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विद्रोही स्व-स्वर में निजी संस्मरणों क ा एक ब्लाग, जिसमें पूरे समाज के बदलावों की झलक है —— रवीश कुमार

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हिंदुस्तान, लखनऊ, 02 फरवरी 2011

http://vidrohiswar.blogspot.in/

 

विद्रोही स्व-स्वर में हमारी सदाशयता को कमजोरी समझा गया —— विजय राजबली माथुर

यह एक अच्छी बात थी जो सीखी व सिखाई थी कि, अपनी योग्यता व क्षमतानुसार दूसरों की अधिक से अधिक भलाई सोचे एवं करें। लेकिन यह भी एक सच है कि इसके परिणाम घातक ही रहे हैं। हमारी भलाई से लाभ उठाने वालों ने इसे हमारी सदाशयता नहीं कोई कमजोरी समझा। लाभ उठाने वाले हम लोगों को ही नुकसान पहुंचाने लगे तब हमें मजबूरन यह निर्णय करना पड़ा है कि अबसे किसी के साथ उदारता नहीं बरतेंगे, किसी का भला नहीं करेंगे। 2015 में इलाहाबादी प्रोफेसर, उल्टी टोपीवाला जैसे मिश्रा समर्थक, मिश्रा वादी अपने ज्ञानी होने के अहंकार से ग्रस्त लोगों ने मुझसे लाभ उठाकर मुझको नष्ट करने का बीड़ा उठा रखा है। उल्टी टोपीवाला का आस्ट्रेलियाई fb फ्रेंड भी उसकी इस मुहिम में जुड़ा हुआ है।
एक बैंक अधिकारी ने यशवंत को घेरने का प्रयास एक बैंक कर्मचारी नेता और मिश्रा के चहेते केसरी के इशारे पर किया। ये बाजारवादी अब सिर्फ मुझे ही नहीं बल्कि मेरे पुत्र को भी परेशान करने पर आमादा हैं । अतः इनकी धूर्तता के चलते ही हम लोगों को भविष्य में किसी का भला न करने का निर्णय लागू करना होगा। हालांकि 2015 में ही ब्लाग जगत के पुराने साथी और fb पर भी फ्रेंड ज्ञान चंद मर्मज्ञ जी ने अपने निबंध संग्रह को भेंट कर हमारे ज्ञान में वृद्धि करने का अमूल्य उपहार प्रदान किया। उनको हम एक कवि के रूप में उनके ब्लाग से ही जानते थे। किन्तु उनके निबंध जो वास्तव में उनके ‘संपादकीय लेख ‘ हैं उनके नाम के शब्दों-‘ज्ञान’ व ‘मर्मज्ञ’ को सर्वथा सार्थक करते हैं। वर्ष 2015 में यह ज्ञान भेंट हमारे लिए एक बड़ी प्रेरक शक्ति भी बनी है।
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https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/992433697485273?pnref=story
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Vijai RajBali Mathur

December 29, 2015 near Lucknow ·

उल्टी टोपी वाला लगातार ‘मिश्रा वाद ‘ का जहर घोल रहा था तब उसे रेस्टरिक्ट कर दिया था और जब उसने ‘मिश्रा पुराण ‘ के नए-नए अध्याय बढ़ाने शुरू किए तब ‘ब्लाक’ कर दिया था और उससे किसी भी प्रकार का संपर्क न रखने की सूचना इसी वाल पर दे दी थी। लेकिन आज फिर अपरान्ह 03 : 36 से 03 : 46 के मध्य उसने 5 बार फोन काल्स किए जिनको अटेण्ड करने का सवाल ही नहीं था। काठ की हांडी सिर्फ एक बार ही आग पर चढ़ती है और वह खुद अपना व अपनी बेटी का ज्योतिषीय विश्लेषण हासिल कर चुका है अब और कुछ मुझसे जानकारी हासिल करना संभव नहीं है।
बड़े बाप का बेटा होने के गरूर में अटकल पच्चू जो कुछ भी वह लिख देता है चापलूस लोग उसे फटाफट लाईक कर डालते हैं। प्रस्तुत फोटो उसकी फूहड़ पन से भरी एक पोस्ट का है जिसमें उसने अपनी पत्नी व एक पड़ोसन की खिल्ली उड़ाई है और उसे 140 से अधिक लोगों के लाईक्स मिल चुके हैं जिसमें ब्राह्मण वह वकील साहब भी हैं जो ‘एथीज़्म’के सबसे बड़े अलमबरदार खुद को बताते हैं। क्या एथीज़्म बाजारवादी अश्लीलता का ही पर्याय है? फूहड़ पन का प्रतीक है? इसी एथीज़्म ने आज केंद्र में पोंगा-पंथियों की फासिस्ट सरकार गठित करा दी है। यदि ‘धर्म’ के ‘मर्म’ को जनता को समझाया जाता तो जनता फासिस्टों के पोंगा-पंथ में फँसने से बच जाती और आज जो फासिस्ट तानाशाही का खतरा मंडरा रहा है उसका वजूद भी न होता।
उल्टी टोपी/खोपड़ी वाले जब तक प्रभावशाली रहेंगे। जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ना फासिस्टों के लिए आसान बना रहेगा।

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कल दिनांक 01 जनवरी 2016 को 10:33am,10 :34 am,06:46 pm आज दिनांक 02-01-16 को 01:38pm,01:39 pm पर फिर उल्टी टोपीवाला के फोन काल्स यह देखते हुये भी आए कि, उनको अटेण्ड किया ही नहीं जाएगा। जिनको काफी काबिल माना जाता हो वे इतना भी न समझते हों कि अनावश्यक तंग करने से भी अब उनकी कोई और चाल सफल नहीं हो सकती तब तो आश्चर्य ही होता है।

 

विद्रोही स्व-स्वर में :बाबूजी का जन्मदि न पर एक स्मरण —— विजय राजबली माथुर

**जन्मदिन 24 अक्तूबर पर एक स्मरण बाबूजी का :

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(ताज राजबली माथुर : जन्म 24 -10-1919 मृत्यु 13-06-1995 )

हमारे बाबूजी का जन्म 24-10-1919 को दरियाबाद, बाराबंकी में हुआ था और मृत्यु 13-06-1995 को आगरा में । बाबूजी जब चार वर्ष के ही थे तभी दादी जी नहीं रहीं और उनकी देख-रेख तब उनकी भुआ ने की थी। इसीलिए जब बाबूजी को बाबाजी ने जब पढ़ने के लिए काली चरण हाई स्कूल, लखनऊ भेजा तो वह कुछ समय अपनी भुआ के यहाँ व कुछ समय स्कूल हास्टल में रहे।
भीखा लाल जी उनके सहपाठी और कमरे के साथी भी थे। जैसा बाबूजी बताया करते थे-टेनिस के खेल में स्व.अमृत लाल नागर जी ओल्ड ब्वायज असोसियेशन की तरफ से खेलते थे और बाबूजी उस समय की स्कूल टीम की तरफ से। स्व.ठाकुर राम पाल सिंह जी भी बाबूजी के खेल के साथी थे। बाद में जहाँ बाकी लोग अपने-अपने क्षेत्र के नामी लोगों में शुमार हुए ,हमारे बाबूजी 1939-45 के द्वितीय विश्व-युद्ध में भारतीय फ़ौज की तरफ से शामिल हुए।

अमृत लाल नागर जी हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हुए तो ठा.रामपाल सिंह जी नवभारत टाइम्स ,भोपाल के सम्पादक। भीखा लाल जी पहले पी.सी एस. की मार्फ़त तहसीलदार हुए ,लेकिन स्तीफा देके भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए और प्रदेश सचिव भी रहे। बाबूजी को लगता था जब ये सब बड़े लोग बन गए हैं तो उन्हें पहचानेंगे या नहीं ,इसलिए फिर उन सब से संपर्क नहीं किया। एक आन्दोलन में आगरा से मैं लखनऊ आया था तो का.भीखा लाल जी से मिला था,उन्होंने बाबूजी का नाम सुनते ही कहा अब उनके बारे में हम बताएँगे तुम सुनो-उन्होंने वर्ष का उल्लेख करते हुए बताया कब तक दोनों साथ-साथ पढ़े और एक ही कमरे में भी रहे। उन्होंने कहा कि,वर्ल्ड वार में जाने तक की खबर उन्हें है उसके बाद बुलाने पर भी वह नहीं आये,खैर तुम्हें भेज दिया इसकी बड़ी खुशी है। बाद में बाबूजी ने स्वीकारोक्ति की कि, जब का.भीखा लाल जी विधायक थे तब भी उन्होंने बाबूजी को बुलवाया था परन्तु वह संकोच में नहीं मिले थे।


बाबूजी के फुफेरे भाई साहब स्व.रामेश्वर दयाल माथुर जी के पुत्र कंचन ने (10 अप्रैल 2011 को मेरे घर आने पर) बताया कि ताउजी और बाबूजी दोस्त भी थे तथा उनके निवाज गंज के और साथी थे-स्व.हरनाम सक्सेना जो दरोगा बने,स्व.देवकी प्रसाद सक्सेना,स्व.देवी शरण सक्सेना,स्व.देवी शंकर सक्सेना। इनमें से दरोगा जी को 1964 में रायपुर में बाबाजी से मिलने आने पर व्यक्तिगत रूप से देखा था बाकी की जानकारी पहली बार प्राप्त हुई थी ।

बाबू जी ने खेती कर पाने में विफल रहने पर पुनः नौकरी तलाशना शुरू कर दिया। उसी सिलसिले में इलाहाबाद जाकर लौट रहे थे तब उनकी कं.के पुराने यूनिट कमांडर जो तब लेफ्टिनेंट कर्नल बन चुके थे और लखनऊ में सी.डब्ल्यू.ई.की पोस्ट पर एम्.ई.एस.में थे उन्हें इलाहाबाद स्टेशन पर मिल गए। यह मालूम होने पर कि बाबूजी पुनः नौकरी की तलाश में थे उन्हें अपने दफ्तर में बुलाया। बाद में बाबूजी जब उनसे मिले तो उन्होंने स्लिप देकर एम्प्लोयमेंट एक्सचेंज भेजा जहाँ तत्काल बाबूजी का नाम रजिस्टर्ड करके फारवर्ड कर दिया गया और सी.डब्ल्यू ई. साहब ने अपने दफ्तर में उन्हें ज्वाइन करा दिया। घरके लोगों ने ठुकराया तो बाहर के साहब ने रोजगार दिलाया। सात साल लखनऊ,डेढ़ साल बरेली,पांच साल सिलीगुड़ी,सात साल मेरठ,चार साल आगरा में कुल चौबीस साल छः माह दुबारा नौकरी करके 30 सितम्बर 1978 को बाबू जी रिटायर हुए.तब से मृत्यु पर्यंत (13 जून 1995 )तक मेरे पास बी-560 ,कमला नगर ,आगरा में रहे। बीच-बीच में अजय की बेटी होने के समय तथा एक बार और बउआ के साथ फरीदाबाद कुछ माह रहे।
कुल मिला कर बाबूजी का सम्पूर्ण जीवन संघर्ष और अभावों का रहा। लेकिन उन्होने कभी भी ईमान व स्वाभिमान को नहीं छोड़ा। मैं अपने छोटे भाई-बहन की तो नहीं कह सकता परंतु मैंने तो उनके इन गुणों को आत्मसात कर रखा है जिनके परिणाम स्वरूप मेरा जीवन भी संघर्षों और अभावों में ही बीता है जिसका प्रभाव मेरी पत्नी व पुत्र पर भी पड़ा है।चूंकि बाबूजी अपने सभी भाई-बहन में सबसे छोटे थे और बड़ों का आदर करते थे इसलिए अक्सर नुकसान भी उठाते थे। हमारी भुआ उनसे अनावश्यक दान-पुण्य करा देती थीं। अब उनकी जन्म-पत्री के विश्लेषण से ज्ञात हुआ है कि इससे भी उनको जीवन में भारी घाटा उठाना पड़ा है। उनकी जन्म-कुंडली में ब्रहस्पति ‘कर्क’ राशिस्थ है अर्थात ‘उच्च’ का है अतः उनको मंदिर या मंदिर के पुजारी को तो भूल कर भी ‘दान’ नहीं करना चाहिए था किन्तु कोई भी पोंगा-पंडित अधिक से अधिक दान करने को कहता है फिर उनको सही राह कौन दिखाता? वह बद्रीनाथ के दर्शन करने भी गए थे और जीवन भर उस मंदिर के लिए मनी आर्डर से रुपए भेजते रहे। इसी वजह से सदैव कष्ट में रहे। 1962 में वृन्दावन में बिहारी जी के दर्शन करके लौटने पर बरेली के गोलाबाज़ार स्थित घर पहुँचने से पूर्व ही उनके एक साथी ने नान फेमिली स्टेशन ‘सिलीगुड़ी’ ट्रांसफर की सूचना दी। बीच सत्र में शाहजहांपुर में हम लोगों का दाखिला बड़ी मुश्किल से हुआ था।
बाबूजी के निधन के बाद जो आर्यसमाजी पुरोहित शांति-हवन कराने आए थे उनके माध्यम से मैं आर्यसमाज, कमलानगर- बल्केश्वर, आगरा में शामिल हो गया था और कार्यकारिणी समिति में भी रहा। किन्तु ढोंग-पाखंड-आडंबर के विरुद्ध व्यापक संघर्ष चलाने वाले स्वामी दयानन्द जी के आर्यसमाज संगठन में आर एस एस वालों की घुसपैठ देखते हुये संगठन से बहुत शीघ्र ही अलग भी हो गया था परंतु पूजा पद्धति के सिद्धान्त व नीतियाँ विज्ञान-सम्मत होने के कारण अपनाता हूँ।
मेरे पाँच वर्ष की आयु से ही बाबूजी ‘स्वतन्त्र भारत’ प्रति रविवार को ले देते थे। बाद में बरेली व मेरठ में दफ्तर की क्लब से पुराने अखबार लाकर पढ़ने को देते थे जिनको उसी रोज़ रात तक पढ्ना होता था क्योंकि अगले दिन वे वापिस करने होते थे, पुराने मेगजीन्स जैसे धर्मयुग,हिंदुस्तान,सारिका,सरिता आदि पूरा पढ़ने तक रुक जाते थे फिर दूसरे सप्ताह के पुराने पढ़ने को ला देते थे। अखबार पढ़ते-पढ़ते अखबारों में लिखने की आदत पड़ गई थी। इस प्रकार कह सकता हूँ कि आज के मेरे लेखन की नींव तो बाबूजी द्वारा ही डाली हुई है। इसलिए जब कभी भूले-भटके कोई मेरे लेखन को सही बताता या सराहना करता है तो मुझे लगता है इसका श्रेय तो बाबूजी को जाता है क्योंकि यह तो उनकी ‘दूरदर्शिता’ थी जो उन्होने मुझे पढ़ने-लिखने का शौकीन बना दिया था। आज उनको यह संसार छोड़े हुये बीस वर्ष व्यतीत हो चुके हैं परंतु उनके विचार और सिद्धान्त आज भी मेरा ‘संबल’ बने हुये हैं।

 

विद्रोही स्व-स्वर में झूठ की हांडी फूट गई — विजय राजबली माथुर

काठ की हांडी दोबारा आग पर चढ़ती है? :
कहावत तो यह है कि, काठ की हांडी दोबारा आग पर नहीं चढ़ती है। लेकिन इलाहाबादी प्रोफेसर साहब अपनी काठ की हांडी को दोबारा आग पर चढ़ाने की असफल कोशिश कर रहे हैं। विगत आठ जून को उनसे पहली व्यक्तिगत मुलाक़ात हुई और उनका एक परिचित के माध्यम से एक साक्षात्कार समाचार पत्र में छपवाने का कार्य क्या सम्पन्न करवा दिया उनको लगा कि एक ‘गुलाम’ मिल गया। बीस जून को वह घर पर आए तो एक अतिथि के रूप में उनको भोजन, चाय-नाश्ता भी करा दिया तो उनको लगा कि इस बेवकूफ को अपनी एक उंगली पर नचाया जा सकता है। ‘अतिथि सत्कार’, ‘सहायता’ और ‘गुलामी’ को इन प्रोफेसर साहब ने पर्यायवाची समझ लिया तो गलती किसकी है?
बीस जून को अनावश्यक मुस्कराहट फेंकने वाले अश्लीलता समर्थक बाजारवादी के प्रति प्रोफेसर साहब को आगाह किया था किन्तु तब यह पता नहीं था कि वह उसी मुस्कराहटे के इशारे पर छल कर रहे हैं। मुस्कराहटे ने अपनी जासूस के माध्यम से भी गुमराह करने का असफल प्रयास किया था। अब फिर से प्रोफेसर साहब को सक्रिय किया गया है। एक बार धोखा खाने व नुकसान उठाने के बाद कौन उनके झांसे में फँसेगा ? जबकि मैंने तो पटना के पत्रकार एक फेसबुक फ्रेंड को भी उनके प्रति ‘एलर्ट’ रहने का निवेदन किया था तब मैं खुद ही प्रोफेसर साहब की जली हुई काठ की हांडी को दोबारा आग पर चढ़वा दूंगा ऐसा सोचना प्रोफेसर साहब की ‘नादानी’ है या कोई ‘गंभीर साजिश ‘? इसे समझना क्या मुश्किल है ?

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विद्रोही स्व-स्वर में मिसेज X ( रेखा की ज न्मपत्री से साम्य ) व y कुंडलियों में क्या विशे ष है? —विजय राजबली माथुर

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मिसेज X (09 अक्तूबर 1954,प्रातः 04 बजे,आगरा)……………………………………………..मिसेज Y (07 सितंबर 1979,प्रातः 07-50,आगरा)

03 जून 2007 को हिंदुस्तान,आगरा के अंक मे प्रकाशित श्रीमती शबाना आज़मी और सुश्री रेखा की जन्मपत्रियों का विश्लेषण उन्हीं को आधार मान कर किया गया था। लेकिन आज यहाँ प्रस्तुत दोनों कुंडलियाँ मेरे द्वारा ही बनाई गई हैं और ये परस्पर माता-पुत्री की हैं। माता के लिए -मिसेज X और पुत्री के लिए मिसेज Y का प्रयोग किया जा रहा है। इस पूरे परिवार से एक ही कालोनी मे रहने के कारण जान-पहचान थी। ग्रहों की चाल को प्रेक्टिल रूप से स्पष्ट करने हेतु इन कुंडलियों का सहारा लिया जा रहा है । मिसेज X का जन्म आगरा मे,मद्रास मे जन्मी फिल्म अभिनेत्री ‘रेखा’ से लगभग 31 घंटे पूर्व हुआ है। रेखा और मिसेज X की राशियाँ एक ही ‘कुम्भ’ हैं किन्तु लग्न अलग-अलग हैं। मिसेज X की जन्मपत्री का चयन इसी वजह से किया है कि,’रेखा’ की जन्मपत्री का जो विवेचन दिया जा चुका है वह इस विश्लेषण की सहायता से आसानी से समझा जा सकता है।
मिसेज X
आगरा मे 09 अक्तूबर 1954 की प्रातः 04 बजे X का जन्म हुआ है उस आधार पर जन्म कुंडली बनी है। जन्म लग्न सिंह है,राशि कुम्भ है जो सुश्री रेखा की भी है। समस्त ग्रह रेखा और X की कुंडलियों मे एक ही राशियों मे हैं। जन्म समय मे 31 घंटे का अंतर होने के कारण सिर्फ लग्न अलग-अलग हैं। अतः ग्रह जिन भावों मे रेखा के हैं उससे भिन्न भावों मे X के हैं। X की जन्मपत्री के जिस भाव मे जिस राशि मे ग्रह हैं उनके अनुसार फल लिखा है और प्रेक्टिकल (वास्तविक ) जीवन मे वैसा ही चरितार्थ होता दिखा है अतएव ‘रेखा’की कुंडली मे उन्हीं ग्रहों के उन्हीं राशियों मे दूसरे भावों मे होने के कारण जो फल लिखा है वह भी प्रेक्टिकल (वास्तविक )जीवन मे वैसा ही चरितार्थ होना चाहिए । यही वजह X की जन्म कुंडली उदाहरणार्थ लेने का कारण बनी हैं।
X ने अपनी जन्मपत्री बनवाने को जब कहा तो विशिष्ट रूप से यह भी निवेदन * किया कि,लिखित मे जो दें उससे अलग हट कर उन्हें ,उनके निगेटिव प्वाईंट्स व्यक्तिगत रूप से ज़रूर बता दें। अमूमन तमाम बातें ऐसी रहती हैं कि नजदीकी से नजदीकी व्यक्ति भी निगेटिव प्वाईंट्स नहीं जान पाता है परंतु ग्रहों का ज्योतिषीय विश्लेषण उन तथ्यों को उजागर कर सकता है। चूंकि X की पुत्री Y को न्यूम्रोलाजी का कुछ ज्ञान था अतः उसने अपनी माँ को उनके अपने निगेटिव प्वाईंट्स बताये थे और उन्हीं का वेरीफिकेशन वह मुझ से कराना चाहती थीं,कि क्या ग्रहों की चाल से इतना सब वाकई ज्ञात हो सकता है ?शायद अपनी पुत्री के ज्योतिषीय ज्ञान पर उन्हें भरोसा न रहा हो किन्तु उन्होने मुझे बताया कुछ नहीं सिर्फ मुझ से बताने को कहा था और बाद मे आत्म-स्वीकृति द्वारा मेरे कथन की परिपुष्टि की थी।
X के शिक्षक पति बेहद सौम्य व्यवहार वाले थे। किन्तु उनकी (x की ) कुंडली मे स्थित राशि बता रही थी कि वह काफी उग्र स्वभाव के और आक्रामक होंगे। अतः विश्लेषण लिखना शुरू करने से पूर्व X से साफ-साफ पूछा कि क्या मास्टर साहब जैसे दिखाई देते हैं उसके उलट स्वभाव उनका है ,क्या वह वास्तव मे दबंग हैं? X का जवाब प्रश्नवाचक था कि क्या उनकी कुंडली से उनके पति का यह स्वरूप सामने आया है। हाँ कहने पर उन्होने कुबूल किया कि शहर मे तो वह नम्र रहते हैं गाँव मे दबंगी दिखाते हैं कभी वांछित व्यक्ति न मिलने पर उसके घर से भैंस खोल कर अपने घर ले आए थे। समस्त बातें रफ पेपर से पढ़ कर उन्हें सुना दी जिन्हें उन्होने स्वीकार कर लिया परंतु लिखित मे वही दिया जो पॉज़िटिव था। बाद मे X ने अपने हाथ मे भी निगेटिव बातों का ज्ञान होने की बात पूछी थी उन्हें बता दिया था कि जन्मपत्री को गणना मे गलती के आधार पर आप नकार भी दें लेकिन अपनी लकीरों को छिपा या बदल नहीं सकती हैं।
X के पति भाव मे बैठा ‘चंद्र’ उनके पति को ऊपर से सौम्य बनाए हुये था और लग्न पर पूर्ण सप्तम दृष्टि के कारण खुद X के चेहरे को लावण्य मय रूप प्रदान कर रखा था ,लग्न ने कमर तक उनके शरीर को आकर्षकत्व प्रदान किया था। उनकी कुंडली मे पति का कारक ग्रह ब्रहस्पति द्वादश भाव मे उच्च का है और नवम दृष्टि से आयु के 20 वे भाव को देख रहा है जहां ‘मीन’ राशि स्थित है जो खुद बृहस्पति की ही राशि है । अतः जीवन के 20वे वर्ष मे उनका विवाह तय हो गया और 08 दिसंबर 1974 को विवाह बंधन मे बंध गईं।उस समय वह बृहस्पति की महादशा के अंतर्गत ‘चंद्र’ की अंतर्दशा मे थीं जिसका प्रभाव बाधापूर्ण होता है। तृतीय भाव मे उच्च का शनि है जिसने उनके बाद भाई नहीं उत्पन्न होने दिये। उनके बाद दो बहने और हुई तब ही भाई हुये। शनि की स्थिति उन्हें निम्न -स्तर के कार्यों हेतु प्रेरित करने वाली है। सुख भाव मे मंगल की वृश्चिक राशि मे शुक्र स्थित है जो यह दर्शाता है कि विपरीत योनि के लोग उनमे आकर्षण रखते होंगे और वह उनमे ,उनके जीवन मे उनके प्रेमियों का भी हस्तक्षेप होगा। हाथ की लकीरों से रिश्ता भी स्पष्ट था और उन्हें बता दिया कि छोटे देवर व छोटे बहनोई से उनका शारीरिक संबंध होना चाहिए जिसे यह कह कर उन्होने कुबूल किया कि इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। पंचम संतान भाव मे ‘मंगल’ व ‘राहू’ की स्थिति से उन्होने बचपन मे अपनी पुत्री Y के अनुत्तीर्ण होने की ही बात नहीं स्वीकारी बल्कि हँसते हुये यह भी स्वीकार किया कि " ‘एबार्शन’ तो जान-बूझ कर करवाए -कितने बच्चे पैदा करते?" उन्होने यह भी स्वीकार किया कि पैदा करने पर पहचान का भी भय था।उनकी प्रथम संतान पुत्र है जो ग्रह योगों के अनुरूप ही पूर्ण आज्ञाकारी है। मिसेज Y उनकी दूसरी संतान है और उससे एक वर्ष छोटी दूसरी पुत्री है। उच्च के बृहस्पति ने धन-दौलत,मान-सम्मान,उच्च वाहन सुख सभी प्रदान किए हैं।

मिसेज Y
Y की राशि भी अपनी माँ वाली ‘कुम्भ’ही है परंतु लग्न-‘कन्या’ है जो ‘प्रेम’ मे असफलता प्रदान करती है। और इस कुंडली मे लग्नेश,पंचमेश व सप्तमेश सभी ‘द्वादश’भाव मे बैठे है जो ‘व्यय भाव’ होता है। अतः Y को प्रेम के मामले मे सावधानी की आवश्यकता थी जो बात उसने अपनी माँ के माध्यम से पुछवाई थी। X को स्पष्ट रूप से बता दिया गया था कि यदि विवाह करना हो तो ‘एरेंज्ड मेरेज’ के जरिये ही हो वरना ‘प्रेम-विवाह’ सफल नहीं हो सकता। यह बात Y के 2003 मे जाब पर बेंगलोर जाते समय X ने पूछी थी और 2008 मे जब Y ने अंतरजातीय प्रेम विवाह की बात उठाई तो मास्टर साहब ने बेटी और उसके प्रेमी को गोली से उड़ा देने की धमकी दी। X ने पूर्व जानकारी के आधार पर कोई नाटक खेला जिसमे उनका बी पी भी काफी लो हो गया और मास्टर साहब की पूर्व शिष्या लेडी डॉ के मुताबिक दिमाग पर भी झटके का असर था। लिहाजा अपनी शिष्या रही डॉ की सलाह पर मास्टर साहब ‘एरेंज्ड मेरेज’ करने को राजी हो गए। 15 दिन की तड़ापड़ी मे तैयारी करके 29 जनवरी 2008 को Y का विवाह किया गया।
X और Y की जब तुलना की जाये तो ग्रहों की चाल का असर साफ-साफ समझ आ जाएगा। इंटर पास X को सफलता और क्वालिफ़ाईड इंजीनियर Y को असफलता अपने-अपने ग्रहों के अनुरूप ही मिल रही थी। यदि पूर्व मे ज्योतिषीय ज्ञान से खतरे का आंकलन न होता तो निश्चय ही Y को अपने प्रेमी सहित मौत का सामना करना पड़ता क्योंकि कुंडली मे चंद्रमा षष्ट भाव मे राहू के साथ ‘ग्रहण योग’ बना रहा है। X की कुंडली मे लग्नेश सूर्य बुध की राशि मे है और बुध शुक्र की राशि मे शनि के साथ जो कि सप्तमेश है ,पंचम ‘प्रेम’ भाव मे शनि सरीखा राहू तो है ही पंचमेश बृहस्पति ‘चंद्र’ की राशि मे है और ‘चंद्र’ सप्तम भाव मे शनि की राशि मे। इस प्रकार लग्नेश,पंचमेश और सप्तमेश मे अच्छा तालमेल होने के कारण X विवाहोपरांत भी प्रेमियों से सफल संपर्क कायम रख सकीं जबकि Y को फजीहत और झगड़े के बाद ही X की तिकड़म और हस्तक्षेप से मन की मुराद पूरी करानी पड़ी। X के हाथ मे विवाह रेखा के समानान्तर दो और सफल रेखाएँ स्पष्ट रूप से स्थित हैं जबकि Y के हाथ मे एक ही रेखा भी जटिल संकेत देती है।

 

विद्रोही स्व-स्वर में उदारता और संघर्ष — विजय राजबली माथुर

**कल तीन अगस्त को यह ब्लाग प्रारम्भ किए हुये पाँच वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। पचास वर्ष पूर्व जब सिलीगुड़ी में नौवीं कक्षा में पढ़ रहा था तब कोर्स के एक निबंध का यह वाक्यांश आज भी याद है -" उदारता एक मानवीय गुण है सभी को उदार होना चाहिए किन्तु उसके साथ-साथ पात्र की अनुकूलता भी होनी चाहिए। "
याद होने के बावजूद कभी-कभी अयोग्य और प्रतिकूल पात्र को न पहचान पाने के कारण भारी नुकसान भी उठाना पड़ता है। हाल के ऐसे ही कुछ सच्चे घटनाक्रम का उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ। :
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https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/919462651449045

जिनकी चर्चा है वह महानुभाव फेसबुक पर रिक्वेस्ट भेज कर फ्रेंड बन गए थे। मित्रता दिवस पर उनकी एक टिप्पणी सुदामा व कृष्ण के विपरीत प्राप्त हुई। न केवल उनकी टिप्पणी को हटाना पड़ा बल्कि उनको भी फ्रेंड लिस्ट से ब्लाक कर दिया। ऐसे लोग शरारतन ही फ्रेंड बनते होंगे।
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https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/919466114782032
यह एक ‘नास्तिक’ संप्रदाय के बड़े नेता के विचार हैं जो सुनने की उनसे अपेक्षा नहीं थी। ‘कथनी-करनी में अंतर’ के इस जमाने में उनको पहचानने में भी चूक हुई जो गैर-जिम्मेदाराना सीख सुनने को मिली।
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https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/919467598115217
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https://www.facebook.com/photo.php?fbid=918461774882466&set=pcb.918462944882349&type=1&theater
ब्राह्मण वाद के कुचक्र में फंसे एक गैर ब्राह्मण विद्वान की यह दुखद गाथा है। इस चित्र में जिस अपने ब्राह्मण मित्र को पुरुसकृत होते देख कर वह अतीव प्रसन्न हैं वही इनकी एक साक्षात्कार की खबर पढ़ कर सन्न रह गया तथा उसने इनकी ही एक ब्राह्मण शिष्या को मोहरा बना कर उससे कहलवाया कि इनको सहयोग न दिया जाये जिस संबंध में इनको उचित समय से सूचित भी कर दिया था। इनको वांछित विद्वानों से परिचित भी करवा दिया था। किन्तु एक और ब्राह्मण ने उन विद्वानों में से एक के विरुद्ध अनर्गल आलाप किया व 20 जून 2015 को मुद्रा राक्षस जी की जयंती के कार्यक्रम में एक और बूढ़े ब्राह्मण ने कुटिल मुस्कान फेंकी तब तत्काल इनको आगाह कर दिया था। फिर भी अपने चचेरे भाई व इन चारों ब्राह्मणों के जाल-जंजाल में यह इस बुरी तरह फंस गए हैं कि उससे निकलना अब इनके लिए मुमकिन नहीं रह गया है तभी तो अनावश्यक आरोपों का तोहफा भेंट कर गए। जवाब देना बेहद ज़रूरी था जो समुचित प्रकार से दे दिया गया है। इनके साथ उदारता बरतना व इनको सहयोग करना मुझे काफी नुकसानदायक रहा लेकिन वह तो भुगतना ही था जब ‘पात्र की अनुकूलता’ पर पहले ही ध्यान नहीं दिया था तो। निम्न चित्रों से इनके परिवर्तित चरित्र का स्पष्ट परिलक्षण हो जाएगा कि ब्राह्मण वाद के कुचक्र में फँसने से पहले यह ठीक चल रहे थे और जाल में फँसने के बाद कैसे बिदक गए थे।
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* " उदारता एक मानवीय गुण है सभी को उदार होना चाहिए किन्तु उसके साथ-साथ पात्र की अनुकूलता भी होनी चाहिए। "
इसके साथ-साथ मैंने अपने लिए इन सिद्धांतों को भी बनाया हुआ है जिन पर ही चलता हूँ :
**’Quick & Fast Decision but Slow & Steady Action’
***’Decided at Once decided for Ever &Ever’
अपने ही बनाए सिद्धांतों पर तो अमल कर ले जाता हूँ 50 वर्ष पढे सिद्धान्त पर अमल करने में चूक गलत पहचान करने के कारण हो जाती है। बचपन से ही स्वभाव सब की मदद करने का रहा है जबकि तमाम लोग मदद लेकर लात मारते रहे हैं उनके खुद के अनुसार उनको मदद करना मेरी अपनी ही गलती थी। और सज़ा उसी को मिलेगी जो गलती करेगा। प्रतीत होता है कि अब शेष बची ज़िंदगी में दूसरों को मदद करने की बात को ‘दिल’ व ‘दिमाग’ से निकाल देने का समय आ गया है।

 

विद्रोही स्व-स्वर में कुछ आज की :कुछ कल क ी ‘ टाईम नहीं है ‘ — विजय राजबली माथुर

टाईम नहीं है :
July 3,2015 at 9:37am · Edited ·

कल दो पहर पौने दो बजे एक साहब का फोन आया कि यदि शाम को पानी नहीं बरसा तो वह अपने भाई साहब के काम से आएंगे। शाम तक मौसम सूखा रहने पर पौने छह बजे उनकी सूचना आई कि कुछ तकनीकी कारणों से वह न आ सकेंगे फिर कल -वल में देखेंगे।
इस प्रसंग ने कुछ पुरानी यादें ताज़ा कर दीं। बात 15 वर्ष पुरानी 2000 ई .की हैं। मैंने सरला बाग,दयालबाग (आगरा ) में अपना ज्योतिष कार्यालय खोला था। आर्यसमाज के नेता और व्यापारी एस पी कुमार साहब का सुझाव था कि खुद को व्यस्त दिखाओ और जब कोई बुलाये तो उसको कहो कि टाईम नहीं है बाद में समय लेना। इसी प्रकार हमारे पड़ौसी नरेंद्र चौहान साहब का सुझाव था कि एक पर्दा लगा कर पार्टीशन कर लो तथा बाहर लोगों से इंतज़ार करवाओ जिससे लगे कि काफी व्यस्त हो।
कुमार साहब को हार्ट अटेक हुआ और उनकी दुकान में चोरी भी हो गई ,वह व्यापार समेट कर बंगलौर चले गए। चौहान साहब पर भी हार्ट अटेक ने धावा किया। सब को त्वरित उपचार की ज़रूरत थी यदि तब डॉ/चिकित्सक भी टाईम के नाम पर उनसे इंतज़ार करवाते तो उन पर कैसी बीतती?
मैंने उनमें से किसी के सुझाव को नहीं माना था और लोगों को तत्काल उपलब्ध रहता था। यह अलग बात है कि जिनको मैंने मदद की उन लोगों में से अधिकांश ने मतलब निकल जाने के बाद लात ही मारी। किन्तु वक्त पर मुझे अनजान-अपरिचित लोगों की सहायता मिलती रही है।
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/905345732860737

July 7,2015 at 8:18pm · Lucknow ·

कुछ अराजक व शरारती स्वभाव के लोग जब अपने खास संबंधियों को भी न बख्शें और किसी अन्य से यह अपेक्षा करें कि वह/वे उनके बहकावे में आकर उनके जाल मे फंस जाएँगे। तब इसे उन ज़रूरत से ज़्यादा चालाक लोगों की ‘परले दर्जे की मूर्खता’ ही माना जाएगा।

Satyanarayn Tirpathi पर ऐसेलोग ही अपने को सबसेज्यादा होशियार मान के चलते है पर समाज मेउनकाआत्मिक सम्मान उनकास्वय कापरिवार ही नहीकरता ॽ
Yesterday at 6:14am
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/907424232652887

 
 
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