका अर्थ हुआ कि, आप प्रार्थना कर रहे हैं – और भय दो। जब आप भय मांगेगे तो वही मिलेगा जिसके निराकरण के लिए आप दान-दक्षिणा के फेर में फंस कर अपनी आय व्यर्थ व्यय करेंगे।
अब यदि आपको संस्कृत का ज्ञान होगा तब आप इसको संधि- विच्छेद करके यों पढ़ेंगे : च + अभय + दा अर्थात ‘और अभय दो’ जब आप अभय ( भय = डर नहीं ) मंगेगे तो निडर बनेंगे और ब्राह्मण वाद से गुमराह नहीं होंगे। हमने एक ब्लाग के माध्यम से जन – हित में स्तुतियाँ देना प्रारम्भ किया था किन्तु ज़्यादातर लोगों के हज़ारे के कारपोरेट भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन का समर्थन करने के कारण उस ब्लाग को हटा लिया था । लोग जब जाग्रत ही नहीं होना चाहते तब किया भी क्या जा सकता है। वेदना होती है विद्वानों से मूर्खता की बातें जान कर ।
जिन वेदों में विशेषकर ‘अथर्व वेद’ जो ‘आयु का विज्ञान’ है में समझाया गया है कि नव रात्र अर्थात नौ जड़ी-बूटियों का सेवन करके ‘नीरोग’ कैसे रहा जाये उसे पौराणिक ब्राह्मण वादियों ने झगड़े की जड़ बना कर समाज में विग्रह उत्पन्न कर दिया है और मूल निवासी तथा एथीज़्म वादी उस चक्रव्यूह में उलझे हुये हैं। जे एन यू विवाद के मूल में भी यही अज्ञानता है। ‘ज्ञान’ से शत्रुता रख कर जीत – विक्टरी कैसे हासिल होगी ?
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विद्रोही स्व-स्वर में उदारीकरण का जनता पर प्रभाव : ‘सच्चे साधक धक्का खाते और चमचे मज़े उड़ाते हैं’ —— विजय राजबली माथुर

1991 में अल्पमत सरकार के प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहा राव साहब ने वर्ल्ड बैंक के पूर्व अधिकारी मनमोहन सिंह जी को वित्तमंत्री बनाया था जिनके द्वारा शुरू किए गए ‘उदारीकरण ‘ को न्यूयार्क में जाकर आडवाणी साहब द्वारा उनकी नीतियाँ चुराया जाना बताया गया था। उस उदारीकरण की रजत जयंती वर्ष में तमाम विद्वान उसकी प्रशंसा में कसीदे गढ़ रहे हैं जो विभिन्न समाचार पत्रों में सुर्खियों के साथ छ्प रहे हैं।
उदारीकरण से 19 वर्ष पूर्व 20 वर्ष की अवस्था में रु 172और 67 पैसे मासिक वेतन से मैंने रोजगार शुरू किया था। छह माह में खर्च के बाद इतने पैसे बच गए थे कि, रु 150/-का टेलीराड ट्रांज़िस्टर,रु 110 /-की एक कलाई घड़ी व भाई-बहन समेत अपने लिए कुछ कपड़े बनवा सके थे। अगले छह माह में बचत से रु 300/- का एक टेबुल फैन व माता जी पिताजी के लिए कुछ वस्त्र ले सके थे। तब बैंक में S B a/c मात्र रु 5/- से खुला था और चेक-बुक या किसी चीज़ का कोई शुल्क नहीं लगता था।
उदारीकरण के 25 वर्ष बाद आज कोई बचत नहीं हो पाती है। निखद कही जाने वाली अरहर की दाल खरीदना भी संभव नहीं है। बैंकों में चेकबुक लेने का भी शुल्क देना पड़ता है, बैंक बेवजह के sms भेजते हैं और उनका भी शुल्क काट लेते हैं। दूसरी ब्रांच के लिए नगद जमा करने पर भी 1 प्रतिशत शुल्क काट लेते हैं। बचत न होने से जमा नहीं होता अतः निकासी भी मुमकिन नहीं तब a/c बंद कर दिया जाता है। पहले स्टाफ का व्यवहार सौम्य होता था अब रूखा रहता है।
उदारीकरण से अमीर ही और अमीर हुये हैं गरीब की तो कमर ही टूट गई है और अब तो ज़बान भी बंद की जा रही है।
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इस 19 मार्च को उत्तर प्रदेश सरकार के एक अंडरटेकिंग में कार्यरत एक एक्जिक्यूटिव इंजीनियर साहब जो आगरा में भी हमसे ज्योतिषीय परामर्श लेते रहे थे तीन वर्षों के अंतराल के बाद पधारे थे। वह मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश यादव के कार्य से संतुष्ट दीख रहे थे किन्तु उनको कानून-व्यवस्था की एकमात्र शिकायत थी। केंद्र की सरकार के निर्णयों से वह अधिक असंतुष्ट थे। FDI की सर्वाधिक आलोचना उन्होने की। उनका मत था कि, यदि FDI से देश का विकास होता अर्थात लोगों को बेहतर शिक्षा,स्वस्थ्य व जीवन स्तर प्राप्त होता तब यह ठीक हो सकती थी। किन्तु सरकार जिसको विकास कहती है वह विकास नहीं है। उनके अनुसार बढ़िया कपड़ा और कारें विकास का प्रतीक नहीं हैं क्योंकि ये सबको सुलभ ही नहीं हैं। वह कह रहे थे विकास वह होता यदि उनको सार्वजनिक परिवहन से मेरे पास 15 कि मी चल कर आने -जाने की सुविधा मिलती और निजी गाड़ी का प्रयोग न करना पड़ता। FDI से जो नए-नए माल खुल रहे हैं वे देश में असमानता की खाई को ही नहीं चौड़ा कर रहे हैं वरन भ्रष्टाचार के नए आयाम भी गढ़ रहे हैं।


इस बात को उन्होने उदाहरण देते हुये स्पष्ट किया कि जैसे उनके बचपन में उनके पिताजी उन लोगों की ख़्वाहिश पूरी कर देते थे वैसे ही जब वह अपने बच्चों की ख़्वाहिश पूरा करना चाहते हैं तो परेशानी महसूस करते हैं। उनके जमाने में जो बाज़ार में उपलब्ध था उसे पूरा करना उनके पिताजी के लिए मुश्किल न था। आज जब उनके बच्चे माल देखते -सुनते हैं तो चलने को कहते हैं और वहाँ जब रु 500/- में एक चम्मच आइसक्रीम एक -एक बच्चे को दिलाते हैं तो तत्काल डेढ़ हज़ार रुपए निकल जाने पर भी न बच्चों को संतुष्टि मिलती है न ही उनको खुद को तसल्ली मिल पाती है। माल के बाहर क्वालिटी की आइसक्रीम सस्ते में जी भर मिल सकती थी अगर दूसरा विकल्प न होता तो। इस प्रकार माल कल्चर विदेशी कंपनियों को न केवल फायदा पहुंचाने का वरन भारतीय पहचान मिटाने का भी बड़ा संबल बन गया है। वेतन से माल की ख़रीदारी करना संभव नहीं है , माल से माल खरीदने का मतलब है भ्रष्टाचार को अंगीकार करके शान दिखाना।


उनका यह भी साफ-साफ कहना था कि, अगले लोकसभा चुनाव आते-आते जन-असंतोष इतना भड़क जाएगा कि इस सरकार के बूते उसे सम्हालना मुश्किल हो जाएगा, साथ ही सरकार के मंत्री-सांसद जनता का सामना करने की स्थिति में ही नहीं रहेंगे। जिन सरकारी अधिकारी-कर्मचारी के दम पर सरकार चलती है उनका असंतोष भी चरम पर होगा और ये परिस्थितियाँ इस सरकार व इसकी पार्टी को पुनर्मूष्क: भव की स्थिति में ला देंगी। यदि इंजीनियर साहब का आंकलन सही भी निकले तब भी अभी तो तीन वर्ष और दो माह का समय कष्टप्रद है ही।

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इस समाचार से कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि अर्थशास्त्रीय ‘ग्रेशम ‘ के सिद्धान्त के अनुसार " खराब ‘मुद्रा’ अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है "। उसी प्रकार समाज में खराब लोग हावी रहते हैं और अच्छे लोगों को व्यवहार से दूर कर देते हैं।
*1991ई में आगरा छावनी से भाकपा प्रत्याशी को किसी तकनीकी कारण से अपना गेंहू की बाल- हंसिया वाला चुनाव चिन्ह न मिल सका था अतः कामरेड जिलामंत्री के निर्देश पर मैं प्रदेश कार्यालय से उनको मिले चिन्ह ‘फावड़ा-बेलचा’ के लिए अधिकार-पत्र लेकर वापिस लौट रहा था। लखनऊ जंक्शन से अवध एक्स्प्रेस गाड़ी पकड़ना था। स्टेशन पर बैठ कर इंतज़ार कर रहे थे साथ में एक और सज्जन आकर बैठ गए थे। अनायास बातों-बातों में हस्तरेखा विज्ञान पर चर्चा छिड़ गई थी। उत्सुकता वश एक गेरुआ वस्त्र धारी अधेड़ पुरुष भी जगह मांग कर हम लोगों के साथ बैठ गए थे। वह भी अपना हाथ देखने के लिए ज़ोर देने लगे। जब उनके हाथ देखे तो बाकी बातें कुबूल करते हुये एक बात पर वह कहने लगे इस बात को छोड़ें बहुत पुरानी हो गई है। बात कितनी भी पुरानी हो हाथ में अपनी अमिट रेखा के साथ उपस्थित थी। हालांकि मैं सीधे-सीधे कहने से बच रहा था किन्तु दूसरे यात्री ने साफ-साफ कह दिया कि वह साधू बनने से पूर्व एक अध्यापक थे और किसी की हत्या करने के बाद भेष बदल कर जी रहे थे। उसके बाद वह गेरुआ साधू ट्रेन आने पर हम लोगों से बच कर दूसरे कम्पार्टमेंट से गए।
** 2000 ई में जब दयालबाग, आगरा के सरलाबाग क्षेत्र में मैंने ज्योतिष कार्यालय खोला था तब पास के मंदिर के पुजारी महोदय भी मुझे अपना हाथ दिखाने आए थे । उस वक्त वह 30 वर्ष आयु के थे और 25 वर्ष की आयु में मथुरा में एक हत्या करके फ़रारी पर आगरा में पुजारी बन गए थे जिस बात को बड़ी मुश्किल से उन्होने कुबूला था । उन्होने काफी मिन्नत करके कहा था कि इस बात का किसी से भी ज़िक्र न करूँ कि वह पंडित जी भी मुझे अपना हाथ दिखाने आए थे।
***आगरा में ही सुल्तानगंज की पुलिया स्थित एक मंदिर के पुजारी महोदय का इतिहास यह था कि वह इंदौर स्थित एक मार्बल की दुकान से गबन करके भागे हुये थे। उनका बेटा आठवीं कक्षा में लगातार तीन वर्ष फेल होने के बाद उनका सहायक पुजारी हो गया था जिसके चरण मथुरा में पोस्टेड एक तहसीलदार अग्रवाल साहब भी छूते थे क्योंकि वह पंडित था।
आज की दुनिया का यही दस्तूर है कि,’ सच्चे साधक धक्का खाते और चमचे मज़े उड़ाते हैं’। फिर समाज-देश में क्यों न अफरा-तफरी और बद- अमनी हो।

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*49 वर्ष पूर्व अर्थशास्त्र विषय का अध्यन करने के दौरान जो नियम ज्ञात हुये उनको समाज में आज हर क्षेत्र में लागू होता देखा जा रहा है। एक है ग्रेशम का सिद्धान्त जिसके अनुसार " खराब ‘मुद्रा’ अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है "। उसी प्रकार समाज में खराब लोग हावी रहते हैं और अच्छे लोगों को व्यवहार से दूर कर देते हैं।
*दूसरा है ‘उपयोगिता का सिद्धान्त ‘ जिसके अनुसार किसी भी वस्तु की उपयोगिता सदा एक सी नहीं बनी रहती है और उस वस्तु का मूल्य उसकी उपयोगिता के अनुसार ही तय होता है।
* तीसरा सिद्धान्त ‘ मांग और आपूर्ती ‘ का है जिसके अनुसार वस्तु की मांग अधिक होने व आपूर्ती कम होने पर मूल्य अधिक व मांग कम होने एवं आपूर्ती अधिक होने पर मूल्य कम हो जाता है।
लेकिन सामाजिक/व्यावहारिक जीवन में ‘ खराब मुद्रा’ वाला सिद्धान्त ‘उपयोगिता ‘ तथा ‘मांग व आपूर्ती ‘ वाले सिद्धांतों पर भारी पड़ता है। खराब चलन के लोग कृत्रिम रूप से तिकड़म द्वारा अच्छे चलन वालों को निकृष्ट घोषित करा देते हैं जिससे उनकी उपयोगिता कम हो जाती है और समाज में उनका मूल्य भी कम आँका जाता है। सामान्य सामाजिक जीवन में इन प्रक्रियाओं पर ध्यान न दिये जाने के कारण राजनीतिक जीवन में भी इनकी पुनरावृति होती है जिसका समाज पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ता है।
अहंकार ग्रस्त राजनीतिज्ञ चापलूसी को अधिक महत्व देते हैं न की योगिता की उपयोगिता को। परिणाम स्वरूप राजनीति व समाज को तो हानि पहुँचती ही है परंतु अंततः उन राजनीतिज्ञों को भी कालांतर में इसके दुष्परिणाम भोगने पड़ जाते हैं। चतुर व बुद्दिमान राजनीतिज्ञ भूल सुधार लेते हैं किन्तु अहंकार ग्रस्त राजनीतिज्ञों को अपनी भूल का एहसास होता ही नहीं है और वे चापलूसों से ही घिरे रह कर व्यर्थ के दोषारोपण सहते रहते हैं बनिस्बत सुधार कर लेने के।

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विद्रोही स्व-स्वर में क्यों होते हैं मे रे खिलाफ कई लोग ? —— विजय राजबली माथुर

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ईश्वर= जो समस्त ऐश्वर्यों से सम्पन्न हो अर्थात आज कोई भी नहीं। धर्म= शरीर व समाज को धारण करने वाले तत्व जैसे ‘ सत्य,अहिंसा (मनसा- वाचा- कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य’। जो ‘नास्तिक संप्रदाय’ धर्म के खिलाफ है वह स्व्भाविक रूप से ‘ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरकारी ,पुरोहितवादी/ब्राह्मण वाद’ को अप्रत्यक्ष समर्थन देकर मजबूत करता है। इसीलिए समष्टिवादी ‘साम्यवाद’ भारत की धरती पर जन-उपेक्षा का शिकार होकर लुटेरे शोषकों के हमले झेल रहा है और निर्दोष कन्हैया कुमार जेल में यातनाग्रस्त हैं।
ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरकारी/बाजरवादी क्रियाओं को धर्म की संज्ञा देना जनता को धोखे में रख कर उसके शोषकों का बचाव करना मात्र है। क्यों नहीं जनता को ‘धर्म’ का ‘मर्म’ समझा कर अपने साथ लाया जाता ?

 

विद्रोही स्व-स्वर में निजी संस्मरणों क ा एक ब्लाग, जिसमें पूरे समाज के बदलावों की झलक है —— रवीश कुमार

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हिंदुस्तान, लखनऊ, 02 फरवरी 2011

http://vidrohiswar.blogspot.in/

 

विद्रोही स्व-स्वर में हमारी सदाशयता को कमजोरी समझा गया —— विजय राजबली माथुर

यह एक अच्छी बात थी जो सीखी व सिखाई थी कि, अपनी योग्यता व क्षमतानुसार दूसरों की अधिक से अधिक भलाई सोचे एवं करें। लेकिन यह भी एक सच है कि इसके परिणाम घातक ही रहे हैं। हमारी भलाई से लाभ उठाने वालों ने इसे हमारी सदाशयता नहीं कोई कमजोरी समझा। लाभ उठाने वाले हम लोगों को ही नुकसान पहुंचाने लगे तब हमें मजबूरन यह निर्णय करना पड़ा है कि अबसे किसी के साथ उदारता नहीं बरतेंगे, किसी का भला नहीं करेंगे। 2015 में इलाहाबादी प्रोफेसर, उल्टी टोपीवाला जैसे मिश्रा समर्थक, मिश्रा वादी अपने ज्ञानी होने के अहंकार से ग्रस्त लोगों ने मुझसे लाभ उठाकर मुझको नष्ट करने का बीड़ा उठा रखा है। उल्टी टोपीवाला का आस्ट्रेलियाई fb फ्रेंड भी उसकी इस मुहिम में जुड़ा हुआ है।
एक बैंक अधिकारी ने यशवंत को घेरने का प्रयास एक बैंक कर्मचारी नेता और मिश्रा के चहेते केसरी के इशारे पर किया। ये बाजारवादी अब सिर्फ मुझे ही नहीं बल्कि मेरे पुत्र को भी परेशान करने पर आमादा हैं । अतः इनकी धूर्तता के चलते ही हम लोगों को भविष्य में किसी का भला न करने का निर्णय लागू करना होगा। हालांकि 2015 में ही ब्लाग जगत के पुराने साथी और fb पर भी फ्रेंड ज्ञान चंद मर्मज्ञ जी ने अपने निबंध संग्रह को भेंट कर हमारे ज्ञान में वृद्धि करने का अमूल्य उपहार प्रदान किया। उनको हम एक कवि के रूप में उनके ब्लाग से ही जानते थे। किन्तु उनके निबंध जो वास्तव में उनके ‘संपादकीय लेख ‘ हैं उनके नाम के शब्दों-‘ज्ञान’ व ‘मर्मज्ञ’ को सर्वथा सार्थक करते हैं। वर्ष 2015 में यह ज्ञान भेंट हमारे लिए एक बड़ी प्रेरक शक्ति भी बनी है।
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Vijai RajBali Mathur

December 29, 2015 near Lucknow ·

उल्टी टोपी वाला लगातार ‘मिश्रा वाद ‘ का जहर घोल रहा था तब उसे रेस्टरिक्ट कर दिया था और जब उसने ‘मिश्रा पुराण ‘ के नए-नए अध्याय बढ़ाने शुरू किए तब ‘ब्लाक’ कर दिया था और उससे किसी भी प्रकार का संपर्क न रखने की सूचना इसी वाल पर दे दी थी। लेकिन आज फिर अपरान्ह 03 : 36 से 03 : 46 के मध्य उसने 5 बार फोन काल्स किए जिनको अटेण्ड करने का सवाल ही नहीं था। काठ की हांडी सिर्फ एक बार ही आग पर चढ़ती है और वह खुद अपना व अपनी बेटी का ज्योतिषीय विश्लेषण हासिल कर चुका है अब और कुछ मुझसे जानकारी हासिल करना संभव नहीं है।
बड़े बाप का बेटा होने के गरूर में अटकल पच्चू जो कुछ भी वह लिख देता है चापलूस लोग उसे फटाफट लाईक कर डालते हैं। प्रस्तुत फोटो उसकी फूहड़ पन से भरी एक पोस्ट का है जिसमें उसने अपनी पत्नी व एक पड़ोसन की खिल्ली उड़ाई है और उसे 140 से अधिक लोगों के लाईक्स मिल चुके हैं जिसमें ब्राह्मण वह वकील साहब भी हैं जो ‘एथीज़्म’के सबसे बड़े अलमबरदार खुद को बताते हैं। क्या एथीज़्म बाजारवादी अश्लीलता का ही पर्याय है? फूहड़ पन का प्रतीक है? इसी एथीज़्म ने आज केंद्र में पोंगा-पंथियों की फासिस्ट सरकार गठित करा दी है। यदि ‘धर्म’ के ‘मर्म’ को जनता को समझाया जाता तो जनता फासिस्टों के पोंगा-पंथ में फँसने से बच जाती और आज जो फासिस्ट तानाशाही का खतरा मंडरा रहा है उसका वजूद भी न होता।
उल्टी टोपी/खोपड़ी वाले जब तक प्रभावशाली रहेंगे। जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ना फासिस्टों के लिए आसान बना रहेगा।

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कल दिनांक 01 जनवरी 2016 को 10:33am,10 :34 am,06:46 pm आज दिनांक 02-01-16 को 01:38pm,01:39 pm पर फिर उल्टी टोपीवाला के फोन काल्स यह देखते हुये भी आए कि, उनको अटेण्ड किया ही नहीं जाएगा। जिनको काफी काबिल माना जाता हो वे इतना भी न समझते हों कि अनावश्यक तंग करने से भी अब उनकी कोई और चाल सफल नहीं हो सकती तब तो आश्चर्य ही होता है।

 

विद्रोही स्व-स्वर में :बाबूजी का जन्मदि न पर एक स्मरण —— विजय राजबली माथुर

**जन्मदिन 24 अक्तूबर पर एक स्मरण बाबूजी का :

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(ताज राजबली माथुर : जन्म 24 -10-1919 मृत्यु 13-06-1995 )

हमारे बाबूजी का जन्म 24-10-1919 को दरियाबाद, बाराबंकी में हुआ था और मृत्यु 13-06-1995 को आगरा में । बाबूजी जब चार वर्ष के ही थे तभी दादी जी नहीं रहीं और उनकी देख-रेख तब उनकी भुआ ने की थी। इसीलिए जब बाबूजी को बाबाजी ने जब पढ़ने के लिए काली चरण हाई स्कूल, लखनऊ भेजा तो वह कुछ समय अपनी भुआ के यहाँ व कुछ समय स्कूल हास्टल में रहे।
भीखा लाल जी उनके सहपाठी और कमरे के साथी भी थे। जैसा बाबूजी बताया करते थे-टेनिस के खेल में स्व.अमृत लाल नागर जी ओल्ड ब्वायज असोसियेशन की तरफ से खेलते थे और बाबूजी उस समय की स्कूल टीम की तरफ से। स्व.ठाकुर राम पाल सिंह जी भी बाबूजी के खेल के साथी थे। बाद में जहाँ बाकी लोग अपने-अपने क्षेत्र के नामी लोगों में शुमार हुए ,हमारे बाबूजी 1939-45 के द्वितीय विश्व-युद्ध में भारतीय फ़ौज की तरफ से शामिल हुए।

अमृत लाल नागर जी हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हुए तो ठा.रामपाल सिंह जी नवभारत टाइम्स ,भोपाल के सम्पादक। भीखा लाल जी पहले पी.सी एस. की मार्फ़त तहसीलदार हुए ,लेकिन स्तीफा देके भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए और प्रदेश सचिव भी रहे। बाबूजी को लगता था जब ये सब बड़े लोग बन गए हैं तो उन्हें पहचानेंगे या नहीं ,इसलिए फिर उन सब से संपर्क नहीं किया। एक आन्दोलन में आगरा से मैं लखनऊ आया था तो का.भीखा लाल जी से मिला था,उन्होंने बाबूजी का नाम सुनते ही कहा अब उनके बारे में हम बताएँगे तुम सुनो-उन्होंने वर्ष का उल्लेख करते हुए बताया कब तक दोनों साथ-साथ पढ़े और एक ही कमरे में भी रहे। उन्होंने कहा कि,वर्ल्ड वार में जाने तक की खबर उन्हें है उसके बाद बुलाने पर भी वह नहीं आये,खैर तुम्हें भेज दिया इसकी बड़ी खुशी है। बाद में बाबूजी ने स्वीकारोक्ति की कि, जब का.भीखा लाल जी विधायक थे तब भी उन्होंने बाबूजी को बुलवाया था परन्तु वह संकोच में नहीं मिले थे।


बाबूजी के फुफेरे भाई साहब स्व.रामेश्वर दयाल माथुर जी के पुत्र कंचन ने (10 अप्रैल 2011 को मेरे घर आने पर) बताया कि ताउजी और बाबूजी दोस्त भी थे तथा उनके निवाज गंज के और साथी थे-स्व.हरनाम सक्सेना जो दरोगा बने,स्व.देवकी प्रसाद सक्सेना,स्व.देवी शरण सक्सेना,स्व.देवी शंकर सक्सेना। इनमें से दरोगा जी को 1964 में रायपुर में बाबाजी से मिलने आने पर व्यक्तिगत रूप से देखा था बाकी की जानकारी पहली बार प्राप्त हुई थी ।

बाबू जी ने खेती कर पाने में विफल रहने पर पुनः नौकरी तलाशना शुरू कर दिया। उसी सिलसिले में इलाहाबाद जाकर लौट रहे थे तब उनकी कं.के पुराने यूनिट कमांडर जो तब लेफ्टिनेंट कर्नल बन चुके थे और लखनऊ में सी.डब्ल्यू.ई.की पोस्ट पर एम्.ई.एस.में थे उन्हें इलाहाबाद स्टेशन पर मिल गए। यह मालूम होने पर कि बाबूजी पुनः नौकरी की तलाश में थे उन्हें अपने दफ्तर में बुलाया। बाद में बाबूजी जब उनसे मिले तो उन्होंने स्लिप देकर एम्प्लोयमेंट एक्सचेंज भेजा जहाँ तत्काल बाबूजी का नाम रजिस्टर्ड करके फारवर्ड कर दिया गया और सी.डब्ल्यू ई. साहब ने अपने दफ्तर में उन्हें ज्वाइन करा दिया। घरके लोगों ने ठुकराया तो बाहर के साहब ने रोजगार दिलाया। सात साल लखनऊ,डेढ़ साल बरेली,पांच साल सिलीगुड़ी,सात साल मेरठ,चार साल आगरा में कुल चौबीस साल छः माह दुबारा नौकरी करके 30 सितम्बर 1978 को बाबू जी रिटायर हुए.तब से मृत्यु पर्यंत (13 जून 1995 )तक मेरे पास बी-560 ,कमला नगर ,आगरा में रहे। बीच-बीच में अजय की बेटी होने के समय तथा एक बार और बउआ के साथ फरीदाबाद कुछ माह रहे।
कुल मिला कर बाबूजी का सम्पूर्ण जीवन संघर्ष और अभावों का रहा। लेकिन उन्होने कभी भी ईमान व स्वाभिमान को नहीं छोड़ा। मैं अपने छोटे भाई-बहन की तो नहीं कह सकता परंतु मैंने तो उनके इन गुणों को आत्मसात कर रखा है जिनके परिणाम स्वरूप मेरा जीवन भी संघर्षों और अभावों में ही बीता है जिसका प्रभाव मेरी पत्नी व पुत्र पर भी पड़ा है।चूंकि बाबूजी अपने सभी भाई-बहन में सबसे छोटे थे और बड़ों का आदर करते थे इसलिए अक्सर नुकसान भी उठाते थे। हमारी भुआ उनसे अनावश्यक दान-पुण्य करा देती थीं। अब उनकी जन्म-पत्री के विश्लेषण से ज्ञात हुआ है कि इससे भी उनको जीवन में भारी घाटा उठाना पड़ा है। उनकी जन्म-कुंडली में ब्रहस्पति ‘कर्क’ राशिस्थ है अर्थात ‘उच्च’ का है अतः उनको मंदिर या मंदिर के पुजारी को तो भूल कर भी ‘दान’ नहीं करना चाहिए था किन्तु कोई भी पोंगा-पंडित अधिक से अधिक दान करने को कहता है फिर उनको सही राह कौन दिखाता? वह बद्रीनाथ के दर्शन करने भी गए थे और जीवन भर उस मंदिर के लिए मनी आर्डर से रुपए भेजते रहे। इसी वजह से सदैव कष्ट में रहे। 1962 में वृन्दावन में बिहारी जी के दर्शन करके लौटने पर बरेली के गोलाबाज़ार स्थित घर पहुँचने से पूर्व ही उनके एक साथी ने नान फेमिली स्टेशन ‘सिलीगुड़ी’ ट्रांसफर की सूचना दी। बीच सत्र में शाहजहांपुर में हम लोगों का दाखिला बड़ी मुश्किल से हुआ था।
बाबूजी के निधन के बाद जो आर्यसमाजी पुरोहित शांति-हवन कराने आए थे उनके माध्यम से मैं आर्यसमाज, कमलानगर- बल्केश्वर, आगरा में शामिल हो गया था और कार्यकारिणी समिति में भी रहा। किन्तु ढोंग-पाखंड-आडंबर के विरुद्ध व्यापक संघर्ष चलाने वाले स्वामी दयानन्द जी के आर्यसमाज संगठन में आर एस एस वालों की घुसपैठ देखते हुये संगठन से बहुत शीघ्र ही अलग भी हो गया था परंतु पूजा पद्धति के सिद्धान्त व नीतियाँ विज्ञान-सम्मत होने के कारण अपनाता हूँ।
मेरे पाँच वर्ष की आयु से ही बाबूजी ‘स्वतन्त्र भारत’ प्रति रविवार को ले देते थे। बाद में बरेली व मेरठ में दफ्तर की क्लब से पुराने अखबार लाकर पढ़ने को देते थे जिनको उसी रोज़ रात तक पढ्ना होता था क्योंकि अगले दिन वे वापिस करने होते थे, पुराने मेगजीन्स जैसे धर्मयुग,हिंदुस्तान,सारिका,सरिता आदि पूरा पढ़ने तक रुक जाते थे फिर दूसरे सप्ताह के पुराने पढ़ने को ला देते थे। अखबार पढ़ते-पढ़ते अखबारों में लिखने की आदत पड़ गई थी। इस प्रकार कह सकता हूँ कि आज के मेरे लेखन की नींव तो बाबूजी द्वारा ही डाली हुई है। इसलिए जब कभी भूले-भटके कोई मेरे लेखन को सही बताता या सराहना करता है तो मुझे लगता है इसका श्रेय तो बाबूजी को जाता है क्योंकि यह तो उनकी ‘दूरदर्शिता’ थी जो उन्होने मुझे पढ़ने-लिखने का शौकीन बना दिया था। आज उनको यह संसार छोड़े हुये बीस वर्ष व्यतीत हो चुके हैं परंतु उनके विचार और सिद्धान्त आज भी मेरा ‘संबल’ बने हुये हैं।

 
 
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